आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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भ्रान्त एव । बाधकस्योभयत्रापि तुल्यत्वात् ।
सर्वत्र भ्रान्तोऽस्त्विति चेत्, भेदव्यवहारोऽपि तथा
किं न स्यात् ? अर्थक्रियास्थितेरिति चेत्, व्यक्तिभेदा-
भेदव्यवस्थापकार्थक्रियाभेदाभेदवत् सजातीयासजातीयत्व-
व्यवस्थापकार्थक्रियासाजात्यवैजात्ये अपि किं न पश्यसि ?
ते अपि भ्रान्ते इति चेत्, अर्थक्रियाभेदोऽपि भ्रान्त इति
तुल्यम् । अस्त्वेवमिति चेन्, त्यज तर्हि बाह्यव्यसनम् ।
अयमेवाशय इति चेन्, तत्र वक्ष्यामः ।
मा भूद् वार्थक्रियासाजात्यवैजात्यावगमः, भ्रान्त्यनुग-
मोऽप्येकं निमित्तमनादृत्य कथम् ? तदपि हि कार्यसाजात्यं
भ्रमात्मक है तो अनेक सामान्योंमें यह एकसामान्यत्वका व्यवहार भी
भ्रमात्मक ही है। क्योंकि बाधक दोनों जगह समानरूपसे है।
यदि कहो कि—तब गोपिण्डोंमें भी एक गोत्वसामान्यका व्यवहार
भ्रान्त हो तो कहूँगा कि सर्वत्र व्यक्तियोंमें भेदव्यवहार भी भ्रान्त क्यों न
हो जाय !
यदि कहो कि—अर्थक्रियाके भेदसे व्यक्तिमें भेद होता है—तो जैसे
अर्थक्रियाका भेद और अभेद व्यक्तिके भेद और अभेदका व्यवस्थापक
है, वैसे ही अर्थक्रियाका साजात्य और वैजात्य व्यक्तिके सजातीयत्व
और विजातीयत्वका व्यवस्थापक है, यह बात भी तुझे क्यों न
सूझती है ?
यदि कहो कि—अर्थक्रियाका साजात्य और वैजात्य भी भ्रान्त है—
तो व्यक्तियोंमें भेद सिद्ध करने वाला अर्थक्रियाका भेद भी वैसे ही
भ्रान्त होगा।
यदि कहो कि—हा, अर्थात् अर्थक्रियाभेद और व्यक्तिभेद सभी
भ्रान्त हैं—तो फिर बाह्यवस्तुओंकी सत्ताका आग्रह छोड़ दो। यदि तू
अपना अभीष्ट भी इसे ही बताओ तो उसके सम्बन्ध में आगे कहेंगे।
अथवा अर्थक्रियाका साजात्य वैजात्य भले ही मत स्वीकार करो
किन्तु एक निमित्तको माने बिना भ्रान्तियोंका अनुगम भी कैसे हो