बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंको पुलिस का मुखबिर बन गया था । इसकी हमें किसी को खबर न थी । तय
यह हुआ कि मैं जोधपुर उतरकर शहर देख लूं और दूसरे दिन शाम की गाड़ी से
बीकानेर के लिए चल पडूं । रास्ते में आशानाडा स्टेशन पर प्रतापजी को 'माधो'
के नाम से पुकारूँ । अगर कोई जवाब न मिले तो समझ लूं कि प्रतापजी देहात में
ुस गए हैं और मैं बीकानेर पहुँचकर उनका इन्तजार करूँ । लेकिन प्रतापजी तो
आशानाडा उतरते ही गिरफ्तार कर लिये गए थे । मेरी आवाज का कोई असर न
देखकर मैं बीकानेर पहुँच गया ।"
"....इधर हरिद्वार की कारगुजारी के सिलसिले से प्रतापसिंह ने बोस बाबू की
तरफ से जो घड़ी और शोर शाल भेंट की थी, वह चोरी चली गई थी । ये पुरस्कार
मुझे बहुत प्रिय थे । प्रतापजी के वियोग की पीडा भी कम न थी । वह आदमी
ही ऐसा था । जितने विप्लववादी देशभक्तों से मेरा परिचय हुआ, उनमे प्रताप
की छाप मुझ पर सबसे अच्छी पड़ी थी। वे बड़े कोमल स्वभाव के निहायत शिष्ट
और सदा खुश रहने वाले जीव थे । गीता को उन्होंने जिस रूप में समझा था,
उसी के अनुसार उनकी सारी चेष्टाएँ होती थी। धन और स्त्री की इच्छा को
उन्होंने खूब जीता था। शरीर इतना सधा हुआ था कि जयपुर मे जब वे मेरे पास
रहे थे तो एक बार लगातार बहत्तर घण्टे जागते रहे और विना खाए-पिए बराबर
काम करते रहे । और फिर सोए तो तीन दिन तक उठने का नाम नहीं लिया ।
गलता के कुंड में घंटों तैरते भी उन्हें देखा ।... वे जहाँ रहते, वही का वातावरण
सरलता, प्रेम और पवित्रता से भर देते थे ।"
राजस्थान के इसी क्रान्तिकारी मंडल मे श्री विजयसिंह पथिक भी थे, जो बाद
को चलकर राजस्थानी किसानों के प्रसिद्ध नेता बने । सन् 1914-15 में पथिकजी
राव साहब खरवा के दाहिने हाथ बने हुए थे और इन लोगों ने कई हजार
बंदूकें विद्रोह के लिए एकत्रित कर ली थी । किन्तु कृपालसिंह द्वारा विद्रोह की
योजना को सरकार पर प्रकट कर देने के कारण यह तमाम तैयारी बेकार चली
गई । निश्चय ही यदि यह योजना क्रियान्वित हो सकती, तो न केवल भारत का,
बल्कि संसार का इतिहास भी शायद बहुत कुछ परिवर्तित हो जाता ।
मुखबिर कृपालसिंह
शचीन्द्रबाबू ने 'बन्दी जीवन' में इतना सकेत तो कर दिया है कि कृपालसिंह
पर क्रान्तिकारियों को संदेह हो गया था । वे उसको समाप्त भी कर देना चाहते
थे, किन्तु कर नही सके और वह अपने इस दुष्कृत्य में सफल हो गया । किन्तु
कृपालसिंह को रास्ते से क्यों नही हटाया जा सका इसका पूरा ब्योरा हमें गदर
पार्टी के एक कार्यकर्ता बाबा हरनामसिंह के एक लेख से मिलता है । बाबा
हरनामसिंह भारत से अमेरिका जाकर खेतों में मजदूरी करते थे । गदर पार्टी का
संगठन होने पर उसके सदस्य हो गए । कुछ दिन तक अमेरिका मे गदर पार्टी के
मंत्री लाला हरदयालजी के अंगरक्षक भी रहे । प्रथम विश्वयुद्ध प्रारम्भ होने पर