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अश्ववैद्यकम् (जयदत्त सूरि - विस्तृत अश्व-रोग निदान एवं शल्य-चिकित्सा महाग्रन्थ)

अश्ववैद्यकम् (जयदत्त सूरि - विस्तृत अश्व-रोग निदान एवं शल्य-चिकित्सा महाग्रन्थ)

Ashvavaidyaka of Jayadatta Suri with Commentary

जयदत्त सूरि (सम्पादक: उमेशचन्द्र गुप्त कविरत्न) द्वारा

DevanagariHindipublished522 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 522 में से

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पृष्ठ 199

र्यस्य जायते ।
Wait, "श्वयथुर्यस्य":
श्व, य, थु, र्य, स्य -> श्वयथुर्यस्य. Correct.

यस्य रोमाणि' स्निग्धानि तैलाक्ता इव केशराः ॥ ४ ॥

  • "यस्य"
  • "रोमाणि'"
  • "स्निग्धानि"
  • "तैलाक्ता"
  • "इव"
  • "केशराः"
  • "॥ ४ ॥"

असाध्य' इति जानीयात् सप्ताहं तस्य जीवितम् ।

  • "असाध्य'"
  • "इति"
  • "जानीयात्"
  • "सप्ताहं"
  • "तस्य"
  • "जीवितम्"
  • "।"

मेढ्र' निष्क्राम्य यो वाजी शार्दूलवन्निषीदति ॥ ५ ॥

  • "मेढ्र'" or "मेढ्रं'"? It looks like "मेढ्र'": wait, is there an anusvāra? There's a stroke above/to the right: मेढ्र'.
    Wait, let's look at मेढ्र': is there a dot? It looks like मेढ्र' with a tick mark, or maybe मेढ्रं'. In Sanskrit it's accusative मेढ्रं निष्क्राम्य. Let's look closely: there is a bindu below the tick?