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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 408 में से

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पृष्ठ 92

90 / बन्दी जीवन
अन्यान्य प्रदेशवालों को फ़ौजों में भर्ती होने का जैसा सुभीता रहता आया
है वैसा सुभीता यदि बंगाल में बंगालियों को होता तो वहाँ न जाने कब का गदर
मच गया होता । किन्तु इस समय में, पंजाब में जिस फुर्ती से विप्लव की तैयारी
हो रही थी, उसको देखते हुए हम लोग सोचते थे कि बंगाल न जाने इस समय
किस प्रकार विप्लव में शामिल होगा । बंगाल के पिछले युग के कलंक का स्मरण
होने से मेरे मन को बड़ा कष्ट होता था । यही कारण था कि बंगाल में जाकर
काम करने की इच्छा होती थी । इससे यतीन्द्र बाबू वगैरह जब बंगाल को वापस
चले गए तब वहाँ जाने के लिए मैं विशेष रूप से उत्सुक हुआ, किन्तु दादा इसके
लिए किसी प्रकार राज़ी न हुए । उन्होंने कहा कि वे स्वयं तो पंजाब जाएँगे और
मुझे बंगाल और पंजाब के मध्य के देश में रहकर उक्त दोनों प्रदेशों की कार्रवाई
का सिलसिला जोड़े रखना होगा । इसमे मन मारकर मुझे काशी में ही रहना
पड़ा ।
इसी समय बंगाल में मोटर-डकैती का आरम्भ हुआ और थोड़े ही समय
में कई जगह डाके डाले गए और इस तरह बहुत-सा धन संग्रह किया गया । इन
घटनाओं के कुछ ही दिन पहले रोडा कम्पनी के यहाँ से पचास मोज़र पिस्तौलों
और पचास हज़ार के लगभग टोंटों की चोरी हो गई । अब तक बंगाल में
विप्लव की तैयारी का कार्यक्रम दो-एक दलों में ही आबद्ध था । यतीन्द्र बाबू थे
तो ख़ासे कार्य-कुशल किन्तु अब तक कुछ-कुछ खाली रहते थे । इससे अन्यान्य
दलों का भी कुछ भी काम-काज न होता था । इस बार यतीन्द्र बाबू के पूर्ण
उद्यम से काम में जुटते ही बंगाल में बड़े सपाटे से काम-काज होने लगा । उनके
इस नये आत्म-प्रकाश को देखकर हम लोगों को बड़ा ही हर्षपूर्ण अचरज
हुआ ।
इधर रासबिहारी भी पंजाब को रवाना हुए । उन्हें गिरफ़्तार करा देने के
लिए साढ़े सात हज़ार रुपये का इनाम घोषित किया गया था । रासबिहारी को
गिरफ़्तार न कर सकने के कारण सरकारी पक्ष की कार्य-कुशलता में बट्टा लग
गया था और उन्हें गिरफ़्तार करने के लिए भारत सरकार ने कुछ उठा न रक्खा
था । एक ओर तो वह प्रबल प्रतापशाली ब्रिटिश राजशक्ति थी जिसको अपार धन-
बल और लोकबल प्राप्त है, जो इतने बड़े सुनियन्त्रित राज्य की चालक है, देश के
एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक जिसका अद्भुत संगठन (Organisa-
tion) है, और जिसके जासूस-विभाग की होशियारी की तुलना रूस के सिवा
एशिया में किसी से भी नहीं हो सकती, और दूसरी ओर था भारत का हमारा
यह दरिद्र विप्लव दल—इतना दरिद्र कि एक दिन रासबिहारी ने हम लोगों से
कहा कि 'मुझे अंग्रेज़ों के हवाले करके साढ़े सात हज़ार रुपए वसूल कर लो ।'
इस दल के साथ देशवासियों की आन्तरिक सहानुभूति तो थी किन्तु वे डर के मारे
किसी भी तरह उसकी सहायता करने को तैयार न थे, और फिर इस दल के नेता
समाज में बिल्कुल ही अपरिचित थे, सो बात की एक बात तो यह है कि ये लोग