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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 2, कुल 788 में से

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पृष्ठ 2

अपने देश और पूरी दुनिया के क्रान्तिकारी साहित्य की
ऐतिहासिक विरासत को प्रस्तुत करने के क्रम में भगतसिंह और उनके
साथियों के महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों को हमने बड़े पैमाने पर जागरूक
नागरिकों और प्रगतिगामी युवाओं तक पहुँचाया है और इसी सोच के
तहत, अब भगतसिंह और उनके साथियों के अब तक उपलब्ध सभी
दस्तावेज़ों को पहली बार एक साथ प्रकाशित कर रहे हैं।
इक्कीसवीं शताब्दी में भगतसिंह को याद करना और उनके
विचारों को जन-जन तक पहुँचाने का उपक्रम एक विस्मृत
क्रान्तिकारी परम्परा का पुनःस्मरण मात्र ही नहीं है। भगतसिंह का
चिन्तन परम्परा और परिवर्तन के द्वन्द्व का जीवन्त रूप है और आज,
जब नयी क्रान्तिकारी शक्तियों को एक बार फिर संगठित होकर
साम्राज्यवाद और देशी पूँजीवाद के विरुद्ध संघर्ष की दिशा और मार्ग
का सन्धान करना है, जब एक बार फिर नयी समाजवादी क्रान्ति की
रणनीति और आम रणकौशल विकसित करने का कार्यभार हमारे
सामने है तो भगतसिंह की विचार-प्रक्रिया और उसके निष्कर्षों से हमें
कुछ बहुमूल्य चीजें सीखने को मिलेंगी।
परम्परा कभी भी उँगली पकड़कर भविष्य तक नहीं पहुँचाती।
वह एक दिशा देती है, बशर्ते कि हम आलोचनात्मक विवेक के साथ
इतिहास का अध्ययन करें और अपनी परम्परा की पहचान करें। हम
यह नहीं कहते कि भगतसिंह द्वारा सुझाया गया क्रान्ति का रास्ता
आज हमारे लिए पूरी तरह से प्रासंगिक है। तब से अब तक देश के
उत्पादन-सम्बन्धों, सामाजिक-आर्थिक संरचना, राज्यसत्ता के चरित्र
एवं कार्यप्रणाली तथा साम्राज्यवाद के चरित्र एवं कार्यप्रणाली में
महत्वपूर्ण बदलाव आये हैं, लेकिन आज की क्रान्ति के युवा हरावलों
के लिए भी भगतसिंह के चिन्तन के कुछ पक्ष नितान्त प्रासंगिक हैं।
इन्हें यदि सूत्रवत् बताना हो तो इस रूप में गिनाया जा सकता है :
(1) भगतसिंह और उनके साथियों की निरन्तर विकासमान
भौतिकवादी जीवनदृष्टि और द्वन्द्वात्मक विश्लेषण पद्धति
(2) साम्राज्यवाद के विरुद्ध जारी विश्व-ऐतिहासिक युद्ध के प्रति
उनका नज़रिया (3) राष्ट्रीय मुक्ति युद्ध को साम्राज्यवादी
विश्व-व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष का अंग मानने तथा समाजवादी
क्रान्ति की पूर्ववर्ती मंज़िल मानने का उनका नज़रिया (4) कांग्रेस
और गाँधी के वर्ग चरित्र का द्वन्द्वात्मक मूल्यांकन और कांग्रेसी नेतृत्व
वाली राष्ट्रीय आन्दोलन की मुख्य धारा की तार्किक परिणति का
प्रतिभाशाली पूर्वानुमान (5) क्रान्तिकारी आतंकवाद के विश्लेषण के
बाद उससे आगे बढ़कर क्रान्तिकारी जनदिशा पर बल देना,
मज़दूरों-किसानों को क्रान्ति की मुख्य शक्ति मानते हुए उन्हें संगठित
करने पर बल देना तथा सर्वहारा क्रान्ति को अपरिहार्य बताना (6)
एक क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट पार्टी की लेनिनवादी अवधारणा को
स्वीकारना और उसके निर्माण को ज़रूरी बताना (7)
धार्मिक-जातिगत-भाषाई कट्टरता का विरोध करना, आदि।
इन विचारों से देश की व्यापक जनता को, विशेषकर उन करोड़ों
जागरूक, विद्रोही, सम्भावनासम्पन्न युवाओं को परिचित कराना
आवश्यक है जिनके कन्धों पर भविष्य-निर्माण का कठिन ऐतिहासिक
दायित्व है। इसी उद्देश्य से भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण
उपलब्ध दस्तावेज़ों का यह संकलन प्रस्तुत है।
आयरिश क्रान्तिकारी डान ब्रीन की पुस्तक के भगतसिंह द्वारा किये
गये अनुवाद और उनकी जेल नोटबुक के साथ ही, भगतसिंह और उनके
साथियों के सभी उपलब्ध दस्तावेज़ों को हम पहली बार एक साथ
प्रकाशित कर रहे हैं। पुस्तक के पहले खण्ड में भगतसिंह और उनके
साथियों के सभी उपलब्ध पत्रों-दस्तावेज़ों को विषयानुसार और
कालक्रमानुसार दस उपखण्डों में बाँटकर प्रस्तुत किया गया है। इस
खण्ड के अन्त में ग्यारह परिशिष्टों में हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन
एसोसिएशन के वैचारिक विकास को सही पृष्ठभूमि में समझने के लिए
उसके पूर्ववर्ती संगठन हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के दो
दस्तावेज़ और उसके शीर्ष नेताओं के कुछ पत्रों को भी शामिल किया
है। इनके अतिरिक्त इन परिशिष्टों में गदर पार्टी के क्रान्तिकारी नेता व
सिद्धान्तकार लाला हरदयाल का लेख 'वर्ग रुचि का आन्दोलनों पर
असर' भी शामिल किया गया है जो सितम्बर 1928 में 'किरती' में 'एक
निर्वासित, एम.ए.' के नाम से प्रकाशित हुआ था।
अभी भी यह नहीं कहा जा सकता कि भगतसिंह और उनके
साथियों का सम्पूर्ण कृतित्व प्रकाश में आ चुका है। घर से भागकर
कानपुर आने और पत्रकार के रूप में 'प्रताप' में काम करने के समय से
लेकर जेल जाने के समय तक 'प्रताप' (कानपुर), 'महारथी' (दिल्ली),
'चाँद' (इलाहाबाद), 'अर्जुन' (दिल्ली) और 'मतवाला' आदि कई हिन्दी
पत्रिकाओं में भगतसिंह कई छद्म नामों से लिखा करते थे। 'किरती' में
वह 'विद्रोही' उपनाम से पंजाबी में लिखते थे और कई सम्पादकीय भी
मुख्यतः उन्होंने ही लिखे थे। उर्दू में भी वह अच्छा लिखते थे। इनमें से
जो कुछ भी अब तक ढूँढ़ा जा सका है, उसके अतिरिक्त भी काफी कुछ
बचे होने की सम्भावना है क्योंकि हिन्दी, उर्दू, पंजाबी पत्रिकाओं का
इतिहास-लेखन के स्रोत के रूप में इस्तेमाल करने की दिशा में अभी भी
न के बराबर काम हुआ है, राष्ट्रीय अभिलेखागार के प्रतिबन्धित साहित्य
के प्रभाग और सरकारी दस्तावेज़ों को भी व्यवस्थित ढंग से खंगालने का
काम अभी पूरा नहीं हो सका है। ब्रिटिश अभिलेखागार और इण्डिया
ऑफिस लाइब्रेरी तथा पाकिस्तान के अभिलेखागार को भी अभी पूरी
तरह से छाना नहीं गया है।
'मैं नास्तिक क्यों' जैसे कई महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों और जेल नोटबुक
का जिस तरह आठवें-नवें दशक में पता चला, उसे देखते हुए, अभी भी
कुछ सामग्री यहाँ-वहाँ पड़ी होगी, यह मानने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं।
इसीलिए इस संकलन को हमने 'सम्पूर्ण दस्तावेज़' के बजाय 'सम्पूर्ण
उपलब्ध दस्तावेज़' नाम दिया है।