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बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)

Bawan Kasni

सद्गुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sant Ashram Ranjari 2015 Edition · Sant Ashram Ranjari, Samba (J&K)

Devanagarihipublished122 पृष्ठ

मानवता का महान् मसीहा

6 साहिब बन्दगी

मानवता का महान् मसीहा

सतगुरु कबीर साहिब

सम्वत् 1455 सुदी 1398 ई. पूर्णिमा सोमवार के दिन अमृत वेला में महान् मानवतावादी सन्त सद्गुरू कबीर साहिब का अवतरण काशी के लहरतारा नामक तलाब में हुआ। उनके जन्म के विषय में जितनी शंकाएँ और भ्रम लोगों में हैं शायद ही किसी अन्य महात्मा के विषय में हो। किसी ने उन्हें कुंवारी ब्राह्मणी की सन्तान बताया, किसी ने अज्ञात बालक। किसी ने कुछ, किसी ने कुछ। आज भी उनका जन्म एवं जीवन संसार के लोगों के लिए रहस्य है। हालांकि उन्होंने अपने जीवन के विषय में स्वयं अपने शब्दों में रहस्य प्रकट किए हैं। अपना विवरण दिया है कि मैं उस परम सत्ता से शुद्ध चेतन रूप में अवतरित हुआ हूँ :

"सन्तों अविगत से हम आए, कोई भेद भरम ना पाये।
ना हम रहले गर्भवास में, बालक होई दिखलाये।
काशी तट सरोवर भीतर, तहाँ जुलाहा पाये॥
ना हमारे भाई बन्धु है, ना संग गिरही दासी।
नीरू के घर नाम धराये, जग में हो गई हाँसी॥
आणे तकिया अंग हमारी, अजर अमर पुर डेरा।
हुक्म हैसियत से चल आए, काटत यम का फेरा॥
काशी में हम प्रकट हुए, रामानन्द पर धाया।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, हंस चेतावन आया।।"

ऐसे अनेक स्थानों पर कबीर साहिब ने अपने विषय में अद्भुत रहस्य प्रकट किए हैं जिनके द्वारा प्रतीत होता है कि वे माता के पेट से नहीं जन्मे एवं उस परम पुरुष के अद्भुत प्रकाश से इस धरती पर उनका अवतरण हुआ। प्रिय पाठको! मेरा अभिप्राय किसी विवाद या संशय को उत्पन्न करना नहीं है, वरन् एक महान् सत्य को तर्क युक्त तरीके से आपके समक्ष रखना है। कबीर शब्द अपने आप में अर्थ समेटे है। कथावीर कबीर कहाया।

कक्का केवल नाम है, बब्बा वरण शरीर।
ररा सब में रम रहा, जिसका नाम कबीर॥
गगन मण्डल से उतरे, सद्गुरु सत्य कबीर।
जल मांहि पौढ़न किया, सब पीरों के पीर॥

ऐसे अनेकों शब्द स्पष्ट कर रहे हैं कि वे असाधारण थे। जितना विस्तृत व्यक्तित्व कबीर साहिब का मिलता है शायद ही किसी अन्य का हो।

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समाज उन्हें महान् समाज सुधारक के रूप में, कार्ल मार्क्स से पहले का समाज सुधारक मानते हैं। कवि लोग उनकी सरल शैली एवं रचनाओं को देखकर उन्हें कवि सम्राट मानते हैं। तर्कवादी उन्हें परम स्पष्ट वक्ता के रूप में मानते हैं। ब्रह्मज्ञानी उनकी ज्ञान शैली का अध्ययन करने पर उन्हें ब्रह्मवेता के रूप में मानते हैं। सन्तों में उनका स्थान सन्त सम्राट या प्रथम सन्त सद्गुरु के रूप में मानते हैं। योगी लोग उनके परा रहस्यों एवं साधना के आन्तरिक आयामों का मनन करने पर उन्हें परम योगेश्वर मानते हैं। व्यंगकार उन्हें महान् व्यंगकार मानते हैं। भक्त लोग कबीर साहिब की भक्ति रस की रचनाओं को पढ़कर उन्हें परम भक्त मानते हैं। न्याय कर्ता उनके तर्कों का अध्ययन करके उन्हें महान् न्यायवेता मानते हैं। रहस्यवादी उन्हें अध्यात्म जगत का महान रहस्यवादी मानते हैं। ज्ञानियों में उनका स्थान वैसा है जैसे सरिताओं में गंगा। उन्होंने किसी धर्म की स्थापना नहीं की, उनका एक लक्ष्य था, केवल मानव को जगाना। मानवता को जगाने के साथ उन्होंने सर्वशक्तिमान की भक्ति का संदेश दिया। कुछ लोग उन्हें खण्डनवादी मानते हैं परन्तु उन्होंने हर भक्ति का महात्म बताया, साथ में यह भी बताया कि किस भक्ति से किस तत्व की प्राप्ति होती है चार तरह की मुक्तियों के स्थान (सामिप्य मुक्ति, सालोक्य, सारोप्य तथा सायुज्य मुक्ति) का वर्णन किया, इनको चार किस्म के स्वर्ग भी कहा, उनकी प्राप्ति के सूत्र बताए जो वेदों से मिलते हैं। परमनिर्वाण के विषय में बताया जहाँ जाकर आत्मा स्थाई अमरत्व को प्राप्त होती है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को पिंड में बताया, उनके साधना के सूत्र सर्वमान्य हुए, उनकी शैली को सबने स्वीकार किया।

भक्ति को कबीर साहिब जी ने तीन भागों में बाँटा

सगुण भक्ति निर्गुण भक्ति परा भक्ति
( वर्णनात्मक शब्द ) ( धुनात्मक शब्द ) ( मूकात्मिक शब्द )

सुन्न गगन में सबद उठत है, सो सब बोल में आवै।
निःसबदी वह बोलै नाहीं सो सत सबद कहावै।। —पलटू साहिब जी
सगुण भक्ति करे संसारा। निर्गुण योगेश्वर अनुसारा।
इन दोनों के पार बताया। मेरो चित्त एको नहीं आया।।

आपने सगुण और निर्गुण इन दोनों के पार बताया। दादू दयाल जी ने कहा-
कोई सगुण में रीझ रहा, कोई निर्गुण ठहराय।
अटपट चाल कबीर की, मौसे कही न जाय।।
जाप मरे अजपा मरे, अनहद भी मर जाय।
सुरति समानी शब्द में, उसको काल न खाय।।

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अंदर धुनें हैं। कुछ इसे सुरति शब्द अभ्यास भी कह रहे हैं और उनमें खो जाते हैं। कुछ धुनों को ही परमात्मा कह रहे हैं। पर इससे तुरीयातीत की अवस्था से पार नहीं जा सकते हैं। सबका अपना वजूद है। धुनें ख़त्म हो जाती हैं। फिर यह कौन-सा शब्द हुआ! यानी धुनात्मक शब्द भी नहीं है, वर्णनात्मक शब्द भी नहीं है। साहिब कह रहे हैं- ‘सो तो शब्द विदेह ॥’ भाव शरीर से बाहर मूकात्मिक शब्द है अर्थात् बिना आवाज़ का शब्द, आवाज़ रहित धुन (Sound less sound) है वो, क्योंकि – ‘दो बिन होय न अधर अवाज़ा ॥’ आवाज़ दो तत्व के टकराने के बिना नहीं होती और जहाँ आवाज़ है, वहाँ माया है।

हद टप्पे सो औलिया, बे-हद टप्पे सो पीर।
हद-बेहद दोनों टप्पे, तिसका नाम कबीर॥

कालान्तर में जितने भी रूहानियत की बात करने वाले सन्त महात्मा हुए सबने निर्विवाद रूप से उनकी बात एवं सिद्धान्त को स्वीकार किया। हर पहलू को अत्यन्त सावधानी के साथ छुआ। सहज साधन के सिद्धान्त को समाज तक पहुंचाया कि हम किस तरह गृहस्थ आश्रम में रहते हुए परमतत्व की साधना कर सकते हैं। सुषमना नाड़ी को किस तरह खोलकर ब्रह्माण्ड की यात्रा की जा सकती है। इन रहस्यों को आम आदमी की भाषा में बोला :

“खेल ब्रह्माण्ड का पिण्ड में देखिया, जगत की भर्मना दूर भागी।
बाहरा भीतरा एक आकाशवत्, सुषमना डोर तह पलट लागी॥
पवन को पलट कर शुन्य में घर किया, घर औ अधर में भरपूर देखा।
कह्रै कबीर गुरु पूरे की मेहर से, त्रिकुटी मध्य दीदार देखा॥
देख दीदार मस्त होय रहूं, सकल भरपूर है नूर तेरा।
सुभग दरियाव जहाँ हंस मोती चुगे, काल का जाल तहां नाहीं तेरा॥
ज्ञान का थाल औ सहज मति पथ है, धर अधर में अगम किया डेरा।
कहै कबीर तहाँ भ्रम भासै नहीं, आवागमन का मिटा फेरा॥

यह शब्द शुद्ध अध्यात्म जगत् के अन्दर ले जाते हैं यदि आप देखें तो पाएंगे ग्रन्थ साहिब में कबीर साहिब की वाणी को बहुत ही ऊंचा स्थान दिया गया है। दादू दयाल जी ने कबीर साहिब के लिए लिखा है।

केते सन्ता कूप है, केते सरिता नीर।
दादू अगम अथाह है, दरिया सत्य कबीर॥
कः कलौ केवलः सार्थो विद्वेषपरिकीर्तियतः।
ऋद्धि शुभसमासेन यः कबीरः स योच्यते॥

अर्थात् (क) कलियुग में जीवों के साथ है। (ब) बोध रूप होकर पापों का नाश करता है (र) सबके हृदय में मिल रहा है, उसको कबीर कहते हैं।

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बाजा बाजे रहित का, पड़ा नगर में शोर।
सद्गुरु खसम कबीर है, नजर ना आवे और॥ –धर्मदास जी

बानी अरब व खरबलों, ग्रन्थाँ कोटि हज़ार।
कर्ता पुरुष कबीर है, नाभे किया विचार॥ –सन्त नाभा जी

यक अर्ज गुफतम पेश, तू दर गोश कुन करतार।
हक्का कबीर करीम तू, बेएब परवरदिगार॥ –गुरु नानक साहिब जी

कबीर कर्ता आप है, दूजा नाहीं कोय।
दादू पूर्ण जगत को, भक्ति दृढ़ावन सोय॥
दादू नाम कबीर का, जो कोई लेवे ओट।
उसको कभी न लागसी, काल बज्र की चोट॥ –दादू दयाल जी

जैसे बादल गगन में, चलते हैं बे पाँव।
ऐसे पुरुष कबीर हैं, शून्य में रहे समाव॥
गगन मण्डल से उतरे, साहिब पुरुष कबीर।
चोला धरा खवास (सेवक) का तोड़े यम जंजीर॥ –ग़रीब दास जी

इत्यादि सन्तों के शब्द प्रकट कर बता रहे हैं कि कबीर साहिब मानव नहीं थे। ऐसे तो सब लोग अपने अपने इष्ट की प्रशंसा करते हैं, बड़ाई बताते हैं पर भाईयों मेरे तर्क में वज़न है, गहराई है। साफ हृदय से एवं निष्पक्ष विचार करें! कबीर साहिब जानते थे कि लोगों ने मेरे जन्म के विषय में कई भ्रांतियाँ पैदा की हुई हैं, अन्तः चलते चलते संसार को बताकर चलते हैं कि हम क्या हैं। जैसा कि आप जानते हैं उनका अवतरण सम्वत् 1455 ज्येष्ट सुधी पूर्णिमा को हुआ। ठीक 120 वर्ष तक संसार में सत्य भक्ति का उपदेश देकर जब उन्हें वापस अपने धाम जाना था तो ऐलान किया कि मैं माघ सुधी एकादशी सम्वत् 1575 मगहर (गोरखपुर के पास) में शरीर छोड़ूँगा। उनका ऐलान सुनकर लाखों की संख्या में लोग मगहर में एकत्रित हुए, उसमें उनके प्रमुख शिष्य काशी के राजा वीरसिंह बघेल अपने दल बल के साथ आए तथा अवध के नवाब बिजली खान पठान व अनेकों शिष्यों के साथ-साथ कुछ तमाशबीन भी एकत्रित हुए। राजा-वीर सिंह ने अपने सेनापति को आदेश दिया जब कबीर साहिब अपना शरीर छोड़ें तो उनके पार्थिव शरीर को लेकर काशी चलना वहाँ मैं उनका संस्कार करके समाधि बनाऊँगा। जब यह बात बिजली खान को पता चली तो उन्होंने कहा मैं ऐसा कभी नहीं होने दूंगा क्योंकि कबीर साहिब मेरे मुर्शिद हैं मैं उन्हें मुसलमान धर्म के अनुसार क्रिया करके मज़ार बनाऊँगा। दोनों ओर से तलवारें खिंच गईं।

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दोनों युद्ध के लिए तैयार हो गए। इतने में एक अद्भुत प्रकाश हुआ एवं आकाशवाणी हुई, “उठाओ पर्दा नहीं है मुर्दा, ऐ मुर्ख नादाना तुमने हमको नहीं पहचाना”। जब चादर उठाई गई तो कमल के फूल मिले, पार्थिक शरीर नहीं। यह कार्य कबीर साहिब ने लाखों लोगों के सामने सरअंजाम दिया। हिन्दुओं ने फूल लेकर समाधि बनाई, मुसलमानों ने चादर लेकर मज़ार। यह दोनों आज भी मगहर में उस महान पुरुष की गवाही दे रहे हैं कि ओ संसार के लोगो वह मानव नहीं, स्वयं पूर्ण परम पुरुष थे। भाईयों आप मेरे तर्क पर विचार करें कि इसमें कितना सत्य एवं ज्ञान है। इससे पहले इस संसार में किसी भी काल में किसी ने अपना शरीर विदेह नहीं किया। यह अपने आप में प्रथम एवं अन्तिम कौतुक है जो साहिब ने संसार को दिखाया। उनकी वाणी हमेशा संसार को दिशा एवं सर्वशक्तिमान तक जाने का रास्ता देगी। वर्तमान परिवेश में उनके सिद्धान्त संसार को शान्ति एवं सत्य के मार्ग की ओर ले जाने को सर्वथा उपयुक्त हैं।

संतों की नजर में साहिब

वाह वाह कबीर के गुरु पूरा है, वाह वाह कबीर गुरु पूरा है।
पूरे गुरु के मैं बलि जौहों, जाका सकल जहूरा है॥
अव्वल संत कबीर हैं, दूजै रामानन्द।
तासे भक्ति प्रगट भई, सात दीप नव खण्ड॥
यक अर्ज गुफतम पेश, तू दर गोश कुन करतार।
हक़्क़ा कबीर करीम तू, बेएब परवर दिगार॥
—गुरु नानक देव जी

बहुत जीव अटक रहे, बिन सतगुरु भव माहिं।
दादू नाम कबीर बिन, छूटे ऐकों नाहिं॥
दादू बैठि जहाज पर, गये समुद्रतीर।
जल में मच्छी जो रहें, कहे कबीर कबीर॥
कोई सगुन में रीझ रहा, कोई निर्गुण ठहराय।
अटपट चाल कबीर की, मोसे कही न जाय॥
—दादू दयाल जी

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गगनमण्डल से उतरे, साहिब पुरुष कबीर।
चोला धरा खवास का, तोड़े यम जंजीर ।।
दास गरीब कबीर को चेरा। सत्य लोक अमर पुर डेरा।
अमृत पान अमिय रस चोखा। पीवे हंसा नाहीं धोखा।।
अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड में, बंदी छोड़ कहाय।
सो तो पुरुष कबीर है, जननी जना न माय।।
साहिब पुरुष कबीर ने, देह धरी न कोय।
शब्द स्वरूपी रूप है, घट घट बोलै सोय ।। –गरीब दास जी

स्वामी! जौ तुम गवौ सो हौं गाऊँ, तुम्हारा ज्ञान विचारूँ।
कहें रैदास सुणों हो स्वामी, भर्म कर्म सब छाडूूँ।। –रविदास जी

पानी ते पैदा नहीं, श्वासा नहीं शरीर।
अन्न अहार करता नहीं, ताको नाम कबीर ।। –नाभा दास जी

मेरे कन्त कबीर है, वर और नहिं वरिहों।
दादू तीन तिलाक है, चित और न धरिहौं ।। –दादू दयाल जी

कक्का केवल नाम है, बब्बा वरण शरीर।
रर्रा सब में रमि रहा, जिसका नाम कबीर ।।
सोई ज्ञानी पुरुष है, सतगुरु सत्य कबीर।
रज वीरज पैदा नहीं, सुआसा नहीं शरीर ।।