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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 788 में से

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पृष्ठ 198

नगर के नेता माने जाने वाले सज्जनों से सम्पर्क स्थापित किया, किन्तु वहाँ से भी
उन्हें साफ़ जवाब मिला। हर ओर से मायूस होकर वे बेचारे म्युनिसिपल गार्डन में
जा बैठे। इसी बीच 'भारतमाता सोसाइटी' के सदस्यों को इसकी सूचना मिली और
वे इन लोगों को अपने स्थान पर ले आये। सोसाइटी के पास एक कमरे के अतिरिक्त
एक विशाल मैदान भी था। इस मैदान में दरियाँ बिछाकर शामियाना लगवा दिया
गया और एक ओर उन किसानों के भोजन के लिए लंगर का प्रबन्ध कर दिया गया।
इससे किसानों का उत्साह बहुत बढ़ गया और फिर पूरे एक सप्ताह प्रतिदिन वहीं
सभाएँ हुईं, जिनमें निर्भीक भाषण दिये गये। इस सभा में आम किसानों का उत्साह
देखकर 'भारतमाता सोसाइटी' के सदस्यों का हौसला और भी बढ़ गया।
इसके बाद देहातों के दौरे का कार्यक्रम बनाया गया, जिससे किसानों को
लगानबन्दी के लिए तैयार किया जा सके। यह सरकार के विरुद्ध युद्ध की घोषणा
थी और जनता में जोश इतना था कि इस संघर्ष में वह अपना सर्वस्व दाँव पर लगा
देने के लिए तत्पर रहती थी।
सूफ़ी अम्बाप्रसाद
ठीक इन्हीं दिनों भारतमाता सोसाइटी में एक उच्च कोटि के देशभक्त, राजनीतिक
और लेखक प्रविष्ट हुए। आपका नाम श्री सूफ़ी अम्बाप्रसाद था। सूफ़ी जी का जन्म
सन् 1858 में मुरादाबाद में हुआ था। उर्दू के प्रभावशाली लेखक, हिन्दू-मुस्लिम
एकता के प्रबल समर्थक तथा स्वतन्त्रता के एक निर्भीक पुजारी थे। आपने एक
साप्ताहिक निकाला था और इसके वर्षभर बाद ही राज-विद्रोह के अपराध में सवा
दो वर्ष के कारावास का दण्ड मिला। यह सज़ा काटकर आये तो सालभर के
भीतर-भीतर आपके ख़िलाफ़ दूसरा मुक़दमा खड़ा कर दिया गया और इस बार
आपको 6 वर्ष के कारावास का दण्ड मिला। उन दिनों राज-विद्रोह में दण्ड पाये
हुए क़ैदियों को बहुत ख़तरनाक माना जाता था और उनके साथ जेल में व्यवहार
भी बहुत बुरा होता था। सन् 1906 में आप जेल से रिहा हुए और पंजाब में यह
नयी राजनीतिक जागृति देखकर पंजाब चले आये। यहीं आकर आप 'हिन्दुस्तान'
साप्ताहिक के सहकारी सम्पादक बनाये गये। आपके गर्मगर्म लेखों और
सम्पादकियों में आपका नाम दिये जाने से अख़बार के मालिकों को बड़ी घबराहट
रहती थी। इस पर आपको उक्त अख़बार से त्यागपत्र देना पड़ा। सबसे पहले आप
जाटों की सभा में आये थे और फिर यहीं रह गये। बाद में तो सरदार अजीत सिंह
से आपकी ऐसी घनिष्ठता हो गयी थी कि एक-दूसरे से अलग होना सर्वथा
असम्भव हो गया।
इन्हीं दिनों लायलपुर में एक बहुत बड़ा मेला होने वाला था। यह मेला 'मण्डी
मवेशियाँ' के नाम से प्रसिद्ध था। इस मेले में लोग हज़ारों मवेशियों को
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