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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 256 में से

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पृष्ठ 199

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १३६
थीं आज वहाँ तट बन गये हैं, जहाँ दो-चार वृक्ष थे वहाँ आज बहुत से वृक्ष उग
आये हैं और जहाँ बहुत थे वहाँ थोड़े से बच रहे हैं, इस तरह यहाँ की स्थिति
ही बदल गयी है। ज्ञात होता है कि जैसे यह वन ही दूसरा हो, केवल पर्वत आज
भी अपने स्थान पर उसी तरह हैं जिससे यह वही वन है, ऐसी धारणा दृढ़ होती
है—इस उक्ति के द्वारा चिरकालिक विपर्यय के कारण बदली हुई स्थिति वाले
वन के वर्णन से स्थान-विशेष के स्वभाव का बड़ा ही मार्मिक चित्रण प्रस्तुत हो
जाता है, जिससे देशौचित्य की महिमा बढ़ जाती है।
न तु यथा राजशेखरस्य—
कर्णाटीदशनाङ्कितः सितमहाराष्ट्रीकटाक्षाहतः,
प्रौढान्ध्रीस्तनपीडितः प्रणयिनीभ्रूभङ्गवित्रसितः ।
लाटीबाहुविवेष्टितश्च मलयस्त्रीतर्जनीतर्जितः,
सोऽयं सम्प्रति राजशेखरकविर्वाराणसीं वाञ्छति ॥
देशानौचित्यमुद्घाटयितुमाह—न तु यथा राजशेखरस्येति । कर्णा-
ट्यास्तद्देशस्थाया नायिकाया दशनेन दन्तेन तत्क्षतेनेति भावः, अङ्कित-
श्चिह्नितः, सिताया गौरवर्णायाः महाराष्ट्रिया महाराष्ट्रवनितायाः, कटाक्षेण
दृग्भङ्ग्याऽऽहतः, प्रौढायाः परिपूर्णयौवनायाः, आन्ध्रया आन्ध्रदेशस्त्रियाः,
स्तनाभ्यां कुचाभ्यां पीडितः, आन्ध्रयाः पयोधरयोरुत्तुङ्गत्वं जगत्प्रसिद्धमेव,
तेन तत्सम्पर्किणः पीडनं सुयुक्तमिति भावः, प्रणयिन्याः प्रेयस्याः, भ्रूभङ्गेन
कटाक्षनिक्षेपेण, वित्रसितः, लाट्या लाटदेशस्थिताया अङ्गनायाः,
बाहुभ्यां भुजाभ्यां, विवेष्टित आलिङ्गित इति भावः, मलयस्त्रिया मलय-
कामिन्यास्तर्जन्याऽङ्गुलिविशेषेण, तर्जितस्त्रासितश्चाभूदिति शेषः, सोऽयं
स एवायं, राजशेखरकविस्तन्नामककविविशेषः, सम्प्रतीदानीं जरावस्था-
यामिति यावत्, वाराणसी काशीं, वाञ्छति स्पृहयति गन्तुमिच्छ-
तीति भावः ।
देशानौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिए कहा गया है—न तु यथेति ।
कर्णाटीति--जो पहले कर्नाटक देश की वनिताओं के दन्तक्षतों से चिह्नित हुआ,
फिर महाराष्ट्र की गोरी ललनाओं के कटाक्षनिक्षेप का शिकार हुआ, बाद में
आन्ध्र की प्रौढ़ सुन्दिरयों के स्तनों के भार से दब सा गया, फिर प्रेयसी की
कुटिल भ्रुकुटी से भयभीत हुआ, बाद में लाट देश की कामिनियों के बाहुपाश
में आबद्ध हुआ और मलयनितम्बिनी की तर्जनी से तर्जित भी हुआ, वही कवि-
शिरोमणि राजशेखर आज काशी जाने की स्पृहा कर रहा है।