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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 788 में से

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पृष्ठ 143

भारत के भीतर राज्य-क्रान्ति की सब चेष्टा विफल हो चुकी थी तो क्या,
बाहर तो अभी बड़े ज़ोरों में प्रयत्न हो ही रहा था। काबुल में उस समय भारत की
अस्थायी सरकार (Provisional Government of India) बनी हुई थी, जो जर्मनी
कमेटी से सहयोग करती हुई भारत-स्वतन्त्रता के प्रयत्न में लगी हुई थी। इस समय
अरब, मिस्र, मैसोपोटेमिया और ईरान आदि सभी प्रदेशों में भारतीय विप्लवी –
जिनमें हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख भी सम्मिलित थे – भारत में क्रान्ति करने की
चेष्टा कर रहे थे। उस सब प्रयास में डॉक्टर जी फिर से जुट गये। उसी के सम्बन्ध
में आपको जर्मनी जाना पड़ा। कुछ दिनों बाद आप फिर लौट आये। ईरान तक तो
आपको बहुत बार जाना पड़ा। फिर निश्चय हुआ कि अस्थायी सरकार की ओर से
एक स्वर्ण पत्र ज़ार, रूस के पास इस आशय का भेजा जाये कि वह भारत-क्रान्ति
की सहायता करे। अब की बड़ी शान से प्रस्थान किया गया। कई सेवक तथा
सामान के लदे हुए कई ऊँट आपके साथ थे। परन्तु उस समय कोई नीच पुरुष
आपकी यात्रा की सब ख़बर अंग्रेज़ सरकार को दे रहा था। यह वह नहीं जानते थे।
ताशकंद नगर में आपको गिरफ़्तार कर लिया गया। ईरान में लाकर शिनाख़्त की
गयी। अभियोग चला। बहुत लोगों ने यत्न किया कि आपको भारत सरकार के सुपुर्द
न किया जाये, परन्तु अब तक अन्य सभी प्रयत्नों में जो निष्फलता हुई थी, अब
ही क्यों सफलता होती?
लाहौर में लाये गये। इधर उन दिनों ओडायरशाही का ज़ोर था। कुछ दिन
न्याय-नाटक हुआ। मृत्यु-दण्ड सुनाया गया। आपने अत्यन्त आनन्द प्रदर्शित करते
हुए सुना। आपके छोटे भाई मुलाक़ात के लिए गये। आपने पूछा – “क्यों भाई, मेरे
मरने की तुम्हें चिन्ता तो नहीं? बालक ने रो दिया। आपने क्रोध-मिश्रित
उत्साहवर्द्धक स्वर से कहा – “वाह जी! यह समय आनन्द मनाने का है। क्या
सिक्ख लोग भी देश के लिए मरते समय रोया करते हैं? मुझे तो अत्यन्त आनन्द
है कि मैं भारतीय विप्लव को सफल बनाने के लिए जो मुझसे हो सका, कर चुका
हूँ, मैं बड़ी शान्ति से फाँसी के तख़्ते पर प्राण त्याग करूँगा।” इस तरह आपने
उसका उत्साह बढ़ाया।
फिर? फिर 27 मार्च, 1917 का दिन आ पहुँचा। उस दिन फिर वही नाटक
प्रारम्भ हुआ। उस दिन के नाटक में एक ही दृश्य हुआ करता है; और वह भी
कुछेक मिनट का। ये पगले लोग न जाने कहाँ से आ गये, जिन्हें न मृत्यु का भय
था, न जीने की चाह; कार्य-क्षेत्र में हँसे, युद्ध-क्षेत्र में हँसे, फाँसी के तख़्ते पर भी
मुस्कुरा दिये। उनकी महिमा अपरम्पार है।
'हों फ़रिश्ते भी फ़िदा जिन पर ये वो इन्सान हैं!'

विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 137