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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 200

१४० औचित्यविचारचर्चा
अत्र कर्णाटमहाराष्ट्रान्ध्रलाटमलयललनासम्भोगसुभगः कालेन
गलितरागमोहः सम्प्रति राजशेखरकविर्वाराणसीं गन्तुमिच्छतीत्युक्ते
शृङ्गाररस्तरङ्गितवराङ्गनाप्रसङ्गेऽनङ्गनिर्गलदक्षिणापथदेशोद्देशमध्ये
प्रणयिनीभ्रूभङ्गवित्रासित इति देशोपलक्षणविरहितकेवलप्रणयिनीपदेन
देशौचित्यमुपचितमप्यनुचिततां नीतम् ॥ २७ ॥
अत्रोक्तपद्ये "कर्णाटकादिदेशाङ्गनारमणः कालक्रमेण विगतस्पृह
इदानीं राजशेखरकविर्वाराणसीं गन्तुमिच्छतीत्युक्ते" शृङ्गाररसेन
तरङ्गित आप्यायितो यो वराङ्गनाप्रसङ्गश्चारुनितम्बिनीसहवासस्त-
स्मिन्, अनङ्गनिर्गलदक्षिणापथदेशोद्देशमध्ये निर्बाधकामक्रीडास्पद-
तया प्रसिद्धे दक्षिणापथे वक्तव्ये, "प्रणयिनीभ्रूभङ्गवित्रासितः" इत्याकार-
केण देशोपलक्षणविरहितकेवलप्रणयिनीपदेन स्थानविशेषसूचनाहीनकेवल-
प्रणयिनीपदप्रयोगेण, उपचितमुच्छ्रितमपि, देशौचित्यमनुचिततामनौचित्यं
नीतं प्राप्तम् ॥ २७ ॥
इस पद्य में पहले "कर्णाटकादि देशों की श्रेष्ठ सुन्दरियों के रमण में लीन
पीछे वृद्धावस्था के कारण राग-मोहादि से मुक्त होकर अभी राजशेखर कवि
काशी जाने की इच्छा कर रहा है" इस तरह के कथन में शृंगार रस से
आप्लावित वरनारी-संभोग के प्रसंग में निर्बाध काम के लिए प्रसिद्ध दक्षिणापथ
की चर्चा के बीच "प्रणयिनीभ्रूभङ्गवित्रासितः" इस तरह के देश विशेष की चर्चा
से रहित केवल "प्रणयिनी" पद से वह देशौचित्य अनौचित्य के रूप में परिणत
हो गया जो पहले समृद्ध था । तात्पर्य यह है कि उन उन देशों की स्त्रियों के
प्रसंग में आन्ध्र देश की नारी की चर्चा के बाद कवि को दक्षिण-देशीय कामिनी
की चर्चा भी अवश्य करनी चाहिए थी परन्तु वैसा नहीं करके केवल प्रणयिनी
मात्र कह देने से पूर्वदेशौचित्य समाप्त हो गया । इसलिए इस देशानौचित्य से
यह पद्य विरस सा हो गया है ॥ २७ ॥
कुलोचित्यं दर्शयितुमाह—
कुलोपचितमौचित्यं विशेषोत्कर्षकारणम् ।
काव्यस्य पुरुषस्येव प्रियं प्रायः सचेतसाम् ॥ २८ ॥
पुरुषस्येव काव्यस्य कुलोन्नतमौचित्यं सविशेषोत्कर्षजनकं प्रायेण
बाहुल्येन सहृदयानामभिमतम् ।