बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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बंगाल और उत्तर बंगाल के प्रायः प्रत्येक जिले में इनकी शाखाएँ-प्रशाखाएँ थीं ।
यह तो सभी मानते हैं कि संख्या और विस्तार में बंगाल के सब विप्लव दलों से
ये बढ़े-चढ़े थे । किन्तु पश्चिम बंग के विप्लव दल के नेता पूर्व बंग के दल को कम
बुद्धिमान् समझते थे, इसी से पूर्व बंग के दल को वे विश्वास की दृष्टि से न देखते
थे । पश्चिम बंग के विप्लव दल के युवक लोग पूर्व बंगाल के युवको की अपेक्षा
अपने को अधिक संस्कृत और सुशिक्षित (Cultured) समझते थे । इसके सिवाय
ढाका की अनुशीलन समिति को बंगाल के प्रायः सभी विप्लव दल परिमाण में
छोटा होने के कारण ईर्ष्या की दृष्टि से देखते थे, इन्ही सब कारणों से चन्दननगर
अथवा रासबिहारी के दल को छोड़कर बंगाल का और कोई दल भी ढाका के
अनुशीलन दल के साथ मिलकर एक अखण्ड दल खड़ा कर लेने को इच्छुक न था ।
मनुष्य का अहंकार बड़ी भयानक वस्तु है। यह मनुष्य को ऊपर उठाने मे जैसे
सहायता करता है वैसे ही नीचे गिराने मे भी कसर नही करता । अहंकार को
सुसंयत करना बड़ा कठिन काम है, इसी से प्रायः सभी जगह अनेक अनर्थों की
सृष्टि इसी अहंकार से हुई है। बंगाल मे भिन्न-भिन्न विप्लव दल मिलकर एक
विराट् दल मे परिणत न हो सके इसका मुख्य कारण इन भिन्न-भिन्न दलो के
नेताओ की क्षुद्र अहंकार-बुद्धि ही थी । बंगाल का कोई दल यदि दूसरे दलो के
साथ मिल-जुलकर एक होने की चेष्टा नही करता, और अन्त मे चेष्टा करने
पर भी कृतकार्य नही हो सकता तो इसी अहंकार के प्रभाव के कारण । इसीलिए
बंगाल मे अनेक क्षुद्र विप्लवदलों का अस्तित्व था । ऐसा जान पड़ता है मानो
बंगाल मे कार्यकर्ता उनकी अपेक्षा नेताओ की संख्या ही अधिक है। बंगाल मे जो
दस युवको को भी एकत्र कर पाया वही एक नेता बनकर खड़ा हो गया ; एक बार
नेता हो जाने पर फिर वे अन्य किसी दल के साथ मिल जाना स्वीकार न करते ;
इसका प्रधान कारण यही था कि ये सब नेता कहलानेवाले सोचते थे कि इस
प्रकार अन्यान्य दलो के साथ मिल जाने से उनकी स्वतन्त्रता एकदम नष्ट हो
जायगी। मेरा विचार है कि बंगाल के भिन्न-भिन्न क्षुद्र दलों के नेताओ के मन में
ऐसा भाव था इसी कारण वे ढाका के दल के साथ मिलना स्वीकार न करते थे ;
वे सोचते थे कि किसी बड़े दल के साथ मिल जाने से उनका क्षुद्रत्व प्रकट हो
जायगा और उस बड़े दल मे शायद उनकी प्रधानता कुछ भी न रहेगी । बहुत बार
मैने स्वय बंगाल के कुछ विप्लव दलो को ढाका दल के साथ मिलाने की चेष्टा
की है, किन्तु किसी बार भी कृतकार्य नही हुआ । निःसन्देह ऐसा मिलाप न होने
का एक और भी विशेष कारण था। बंगाल के भिन्न-भिन्न विप्लव दलो के बीच ऐसे
कोई प्रतिभावान् शक्तिशाली पुरुष नहीं हुए जिनकी व्यक्तिगत मोहनी शक्ति के
बल से खिंचकर भिन्न-भिन्न दल अन्त मे एक दल मे परिणत हो सकते । अवश्य
ही वैसे किसी प्रभावशाली व्यक्ति के होने पर भी बंगाल के सब दल मिलकर एक
हो जाते कि नही इसमे भी सन्देह है ।
चाहे जिस कारण से हो बंगाल के प्रायः सभी विप्लव दल ढाका की समिति