भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 145, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंसानफ़्रांसिस्को की बन्दरगाह पर पहुँचे। आज़ाद देश में पहुँचकर क़दम-क़दम पर
आपके कोमल हृदय पर चोट पड़ने लगी। इन गोरों की ज़बान से Damn Hindu
(तुच्छ हिन्दू) और Black man (काला आदमी) आदि सुनते ही वे पागल हो उठते
थे। उनको क़दम-क़दम पर देश की इज़्ज़त व सम्मान ख़तरे में नज़र आने लगे।
घर की याद आने पर ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ विवश भारत सामने आ जाता। उनका
कोमल दिल धीरे-धीरे सख्त होने लगा और देश की आज़ादी के लिए ज़िन्दगी
कुर्बान करने का निश्चय दृढ़ होता गया। उनके दिल पर उस समय क्या गुज़रती
थी, यह हम कैसे समझ सकते हैं।
यह असम्भव था कि वे चैन से रह पाते। हर समय उनके सामने यह प्रश्न उठने
लगा कि यदि शान्ति से काम न चला तो देश आज़ाद किस तरह होगा? फिर बिना
अधिक सोचे उन्होंने भारतीय मज़दूरों का संगठन शुरू कर दिया। उनमें आज़ादी की
भावना उभरने लगी। हर मज़दूर के पास घण्टों बैठकर वे समझाने लगे कि अपमान
से भरी गुलामी की ज़िन्दगी से तो मौत हज़ार दर्जा अच्छी है। काम शुरू होने पर
और लोग भी उनसे आ मिले। मई, 1912 में इन लोगों की एक ख़ास बैठक हुई।
इसमें कुछ चुनिन्दा हिन्दुस्तानी शामिल हुए। सभी ने देश की आज़ादी के लिए तन,
मन, धन न्योछावर करने का प्रण लिया। इन्हीं दिनों पंजाब के जलावत़न देशभक्त
भगवान सिंह वहाँ पहुँचे। धड़ाधड़ जलसे होने लगे, उपदेश होने लगे। काम से काम
चलता गया। मैदान तैयार हो गया। फिर अख़बार की ज़रूरत महसूस होने लगी।
'ग़दर' नामक अख़बार निकाला गया। इसका प्रथम अंक नवम्बर 1913 में निकाला
गया। इसके सम्पादकीय विभाग में कर्तार सिंह भी थे। आपकी क़लम में अथाह
जोश था। सम्पादकीय विभाग के लोग अख़बार को हैण्ड प्रेस पर छापते थे। कर्तार
सिंह क्रान्ति-पसन्द मतवाले नौजवान थे। प्रेस चलाते हुए थक जाने पर वे गीत गाया
करते थे –
सेवा देश दी जिन्दड़िए बड़ी औखी,
गल्लाँ करनीआँ ढेर सुखल्लीयाँ ने।
जिन्हाँ देशसेवा विच पैर पाया,
उन्हाँ लक्ख मुसीबताँ झिल्लियाँ ने।
(देशसेवा करनी बहुत मुश्किल है, जबकि बातें करना खूब आसान है। जिन्होंने
देशसेवा के रास्ते पर क़दम उठा लिया वे लाख मुसीबतें झेलते हैं।)
कर्तार सिंह जिस लगन से परिश्रम करते थे उससे सभी की हिम्मत बढ़ जाती
थी। भारत को किस तरह आज़ाद कराया जाये, यह किसी और को पता चले या
नहीं, और किसी ने इस सवाल पर सोचा हो या नहीं, लेकिन कर्तार सिंह ने इस
सवाल पर बहुत कुछ सोच रखा था। इसी दौरान आप न्यूयार्क में विमान कम्पनी
में भरती हो गये और वहीं दिल लगाकर काम सीखने लगे।
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 139