भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 474, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंआपका दूसरा तर्क यह हो सकता है कि जन्म से ही अन्धे या लंगड़े पैदा होने
वाले बच्चे यदि पूर्वजन्म के कर्मों के कारण नहीं तो और किस कारण से ऐसे पैदा
होते हैं। जीवविज्ञानी इसकी व्याख्या कर चुके हैं और उनके अनुसार यह महज एक
जीववैज्ञानिक घटना है। उनके अनुसार इसके लिए माता-पिता उत्तरदायी होते हैं,
चाहे वे गर्भावस्था में ही बच्चे में हो जाने वाली विकृतियों को जन्म देने वाले अपने
कार्यों के प्रति सचेत हों या न हों।
स्वाभाविक है कि अब आप एक और सवाल पूछेंगे – हालाँकि सारतः वह
सवाल बचकाना है। आपका सवाल होगा : यदि ईश्वर था ही नहीं तो लोग उसमें
विश्वास कैसे करने लगे? मेरा उत्तर स्पष्ट और संक्षिप्त है। लोग जिस तरह भूतों
और प्रेतात्माओं में विश्वास करने लगे, उसी तरह ईश्वर में विश्वास करने लगे; फ़र्क़
सिर्फ़ यह है कि ईश्वर में विश्वास सर्वव्यापी है और इसका दर्शन बहुत विकसित
है। कुछ परिवर्तनवादी यह मानते हैं कि ईश्वर की उत्पत्ति शोषकों की चालबाज़ी
से हुई, जो एक परमसत्ता के अस्तित्व का प्रचार करके और फिर उससे प्राप्त सत्ता
और विशेष अधिकारों का दावा करके लोगों को गुलाम बनाना चाहते थे। मैं यह
नहीं मानता कि उन्हीं लोगों ने ईश्वर को पैदा किया, हालाँकि मैं इस मूल बात से
सहमत हूँ कि सभी विश्वास, धर्म, मत और इस प्रकार की अन्य संस्थाएँ अन्ततः
दमनकारी तथा शोषक संस्थाओं, व्यक्तियों और वर्गों की समर्थक बनकर ही रहीं।
राजा के विरुद्ध विद्रोह करना हर धर्म के मुताबिक़ पाप है।
ईश्वर की उत्पत्ति के बारे में मेरा अपना विचार यह है कि मनुष्य ने जब अपनी
कमियों और कमज़ोरियों पर विचार करते हुए अपनी सीमाओं का अहसास किया
तो मनुष्य को तमाम कठिन परिस्थितियों का साहसपूर्वक सामना करने और तमाम
ख़तरों के साथ वीरतापूर्वक जूझने की प्रेरणा देने वाली तथा सुख-समृद्धि के दिनों
में उसे उच्छृंखल हो जाने से रोकने और नियन्त्रित करने वाली सत्ता के रूप, ईश्वर,
की कल्पना की। अपने निजी नियमों वाले और पालनहार जैसी उदारता वाले ईश्वर
की कल्पना ख़ूब बढ़ा-चढ़ाकर की गयी और वैसा ही उसका विशद चित्रण किया
गया। उसके क्रोध और मनमाने नियमों की चर्चा करके उसका इस्तेमाल एक
निवारक तत्त्व के रूप में किया जाता था, ताकि आदमी समाज के लिए ख़तरा न
बन जाये। उसके पालनहार जैसे गुणों की चर्चा करके उससे पिता, माता, बहिन और
भाई, मित्र और सहायक का काम लिया जाता था, ताकि आदमी जब भारी मुसीबत
में हो और सब लोग धोखा देकर उसका साथ छोड़ गये हों तो वह इस विचार से
तसल्ली पा सके कि कम से कम एक तो उसका सच्चा मित्र है जो उसकी
सहायता करेगा, उसे सहारा देगा, और जो ऐसा सर्वशक्तिमान है कि कुछ भी कर
सकता है। आदिम युग के समाज में यह चीज़ सचमुच बड़ी उपयोगी थी। मुसीबत
में पड़े आदमी के लिए ईश्वर का विचार मददगार होता था।
468 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़