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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 788 में से

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पृष्ठ 206

के लिए कहीं से पिस्तौल या बम लेकर निकलता है तो सभी नौकरशाह और उनके
पिट्ठू 'अनार्किस्ट-अनार्किस्ट' कहकर दुनिया को डराते हैं। अनार्किस्ट एक बड़ा
खूँखार व्यक्ति समझा जाता है, जिसके दिल में कि ज़रा भी दया न हो, जो
रक्तपिपासु हो, नाश-महानाश देखकर जो झूम उठता हो। अनार्किस्ट शब्द इतना
बदनाम किया जा चुका है कि भारत में राज-परिवर्तनकारियों को भी – जनता में
घृणा पैदा करने के लिए – अनार्किस्ट कहा जाता है। डॉक्टर भूपेन्द्रनाथ दत्त ने
बंगला में लिखी पुस्तक 'अप्रकाशित राजनीतिक इतिहास' के प्रथम भाग में इसका
ज़िक्र किया है कि हमें बदनाम करने के लिए सरकार भले ही अनार्किस्ट-
अनार्किस्ट कहती रहे, वास्तव में वह राज-परिवर्तनकारियों की टोली थी। और
अराजकतावाद तो एक बहुत ऊँचा आदर्श है। उस ऊँचे आदर्श तक तो हमारी
साधारण जनता क्या सोचती, क्योंकि वह तो राज-परिवर्तनकारियों से आगे
युगान्तकारी भी नहीं थे। वे लोग मात्र राज-परिवर्तनकारी ही थे। खैर।
हम चर्चा कर रहे थे कि अराजकतावादी शब्द बहुत बदनाम किया गया है।
और स्वार्थी पूँजीपतियों ने जिस तरह 'बोल्शेविक', 'कम्युनिस्ट', 'सोशलिस्ट'
आदि शब्द बदनाम किये हैं, उसी प्रकार इस शब्द को भी बदनाम किया। हालाँकि
अराजकतावादी सर्वाधिक संवेदनशील मनवाले, सारी दुनिया का भला चाहने वाले
होते हैं। उनके विचारों के साथ भिन्नता रखते हुए भी उनकी गम्भीरता, जनता से
स्नेह, त्याग और उनकी सच्चाई आदि पर किसी प्रकार की शंका नहीं हो सकती।
'अनार्किस्ट', जिसके लिए हिन्दी में 'अराजकतावादी' शब्द ही प्रयोग में लाया
जाता है, यूनानी भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है – एन = नॉट, आर्की
= रूल, अर्थात शासनविहीन – किसी भी प्रकार से शासित न होना। इन्सान में पहले
से ही अधिक से अधिक स्वाधीनता पाने की चाह रही है और बीच-बीच में पूर्ण
स्वतन्त्रता, जोकि अराजकतावादी आदर्श है, से मिलता-जुलता विचार प्रकट हुआ।
उदाहरणस्वरूप काफ़ी पहले एक यूनानी दार्शनिक ने कहा था –
We wish neither to belong to the governing class nor to the governed.
अर्थात, हम न शासक बनना चाहते हैं और न ही प्रजा।
मैं समझता हूँ कि हिन्दुस्तान में विश्व-भ्रातृत्व और संस्कृत के वाक्य 'वसुधैव
कुटुम्बकम्' आदि में भी यही भाव है। अगर हम बहुत पुरानी मान्यताओं से किसी
ख़ास नतीजे तक न भी पहुँच सकें तो भी यह तो स्वीकारना पड़ेगा कि यह विचार
उन्नीसवीं अर्थात पिछली सदी के आरम्भ में एक फ़्रांसीसी दार्शनिक प्रूढ़ों ने स्पष्ट
तौर पर जनता के समक्ष रखा और उसका खुलेआम प्रचार किया। इसलिए उन्हें
अराजकतावाद का जन्मदाता कहा जाता है। उन्होंने इसका प्रचार आरम्भ किया। बाद
में एक रूसी बहादुर, बैकुनिन ने इसके प्रसार और सफलता के लिए काफ़ी काम
किया। बाद में जॉन मास्टर प्रिन्स क्रोपोटकिन जैसे अनेक अराजकतावादियों ने जन्म
200 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़