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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 530 में से

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पृष्ठ 199

१५० आत्मतत्त्वविवेके
सामर्थ्यात् । तद्रूपेण तस्यैव प्रथनादिति चेत्, प्रथताम्,
न तु तस्य प्रवर्तनयोग्यता तत्र प्रथननियता, वह्निस्वलक्षणे
च ह्विकल्पादप्रवृत्तिप्रसङ्गात् । स्वीकुरु वा तस्यापि तत्र स्फुरणं,
परिहर वा वह्निविकल्पादवह्नौ प्रवृत्तिमिति ।
एतेनाकारसारूप्यं नियमहेतुरपास्तः । अर्थनीयसारूप्या-
भावेऽपि प्रवृत्तिदर्शनात्, अनर्थनीयसारूप्यमात्रस्य चाति-
प्रसञ्जकत्वात् ।
नियामक है—तब तो वह्निविकल्पसे रत्नकिरणपुञ्जमे कभी भी प्रवृत्ति न
हो सकेगी । कारण, दाहसमर्थमे ही प्रवृत्ति करानेकी शक्ति उस विकल्प-
जातिमे है, और रत्नकिरणसमूहमे वह दाहसामर्थ्य धर्म है नहीं । किन्तु
वह्निबुद्धिसे उसमे भी लौकिक प्रवृत्ति देखी जाती है ।
यदि कहो कि—दाहसमर्थ अग्निके रूपमे ही रत्नकिरणोंका ज्ञान हुआ
है, इसलिये उसमेप्रवृत्ति हो सकती है—तो रत्नकिरणोंका ज्ञान होनेसे
क्या हुआ ? कारण, तुम्हारे मतमे तो उस वस्तुमें प्रवृत्ति करानेके लिये
उस वस्तुका ज्ञान आवश्यक है नहीं । यदि आवश्यक हो तो वह्निविकल्प
से वह्निवस्तुमें प्रवृत्ति न हो सकेगी, क्योंकि उस विकल्पमे वह्निवस्तुका
भान तुम्हारे मतमें नहीं होता है । इसलिये या तो वह्निवस्तुका भी भान
सविकल्पक ज्ञानमें मानो या वह्निविकल्पसे रत्नकिरणपुञ्जमे होने वाली
प्रवृत्तिको रोक दो ।
इस रत्नकिरणवाले दोषसे यह मानना भी कि नियत विषयमे प्रवृत्तिका
कारण प्रवृत्तिविषय और विकल्पमे आकार (धर्म) सारूप्य है, खण्डित

  • हो जाता है । क्योंकि इस मतानुसार वह्निविकल्पसे वह्निस्वलक्षणमे
    तो प्रवृत्ति हो जायगी । कारण, जो वह्नित्वधर्म वह्निस्वलक्षणमे है,
    वही वह्निविकल्पमे भी माना जाता है, इसलिये यहा विकल्प और
    स्वलक्षणात्मक वस्तुमे धर्मसारूप्य मिल जाता है । किन्तु जहा वह्नि-
    बुद्धि (विकल्प) से रत्नकिरणमे निष्फल प्रवृत्ति होती है, वहा अर्थनीय
    वस्तुमे अर्थात् प्रवृत्तिके लिये अभिप्रेत किरणपुञ्जमे और प्रवर्तक बुद्धि
    में आकारसारूप्य है नही । क्योंकि प्रवर्तक वह्निविकल्पमे वह्नित्वधर्म