भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 207, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंलिया। आजकल अमेरिका में श्रीमती एमा गोल्डमैन और अलेक्ज़ेण्डर बैक़मैन आदि
इसके प्रचारक हैं।
अराजकतावाद के सन्दर्भ में श्रीमती गोल्डमैन ने लिखा है –
Anarchism—The philosophy of a new social order based on liberty
unrestricted by man-made law. The theory that all forms of Government
rest on violence, and are therefore wrong and harmful, as well as unnec-
essary. (अर्थात)
अराजकतावाद एक नया दर्शन है जिसके अनुसार एक नया समाज बनेगा।
जनता का रहन-सहन या भ्रातृत्व ऐसा होगा जिसमें कि मनुष्य के बनाये नियम कोई
अवरोध न पैदा कर सकेंगे। उनके अनुसार किसी भी शासन की ज़रूरत नहीं
महसूस होती, क्योंकि प्रत्येक सरकार दमन पर टिकी होती है। इसलिए यह
अनावश्यक है।
इससे पता चलता है कि अराजकतावादी किसी भी प्रकार की सरकार नहीं
चाहते और यह बात सत्य है। लेकिन यह सुनकर हम भयभीत होते हैं। हमारे मनों
में कई प्रकार के हौवे पैदा किये जाते हैं। हम अंग्रेज़ी सरकार के बाद अपनी सरकार
बनाकर भी भूत देख-देखकर डरें और हमेशा थर-थर काँपते रहें, यही हमारे
शासकों की नीयत होती है। ऐसी हालत में हम कैसे एक मिनट के लिए भी सोच
सकते हैं कि ऐसा भी कोई समय आयेगा कि जब सरकार के बिना भी हम सुखी
और स्वतन्त्र रह सकेंगे। लेकिन इसमें हमारी स्वयं की दुर्बलताएँ हैं। आदर्श या
भावना का कोई क़सूर नहीं है।
अराजकतावाद के अनुसार जिस आदर्श स्वतन्त्रता की कल्पना की जाती है वह
पूर्ण स्वतन्त्रता है, जिसके अनुसार न तो मन पर भगवान या धर्म का भूत सवार हो,
न माया या सम्पत्ति के लालच का जनून समाया हुआ हो और न ही शरीर पर किसी
प्रकार की या सरकारी ज़ंजीरें कसी हुई हों। इसका अर्थ यह है कि वह (निम्नोक्त)
तीनों मोटी-मोटी बातों को दुनिया से पूरी तरह ख़त्म कर देना चाहते हैं : 1. चर्च,
भगवान और धर्म, 2. स्टेट (सरकार), 3. प्राइवेट प्रापर्टी (निजी सम्पत्ति)।
यों तो यह विषय बहुत रोचक और विस्तृत है जिसके लिए काफ़ी कुछ लिखा
जा सकता है लेकिन अब यह लेख हम बहुत अधिक बढ़ा नहीं सकते, क्योंकि
स्थानाभाव है। इसलिए हम मोटी-मोटी बातों का ही उल्लेख करेंगे।
भगवान और धर्म
सबसे पहले हम भगवान और धर्म को लेते हैं। हिन्दुस्तान में भी अब इन दोनों भूतों
के विरुद्ध आवाज़ उठ रही है, लेकिन यूरोप में तो पिछली सदी से ही इसके विरुद्ध
विद्रोह उठ खड़ा हुआ था। वह तो आरम्भ ही उस युग से करते हैं जबकि जनता
अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का अध्ययन / 201