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सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 173

संस्कृत-हिन्दोव्याख्याद्वयोपेता ११३
इसी अर्थ को स्पष्ट करने के लिये कहा गया है—प्रस्तुतार्थोचितेनेति—वर्ण-
नीय अर्थ के अनुरूप लिंग के प्रयोग से काव्य उसी तरह चमक उठता है जैसे
राजचिह्न से शरीर ।
यथा मम ललितरत्नमालायाम्—
निद्रां न स्पृशति त्यजत्यपि धृतिं धत्ते स्थितिं न क्वचिद्
दीर्घां वेत्ति कथां व्यथां न भजते सर्वात्मना निर्वृतिम् ।
तेनाराधयता गुणस्तव जपध्यानेन रत्नावलीं,
निःसङ्गेन पराङ्गनापरिगतं नामापि नो सह्यते ॥
लिङ्गोचित्यमुदाहर्तुमाह—यथा ममेति । रत्नावलीवियोगेन विकलस्य
वत्सेश्वरस्य वर्णनमिदम् – निद्रामिति । निद्रां स्वापं, न स्पृशति रत्नावली-
वियोगविधुरोऽसौ रात्रौ निद्रां नाप्नोतीति भावः ? धृतिं धैर्यमपि त्यजति
जहाति, क्वचित्कुत्रापि स्थितिं न धत्ते कुत्राप्येकत्र स्थातुं न पारयतीतस्ततो
विक्षिप्तवद् अमतीति भावः, दीर्घा महतीं, कथां कामपि वार्त्ता, व्यथामाधि-
मिव वेत्ति जानाति, सर्वात्मना सर्वतोभावेन निर्वृतिं शान्तिं न भजते
रत्नावल्या गुणस्य दाक्षिण्यादेः स्तवेनोच्चैः कीर्त्तनेन, जपेनान्तर्मुखोच्चारणेन
ध्यानेनाधिमनश्चिन्तनेन च गुणस्तवद्वारेति भावः, रत्नावलीं लङ्केशकुमारी-
माराधयता पूजयता, निःसङ्गेन त्यक्तविषयाभिलाषेण, तेन वत्सराजेन,
पराङ्गनापरिगतमन्यस्त्रीसमाधृतं नामापि किमुत सम्पर्कौ नो सह्यते ।
लिङ्गोचित्य का उदाहरण दिखाया जा रहा है—यथा ममेति । निद्रामिति ।
रत्नावली के वियोग में वत्सराज उदयन इतने उद्विग्न हो गये हैं कि उन्हें निद्रा
नहीं आती, धैर्य छूट रहा है, किसी एक जगह ठहर नहीं सकते हैं, विक्षिप्त के
समान इधर-उधर छटपटाते फिर रहे हैं, किसी तरह की लम्बी बातचीत उन्हें
व्यथादायक होती है। कहीं भी शान्ति नहीं मिल पाती । कहाँ तक बताया जाय,
रत्नावली के अभाव में उसके स्तवन, जप और ध्यान के द्वारा उसकी आराधना
करते हुए जनसंपर्क से दूर रहने वाले उदयन किसी दूसरी स्त्रो का नाम भी
सुनना नहीं चाहते हैं ।
अत्र वत्सेश्वरस्य रत्नावलीविरहविधुरचेतसः स्मरावस्थासमुचितं
विदूषकेन सुसङ्गतायै यदभिहितम्—निद्रां न स्पृशति, धृतिं
त्यजति, स्थितिं न धत्ते, दीर्घां कथां व्यथामिव वेत्ति, निर्वृतिं न भजते,
तां विना तेन तद्गुणजापिना तद्ध्याननिरतेन जनसङ्गत्यागिनाऽन्या-
८ औ०