भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 475, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमाज ने जिस प्रकार मूर्तिपूजा और धार्मिक संकीर्णताओं के विरुद्ध संघर्ष
किया है, उसी प्रकार उसे इस विश्वास के विरुद्ध भी संघर्ष करना होगा। इसी तरह
इन्सान जब अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश करेगा और यथार्थवादी बनेगा, तो
उसे अपनी आस्तिकता को झटककर फेंक देना पड़ेगा और परिस्थितियाँ चाहे उसे
कैसी भी मुसीबत और परेशानी में डाल दें, उनका सामना मर्दानगी के साथ करना
पड़ेगा। मेरी हालत ठीक इसी तरह की है।
मेरे दोस्तो, यह अहम्मन्यता नहीं है। यह मेरे सोचने का तरीक़ा है, जिसने मुझे
नास्तिक बना दिया है। मैं नहीं जानता कि ईश्वर में विश्वास करने और रोज़ प्रार्थना
करने से – जिसे मैं आदमी का सबसे स्वार्थपूर्ण और घटिया काम समझता हूँ –
मुझे राहत मिलती या मेरी हालत और भी बदतर हुई होती। मैंने उन नास्तिकों के
बारे में पढ़ा है, जिन्होंने साहसपूर्वक सारी मुसीबतों का सामना किया। उन्हीं की तरह
मैं भी यह कोशिश कर रहा हूँ कि आख़िर तक, फाँसी के तख़्ते पर भी, मर्द की
तरह सिर ऊँचा किये खड़ा रहूँ।
देखिये, इस कोशिश में कहाँ तक क़ामयाब होता हूँ। एक मित्र ने मुझसे प्रार्थना
करने के लिए कहा था। जब उन्हें पता चला की मैं नास्तिक हूँ, तो उन्होंने कहा,
“अपने अन्तिम दिनों में तुम ईश्वर को मानने लगोगे।” मैंने कहा, “नहीं जनाब, यह
नहीं होगा। मैं इसे अपने लिए अपमान और पस्तहिम्मती का काम समझूँगा। स्वार्थपूर्ण
इरादों से प्रार्थना हरगिज़ नहीं करूँगा।” पाठको और मित्रो, क्या यह अहम्मन्यता है?
अगर है तो मैं इसका हामी हूँ।
(अक्टूबर, 1930)
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 469