आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 409, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें३६० आत्मतत्त्वविवेके
प्रवृत्तिश्च भज्येतेति ।
एवञ्च---
अशक्तिरनुपादानादन्यादानादनन्तता ।
मिथो न प्रतिसन्धिश्च सङ्करेऽनेकसंश्रितिः ॥
इति संग्रहः ।
नापि द्वितीयः, तस्यापि भेदाग्रहः स्वरूपतो वा स्यात् ?
विषयतो वा ? आद्ये पूर्वद्विमिति प्रत्ययमात्राद्वा ? प्रवृत्तिविज्ञाने-
भ्योऽपि वा ? न प्रथमः, अहमित्यज्ञासिपमहमिति जानाम्यहमिति
आलयविज्ञानका उपादानोपादेयभाव नहीं होनेसे प्रवृत्तिविज्ञानके विषय-
का आलयविज्ञानद्वारा प्रतिसन्धान (स्मरण ) नहीं हो सकेगा। एवं,
सभी आलयविज्ञान निमित्तताके अनुरोधसे दूसरे-दूसरे ज्ञानोंको ही
अपना उपादेय (कार्य) बनायेगा और वे भी प्रत्येक दूसरे ही दूसरेको।
इस प्रकार नये नये अनन्त सन्तानोंकी प्रवृत्ति भी होने लगेगी।
ऐसी दशामे आये दोषोंका सङ्ग्रह यों है---प्रथम दोष अशक्ति है।
अर्थात् प्रवृत्तिविज्ञान यदि किसीका उपादान न हो तो निमित्त भी नहीं
हो सकेगा तथा अर्थक्रियासामर्थ्यके अभावमें वह असत् हो जायगा।
यदि वह अन्य (विजातीय) सन्तानका उपादान हो तो वह भी किसी
अन्य का होगा, इस प्रकार अनन्त सन्तानोंका प्रसङ्ग हो जायगा।
प्रवृत्तिविज्ञान एवं आलयविज्ञानका परस्परमें उपादानोपादेयभाव नहीं
होनेपर परस्परद्वारा ज्ञात-विषयका स्मरण भी नहीं हो सकेगा। यदि
दोनोंमें उपादानोपादेयभाव हो तो सङ्कर होनेसे एक अनेकाश्रित
(अनेकोपादेय) हो जायगा, जिससे अवयवी और सयोग आदि भी
मानने पड़ जायेंगे।
'प्रवृत्तिविज्ञानसन्ततिके अन्त पाती कादाचित्क (कभी-कभी होनेवाला)
अहंप्रत्यय ही आलय विज्ञान है" यह द्वितीयपक्ष भी नहीं हो सकता है।
क्योंकि उसका भी भेदाग्रह स्वरूपत होगा ? या विषयकी दृष्टिसे ?
आद्यपक्षमें पूर्वमें बताय "अहम्" इस प्रतीतिमात्रसे भेदाग्रह होगा ?