भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 154, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंपर सन्देह भी न था, फिर तुमने एकाएक अपराध स्वीकार कर मृत्यु का आह्वान
क्यों किया?” तो उसने कहा, “मेरे गुरु जी की ऐसी ही आज्ञा है।”
सरकार ने भी परीक्षा करनी चाही। एक सब-इंस्पेक्टर को भेजा। वह भी प्रसन्न
था। उसे आशा थी कि सब भेद खोलकर कुछ पुरस्कार पायेगा। गुरु जी के दर्शन किये।
लौट आया। लौटते ही त्यागपत्र दे दिया। अफ़सरों ने पूछा, “राम सिंह क्या कहता है?”
कहा, “बताने की आज्ञा नहीं।” पूछा गया, “त्यागपत्र क्यों देते हो?” उत्तर दिया, “गुरु
जी की यही आज्ञा है। वे कहते हैं, विदेशी शासकों की नौकरी मत करो।”
ऐसी अनेक घटनाएँ हैं। जो भी हो, इतना तो मानना ही पड़ेगा कि गुरु जी
ईश्वर-भक्ति तथा उच्च चरित्र के कारण एक महान शक्तिशाली महापुरुष थे। अतः
उपरोक्त घटनाएँ असम्भव नहीं। अस्तु। सरकार यह बात देखकर घबरायी और उसे
सारे आन्दोलन को दबाने की चिन्ता हुई। यह भी स्वाभाविक ही था।
अपरिपक्व विप्लव का प्रारम्भ
1869 में सब बन्धन हटा दिये गये। लोग सहस्रों की संख्या में भैणी आने लगे।
सन् 1871 ई. में कुछ कूके वीर अमृतसर में से गुज़र रहे थे। सुना, मुसलमान बूचड़
असंख्य गौओं की नित्य हिन्दुओं को चिढ़ाने के लिए उनके सामने हत्या करते हैं।
हिन्दू समाज को बहुत कष्ट होता है। कट्टर गो-भक्त कूके यह सब सहन न कर
सके। उन्होंने बूचड़खाने पर आक्रमण कर दिया और सभी बूचड़ों को वहीं ढेर कर
दिया और आप भैणी की ओर चल दिये। अमृतसर के सभी प्रतिष्ठित हिन्दू गिरफ़्तार
कर लिये गये। उधर गुरु जी को वैसे भी सारा समाचार मिल चुका था, इधर इन
कूकों ने जाते ही सब कहानी कह सुनायी। गुरु जी ने आज्ञा दी, “जाओ जाकर
अपना अपराध स्वीकार कर लो और उन निर्दोष लोगों को विपत्ति से बचाओ।”
आज्ञा का पालन हुआ। निरपराध लोग छूट गये और ये वीर अत्यन्त आनन्द और हर्ष
के साथ फाँसी पर लटक गये। ऐसी ही एक घटना रायकोट में भी हो गयी। वहाँ
पर भी कई कूकों को फाँसी पर लटका दिया गया था। परन्तु वहाँ पर शेष सिक्खों
ने अनुभव किया कि उनके निर्दोष साथी फाँसी पर लटकाये गये हैं। प्रतिहिंसा की
अग्नि प्रचण्ड हो उठी, परन्तु कोई विशेष घटना नहीं हुई।
13 जनवरी, सन् 1872 को भैणी में माघी का मेला होने वाला था। लोग
दूर-दूर से हज़ारों की संख्या में आने लगे। एक कूका नामधारी¹ वीर मलेर कोटला
- गुरु रामधारी के अनुयायी नामधारी तथा कूका कहलाते थे। नामधारी इसलिए कि गुरु
जी के उपदेश का आधार स्तम्भ ‘ईश्वर का नाम’ था। उस उपदेश और दीक्षा पाने के बाद
प्रत्येक मनुष्य ‘नामधारी’ अथवा ‘ईश्वर-नाम को हृदय में धारण किये हुए’ कहलाता था। कूका
इसलिए कि वे भगवद्जन में तन्मय होकर खूब शोर मचाते थे, अतः कूकने वाले ‘कूका’
कहलाते थे।
148 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़