भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 28, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ें‘मैं नास्तिक क्यों हूँ?’ जैसे कई महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों और जेल नोटबुक का
जिस तरह आठवें-नवें दशक में पता चला, उसे देखते हुए, अभी भी कुछ सामग्री
यहाँ-वहाँ पड़ी होगी, यह मानने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं। इसीलिए इस संकलन
को हमने ‘सम्पूर्ण दस्तावेज़’ के बजाय ‘सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़’ नाम दिया है।
शिव वर्मा और भगतसिंह के कई साथियों तथा कई इतिहासकारों द्वारा
उल्लिखित इस तथ्य की भी चर्चा यहाँ ज़रूरी है कि भगतसिंह ने जेल में सतत
गहन अध्ययन करने, मुक़दमे की कार्रवाई में हिस्सा लेने तथा पत्रों, सन्देशों
और विविध दस्तावेज़ों के लेखन के अतिरिक्त चार पुस्तकें और लिखी थीं :
(1) ‘आत्मकथा’ (2) ‘समाजवाद का आदर्श’ (3) ‘भारत में क्रान्तिकारी
आन्दोलन’ और (4) ‘मृत्यु के द्वार पर’। इन पुस्तकों की पाण्डुलिपियों के ग़ायब
होने की कई रहस्यमय कहानियाँ चलन में रही हैं और माना यही जाता है कि वे
नष्ट हो चुकी हैं। लेकिन इस बात से अभी भी पूरी तरह से इन्कार नहीं किया जा
सकता कि जेल नोटबुक की तरह किसी के व्यक्तिगत संग्रह से या किसी
अभिलेखागार से सहसा ये पाण्डुलिपियाँ भी बरामद हो जायें। ‘भगतसिंह के सम्पूर्ण
दस्तावेज़’ (2004) के अपने सम्पादकीय निबन्ध में चमनलाल ने बिना किसी
तथ्य के और निहायत लचर तर्क के आधार पर एक विचित्र अटकल प्रस्तुत की
है। उनका कहना है कि हो सकता है कि इन चार पाण्डुलिपियों का कोई अस्तित्व
ही न हो। वह अटकल लगाते हैं कि ‘आत्मकथा’ और ‘मृत्यु के द्वार पर’ शीर्षक
पाण्डुलिपियाँ डॉन ब्रीन की आत्मकथा का ही प्रारूप हो सकती हैं। ‘भारत में
क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास’ उनके अनुसार जेल में रहते हुए लिख पाना
असम्भवप्राय था। साथ ही, वह यह भी कहते हैं कि तार्किक स्तर पर जेल प्रवास
के दो साल में चार पुस्तकों का लेखन असम्भव है। यह अटकल विचित्र ही नहीं,
बचकानी ओर ग़ैर-ज़िम्मेदाराना भी है, जिसकी अपेक्षा कम से कम ऐतिहासिक
दस्तावेज़ों का सम्पादन करने वाले किसी व्यक्ति से नहीं की जानी चाहिए। पहली
बात तो यह कि भगतसिंह को जब 12 सितम्बर 1929 से लिखने के लिए नोटबुक
और पढ़ने के लिए किताबों की सुविधा मिलने लगी थी, तो भला यह सम्भव क्यों
नहीं है कि वे जेल में रहकर भारत के क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास लिख
सकें? बल्कि सम्भावना तो इसी बात की ज़्यादा है कि सशस्त्र क्रान्ति की
मध्यवर्गीय सोच से आगे किसानों-मज़दूरों के जन-संगठन बनाने तथा साथ ही गुप्त
क्रान्तिकारी पार्टी बनाने की मार्क्सवादी अवस्थिति तक पहुँचने के बाद
समाहारमूलक दृष्टि से भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास लिखने का
विचार भगतसिंह के मस्तिष्क में आया हो। जहाँ तक जेल-जीवन के दो वर्षों के
जेल-जीवन के दौरान चार पुस्तकों के लेखन को तार्किक दृष्टि से असम्भव मानने
की बात है, तो यह तो और अधिक हास्यास्पद है। चमनलाल को साइबेरिया-प्रवास
22 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़