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सर्वकोश
भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 788 में से

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तथा उनके अन्य साथियों को चुपचाप भारत की अंग्रेज़ सरकार के सुपुर्द कर दिया।
सो क्यों? इसका भी एकमात्र कारण यही है कि भारत गुलाम था। गुलाम जाति के
लिए कौन ख़्वाहमख़्वाह की बला सिर पर लेता है। ख़ैर!
श्री बलवन्त सिंह जी को सिंगापुर लाया गया। संसारभर की धमकियाँ तथा
लोभ देकर सब भेद कह देने के लिए राजी करने के प्रयत्न किये गये, परन्तु उनके
पास मौन के सिवा क्या धरा था? आख़िर 1916 में आपको लाहौर-षड्यन्त्र के दूसरे
अभियोग में शामिल किया गया। अपराध वही था, जिसमें निष्फलता होने पर
मृत्यु-दण्ड ही मिला करता है। आप पर विद्रोह का आरोप लगाया गया। 24 दिन
नाटक हुआ। बेला सिंह जैण्ड आदि कई-एक गवाह आपके विरुद्ध पेश हुए। नाटक
दुखान्त था। अभियुक्त को साम्राज्य की बलि-वेदी पर कुर्बान करने का निश्चय
हुआ। मृत्यु-दण्ड सुनते ही देवता सहम गये। इस देवता को मृत्यु-दण्ड! राक्षसों-
दानवों में भीषण अट्टहास मच गया होगा।
काल कोठरी में बन्द हैं, सिक्ख होने पर टोपी नहीं पहन सकते। कम्बल ही
सर पर लपेट लिया है। बदनाम करने के लिए किसी ने शरारत की – कम्बल के
किसी एक कोने में अफ़ीम बाँध दी और कहा गया कि आप आत्महत्या करना
चाहते हैं। आपने अत्यन्त शान्ति से उत्तर दिया – “मृत्यु सामने खड़ी है। उसके
आलिंगन के लिए तैयार हो चुका हूँ। आत्महत्या कर मैं मृत्यु-सुन्दरी को कुरूपा
नहीं बनाऊँगा। विद्रोह के अपराध में मृत्यु-दण्ड पाने में गर्व अनुभव करता हूँ। फाँसी
के तख़्ते पर ही वीरतापूर्वक प्राण दूँगा।” पूछताछ करने पर भेद खुल गया। कुछ
नम्बरदार क़ैदियों तथा वार्डर को कुछ सज़ाएँ हुईं। सभी ने आपकी देशभक्ति तथा
निर्भीकता की दाद दी।
सन् 1916 के दिन थे। भारतवर्ष में कालेपानी और फाँसियों का ज़ोर था।
समस्त उत्तर भारत में एकाएक खलबली मच गयी थी! अन्दर ही अन्दर एक विराट
गुप्त विप्लव का आयोजन हो गया था, यह भारत की जनता न जानती थी। नेतागण
उन लोगों की ओर ताकने तक का साहस न करते थे। बहुत-से लोग समझते थे
कि सरकार ने यों ही देश को भयभीत करने के लिए ऐसे-ऐसे भीषण अभियोग
चला दिये हैं। जो भी हो, उस विराट आयोजन के निष्फल हो जाने पर भी उसकी
सुन्दर स्मृति बाकी है। वह सुन्दर है, इसलिए कि आदर्शवादी युवकों के पवित्र रक्त
से लिखी गयी है। बाक़ी है इसलिए कि कुर्बानियाँ कभी व्यर्थ नहीं जाया करतीं।
इसी वर्ष में (मार्च) चैत्र की 18 तारीख़ को श्री बलवन्त सिंह जी की धर्मपत्नी
भेंट के लिए गयीं। पुस्तक तथा वस्त्र देकर बताया गया – “कल 17 चैत्र को उन्हें
फाँसी दे दी गयी।” उनकी धर्मपत्नी कलेजा थामकर रह गयीं।
श्री बलवन्त की फाँसी के दिन के समाचार बाद में मिले। आपने प्रातःकाल
स्नान किया तथा अपने छह और साथियों सहित (जिन्हें उसी दिन फाँसी मिली
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 133