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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 256 में से

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पृष्ठ 172

११२ औचित्यविचारचर्चा
कामिनियों के धड़कते कुचतट पर हार को सहला रहा है, ऐसे कथन से उनके
प्रताप की सर्वव्यापकता समाप्त हो जाती है, वह एकदेश मात्र में फैल कर रह
जाता है, फिर जिस उद्देश्य से उनके शौर्य और शृङ्गार की गाथा गायी गयी है
वह प्रशंसा न होकर एक तरह से निन्दा ही हो जाती है, क्योंकि उस कथन
से यह स्पष्ट हो जाता है कि जहाँ मैं था वहाँ तो आपका प्रताप वैसा कर रहा
है परन्तु अन्य देश में ऐसी बात नहीं है, और एक देश मात्र में राजा का प्रताप
फैला भी है तो यह कोई खास बड़प्पन की बात नहीं है, क्योंकि एक देश में तो
डाकू या लुटेरा का भी प्रताप फैलता देखा गया है। इसके परिहार के लिए यदि
सब जगह मैं रहा हूँ ऐसा ही अभिप्राय उक्त वाक्य का माना जाय तो वह भी
उचित नहीं होगा, क्योंकि “तत्र” से स्वभावतः किसी खास स्थान का ही बोध
होता है। इसलिए यहाँ अधिकरणपदगत अनौचित्य स्पष्ट परिलक्षित हो रहा
है। मैं वहां सब जगह था जहां-जहां आपका प्रताप फैल रहा है—ऐसा यदि कहा
जाता तो पूर्ण प्रशंसा के अनुकूल होता और अचित्य का व्याघात भी नहीं
होता ॥ २० ॥
लिङ्गोचित्यं दर्शयितुमाह—
उचितेनैव लिङ्गेन काव्यमायाति भव्यताम् ।
साम्राज्यसूचकेनेव शरीरं शुभलक्ष्मणा ॥ १२ ॥
प्रस्तुतार्थोचितेन लिङ्गेन काव्यं भव्यतामुपयाति राजलक्षणेनेव
शरीरम् ।
कारकोचित्यं प्रदर्श्य क्रमोपगतं नवमं लिङ्गोचित्यं दर्शयितुमाह—
उचितेनैवेति । उचितेनैवानुरूपेणैव, लिङ्गेन स्त्रीपुंनपुंसकरूपेण, काव्यं,
साम्राज्यसूचकेन साम्राज्यव्यञ्जकेन, शुभलक्ष्मणा शुभकारकलक्षणेन,
शरीरं वपुरिव, भव्यतां स्पृहणीयतामायति प्राप्नोति ।
कारिकार्थं विवृणोति—प्रस्तुतार्थेनेति । प्रस्तुतार्थोचितेन वर्णनीयार्था-
नुरूपेण लिङ्गेनलिङ्गनिर्देशेनेति भावः, काव्यं कविकर्म, राजलक्षणेन
राजचिह्नेन शरीरमिव भव्यतां सुन्दरतामुपयाति समुपगच्छति ।
कारकोचित्य के उदाहरण प्रत्युदाहरण दिखलाकर अब अवसरप्राप्त नवे
लिङ्गोचित्य की विवेचना करने के लिये कहा गया है—उचितेनैवेति—जैसे राज्य
सूचक शुभ लक्षण से शरीर शोभित होता है उसी तरह स्त्रीलिंग पुलिंग आदि
के समुचित प्रयोग से काव्य स्पृहणीय हो जाता है ।