भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 149, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंकि कर्तार सिंह भाई परमानन्द के इशारे पर ऐसा बयान दे रहे हैं, लेकिन वह विद्रोही
कर्तार सिंह के दिल की गहराइयों में नहीं उतर सकते थे। कर्तार सिंह का बयान
अधिक ज़ोरदार, अधिक जोशीला और पहले दिन की तरह ही इक़बालिया था।
आख़िर में आपने कहा, “अपराध के लिए मुझे उम्रक़ैद की सज़ा मिलेगी या फाँसी।
लेकिन मैं फाँसी को प्राथमिकता दूँगा, ताकि फिर जन्म लेकर – जब तक
हिन्दुस्तान आज़ाद नहीं हो, तब तक मैं बार-बार जन्म लेकर – फाँसी पर लटकता
रहूँगा। यही मेरी अन्तिम इच्छा है...”
आपकी वीरता से जज बहुत प्रभावित हुए, लेकिन उन्होंने विशाल दिलवाले
दुश्मन की तरह आपकी वीरता को वीरता न कहकर बेशर्मी के शब्दों में याद किया।
कर्तार सिंह को सिर्फ़ गालियाँ ही नहीं, मौत की सज़ा भी मिली। आपने मुस्कुराते
हुए जजों को धन्यवाद दिया। कर्तार सिंह फाँसी की कोठरी में क़ैद थे। आपके दादा
ने आकर कहा, “कर्तार सिंह, जिनके लिए मर रहे हो, वे तुम्हें गालियाँ देते हैं।
तुम्हारे मरने से देश को कुछ लाभ होगा, ऐसा भी दिखायी नहीं देता।” कर्तार सिंह
ने बहुत धीमे से पूछा –
“दादा जी, फलाँ रिश्तेदार कहाँ है?”
“प्लेग में मर गया।”
“फलाँ कहाँ है?”
“हैजे से मर गया।”
“तो क्या आप चाहते हैं कि कर्तार सिंह महीनों बिस्तर पर पड़ा रहे और पीड़ा
से दुखी किसी रोग से मरे! क्या उस मौत से यह मौत हज़ार गुना अच्छी नहीं?”
दादा चुप हो गये।
आज फिर सवाल उठता है कि उनके मरने से क्या लाभ हुआ? वह किसलिए
मरे? इसका जवाब बिल्कुल स्पष्ट है। देश के लिए मरे। उनका आदर्श ही देश-सेवा
के लिए लड़ते हुए मरना था। वे इससे ज़्यादा कुछ नहीं चाहते थे। मरना भी गुमनाम
रहकर चाहते थे।
चमन ज़ारे मुहब्बत में, उसी ने बाग़बानी की,
जिसने मिहनत को ही मिहनत का समर जाना।
नहीं होता है मुहताजे नुमाइश फ़ैज़ शबनम का,
अँधेरी रात में मोती लुटा जाती है गुलशन में।
डेढ़ साल तक मुक़दमा चला। 16 नवम्बर, 1915 का दिन था, जब उन्हें
फाँसी पर लटका दिया गया। उस दिन भी हमेशा की तरह खुश थे। इनका वज़न
दस पौण्ड बढ़ गया था। ‘भारतमाता की जय’ कहते हुए वे फाँसी के तख़्ते पर झूल
गये।
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 143