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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 788 में से

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पृष्ठ 141

कार्य सीखना शुरू किया। बड़ी चेष्टा से आप सब कार्य करते। तीन-चार वर्ष में
ही आप इस कार्य में प्रवीण हो गये। फिर आपने अपनी दुकान अलग खोल दी।
वह दुकान नौशेरा छावनी में थी, आप सभी देशों से चिकित्सा सम्बन्धी
पत्र-पत्रिकाएँ मँगवाया करते थे। विशेष शिक्षा ग्रहण करने के लिए आपने अमेरिका
जाने का विचार किया। दुकान का झंझट अभी तय भी न हो पाया था कि आपकी
सुपत्नी तथा सुपुत्री का देहान्त हो गया। परन्तु इससे क्या होता था? आपने उधर
प्रस्थान कर दिया। 1913 में आप चले थे। कुछ अधिक धन पास न होने के कारण
आपको शंघाई में ही रुक जाना पड़ा। वहीं पर आपने चिकित्सा-कार्य शुरू कर
दिया, जिसमें आपको बहुत सफलता हुई। परन्तु आपका इरादा कैनेडा जाने का था;
आप कुछ और भारतीयों के साथ उधर गये। परन्तु वहाँ पर बहुत दिक्कतें पेश आयीं।
पहले केवल आपको तथा एक और सज्जन को वहाँ उतरने की आज्ञा मिली, दूसरे
लोगों को नहीं। इस पर आपने वहाँ उतरना उचित न समझा। परन्तु साथियों के आग्रह
करने पर आप उतरे तो सही, परन्तु वहाँ पर इमिग्रेशन विभाग से अन्य साथियों के
लिए झगड़ा शुरू कर दिया। अभियोग तक चला। परन्तु क़ानून और कोर्ट
शक्तिशाली लोगों के लिए होते हैं न कि पराधीन देशवालों के लिए। वहाँ से आपको
तथा अन्य भारतीय यात्रियों को वापस लौटा दिया गया। बहाना वही कि कैनेडा में
किसी जहाज़ द्वारा सीधे नहीं आये। आप शंघाई लौट आये। आकर भारतीय लोगों
में अपनी दीन-हीन दशा की मार्मिक कथा सुनायी और श्री बाबा गुरुदत्त सिंह जी
को एक अपना जहाज़ बनाने की सलाह दी, जो सीधा कैनेडा जावे, इसी सलाह
पर बाबा जी ने कामागाटामारू जहाज़ किराये पर ले लिया और उसका नाम गुरु
नानक जहाज़ रखा। आपको इधर पंजाब आना पड़ा। जहाज़ जल्दी से तैयार हो गया,
अतः आप निश्चित दिन पर वहाँ न पहुँच सके। सिंगापुर से, 35 के लगभग अन्य
साथियों सहित, दूसरे जहाज़ से चले, ताकि शंघाई तक कामागाटामारू से मिलकर
उस पर सवार हों। हाँगकाँग पहुँचने पर पता चला कि जहाज़ वहाँ से भी चल चुका
है। इसलिए आप वहीं पर ठहर गये। अब तक आप भारत-स्वतन्त्रता के लिए जीवन
अर्पण करने का निश्चय कर चुके थे।
हाँगकाँग में आपने प्रचार-कार्य शुरू कर दिया। अमेरिका से ग़दर पार्टी का
'ग़दर' अख़बार आता था। आप भी वहीं पर वैसा ही गुप्त अख़बार छपवाकर लोगों
में बाँटने लगे। उधर कामागाटामारू जहाज़ पर जो-जो अत्याचार होने लगे उन सबके
समाचार आपको मिल रहे थे। जब मालूम हुआ कि कामागाटामारू जहाज़ को
वापिस आना ही पड़ेगा तब आपने बड़े ज़ोरों से प्रचार शुरू किया। उस समय
कैण्टन में एक सिक्ख पुलिस इंस्पेक्टर महाशय इन सभी आन्दोलनों को दबाने
की बहुत चेष्टा कर रहे थे। आपने उनसे मिलकर जो बातचीत की तो वे महाशय
भी इनकी सहायता करने लगे। आप किसी कार्यवश शंघाई गये। जाते समय सबसे
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 135