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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 788 में से

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पृष्ठ 147

पहुँच गये और उस आदमी के माथे पर पिस्तौल रखकर उसे निहत्था कर दिया।
फिर कड़ककर बोले, “पापी! तेरा अपराध बहुत गम्भीर है। तुम्हें सज़ा-ए-मौत
मिलनी चाहिए, लेकिन हालात की मजबूरी से तुम्हें माफ़ किया जाता है। फ़ौरन
इस लड़की के पाँवों में गिरकर माफ़ी माँग कि हे बहिन! मुझे माफ़ कर दो। और
इसकी माता जी के पैर छूकर कह कि माता जी, मैं इस पतन के लिए माफ़ी चाहता
हूँ। यदि वे तुम्हें माफ़ कर दें तो तुम्हें ज़िन्दा छोड़ दिया जायेगा वरना गोली से उड़ा
दिया जायेगा।” उसने ऐसा ही किया। बात अभी ज़्यादा नहीं बढ़ी थी। यह देखकर
माँ-बेटी की आँखें भर आयीं। माँ ने कर्तार सिंह को प्यार भरे लहजे में कहा, “बेटा!
ऐसे धर्मात्मा और सुशील नौजवान होकर आप इस काम में किस तरह शामिल
हुए?” कर्तार सिंह का भी दिल भर आया और कहा, “माँ जी! रुपये के लालच
में हमने यह काम शुरू नहीं किया। अपना सबकुछ दाँव पर लगाकर डकैती डालने
आये हैं। हथियार ख़रीदने के लिए रुपये की ज़रूरत है। वह कहाँ से लायें? माँ जी,
इसी महान काम के लिए आज इस काम पर मजबूर हुए हैं।” इस समय पर यह
दृश्य बड़ा दर्दनाक था। माँ ने फिर कहा, “इस लड़की की शादी करनी है। इसके
लिए कुछ छोड़ जाओ तो अच्छा है।” इसके बाद उन्होंने अपना सारा धन माँ के
सामने रख दिया और कहा, “जितना चाहें ले लें।” कुछ पैसा रखकर माँ ने बाक़ी
सारा रुपया कर्तार सिंह की झोली में डाल दिया और आशीर्वाद दिया, “जाओ बेटा,
तुम्हें सफलता मिले।” डकैती जैसे भयानक काम में शामिल होकर भी कर्तार सिंह
का दिल कितना भावनामय, पवित्र व विशाल था, यह इस घटना से ज़ाहिर है।
फ़रवरी, 1915 में विद्रोह की तैयारी थी। पहले सप्ताह आप पिंगले और दूसरे
दो-तीन साथियों के साथ आगरा, कानपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, मेरठ व अन्य कई
स्थानों पर मत और विद्रोह के लिए उनसे मेल-मिलाप कर आये। आख़िर वह दिन
क़रीब आने लगा, जिसका बड़ी देरी से इन्तज़ार हो रहा था। 21 फ़रवरी, 1915
भारत में विद्रोह का दिन नियत हुआ था। इसी के अनुसार तैयारी हो रही थी। लेकिन
इसी समय उनकी आशाओं के वृक्ष की जड़ में बैठा एक चूहा उसे कुतर रहा था।
चार-पाँच दिन पहले सन्देह हुआ कि किरपाल सिंह की ग़द्दारी से सब ध्वस्त हो
जायेगा। इसी आशंका से कर्तार सिंह ने रासबिहारी बोस से विद्रोह की तारीख़ 21
की बजाय 19 फ़रवरी करने के लिए कहा। ऐसा होने पर भी इसकी भनक
किरपाल सिंह को मिल गयी। इस क्रान्तिकारी दल में एक ग़द्दार का होना कितने
ख़तरनाक परिणाम का कारण बना। रासबिहारी और कर्तार सिंह भी कोई उचित
प्रबन्ध न होने से अपना भेद छिपा नहीं पाये। इसका कारण भारत के दुर्भाग्य के
सिवाय और क्या हो सकता है?
कर्तार सिंह पिछले फैसले के अनुसार पचास-साठ साथियों के साथ फ़िरोज़पुर
जा पहुँचे। अपने साथी सैनिक हवलदार से मिले और विद्रोह की बात की। लेकिन
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 141