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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 788 में से

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पृष्ठ 27

प्रो. बिपनचन्द्र के एक शोध-निबन्ध ‘1920 के दशक में उत्तर भारत में क्रान्तिकारी
आतंकवादियों की विचारधारा का विकास' को रखा जा सकता है।
पुस्तक के पहले खण्ड में भगतसिंह और उनके साथियों के सभी उपलब्ध
पत्रों-दस्तावेज़ों के विषयानुसार, और कालक्रमानुसार दस उपखण्डों में बाँटकर
प्रस्तुत किया गया है। इस खण्ड के अन्त के ग्यारह परिशिष्टों में हिन्दुस्तान
सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के वैचारिक विकास को सही पृष्ठभूमि में
समझने के लिए उसके पूर्ववर्ती संगठन हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के दो
दस्तावेज़ और उसके शीर्ष नेताओं के कुछ पत्रों को भी शामिल कर लिया है। इनके
अतिरिक्त इन परिशिष्टों में ग़दर पार्टी के क्रान्तिकारी नेता व सिद्धान्तकार लाला
हरदयाल का लेख ‘वर्ग रुचि का आन्दोलनों पर असर' भी शामिल कर लिया गया
है जो सितम्बर 1928 में ‘किरती' में ‘एक निर्वासित, एम.ए.' के नाम से प्रकाशित
हुआ था। इस लेख में सामाजिक आन्दोलनों के वर्ग विश्लेषण की जो पद्धति
अपनायी गयी है, उसमें उस योजक सूत्र को ढूँढ़ा जा सकता है जो ग़दर पार्टी की
परम्परा से एच.एस.आर.ए. को जोड़ता है और जिसके चलते ग़दर पार्टी की धारा
के क्रान्तिकारियों का बहुलांश आगे चलकर भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन में
शामिल हो गया। उल्लेखनीय है कि लाला हरदयाल के इस लेख पर भगतसिंह और
उनके साथियों ने गहराई से विचार किया था। जब यह लेख ‘किरती' में प्रकाशित
हुआ था, उस समय भगतसिंह भी उसके सम्पादक-मण्डल में शामिल थे।
अभी भी यह नहीं कहा जा सकता कि भगतसिंह और उनके साथियों का
सम्पूर्ण कृतित्व प्रकाश में आ चुका है। घर से भागकर कानपुर आने और पत्रकार
के रूप में 'प्रताप' में काम करने के समय से लेकर जेल जाने के समय तक
'प्रताप' (कानपुर), 'महारथी' (दिल्ली), 'चाँद' (इलाहाबाद), 'अर्जुन'
(दिल्ली) और 'मतवाला' आदि कई हिन्दी पत्रिकाओं में भगतसिंह कई छद्म नामों
से लिखा करते थे। 'किरती' में वह 'विद्रोही' उपनाम से पंजाबी में लिखते थे और
कई सम्पादकीय भी मुख्यतः उन्होंने ही लिखे थे। उर्दू में भी वह अच्छा लिखते
थे। इनमें से जो कुछ भी अब तक ढूँढ़ा जा सका है, उसके अतिरिक्त भी काफ़ी
कुछ बचे होने की सम्भावना है क्योंकि हिन्दी, उर्दू, पंजाबी पत्रिकाओं का इतिहास-
लेखन के स्रोत के रूप में इस्तेमाल करने की दिशा में अभी भी न के बराबर काम
हुआ है, राष्ट्रीय अभिलेखागार के प्रतिबन्धित साहित्य के प्रभाग और सरकारी
दस्तावेज़ों को भी व्यवस्थित ढंग से खँगालने का काम अभी पूरा नहीं हो सका है।
ब्रिटिश अभिलेखागार और इण्डिया ऑफ़िस लाइब्रेरी तथा पाकिस्तान के
अभिलेखागार को भी अभी पूरी तरह से छाना नहीं गया है। भगतसिंह और उनके
साथियों के लेखों-पत्रों की खोजबीन जब कुछ गम्भीरता से शुरू हुई, तब तक उस
युग के अधिकांश सम्पादक, प्रकाशक और लेखक जीवित नहीं बचे थे।
भगतसिंह की वैचारिक विरासत और हमारा समय / 21