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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 788 में से

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पृष्ठ 211

राज स्थापित हुए, लेकिन पूर्ण स्वतन्त्रता तब भी न मिली। उधर जिस वक़्त आस्ट्रिया
का मन्त्री मैटरनिक एकतन्त्र शासन की तरफ़ से दमन कर लोगों को उसका विरोधी
बना रहा था, उधर अमेरिका के पंचायती राज में बेचारे गुलामों की बुरी स्थिति हो
गयी थी। तब फ़्रांस के ग़रीब लोग भी अनेक बार कोशिशें करके उठ और गिर रहे
थे। आज भी फ़्रांस में पंचायती राज है, लेकिन लोग पूरी तरह स्वतन्त्र नहीं हैं। इसलिए
अराजकतावादी कहते हैं कि कोई भी राज नहीं चाहिए। बाक़ी सब बातों में वे
साम्यवादियों के समान हैं लेकिन इन दोनों बातों का अन्तर है। प्रख्यात साम्यवादी कार्ल
मार्क्स के प्रख्यात साथी फ़्रेडरिक एंगेल्स ने भी अपने और मार्क्स के साम्यवाद के
सम्बन्ध में लिखा है कि हमारा भी यही आदर्श है : Communism also looks
forward to a period in the evolution of the society when the State will become
superfluous and having no longer any function to perform, will die away.
अर्थात वह भी समझते हैं कि अन्त में राजसत्ता की कोई ज़रूरत नहीं रहेगी।
ख़ैर, तात्पर्य तो यह है कि वे चाहते हैं कि राजसत्ता न रहे और लोग भ्रातृत्व
से रहें। मैकियावली इटली का राजनीतिज्ञ था। वह कहता था कि राज कोई न कोई
ज़रूर होना चाहिए। चाहे वह पंचायती हो या एक राजा का। उसकी यह मान्यता
थी कि राज हो और मज़बूत लोहे के हाथ-सा हो। लेकिन अराजकतावादी कहते
हैं कि नरम और गरम क्या? हमें न पंचायती राज चाहिए और न कोई अन्य। वे कहते
हैं : "Undermine the whole conception of a State and then and then only we
have Liberty worth having" अर्थात राजसत्ता का विचार भी दुनिया में ख़त्म
किया जाये, तभी कोई स्वतन्त्रता प्राप्त हो सकेगी।
लोग कहेंगे कि भला यह कोई बात हुई, राजसत्ता न होगी, क़ानून न होगा,
क़ानून मनवाने वाली पुलिस न होगी तो अन्धेरगर्दी मच जायेगी। राजनीति के प्रख्यात
दार्शनिक डेविड थोरियन ने कहा है कि "Law never made man a whit more just,
and by means of their respect for it even the well disposed are daily made
gents of injustice."
इसमें तो कोई असत्यता नज़र नहीं आती। हमें नज़र आता है कि ज्यों-ज्यों
क़ानून सख़्त होते हैं त्यों-त्यों भ्रष्टाचार भी बढ़ता है। यह तो आम शिकायत है कि
पहले किसी प्रकार की लिखा-पढ़ी के बिना हज़ारों रुपयों का लेन-देन होता था
और कोई बेईमानी नहीं करता था। अब हस्ताक्षर, अँगूठे, साक्ष्य और रजिस्ट्रियाँ होती
हैं। लेकिन बेईमानी बढ़ रही है। फिर वे तो इसका निदान यही सुझाते हैं कि प्रत्येक
मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति होती रहे, सभी कार्य उसकी इच्छानुसार होते
रहें, तब कोई पाप या जुर्म न होगा।
"Crime is naught but misdirected energy. So long as every institution
of today, economic, political, social and moral conspires to misdirect human
अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का अध्ययन / 205