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बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)

Bawan Kasni

सद्गुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sant Ashram Ranjari 2015 Edition · Sant Ashram Ranjari, Samba (J&K)

Devanagarihipublished122 पृष्ठ

अलग-अलग नामों से हर युग में आये साहिब

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साहिब बन्दगी

अलग अलग नामों से हर युग में आये साहिब

धर्म दास को साहिब जी समझा रहे हैं कि मैं हर युग में आकर हंसों को अपने धाम ले जाता हूँ। सतयुग का वर्णन करते हुए साहिब कह रहे हैं-

सुनु धर्मदास यह अकथ कहानी। सुर नर मुनि काहू नाहिं मानी॥
तन मन धनसो चित्त लगावे। गुरु का अंत कोई बिरला पावे॥
युगन युगन मोहि आवत भयऊ। सत्य शब्द मैं कहते रहेऊ॥
कहा कहौं कोई नाहिं मानै। जे समझै ते झगरा ठानै॥

सतयुग-सतयुग में सत्यसुकृत नाम से ज्ञानी पुरुष (कबीर साहिब) काल पुरुष के लोक में आए। इस युग में मनुष्य 21 हाथ ऊँचे शरीर के थे। साहिब ने चार हंसों को तारा-जिनके नाम थे, चित्ररेखा रानी, अष्टचौका (अष्टावक्र), राय हरचन्द (राजा हरीश चंद्र) और विकसी ग्वालिन। उन्होंने-आगे नौ लाख जीवों का कल्याण किया।

सतयुग चार हंस समझाये। प्रथम राय मित्र से नहिं आये॥
<ins>चित्ररेखा रानी</ins> कर नाऊ। तिन सुनि शब्द श्रवण चितलाऊ॥
राजा रानी पूछत मोही। सो हकीकत कहौं मैं तोही॥
<ins>अष्टचौका</ins> को शब्द सुनावा। राजा रानी लोक पठावा॥
दुसरे राय वटक्षेत्र के आवा। सतसुकृति तहँ नाम धरावा॥
तिन राजा पूछा चित लायी। तब तेहि भेद कह्यो समझायी॥
पान परवाना राजहिं दीन्हा। राजा वास लोक में कीन्हा॥
तिसरे <ins>राय हरचन्द</ins> कहँ आये। बन्ध काटि के लोक पठाये॥
चौथे पुरी मथुरा में आये। <ins>विकसी ग्वालिन</ins> को समझाये॥
चारि हंस सतयुग समझाये। ते चारों गुरुवंश कहाये॥
चारिहंस नौ लाख बचाये। शब्द भरोसे घरहिं पठाये॥

साहिब कह रहे हैं कि इस तरह सतयुग में आकर मैंने चार हंसों को तारा और आगे उन चारों ने नौ लाख जीवों का कल्याण किया। आगे कह रहे हैं-

बावन कसनी ( कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई ) 13

त्रेतायुग–इस युग में ज्ञानी जी ( कबीर साहिब) मुनिन्द्र नाम से आए। इस युग में मनुष्य 14 हाथ ऊँचे शरीर के थे। त्रेतायुग के हंस ऋषि श्रृंगी ( नेम ऋषि) , अयोध्व मधुकर, टकसार।, लक्ष्मण कुमारा, रावण की पत्नि मन्दोदरी, गुरु वशिष्ठ मुनि और दुर्वासा ऋषि को गुरु स्वरूप परवाना दिया।

पुनि त्रेता युग कहौं विचारी। सात हंस त्रेतायुग तारी॥
प्रथम ऋषि श्रृंगी समझाये। दुसरे अयोध्या मधुकर आये॥
तीसरे शब्द कह्यो टकसार। चौथे बोधे लछन कुमारा॥
पचवें चलि रावण लगि गयऊ। तहाँ भेंट मंदोदरि से भयऊ॥
गवीं रावण शब्द न माना। मंदोदरी शब्द पहचाना॥
छठैं चलि वसिष्ठ लगि आये। ब्रह्म निरूपन उनहिं सुनाये॥
सतये जंगल में कियो वासा। जहाँ मिले ऋषि दुर्वासा॥
सात हंस सातौ गुरु कीन्हा। परम तत्व उनही भल चीन्हा॥
सातौ गुरु त्रेता में भयऊ। देइ उपदेश सो हंस पठयऊ॥

इस तरह साहिब कह रहे हैं कि त्रेतायुग में मैंने सात हंसों को तारा, जिनमें वशिष्ठ मुनि, श्रृंगी ऋषि आदि भी थे। अब द्वापर युग का वर्णन करते हुए साहिब कह रहे हैं-

द्वापरयुग–इस युग में ज्ञानी पुरुष करुणामय नाम से साहिब आए और रानी इन्दुमती, राजा युधिष्ठिर, द्रौपदी, पराशर ऋषि, राय धुधुल, पारसदास और उनकी पत्नी, गरुड़बोध, हरिदास सुपच भक्त, शुकदेव, विदुर, राजा भोज, राजा मुचकुन्दहि, चन्द्रहास, चार ग्वाल ( श्री कृष्ण) की गोपी को तारा।

त्रेता गत द्वापर युग आया। सत्रह जीव परवाना पाया॥
प्रथमं में राय चंद विजय कहँ गयऊ। ताकी रानी इन्दुमति रहेऊ॥
दुसरे राय युधिष्ठिर कहँ आये। द्रौपदी सहित परवाना पाये॥
तिसरे पाराशर पहँ आये। निर्णय ज्ञान ताहि समझाये॥
चौथे राय धुधुल लहि भेदा। बहुत ज्ञान को कीन्ह निखेदा॥
पचयें पारसदास समझावा। स्त्री सहित परवाना पावा॥
छठये गरुड़बोध हम कीन्हा। विहंग शब्द गरुड़ को दीन्हा॥
सातें हरिदास सुपच समझावा। नीमषार महँ उसको पावा॥

14 साहिब बन्दगी

अठयें शुकदेव पहँ ज्ञान पसारा। सकल सरब भेद निरवारा॥
नवमें राजा विदुर समझाया। भक्तिरूप उन दर्शन पाया॥
दशमें राजा भोज बुझाया। सत्य शब्द पुनि उसे चिह्नाया॥
ग्यारहें राजा मुचकुन्दहि तारे। बारहें राजा चन्द्रहास उबारे॥
तेरहे चलि वृन्दावन आये। चारि गवाल गोपी समझाये॥
गुरु रूप पुनि पन्थ चलाये। भौंसे हंसा आनि छुड़ाये॥
बावन लाख जो जीव उबारा। कलियुग चौथे यहाँ पर धारा॥

इस तरह साहिब कह रहे हैं कि 17 जीव मैंने द्वापर में तारे। अब कलयुग का वर्णन करते हुए कह रहे हैं-

कलयुग-कलयुग में ज्ञानी पुरुष कबीर नाम से आए और गोरखदत्त (गोरखनाथ), गुरु रामानन्द, पीर शेख तकी, राजा सिकन्दर, राजा बीर सिंह, कनक सिंह, राव भुपाले, रतना बनिया, अलिदास धोबी, ...................., हजरत मुहम्मद, नानक देव जी, साहु दमोदर को तारा और गुरु स्वरुप परवाना दिया। ऐसे 5 लाख पहिले तारे 42 लाख और जीवों को उबारा।

प्रथमं गोरखदत्त समझाये। तारक भेद हम तुमहिं बताये॥
दुसरे शाह बलख को बोधा। पढ़े आरबी बहुविधि सोधा॥
तिसरे रामानन्द पहँ आये। गुप्त भेद हम उन्हें सुनाये॥
चौथे पीर को परचे दीन्हा। पचये शरण सिकन्दर लीन्हा॥
छठै बीरसिंह राजा भयऊ। ताको हम शब्द सुनयऊ॥
सतयें कनकसिंघ समझाये। सोलह रानी लोक पठाये॥
अठएँ राव भूपाले आये। ग्यारह रानी लोक पठाये॥
नौमें रतना बनिन समझाई। जाति अग्रवालिन करत मिठाई॥
दशाएँ अलिदास धोबी गयऊ। सात जीव परवाना पयऊ॥
ग्यारहें ________ समझायी। तिन बहु भक्ति करी चितलायी॥
बारहें मुहम्मद कह्यो कुराना। हद्द हुकुम जीव कर माना॥

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तेरहें नानक से कह्यो उपदेशा। गुप्त भेद का कहा संदेशा॥
चौदहें साहु दमोदर समझावा। करामात दै जीव मुक्तावा॥
चौदह हंस कलयुग में कीन्हा। गुरु स्वरूप परवाना दीन्हा॥
पाँच लाख हम पहिले तारे। पीछे धर्मनि तुम पगुधारे॥
वंशन थाप्यों कियो कडिहारा। लाख ब्यालिस जीव उबारा॥

साहिब ने धर्मदास को कहा कि हर युग में आता हूँ और जीवों को चिताकर अमर लोक ले जाता हूँ। इस तीन लोक में काल जीवों को सता रहा है। यह देख साहिब ने मुझे भेजा।

वो कह रहे हैं कि मेरा कोई माता-पिता नहीं है, मैं अविगत से चला आया हूँ। जो मेरे नाम को पकड़ लेता है, वो काल से मुक्त हो जाता है।

कबीर साहिब खुद साहिब थे। हम उनकी वाणी को लेकर चल रहे हैं। अन्य कोई भी उनकी वाणी को पूर्ण रूप से लेने से हिचकेगा। इसके कई कारण हैं। हालांकि हमारा पंथ कबीर-पंथ नहीं है, क्योंकि साहिब ने कभी नहीं कहा कि मुझे मानना, उन्होंने सतगुरु की भक्ति करने को कहा, सतगुरु को ऊँचा स्थान दिया। पर मैं उनकी वाणी को एक सहारे के रूप में ले रहा हूँ। वो भी लेने की ज़रूरत नहीं है, पर इससे मेरी बात को गवाही मिल जाती है। बाकी महात्मा वाणी को पूर्ण रूप में लेने से इसलिए हिचक रहे हैं, क्योंकि साहिब जी पाखण्ड के ख़िलाफ़ थे और पाखण्ड के हरेक रूप पर उन्होंने चोट की है। ऐसे में बाकिओं को अपनी पोल खुलने का भय है। वे तो बस उतना ही ले रहे हैं, जितने से उनका स्वार्थ सिद्ध हो सके। उनकी वाणी को लेकर कहीं वो तीन लोक को स्थापित कर रहे हैं, कहीं उनकी वाणी को लेकर सगुण-भक्ति को स्थापित कर रहे हैं। बस इनका हाल तो उस भिखारी की तरह है जो दान माँगने के लिए उनका नाम लेकर अक्सर गाता फिरता है-

दान दिये धन न घटे, नदी न घटे नीर।
अपनी आँखों देख ले, यों कथि कहहिं कबीर॥

पर वह कभी भी यह दोहा क्यों बोलेगा-

माँग़ण मरण समान है, मत माँगो कोई भीख।
माँग़ण ते मरना भला, यह सतगुरु की सीख॥

वो तो बस साहिब के नाम की मोहर लगाकर अपना मतलब निकाल रहा है, लोगों को बुद्धू बना रहा है। वो तो साहिब ने दूसरे अर्थ से कहा है। यानी दान देने वाले की इच्छा पर है, माँगने के लिए तो कहा ही नहीं। ऐसे ही सगुण भक्ति के बारे में समझाया, पर यह तो कहा ही नहीं कि सगुण-भक्ति से कल्याण होगा। उन्होंने तो आत्मा के कल्याण के लिए सगुण और निर्गुण दोनों से परे परा-भक्ति का रहस्य दिया।