भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 200, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंस. अजीत सिंह के पश्चात लाला लाजपतराय भाषण देने के लिए उठे। लाला
जी पंजाब के बेजोड़ भाषणकर्ता थे, किन्तु उस दिन के वातावरण में वे जिस शान,
जिस निर्भीकता तथा निश्चयात्मक भावनाओं के साथ बोले, उसकी बात ही कुछ
निराली थी। लाला जी के भाषण की एक-एक लाइन पर तालियाँ बजती थीं और
जय के नारे बुलन्द होते थे। सभा के पश्चात बहुत-से व्यक्तियों ने अपने को देश
का कार्य करने हेतु अर्पित करने की घोषणा की।
लायलपुर के डी.सी. भी वहाँ उपस्थित थे। सभा की कार्यवाही देखकर उन्होंने
यह परिणाम निकाला कि यह सारा आयोजन एक षड्यन्त्र था। लाला लाजपत राय
इन सबके गुरु हैं और नवयुवक स. अजीत सिंह उनका शिष्य है। सरकार का यह
विचार बहुत दिनों तक बना रहा। सम्भवतः लाला जी और अजीत सिंह जी को
नज़रबन्द करने का भी यही कारण था।
लाला जी के भाषण के बाद श्री बाँकेदयाल जी ने एक बहुत ही प्रभावशाली
नज़्म पढ़ी, जो बाद में अत्यन्त लोकप्रिय हो गयी। यह नज़्म 'पगड़ी सँभाल ओ
जट्टा' थी।
लाला बाँकेदयाल पुलिस में सब-इंस्पेक्टर थे, और सरकारी नौकरी छोड़कर
इस आन्दोलन में सम्मिलित हो गये थे। इस दिन नज़्म पढ़कर जब वह मंच से उतरे
तो भारतमाता सोसायटी के कार्यकर्ताओं ने उनको गले से लगा लिया।
लाहौर में हुए दंगे के बाद म्युनिसिपल बोर्ड ने एक प्रस्ताव पास किया था कि
शहर में सभी कॉलेजों के प्रिंसिपलों से कहा जाये कि वे विद्यार्थियों को राजनीतिक
आन्दोलनों में भाग लेने से रोकें और उन्हें छात्रावास से बाहर न जाने दें। जो विद्यार्थी
उनकी आज्ञा का पालन न करे उसे कड़ा से कड़ा दण्ड दिया जाये।
इस प्रस्ताव के सम्बन्ध में लोकमान्य तिलक ने अपने मराठी पत्र 'केसरी' में
एक ज़बरदस्त लेख लिखा था। लोकमान्य ने लिखा था कि इस दंगे पर किसे खेद
और दुख न होगा? कौन चाहता है कि युवक थोड़े धैर्य से काम न लें? लेकिन
म्युनिसिपल बोर्ड के इस प्रस्ताव का क्या आशय है? पचास वर्ष बाद आज देश
के युवकों में थोड़ी-सी जागृति दिखायी दी है। उसे एक साधारण-से बलवे के
कारण नष्ट करने का प्रस्ताव क्यों किया जाये? आज जब युवकों में देश-भक्ति
की भावनाएँ उमड़ रही हैं और वे स्वाधीनता के लिए बेचैन हैं तो उनको प्रेम के
साथ समझाना चाहिए कि वे अपनी शक्ति का इस प्रकार अपव्यय न करें।
जनता जोश में आकर जब कुछ कर गुज़रती थी तो गरम दल की यही नीति
होती थी। गरम दल के नेता जानते थे कि जब जनता में जागृति होती है, तो उसके
साथ जोश और बेचैनी होना भी अवश्यम्भावी है। वे यह भी जानते थे कि
फूँक-फूँककर क़दम रखने वाले महानुभाव स्वतन्त्रता के संघर्ष में अधिक समय
तक नहीं टिक सकते। राष्ट्र के निर्माता तो नवयुवक ही हुआ करते हैं। किसी ने
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