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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 256 में से

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पृष्ठ 198

१३८ औचित्यविचारचर्चा

हेतुं दर्शयति—निवेशः शैलानामिति । शैलानां पर्वतानां, निवेशः यथा-
पूर्वमवस्थानं, तदेवेदं वनमिति बुद्धिं मतिं, द्रढयति ।
देशौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है--यथा भट्टभवभूते-
रिति । शम्बूकवध के प्रसंग में पुनः दण्डकारण्य गये हुए रामचन्द्र की उक्ति
है--पुरेति । पहले जहाँ नदियों का प्रवाह था आज वहाँ तट उग आये हैं तथा
वृक्षों के घन-विरल भाव में परिवर्तन आ गया है अर्थात् जहाँ पहले छिटपुट पेड़
थे आज वहाँ सघन हो गये हैं और जहाँ सघन थे आज वहाँ छिटपुट हो गये
हैं । ऐसा ज्ञात हो रहा है कि जैसे यह दूसरा ही वन हो, परन्तु पर्वतों की
यथापूर्व स्थिति से ऐसा विश्वास बद्धमूल हो रहा है कि यह वही वन है ।
अत्र बहुभिर्वर्षैरतिक्रान्तैः शम्बूकवधप्रसङ्गेन दण्डकारण्यं रामः पूर्व-
परिचितं पुनः प्रविष्टः समन्तादवलोक्यैवं ब्रूते-"पुरा यत्र नदीनां प्रवा-
हस्तत्रेदानीं तटम् वृक्षाणां घनविरलत्वे विपर्ययश्चिराद् दृष्टं वनमिदम-
पूर्वमिव मन्ये, पर्वतसन्निवेशस्तु तदेवैतदिति बुद्धिं स्थिरीकरोति" इत्युक्ते
चिरकालविपर्ययपरिवृत्तसंस्थानकाननवर्णनया हृदयसंवादी देशस्वभावः
परमौचित्यमुद्द्योतयति ।
अत्रास्मिन् पद्ये, बहुभिः कियद्भिर्वर्षैरतिक्रान्तैर्व्यतीतैः, शम्बूकवध-
प्रसङ्गेन शम्बूकनाम्नः शूद्रर्षेर्हननक्रमेण, रामः, पूर्वपरिचितं सीतया सह
वनवासकाले परिज्ञातं, दण्डकारण्यं दण्डकनामकं वनं, पुनर्भूयः, प्रविष्टः
समुपेतः, समन्तात्परितोऽवलोक्य दृष्ट्वैवं ब्रूते कथयति--"पुरा वनवास-
काले, यत्र नदीनां प्रवाह आसीत्तत्राद्य तटं वर्तते, वृक्षाणां घनविरलत्वे
परिवर्तनं संवृत्तमस्ति, बहुकालानन्तरं दृष्टमिदं वनमदृष्टपूर्वमिव लगति,
परन्तु पर्वतानां यथापूर्वस्थितिस्तदेवेदं वनमिति बुद्धिं स्थिरीकरोति"
इत्युक्ते चिरकालस्य बहुसमयस्य, विपर्ययेण विपर्यासेन, परिवृत्तं परि-
वर्तितं, संस्थानं संघटनं यस्यैवं भूतस्य काननस्य वनस्य वर्णनया वर्णनेन,
हृदयसंवादी हृदयसंमतः, देशस्वभावः स्थानविशेषप्रकृतिः, परमौचित्य-
मुद्द्योतयति ।
इस पद्य में कई ( बारह ) वर्ष बीत जाने पर शम्बूक नामक शूद्रमुनि के
वध के क्रम में श्री रामचन्द्र पूर्वपरिचित दण्डकारण्य में पुनः प्रविष्ट होकर वहाँ
की परिवर्तित स्थिति को देखते हुए कह रहे हैं-"पहले जहाँ नदियों की धारायें