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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 304, कुल 408 में से

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पृष्ठ 304

302 / बन्दी जीवन

ऐसा प्रतीत होने लगा कि बहुत संभव है कि कुतुबुद्दीन साहब की बात सत्य हो।
क्षणभर में मेरे मानसिक चित्रपट में संन्यास आश्रम के बारे में मुहूर्त-भर के
लिए यह प्रश्न उठा कि जीवन-भर की तपस्या के परिणामतः जिस चरम और
परम अवस्था को प्राप्त करने के लिए हिन्दू समाज मे व्यवस्था है कम्यूनिज्म की
व्यवस्था मे क्या उसी अवस्था को इतने सरल एवं सहज मार्ग से प्राप्त किया जा
सकता है ? परन्तु यह प्रश्न क्षण-भर के लिए ही मन मे उदय हुआ था। थोड़े ही
समय के अनन्तर में समझने लगा कि संभव है विप्लव के बाद हिन्दू समाज
प्रदर्शित उत्कर्ष के मार्ग को मनुष्य ग्रहण कर सके । कम्यूनिज्म को भली प्रकार
समझने के लिए मन में उत्सुकता और बढ़ गई। एक समय नियत करके मै फिर
कुतुबुद्दीन साहब से मिला और कम्यूनिज्म के सिद्धान्त के बारे मे उनसे मेरी
घण्टों तक बातचीत हुई ।
क्वीन गारडेन में बैठकर घंटों तक कुतुबुद्दीन साहब से मेरी बातचीत
हुई । कुतुबुद्दीन साहब ने प्राचीन काल से लेकर आज तक के इतिहास का एक
खाका खींचकर दिखाने का प्रयत्न किया । उन्होंने एच० जी० वेल्स के इतिहास
से दृष्टान्त देकर यह दिखाना चाहा कि कैसे एक समय नारी राज्य का अस्तित्व
था और उस समय स्त्री जाति के प्रभुत्व के कारण समाज की रीति व्यवस्था
पद्धति आदि सब स्त्रियो की इच्छानुसार होती थी । उस समय पुरुषों के
अधिकार स्त्रियों के अनुवर्ती होते थे अर्थात् समाज में जो जाति शासन करती
है उसी के स्वार्थ के अनुकूल रीति-नीति भी बन जाती है। कुतुबुद्दीन साहब का
कहना था कि रीति नीति समाज व्यवस्था इत्यादि सनातन नियमों की अनुवर्त्ती
होकर नहीं बनती, प्रत्युत राज-शक्ति जिसके हाथ में रहेगी उसकी इच्छा एवं
स्वार्थ के अनुसार ही समाज व्यवस्था बनेगी। सामाजिक उन्नति भी राज-शक्ति
पर निर्भर है। राज-शक्ति की सहायता से समाज में शिक्षा-दीक्षा उद्योग-धन्धों
आदि की व्यवस्था अनायास ही एवं ठीक नीति पर हो सकती है। व्यक्ति के
लिए उन्नति का मार्ग भी तभी प्रशस्त होगा जब राज-शक्ति की सहायता
मिलेगी। व्यक्ति की उन्नति की प्रतीक्षा में यदि हम बैठे रहेंगे तो समाज का
कोई काम नहीं चल सकेगा। आज समाज में जितने घोर अनर्थ हो रहे हैं उनके
मूल में सबसे बडी बात यह है कि समाज के धन उत्पादन के जितने साधन हैं वे
सब कुछ थोड़े ही मनुष्यों के हाथ में हैं। वे जैसा चाहते हैं उसी प्रकार समाज
व्यवस्था बनाते हैं जिधर चाहते हैं उसी तरफ समाज को ले चलते हैं। राज-शक्ति
भी इन्हीं के हाथ में रहती है। एक ओर तो धन की समृद्धि होती है दूसरी ओर
दरिद्रता के निष्ठुर दबाव से समाज के असंख्य व्यक्ति हाहाकार करते हैं ।
प्रजातन्त्रात्मक राज्य में भी पूंजीपति ही जो-जो चाहते हैं वही करते हैं। कहने
के लिए तो प्रजा को सब राष्ट्रीय कर्णधार बराबर हैं परन्तु धनी व्यक्ति गरीबों
के वोट अपने धन की सहायता से प्राप्त कर लेते हैं। इसलिए यथार्थ प्रजातन्त्रा-
त्मक राज्य तभी बन सकता है जब समाज से गरीब और अमीर का भेद मिट