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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 256 में से

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पृष्ठ 219

पतत्तोयकणसन्तानेन स्तनयोः कृतमुहूर्तहारविभ्रमा, शीतेन रोमाञ्च-
सीत्कारिणी, धौताञ्जनारुणनयनान्ता, प्रलवन्मुक्तकेशकलापा, स्नानो-
त्तीर्णा तरुणी कस्य स्पृहार्द्रं न मनः करोतीत्युक्ते" स्वयमार्द्रस्वभावः
परमप्यार्द्रीकरोतीत्युचितमेतत् ।
अस्मिन्पद्ये, "वियद्गङ्गातीरे सद्यःस्नाता नग्नाः शुकदर्शनोत्तरमपि
निर्लज्जा देवाङ्गना अवलोकयतो निर्वेदस्वच्छमनस उत्कटवैराग्यनिःस्पृह-
स्य व्यासपुत्रस्य शुकाचार्यस्य, स्मरव्यतिकरनिर्विकारतायां कामवासना-
जन्यविकारशून्यतायां प्रतिपाद्यमानायां, श्रवणमूलोर्ध्वनिक्षिप्तकेशपाशा-
ग्रभागनिःस्यन्दमानाम्बुकणसमूहेन कुचयोर्विहितक्षणिकहारविलासा,
स्नानकृतशैत्यानुभवेनाञ्चितरोमाञ्चा सीत्कारकारिणी च, प्रक्षालितकज्जल-
रक्ताभनेत्रप्रान्ता, वहज्जलोन्मुक्तचिकुरनिकुरा स्नानं कृत्वोपरि समायाता
युवती कस्य पुंसश्चित्तं लालसार्द्रं न करोति ?" इत्युक्ते स्वयमार्द्रस्वभावः
स्वयं सरसा प्रकृतिरन्यमपि सरसीकरोतीत्येतत्स्वभावानुरूपवर्णनमुचितं
नितरामौचित्यपोषकम् ।
इस पद्य में स्वर्गंगा के किनारे सद्यःस्नाता, विवस्त्रा तथा शुकाचार्य को
देखकर भी नहीं लजानेवाली, देवाङ्गनाओं को देखते हुए भी विकारशून्य तथा
उत्कट वैराग्य से निःस्पृह व्यासपुत्र शुकाचार्य की कामवासनाजन्य विकारशून्यता
के प्रतिपादन-क्रम में - कान के पास से फेंके गये घुंघराले बालों से चूते हुए
जलकणों की परंपरा से स्तनों के ऊपर क्षणभर हार का भ्रम उत्पन्न कर देने-
वाली, शीत से रोमाञ्चित और सीत्कार करने वाली, अंजन धुल जाने के कारण
रक्ताभनेत्रप्रान्तों वाली, खुले हुए अथ च भीगे हुए केशों वाली, सद्यःस्नाता तरुणी
किसके मन को स्पृहा से आर्द्र नहीं बना देती ?" ऐसा जो कहा गया है उससे
यह निष्कर्ष निकलता है कि खुद आर्द्र वस्तुस्वभाव दूसरों को भी आर्द्र बना देता
है। यह एक औचित्यपूर्ण स्वभाव वर्णन है।
न तु यथा मम तत्रैव--
भक्तिः कातरतां क्षमा सभयतां पूज्यस्तुतिर्दीनतां,
धैर्यं दारुणतां मतिः कुटिलतां विद्याबलं क्षोभताम् ।
ध्यानं वञ्चकतां तपः कुहकतां शीलव्रतं षण्ढतां,
पैशुन्यव्रतिनां गिरां किमिव वा नायाति दोषार्द्रताम् ॥