भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 155, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामक मुसलमान रियासत की इसी नाम की राजधानी में से गुज़र रहा था, वहाँ पर
उसने एक मुसलमान को देखा जो एक बैल पर अत्यन्त बोझ लादे, स्वयं उस पर
बैठा हुआ उसे पीटता जा रहा था। बैल बड़े कष्ट से चल रहा था। यह देखकर
उस कूके ने उस मुसलमान से कहा, “भाई! इतना अत्याचार न करो। बोझ पहले
ही ज़्यादा है, तुम नीचे उतर आओ तो क्या हर्ज़ हो?” परन्तु उस मुसलमान ने तुरन्त
उसे दो-चार गालियाँ दे दीं। कूका सिक्ख कोई भीरु या कायर तो था ही नहीं, ईंट
का जवाब पत्थर से मिला। नौबत हाथापाई तक आ गयी। मुसलमान रियासत के
मदमत्त मुसलमान कर्मचारी उसे पकड़कर कोतवाली में ले गये, जहाँ पर उस ग़रीब
को अनेकानेक यातनाएँ तथा अपमान सहन करने पड़े। और बाद में, उस बैल का,
उसके पास बैठाकर, उसकी आँखों के सामने, वध कर दिया गया। यह असह्य था।
छूटते ही वह वीर भैणी पहुँचा। उसने भरे दिवान में क्रूर आतताइयों के उन अत्याचारों
का विवरण तथा अपनी करुण कथा कह सुनायी। लोग तो रायकोट की घटना से
पहिले ही उत्तेजित हो रहे थे, उस पर यह घटना हो गयी। जलती पर तेल पड़ा और
भभक उठी। निज बाहुबल के भरोसे बदला चुकाने का निश्चय हो गया। जोश बढ़ता
देखकर गुरु जी तनिक घबराये। गले में कपड़ा डालकर प्रार्थना की, “खालसा जी!
क्या अनर्थ करने जा रहे हो। ज़रा शान्ति तथा सहनशीलता से काम लीजिये। ज़रा
सोचो तो सही, इस सबका क्या परिणाम होगा? सारा बना-बनाया काम बिगड़
जायेगा।” गुरु जी के इस प्रकार समझाने पर बहुत-से लोगों का जोश तो ठण्डा हो
गया, परन्तु 150 व्यक्ति प्रतिहिंसा की उग्र मूर्तियाँ बन उठे। उनका जोश न थमा।
गुरु जी ने लाख समझाने की चेष्टा की, परन्तु एक साथी का अपमान उनके लिए
असह्य हो उठा था।
बड़ी विकट परिस्थिति थी। काम अधूरा ही था और कोई तैयारी न की गयी
थी। ऐसी दशा में इन 150 उत्तेजित लोगों का साथ देने से सारा आन्दोलन पिस जाने
की सम्भावना थी। – क्या किया जाये? किंकर्तव्यविमूढ़ की भाँति सभी देख रहे
थे और देख रहे थे गुरु जी भी। और कोई दूसरा व्यक्ति ऐसे समय क्या करता?
अथवा ऐसे समय पर लोग क्या करने की सलाह दे सकते हैं? इस बात का हमें
पता नहीं, इसकी चिन्ता भी नहीं। दूरदर्शी गुरु राम सिंह ने उस समय यही सोचा
कि ये उत्तेजित लोग तो शान्त हो नहीं रहे हैं, इनकी इच्छानुसार अभी विद्रोह खड़ा
करने की तो तैयारी नहीं की गयी और अभी तो इच्छानुसार सब संगठन भी नहीं
हुआ। इस समय यदि ये जायें और हम सरकार पर यह प्रकट कर दें कि हमारा
इनसे कोई सम्बन्ध नहीं तो शेष आन्दोलन बच जायेगा। बात तो अच्छी दीख पड़ती
है, परन्तु राजनीतिक चालों का महत्त्व उनकी सफलता पर निर्भर हुआ करता है।
गुरु जी ने यह चाल चली थी, वह निष्फल हुई। पासा उलट गया। यही उनका
गुरुतर अपराध था। उन्होंने उसी समय पुलिस को ख़बर दे दी कि ‘ये लोग उत्तेजित
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 149