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अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

सूत्र-७ 33
इसी तरह कृमि, कीट-पतङ्गादि जो ये जीव अनुरूप संसार की सृष्टि में उत्पन्न हुए
हैं, उनके बारे में भी आप कृपा करके अवश्य कहें।
विश्वकर्मोवाच -
काश्यपस्य हृदुत्पन्ना मानस्यः पञ्च कन्यकाः ।
तदुत्पन्ना च या सृष्टिः कथये तां च साम्प्रतम् ॥ ३॥
अश्वी गजी नखी चैव शृङ्गी शुकी तु पञ्चमी ।
पृथगेकैकसम्भूतिं कथयामि यथाश्रुतम् ॥ ४॥
विश्वकर्मा बोले - कश्यप मुनि के हृदय से पाँच मानसी कन्याएँ उत्पन्न हुईं
जिनके द्वारा जो सृष्टि उत्पन्न हुई, उसके बारे में अब मैं तुम्हें कहता हूँ। इनमें अश्वी,
गजी, नखी, शृङ्गी तथा शुकी पाँचवीं कन्या है। इसमें से प्रत्येक के पृथक-पृथक
जीव जैसे उत्पन्न हुए, उनके विषय में जैसा मैंने सुना, उन्हें यथावत कहता हूँ।
वृक्षा श्चैवाम्बुकी जाता आम्बुकाः पञ्चमूर्धजाः ।
अम्बो जम्बूस्तथाऽश्वत्थो वटश्चोदुम्बरस्तथा ॥ ५॥
इसी प्रकार आम्बुकी से वृक्षों में पाँच मुख्य-मुख्य अम्बुक उत्पन्न हुए जो इस
प्रकार हैं- (1.) आम, (3.) जामुन, (3.) अश्वत्थ, (4.) वट और (5.) उदुम्बर।
आम्बकात् सरलोजास्तस्तस्यैव सप्तपुत्रिकाः ।
ताली चैव तदुद्भूताः तमालतालवृक्षकाः ॥ ६॥
धान्यकी च तृणी चैव व्याख्याताः सप्तपुत्रिकाः ।
शाली च व्यन्तरी चैव लता चैवौषधिस्तथा ॥ ७॥
आम्बका से सरल उत्पन्न हुआ जिसके सात पुत्रियाँ हुईं। ताली और उससे
उत्पन्न हुए तमाल और ताल वृक्ष, धान्यकी, तृणी, शाली, व्यन्तरी, लता और

  • औषधि।
    व्यन्तार्याश्च समुद्भूता व्यन्तराश्चैव "मूर्धजाः"?।
    लताश्चैव लतोद्भूताः शैलाद्यं भूतले यथा ॥ ८॥
    औषध्यश्चौषधीजाता लक्षाणि वै समुद्भवाः ।
    धान्यकी धान्यसम्भूतिः सङ्ख्याताष्टादशात्मिका₁₈ ॥ ९॥
    व्यन्तरी से मुख्य-मुख्य व्यन्तरा वृक्ष उत्पन्न हुए। इसी तरह लता से भी भूतल
    पर लता से उत्पन्न होने वाले शैलाद्य उत्पन्न हुए। औषधि से उत्पन्न लाखों औषधियाँ
    पैदा हुईं। धान्यकी से भी अठारह प्रकार की संख्या के धान्य उत्पन्न हुए।

34 अपराजितपृच्छा
तृण्यास्तृणानिजातानि चतुरशीतिः सङ्ख्यया ।
तृणानां दूर्विकादीनां समस्तानां ततो भवः ॥ 10 ॥
तृणी से चौरासी की संख्या के तृण उत्पन्न हुए। उन तृणों में समस्त प्रकार की
दूर्विका-दूब उनसे उत्पन्न हुई।
शृङ्गयाश्चैव प्रवक्ष्यामि मानसीः सप्तपुत्रिकाः ।
वृषी महिषी मेषी च ह्यजा मृगी च शम्बरी ॥ 11 ॥
गण्डकी सप्तमी जाता गण्डक्याश्चैकशृङ्गकाः ।
शम्बर्याः शम्बरा जाता मृग्या श्चैवं मृगा मताः ॥ 12 ॥
मेष्या मेषाः समुत्पन्नास्तथाजाया अजोद्भवः ।
वृष्या वृषाश्च सञ्जाता महिष्या महिषोद्भवः ॥ 13 ॥
शृङ्गी के भी सात मानसी पुत्रियाँ हुई जिनके विषय में अब कहता हूँ। उनमें
( 1.) वृषी, ( 2.) महिषी, ( 3.) मेषी, ( 4.) अजा, ( 5.) मृगी, ( 6.) शम्बरी और
( 7.) गण्डकी। गण्डकी से उत्पन्न होने वाले एक सींग वाले गेण्डे तथा शम्बरी से
शम्बर उत्पन्न हुए और मृगी से मृग उत्पन्न माने गए। मेषी से मेष-भेड़ें उत्पन्न हुईं
और अजा से बकरी उत्पन्न हुई। वृष्या से वृष-बैल उत्पन्न हुए और महिषी से
महिष-भैंसे हुए।
पुत्रिकाश्चैव शुक्यास्तु शतान्यष्टौ₁₀₈ द्विधाश्च₂ ताः ।
विहङ्गाश्च समस्तास्तु ह्यण्डजाः पक्षिणस्तथा ॥ 14 ॥
इसी प्रकार शुकी के एक सौ आठ पुत्रिकाएँ हुईं जो दो प्रकार की हैं। उनसे ही
सभी विहङ्ग और अण्डों से उत्पन्न होने वाले पक्षी उत्पन्न हुए।
एकैव च नखीजाता द्वात्रिंशच्च₃₂ तदात्मजाः ।
ग्रामारण्यव्योमचराः सङ्ख्याताश्च समस्तकाः ॥ 15 ॥
एक मात्र नखी के बत्तीस सन्तान हुईं उनमें ग्रामवासी, अरण्यवासी,
आकाशचारी आदि की समस्त संख्या आ जाती है।
गजा वराहाश्चैवं च एकान्वयसमुद्भवाः ।
कथिता चान्वयोद्भूतिरश्वीनां तु ह्यतः परम् ॥ 16 ॥
गज और वराह आदि दन्ति एक ही वंश से समुद्भूत हुए हैं। आगे मैं अश्वी के
एक ही वंश में उत्पन्न होने वाले जीवों के बारे में कहता हूँ।
अश्वः खरश्च पौराश्च गैरा म ( क )र्कटकादयः ।
अन्ये च श्वापदाः सर्वे ह्यश्वव्युत्पत्तिः प्रकीर्तिता ॥ 17 ॥

सूत्र-७ 35
अश्व, खर, पौर, गैर (गवय), मर्कट आदि अन्य श्वापद सभी अश्व से ही हुई
उत्पत्ति में कहे गए हैं।
तिस्रः पुत्र्यः समुत्पन्ना मानस्यः कश्यपस्य तु।
पद्मा चाम्भोभवी क्रौञ्चा तिस्रश्चैवं प्रकीर्तिताः ॥ 18 ॥
कश्यप से तिस्र पुत्रियों से उत्पन्न होने वाले मानस्य और पानी से पैदा होने
वाले पद्म, क्रौञ्च ये तिस्र ही कहे गए हैं।
अम्भोभव्या जलचराः पद्मायाः पद्मसम्भवः।
क्रौञ्चात्मजाश्च शैवालास्त्रिधा चैवं समुद्भवम् ॥ 19 ॥
अम्भोभव्या- पानी में उत्पन्न होने वाले सभी जलचर और पद्म-कमल तथा
कमल से उत्पन्न होने वाले, क्रौञ्च-सारस और तीन प्रकार के शैवाल जो पानी में
उत्पन्न होते हैं।
चतुर्वर्णाः प्रकृतयो ह्यन्त्यजा नीचकोद्भवाः।
भौमाः कीटपतङ्गाश्चोष्मजा उरगव्यन्तराः ॥ 20 ॥
भूम्युदकेषु सम्भूता विख्याता बीजतस्तथा।
भूमौ समुद्भवं चैवं सम्योगे वारिणां खलु ॥ 21 ॥
चारों वर्णों की प्रकृति प्रजा व निम्न योनि में जन्म लेने वाले अन्त्यज, भूमि में
पैदा होने वाले कीट-पतङ्ग जो गर्मी से उत्पन्न होते हैं तथा उरग-सर्पादि व्यन्तर
जीव, भूमि और पानी से उत्पन्न होने वाले विख्यात बीज जो भूमि में पानी के संयोग
से सभी उत्पन्न होते हैं।
उदके सर्वबीजानां सम्भूतिः सर्वतः स्मृता।
केचिदाकाश उत्पन्नाः केचित्पातालसम्भवाः ॥ 22 ॥
केचिद्द्भूम्युद्बवाश्चैव त्रिविधः₃ सृष्टिसम्भवः।
वर्षाकाले समुत्पत्तिर्हेमन्ते तु प्रवर्तनम् ॥ 23 ॥
प्रलयो ग्रीष्मसम्प्राप्तौ अजीर्णे ? पुनराव्रजेत्।
चतुरशीति₈₄ लक्षाणि जीवयोनिरनेकधा ॥ 24 ॥
जल से ही समस्त बीजों की उपज-निपज होती है, ऐसा सभी को ज्ञान है।
कितनी ही आकाश में उत्पन्न होने वाली तथा कितनी ही पाताल में उत्पन्न होने
वाली, कितनी ही भूमि में उत्पन्न होने वाली ऐसी तीन प्रकार की सृष्टि सम्भव होती
है जो वर्षाकाल में उत्पन्न होकर हेमन्त ऋतु में प्रवर्तित होती है जबकि ग्रीष्मकाल
के आने पर सूख जाती है परन्तु नष्टभूत नहीं होती और पुनः उत्पन्न हो सकती है।

36 अपराजितपृच्छा
इस प्रकार चौरासी लाख योनियाँ¹ हैं जो नाना प्रकार की होती है।
इति सूत्रसन्तागुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां-
सृष्टिसंसारावतारणाधिकारो नाम सप्तमं सूत्रम् ॥ 7 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में सृष्टि
संसार अवतारण अधिकार नामक सातवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 7 ॥
सप्तपातालराज्योद्भवो नामाष्टमं सूत्रम् ॥ 8 ॥
अपराजित उवाच -
के च स्वर्गे कृता देवा के च पातालसम्भवाः ।
मर्त्यलोके च भूतानि कथयस्व परेश्वर ॥ 1 ॥
अपराजित बोले - स्वर्ग के कौन-कौन देवता है और पाताल में होने वाले
देव कौन-कौन हैं, इसी प्रकार हे परमेश्वर ! आप मुझे मर्त्यलोक में होने वाले
प्राणियों के बारे में भी उपदेश कीजिए।
विश्वकर्मोवाच -
तलो वितलस्सुतलो नितलश्च तलातलः ।
रसातलश्च पाताल उरगेशाश्च सप्त च ॥ 2 ॥
उरगोद्भवपाताले सप्तपातालविक्रमम् ।
पृथगेवं समुद्दिष्टा ? नवनागकुलानि च ॥ 3 ॥
विश्वकर्मा बोले - तल, वितल, सुतल, नितल, तलातल, रसातल व पाताल-
ये सात सर्पराजाओं के, उरगेशों के लोक हैं। इन उरगों-सर्पों के पातालों में सातों
पाताल बड़े ऐश्वर्यवाले है। इनसे अलग नौ नागकुलों को बताया गया है।
नवकुलनागराजनामावली -
पद्मः कर्कोटकश्चैव पुण्डरीकोऽथ तक्षकः ।

  1. गरुडपुराण में आया है- चतुरशीतिलक्षाणि चतुर्भेदाश्च जन्तवः । अण्डजाः स्वेदजाश्चैव उद्भिजाश्च
    जरायुजाः ॥ एकविंशति लक्षाणि ह्यण्डजाः परिकीर्तिताः । स्वेदजाश्च तथैवोक्ता उद्भिजास्तत् प्रमाणतः ॥
    जरायुजाश्च तावन्तो मनुष्याद्याश्च जन्तवः । सर्वेषामेव जन्तूनां मनुषत्वं सुदुर्लभम्। (प्रेतकल्पोक्त धर्मप्रकटन
    नामक द्वितीय अध्याय)
    बृहद्विष्णुपुराणे - जलजा नवलक्षाणि स्थावरा लक्षविंशतिः । कृमयो रुद्रसङ्ख्याकाः पक्षिणां दशलक्षकम् ॥
    त्रिंशल्लक्षाणि पशवश्चतुर्लक्षाणि मानुषां । सर्वयोनिं परित्यज्य ब्रह्मयोनिं ततोऽभ्यगात् ॥ (शब्दकल्पद्रुम चतुर्थ

सूत्र-८ 37
अनन्तः शङ्खचूडश्च वासुकिः सप्तमो मतः ॥ ४ ॥
सप्तपाताललोकेशो महावीर्या मदोत्कटाः ।
रौद्राश्च विद्रुताः सर्वे ह्यमात्या वीरविक्रमाः ॥ ५ ॥
ये नौकुली नाग हैं- (1.) पद्म, (2.) कर्कोटक, (3.) पुण्डरीक, (4.)
तक्षक, (5.) अनन्त, (6.) शङ्खचूड़, (7.) वासुकी। ये सभी सप्त पातालों के बड़े
बलवान, मदोन्मत्त अधिपति, लोकेश हैं। ये बड़े भयङ्कर रौद्ररूप व शीघ्रगामी तथा
सभी आमात्य वीर और पराक्रमी होते हैं।
तलेषु पद्मकॊ राजा वितले च कर्कोटकः ।
सुतले पुण्डरीकाक्षो नितले चैव तक्षकः ॥ ६ ॥
तलातले त्वनन्तश्च शङ्खचूडो रसातल ।
वासुकिर्नागराजेन्द्रः पाताले सर्वतोऽधिपः ॥ ७ ॥
इनमें से तल नामक पाताल के राजा पद्मक हैं, वितल के कर्कोटक, सुतल के
पुण्डरीकाक्ष और नितल के राजा तक्षक है। तलातल के राजा अनन्त, रसातल के
शङ्खचूड़ और इन सब पर वासुकी नागराजेन्द्र समस्त पातालों के महाराजा है।
कुलानि नव₉ प्रत्येकं त्रिषष्टि₆₃ कुलपन्नगाः ।
सप्त₇ पाताललोकेशोः संस्थिताः क्रमयोगतः ॥ ८ ॥
इन सातों में प्रत्येक के नौ-नौ कुल है और इस प्रकार ये सभी सात गुणा नौ
मिलाकर कुल तिरसठ प्रकार के नाग उक्त सातों पातालों के लोकेश के रूप में
क्रमशः संस्थित हैं।
पद्मेशराज्यवासिनामाह —
यत्पद्मेशस्य वै राज्यमाद्यपातालसञ्जितम् ।
तत्रामर्त्यनिवासाश्च चन्द्रकान्तिसमा भुवः ॥ ९ ॥
दिव्यरूपधराः सर्वे दिव्याभरणभूषिताः ।
स्वेच्छारूपं स्त्रीनराणां स्वेच्छागम्यास्तदात्मजाः ॥ १० ॥
जो पद्मेश नाग का राज्य है, उसे आदिपाताल नाम से कहा गया है। वहाँ के
रहने वाले मर्त्य लोग चन्द्रकान्ति वाले अर्थात् गौरवर्ण होते हैं। वे सभी दिव्य कान्ति
वाले रूपयुक्त और दिव्य वस्त्राभरणों को धारण किए सुशोभित होते हैं। इन सब की
यह विशेषता भी है कि ये सब नर-नारी अपनी इच्छा के अनुसार रूप धारण करने
वाले (इच्छाधारी) होते हैं और उनकी सन्तानें भी मनैच्छित ढंग से, स्वच्छन्द रूप
से कहीं भी आ-जा सकती हैं अर्थात निरङ्कुश हैं।

38 अपराजितपृच्छा
रक्तोष्ठी कम्बुग्रीवा च कर्णपूरायतेक्षणा।
वर्णश्यामा क्षाममध्या दशनैर्मौक्तिकोपमा ॥ 11 ॥
नीलोत्पलदलाभासा करवीरदलाकृतिः।
सारद्रुमनितम्बा च रम्भाजङ्घा तथैव च ॥ 12 ॥
इनकी सन्तानों की विहारचर्या देखने योग्य है। ये ओठों को रक्तवर्ण से रङ्गे
रखते हैं। इनकी गर्दन शङ्ख के समान सुडौल भरी हुई होती है और इनके विशाल
नेत्रों की लम्बाई कानों तक पहुँचती भौंहों से युक्त होती है। इनका वर्ण साँवला
होता है और इनकी कमर का मध्य प्रदेश बहुत क्षाम अर्थात् पतला होता है। इनकी
दन्तपङ्क्तियाँ मोती की भाँति चमकदार होती है। इनका शरीर नीलकमल की
पँखड़ियों जैसा सौन्दर्याभास देता है। इनका मांसल शरीर करवीर की पँखड़ियों
जैसी भरी हुई आकृति वाला होता है। इनमें नवाङ्गना सुन्दरियों के नितम्ब भरे हुए
पुष्ट, सुडौल सारद्रुम की भाँति मोटाई लिए हुए गोल होते हैं और इन सुन्दरियों की
जङ्घाएँ बड़ी सुडौल भरी हुई केले के तने जैसी पुष्ट होती है।
एवं स्त्रियः पुमांसश्च स्वेच्छारूपधराः किल।
पद्मोशस्य महाराज्यं पूर्वं पातालवासिनाम् ॥ 13 ॥
इस प्रकार इन नाग लोकों के समस्त स्त्री-पुरुष स्वेच्छा रूप धारण किए हुए,
मनमाने ढंग से पद्मेश के राज्य के पहले के पातालवासी होते हैं।
कर्कोटकराज्यवासिनामाह —
दिव्यतेजोमयाश्चैवं शुद्धस्फटिककान्तयः।
तथा वायतनेत्राश्च प्रवालसदृशाधराः ॥ 14 ॥
केतकीदलसारूपप्या करदग्रेन शोण्यता ?।
श्वेताः स्त्रियश्च पुरुषाः ख्याता वितलवासिनः ॥ 15 ॥
ताम्बूलादिरसाहाराः शत्रुरूपा महाबलाः।
एवं कार्कोटकं राज्यं पाताले तु द्वितीयके ॥ 16 ॥
दिव्य तेजयुक्त आभा वाले और शुद्ध स्फटिक के समान उज्ज्वल और पारदर्शी
स्वभाव के और विशाल नेत्र व मूंगा जैसे लाल-लाल रङ्गों से रङ्गे ओष्ठ, अधर वाले
केतकी के फूलों की पँखड़ियों के समान कोमल हाथों की शोण्यता युक्त सुन्दरता
लिए हुए ये विख्यात वितलवासी नर-नारीगण गौर वर्ण के होते हैं। इस तरह के ये
द्वितीय पातालवासी कर्कोटक के राज्य वाले ताम्बूलादि रसों के आहारी शत्रुओं के
लिए महा बलवान् सिद्ध होने वाले लोग हैं।

सूत्र-८
पुण्डरीकराज्यनिवासिनामाह —
कुङ्कुमाङ्कितनागास्तु ( सर्व ) दाश्वासकोद्भवा।
पद्मपुष्परसाहाराः स्वेच्छारूपा महाबलाः ॥ 17 ॥
रक्तोष्ठनखपादाश्च तथा च रक्तपाणयः।
राज्यं च पुण्डरीकस्य पाताले तु तृतीयके ॥ 18 ॥
कुङ्कुम के तिलक लगाए, सर्वदा गम्भीर श्वास लेते हुए, कमल के पुष्पों का
रसपान करने वाले, भ्रमरों की भाँति मनमौजी रूप बनाए हुए नवयुवतियों के
कमलाननों के शौकिन, छैल-छबीले और महाबलवान, सुडौल लालिमायुक्त नख-
ओष्ठ-पदतलों और कर-कमलों वाले लोग पुण्डरीक के राज्य, तीसरे पाताल के
निवासी हैं।
तक्षकस्य तथा राज्यं कथयामि समासतः।
रक्ताक्षाश्च महोत्साहा दिव्यरूपास्तथोत्तमाः ॥ 19 ॥
रक्ताक्षं च महद्भूतं रक्तोत्पवलमिवांभसि।
सस्थाव ( र ) तीररेखामण्डितं स्त्रीणां तनुमावृते ? ॥ 20 ॥
रक्तोत्पलदलाभासा मध्यक्षामाः स्तनोन्नताः।
पूर्णचन्द्राननाश्चैवं स्त्रियस्सन्ति सुशोभनाः ॥ 21 ॥
एवं तक्षकराज्यं वै पाताले तु चतुर्थके।
अब मैं तक्षक के राज्य के निवासियों के विषय में संक्षेप से कहता हूँ। वहाँ के
लोग मदमाते लाल रङ्गों वाली आँखों व दिव्य चमक वाले सुन्दर, उत्तम रूपवान
और परम उत्साही होते हैं। जल सरोवर में जिस प्रकार से लाल कमल शोभायमान
होते हैं, उसी प्रकार ये बड़ी-बड़ी अद्भुत लाल आँखों वाले छैले कामिनियों के सङ्ग
रतिक्रीड़ा में आई अपने तन पर पड़ी खरोंचों से मण्डित छैल-छबीली नवयुवतियों
के स्तनों से घिरे रहते हैं। जो लाल कमलदलों की आभा वाले सौन्दर्ययुक्त क्षीणकटि
और पीन पयोधरों युक्त पूर्णिमा के चन्द्रमा जैसे खिले-खिले सुशोभित मुख वाली
रमणियाँ हैं और तक्षक के राज्य चतुर्थ पाताल की निवासी हैं।
अथानन्तराज्यनिवासिनामाह —
पञ्चमेऽनन्तको राजा तस्य वक्ष्यामि साम्प्रतम् ॥ 22 ॥
नीलोत्पलदलाभासा अतसीपुष्पसन्निभाः।
मणिरत्नसुशोभाढ्या दिव्याभरणमण्डिताः ॥ 23 ॥

दिव्यरसाहारमाला दिव्यदेहा महोत्कटाः ।
सांसारामोघमालिन्यस्तद्राज्ये च स्त्रियस्तथा ॥ 24 ॥
मोहिन्यो दिव्यदेहैस्तु मोहयन्ति जगद्गुरुम्।
एवं गुणैः समुद्भूता आनन्ते न तलातले ॥ 25 ॥
अब मैं पाँचवें अनन्त नागराज के बारे में कहता हूँ। नीलकमल दलों के समान
कान्तिवाले और अतसी पुष्पों के समान आभा वाले, मणिरत्नों से भरपूर शोभा वाले,
दिव्य आभूषणों से सजे-धजे, दिव्यरसों का पान करने वाले दिव्य पुष्पहारों को धारण
करने वाले, दिव्य देह युक्त ये महाबलवान उत्कट योद्धा होते हैं और वहाँ की स्त्रियाँ
भी सांसारिक व्यर्थ की मलीनता से मुक्त भाव से अपनी दिव्य देह से और मोहिनी
रूप से जगत के बड़े-बड़े गुणवानों को मोहित करने वाली एवं महान गुणवाली ये
सन्नारियाँ अनन्त नाग के राज्य तलातल नामक पाताल की उत्तम उपज हैं।
रसातलनिवासिनामाह —
रसातले तु पाताले रसानां दिव्यदेहकम्।
यस्तच्चारुसैर्दिव्यैर्शोभि वे दिस्य देहिनः ? ॥ 26 ॥
दिव्यपरत्नोपमाः कान्ता दिव्यदेहाः सुरूपकाः ।
नागकन्या महारूपाश्चूडामणिमहोत्सवाः ॥ 27 ॥
श्वेतरक्तपीतकृष्णाविचित्ररूपशोभिताः ।
राज्ये वै शङ्खचूडस्य नागराजेन्द्रकन्यकाः ॥ 28 ॥
रसातल नामक पाताल निवासी समस्त पृथ्‍वी (रसा) पर दिव्य गुणों (रसों) से
युक्त व दिव्य शोभायुक्त देह वाले होते हैं। इनके स्वरूप की कान्ति दिव्य रत्नों के
समान उपमा वाली, सुन्दर कान्ताओं, महा रूपवती महोत्सवों की चूड़ामणि रूप,
सुन्दर नाग कन्याओं की गौरवणीं, रक्तवर्णी, पीतवर्णी, कृष्णवर्णी विचित्र रूपवती
इन सन्नारियों से शोभित नागराजेन्द्र शङ्खचूड़ के राज्य की ये सब नाग कन्याएँ हैं।
इत्यमनन्तर पातालनिवासिनामाह —
सप्तमं कथयिष्यामि पातालं च यथाक्रमम्।
पातालेषु च सर्वेषु श्रेष्ठं नागसमाकुलम् ॥ 29 ॥
समारूपैराकीर्णे श्वेतरक्तशरीरिभिः ।
पद्मरागनिभाः सन्ति सर्वरत्नैश्च शोभिताः ॥ 30 ॥
अब मैं सातवें पाताल लोक का यथाक्रम वर्णन करता हूँ जो समस्त पातालों में
सर्वश्रेष्ठ नागों का समाकुल सङ्कठन है। यहाँ के नाग सभी समान रूपों से भरपूर है।

इनके स्वरूप गौरवर्ण, रक्तवर्ण, पद्मराग के समान वर्ण युक्त होते हैं और सभी प्रकार
के रत्नों से ये शोभायमान होते हैं।
मोहमुद्रापमा दृष्टिः संसारफलदोपमाः ।
तथा चूडोन्नताः केशाश्चित्ररत्नसमुज्ज्वलाः ॥ ३१ ॥
चन्द्रसूर्योपमैश्चैव कुण्डलैस्समलङ्कृताः ।
नैकरत्नमयैश्चैव हारैः पापप्रणाशनैः ॥ ३२ ॥
इनकी मोहक दृष्टि से संसार में जन्म लेने का फल सार्थक लगने लगता है। इनके
सिर के केश विचित्र रत्नों से जड़े हुए चमकदार ऊँचे जूड़ों में गूँथे हुए तथा चन्द्र, सूर्य
की उपमा की शोभायुक्त कर्ण कुण्डलों से अलङ्कृत और अनेक रत्नों से निर्मित हारों
को धारण करने से ये समस्त पापों, बुराइयों, कमियों को समाप्त कर देने वाली हैं।
मेखलाकटिसूत्राद्यैस्सर्वरत्नोपमैः सदा।
एवमाभरणैर्युक्ता दिव्यकान्त्या सुतेजसा ॥ ३३ ॥
स्वर्गादिदेवताभक्ताः पन्नगास्सुमहोत्सवाः ।
देवाग्निगुरुभक्ताश्च संस्थिताश्चैव निश्चलाः ॥ ३४ ॥
ये सब रत्नों से भरपूर मेखला व कटिसूत्रादि से आभूषित सदा ऐसे उत्तम
आभूषणों की दिव्य कान्ति और सुन्दर चमक-दमक युक्त रहकर स्वर्गादि देवताओं
की भक्ति में देव, अग्नि और गुरु की भक्ति में, नागों के महोत्सवों में भाग लेती हुई
नित्य निश्चल दृढ़ता के साथ संस्थित रहती हैं।
सहस्रफणसङ्कीर्णाः सहस्ररदशोभिताः ।
स्वेच्छारूपधरा दिव्याः स्वर्गपातालगामिनः ॥ ३५ ॥
एवं वासुकिराज्यं च सप्तपातालकक्रमः ।
वासुकिर्नागराजेन्द्र ईश्वरानन्यभक्तिमान् ॥ ३६ ॥
ये सभी हजारों फणों से युक्त, हजारों दांतों से शोभित, मन चाहा रूप धरने में
समर्थ, दिव्य सन्नारियाँ हैं और स्वर्ग से लेकर पाताल तक आवागमन करने वाली
हैं। इस तरह ईश्वर की अनन्य भक्ति में लीन वासुकी नाग राजेन्द्र की वासुकी राज्य
की प्रजा सप्त पातालों के क्रम में वर्णित हैं।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
सप्तपातालराज्योद्गवाधिकारो नामाष्टमं सूत्रम् ॥ 8 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में सप्त
पाताल राज्य उद्भव अधिकार नामक आठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 8 ॥

42 अपराजितपृच्छा
भूराज्यनिवेशनो नाम नवमं सूत्रम् ॥ ९ ॥
अपराजित उवाच -
के च देवाः स्थिता लोके सप्तद्वीपेषु के स्थिताः ।
सिन्धूपकण्ठनिर्वासाः के च शैलाश्रमस्थिताः ॥ १ ॥
कानि क्षेत्राणि द्वीपेषु कास्तथा वासभूमयः ।
राजानः के च तत्रोक्ताः कथयस्व जगत्प्रभो ॥ २ ॥
अपराजित बोले - सप्त द्वीपों तथा लोकों में कौन-कौन से देवता निवास करते
हैं तथा समुद्र के किनारे रहने वाले और पर्वतों के आश्रमों में रहने वाले कौन हैं,
किन-किन क्षेत्रों और द्वीपों में रहने वालों की वासभूमि कैसी है, उनके राजा कौन
हैं, हे जगत्प्रभो ! आप यह सब कहिए।
विश्वकर्मोवाच -
शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि द्वीपानां चैव लक्षणम् ।
प्रमाणं च तथोक्तानां कथये तव साम्प्रतम् ॥ ३ ॥
द्वीपांश्च कथयिष्यामि सप्तद्वीपा तु मेदिनी ।
पृथक् पृथक् महाराज्यं कथयामि समाहितः ॥ ४ ॥
विश्वकर्मा बोले - हे वत्स सुनो ! मैं तुम्हें द्वीपों के लक्षण तथा उनके कहे गए
प्रमाण, लम्बाई-चौड़ाई, विस्तारादि अब कहता हूँ। इस सप्तद्वीपा मेदिनी के पृथक्-
पृथक् द्वीपों, महाराज्यों के विषय में विस्तार से कहता हूँ।
पृथुश्च कुशक्रौञ्चौ च शाकः शाल्मलिकस्तथा ।
गोमेदः पुष्कराख्यश्च सप्तद्वीपा नृपैः कृता ॥ ५ ॥
महाराजाभिधानैश्च सप्तद्वीपाभिधानकम् ।

  1. पृथु, 2. कुश, 3. क्रौञ्च, 4. शाक, 5. शाल्मलि, 6. गोमेद और 7. पुष्कर ये
    सात द्वीप राजाओं ने किए हैं। इन सप्तद्वीपों के अधिनायक महाराजा के अभिधान
    (उपाधि, पदवी) से सुशोभित होते हैं।
    पुष्कराख्यो महाराजः सप्तद्वीपदीपकः ॥ ६ ॥
    गोमेदस्य गोमेदः शाल्मलेः शाल्मलो नृपः ।
    शाकश्च शाकद्वीपे च क्रौञ्चः क्रौञ्चाधिपस्तथा ॥ ७ ॥
    कुशश्च कुशद्वीपे च महोत्कटा महाबलाः ।
    महारूपाश्च भूपालाः संस्थिता मेरुदक्षिणे ॥ ८ ॥

सूत्र-९ 43
सातवें द्वीप पुष्कर के कीर्तिमान महाराज पुष्कर (अधिपति) नाम से विख्यात है।
इसी तरह से गोमेद द्वीप के महाराज गोमेद और शाल्मलि द्वीप के महाराज शाल्मलि
नृप कहे गए हैं। शाकद्वीप के महाराज शाक और क्रौञ्च द्वीप के महाराजा क्रौञ्च के
नाम से विख्यात है। कुश द्वीप के महाराज परमवीर महाबली कुश नरेश है। इस तरह
मेरु के दक्षिणी भाग में महान् रूपों वाले भूपालगण महाराजा विद्यमान हैं।
अथ जम्बूद्वीपवर्णनमाह —
पृथुः पृथुमहीश्वरः जम्बूद्वीपाधिपः पृथुः ।
मेरोः प्रदक्षिणे कुक्षौ जम्ब्वाख्यश्च महातरुः ।
यस्य नाम्ना तु विख्यातो जम्बूद्वीपेतिसञ्ज्ञितम् ॥ ९॥
जम्बू द्वीप के अधिपति महाराज पृथु है और ये पृथु महाराज इस समस्त पृथ्वी
के महीश्वर, स्वामी है। मेरु पर्वत के प्रदक्षिण कुक्ष में जम्बू नाम का एक वृक्ष है,
इसी के नाम से इस द्वीप का नाम जम्बू विख्यात हुआ है।
एक

मेर्वावृत्त्या प्रदक्षिण्यै रम्यको मुक्तिभूतल ।
मेरोश्च पुरतो भागे इलाख्यः केतुमालिका ॥ 14 ॥
दक्षे हरिर्भारतश्च किम्पुरुषश्च पुष्करे।
अब्ध्यन्तः कुरुभद्राश्वौ मेरोश्चैवोत्तरे स्थिताः ॥ 15 ॥
मेरु के घेरे में दक्षिण की ओर भूतल पर मुक्ति का रम्यक धाम है। मेरु के
अग्रभाग (पूर्व) में इला नामक केतुमालिका है। मेरु के दक्षिण में हरिभारत,
किम्पुरुष और पुष्कर हैं। मेरु के उत्तर भाग में स्थित समुद्र के अन्त तक फैले हुए
कुरु और भद्राश्व प्रदेश हैं।
तत्रैव गन्धर्वविद्याधराक्षनिवासिनामाह —
मेरुवृत्ताङ्गे दक्षिणे रम्यकस्योर्ध्वमालिका।
गन्धर्वनगरी रम्या नाम्ना गन्धर्वमालिनी ॥ 16 ॥
विद्याधरास्तदूर्ध्वे तु यक्षाश्चैवं तदूर्ध्वतः ।
तदूर्ध्वं वैदेवाः ख्याता देवाश्चैवं तदूर्ध्वतः ॥ 17 ॥
इसी प्रकार मेरु के

सूत्र-१० 45
तत्र शम्भुमहादेवो ह्यव्यक्तं परमं पदम्।
प्राचीना च भवेन्मूर्तिः सूर्यतेजरसमुद्भवा ॥ २१ ॥
यहाँ पर सभी प्रकार के रत्न जैसे हीरा, वैदूर्य, गोमेद, पुष्पराग, इन्द्रनील आदि
सब द्वादश आदित्यों के तेज से युक्त और करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशयमान हैं।
यहीं पर महादेव शम्भू अव्यक्त रूप से परमपद में अवस्थित है और यह मूर्ति अति
प्राचीन है जो सूर्य के तेज से समुद्भूत हुई है।
ब्रह्मविष्णु ततो जातौ संसारसृष्टिकोद्भवौ।
ब्रह्मतेजस्समुत्पन्नः काश्यपो मुनिपुङ्गवः ॥ २२ ॥
सृष्टिस्तदुद्भवा त्वेवं जगत्स्थावरजङ्गमम्।
चतुर्विधो भूतग्रामः पृथक् पृथक् शरीरिणाम् ॥ २३ ॥
इन्हीं शम्भू से ब्रह्मा और विष्णु का जन्म हुआ है जो संसार की सृष्टि के उद्भव
के कारक हैं। ब्रह्मा के तेज से मुनि पुङ्गव काश्यप उत्पन्न हुए। उन्हीं से यह सृष्टि
उद्भूत हुई है जिसमें स्थावर-जङ्गम जगत बना और चार प्रकार के प्राणी समूह
अलग-अलग देहधारण किए उत्पन्न हैं।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
भूराज्यनिवेशनाधिकारो नाम नवमं सूत्रम् ॥ ९ ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में भू राज्य
निवेशन अधिकार नामक नवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥
संसारभूतग्रामोत्पत्तिपञ्चतत्त्वनिर्णयो नाम दशमं सूत्रम् ॥ १० ॥
अपराजित उवाच -
केनोत्पत्तिः समस्तानां भूतानां च तथालयः।
केनासौ कलते कालो लयं यान्ति च सर्वशः ॥ १॥
केनासौत्र नाति कालन्यानास्यासः ? वद प्रभो।
ज्ञानं तनु युक्तोद्रव्यं पश्यन्ते च परस्परं विदुः ? ॥ २ ॥
अपराजित बोले- संसार में समस्त भूत प्राणियों की और उनके आवास की
उत्पत्ति किसके द्वारा हुई तथा किसके द्वारा यह काल-कलित हो रहा है ? किसके
द्वारा ये सब पूरी तरह से विलीन होकर मिट जाते हैं ? यहाँ कौन ऐसे हैं जो काल
से भी प्रभावित नहीं होते ? ऐसे ज्ञान स्वरूप तन युक्त द्रव्य को जो परम विद्वान
परस्पर देखते हैं, उनके विषय में हे प्रभु ! आप कुछ कहिए।

विश्वकर्मोवाच —
पञ्चात्मकं पञ्चसु वर्तमानं षडाश्रयं षड्गुणयोगयुक्तम्।
तं सप्तधातुविमलं तं योनिं चतुर्विधं हारमयं शरीरकम्॥ ३॥
विश्वकर्मा बोले — पाँच से पञ्चात्मक वर्तमान में, छह से छह गुणों का योग
बनता है। उसी सप्तधातु रूपी विमल को तथा योनि को और चार प्रकार के मनोमय
(यष्टि) शरीरों को समझो।
पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाशमेव च।
पञ्चात्मकमिति प्रोक्तं कथयामि गुणोद्भवन्॥ ४॥
(इस शरीर की रचना में) (1.) पृथ्वी, (2.) जल, (3.) तेज, (4.) वायु
और (5.) आकाश— इनको पञ्चात्मक कहा गया है। अब इनसे उत्पन्न गुणों को
कहता हूँ।
कठिना या सा तु पृथ्वी द्रवाश्चापस्तदुद्भवाः।
दीप्तं चत्तद्द्वेत्तेजः चलं तत् पवनात्मकम्॥ ५॥
यच्छिद्रं तु तदाकाशं तेभ्यः सर्वसमुद्भवः।
इत्थं पञ्चात्मकं भूतं कथितं हि यथाक्रमम्॥ ६॥
जो कठिन या ठोस है, उसे पृथ्वी कहा गया है, जितने भी द्रव्य पदार्थ है, वे जल से
उत्पन्न हुए हैं, जितने भी दीप्त स्वरूप पदार्थ हैं वे तेज या अग्नि से उत्पन्न हैं, जो हलचल
या चलिष्णुता है वह पवनात्मक है जबकि जो छिद्र जैसी पोल है, वही आकाश है तथा
उस आकाश से ही सब कुछ उत्पन्न या प्रकट हुआ है। इस प्रकार इसी को पञ्चात्मक
भूतसृष्टि या पञ्चभूतात्मक सृष्टि कहा गया है, जिसे मैंने यथाक्रम कहा है।
पृथिवी धारणं कृत्वा द्रवीकरणं तथैव च।
तदुद्भवं तेजः पुञ्जस्तेजत्वेषु समुद्भवे ?॥
आकाशस्याधिकारश्च पञ्चात्मकःस्यादनुक्रमात् ?।
अब पृथ्वी द्वारा धारण किए गए गुण, जल से द्रवीकरण वाले गुण तेज से
प्रकट होने वाले गुण, वायु से होने वाले गुण और आकाश के अधिकार में रहने
वाले गुण के पञ्चात्मक को अपने अनुक्रम से कहता हूँ।
स्पर्शो रसश्च रूपं च गन्धः शब्दश्च पञ्चमः॥ 7॥
जिह्वयां रस आयाति स्वादस्यैव च कारणम्।
रूप च चक्षुषांश्चैव गन्धो घ्राणात् तथा मतः॥ 8॥

सूत्र- १० 47
शब्दो ब्रह्मादि ? सम्भूतः पञ्चतत्त्वानि वै विदुः ।
गतिर्ग्राहस्तुतिर्व्याप्तिर्विसर्गश्चैव पञ्चकम् ॥ ९ ॥
पृथ्वी से ( 1.) स्पर्श, जल से ( 2.) रस, तेज से ( 3.) रूप, वायु से ( 4.) गन्ध
और आकाश से ( 5.) शब्द गुण उत्पन्न जानना चाहिए। जिह्वा से जो रस आता है,
उसका कारण स्वाद है। आँखों से रूप का और नासिका से गन्ध का भान होता है,
ऐसा माना जाता है। जिसे शब्द कहा है, वह ब्रह्म के आदि में आकाश से सम्भूत
हुआ, इन्हीं को विद्वानों से पञ्चतत्त्व कहा है। ( 1.) गति, ( 2.) ग्रहण करना, ( 3.)
स्तुति, ( 4.) व्याप्ति और ( 5.) विसर्ग— ये पाँच शारीरिक क्रियाएँ हैं।
पादैः स्याद् गतिसंयोगः हस्तैस्तु ग्रहणं भवेत्।
उपस्थानैर्व्यापयन्ति विसर्जन्ति गुदेन च ॥ 10 ॥
श्रुतिः श्रोत्रेन्द्रियेणैव जिह्वया च तथा रसः ।
एवं तत्त्वोद्भवा सृष्टिस्तन्मात्रादिकमुच्यते ॥ 11 ॥
पाँव से गति का संयोग होता है और हाथों से ग्रहण करने का कार्य होता है।
उपस्थान से व्याप्ति का कार्य एवं गुदा से विसर्जन का कार्य होता है। श्रोतेन्द्रिय,
कानों से सुनने की क्रिया, जिह्वा से रस का बोध होता है। इस प्रकार से उन-उन
इन्द्रियों से होने वाले ज्ञान की (तत्त्वोद्भव) सृष्टि को तन्मात्रादिक कहा जाता है।
आत्मा तन्मात्राण स ? मनः सङ्कल्पलक्षणम्।
व्यवसायो बुद्धिभावः प्रज्ञाहङ्कारकौ तथा ॥ 12 ॥
तत्तथा तु तन्मात्रं बुद्धीन्द्रियक्रमस्फुटम्।
व्यवसायो बुद्धियोगः प्रज्ञा विकाशकोद्भवा ॥ 13 ॥
अहङ्कारश्च विकृतो रागद्वेषाकुलो ध्रुवम्।
पञ्चपित्तोद्भवाश्चैवं आतपकुलसम्भवाः ॥ 14 ॥
आत्मा की तन्मात्रा का ज्ञान सः (वह परमतत्त्व है?), मन की तन्मात्रा सङ्कल्प
को तथा बुद्धि की तन्मात्रा व्यवसाय भाव, काम करने का तरीका है, बुद्धि की तन्मात्रा
अहङ्कार का भाव है। इन-इन तन्मात्राओं से ही बुद्धि आदि इन्द्रियों का क्रम स्पष्ट हो
पाता है। व्यवसाय से बुद्धियोग तथा विकाश से उत्पन्न होता है प्रज्ञा का परिचय। जब
अहङ्कार में विकृति होती है, तब राग-द्वेष से दुखी होना तो निश्चित है। आतप या गर्मी
के समूह से उत्पन्न होने वाले पाँच पित्त से होने वाले विकार हैं।
पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाशमेव च।
शब्दः स्पर्शो रसो रूपं गन्धश्च पञ्चकं त्विदम् ॥ 15 ॥

48 अपराजितपृच्छा
गतिर्ग्राहः श्रुतिर्व्याप्तिर्विसर्गो दशपञ्चकम्₁₅ ।
( 1 . ) पृथ्वी, ( 2 . ) जल, ( 3 . ) तेज ( 4 . ) वायु और ( 5 . ) आकाश— ये
पाँच, ( 1 . ) शब्द, ( 2 . ) स्पर्श, ( 3 . ) रस, ( 4 . ) रूप ( 5 . ) गन्ध— ये पाँच और
( 1 . ) गति, ( 2 . ) ग्राह्यता, ( 3 . ) श्रुति, ( 4 . ) व्याप्ति, ( 5 . ) विसर्ग— ये पाँच
मिलकर कुल पन्द्रह होते हैं।
अहङ्कारो रागद्वेषौ क्रोधोऽस्मिता प्रकृतयः ॥ 16 ॥
मनः प्रज्ञा बुद्धिचित्तभावाश्च पञ्चविंशतिः₂₅ ।
कामो मदो लोभमोहौ भयं तत्त्वानि त्रिंशतिः₃₀ ॥ 17 ॥
इनमें ( 1 . ) अहङ्कार, ( 2 . ) राग, ( 3 . ) द्वेष, ( 4 . ) अस्मिता, ( 5 . ) क्रोध,
( 6 . ) प्रकृतियाँ,

सूत्र-१० 49
ब्रह्मबिन्दुसमायोगं शिवशक्तिः परात्परम्।
संयुक्तयोग एवं यो योगयुक्तः स उच्यते॥ २२॥
योग युक्तियों के प्रयास से बनने वाले संयोगों, कामों में तथा योग युक्ति रहित
(?) कामों में बनने वाले अयोगकारी काम आदि सब शिव-शक्ति के सम्मिलित
प्रयास से होने वाले सफल काम की तरह एवं ब्रह्मा, विष्णु की सम्मिलित शक्ति
अपने आप होने वाले काम की तरह संयोग ही है। ब्रह्म और नादबिन्दु के समायोग
से जो परात्पर सर्वोच्च शिवशक्ति प्रकट होती है, उसे ही संयुक्तयोग तथा
योगयुक्त-ऐसा कहा जाता है।
रक्तः पीतः श्वेतकृष्णौ श्यामो नीलस्तथा हरित्।
सप्तधास्तु इमे प्रोक्ताः सप्तस्थानादिकोद्भवाः॥ २३॥
सात स्थानों से उत्पन्न होने वाले (1.) रक्त-लाल, (2.) पीत-पीला, (3.)
श्वेत-सफेद, (4.) कृष्ण, (5.) श्याम-सांवला (6.) नील-आसमानी, (7.)
हरित्- हरा- ये सप्तधातु कहलाते हैं।
श्वेताः श्वेतसमुद्भूता रक्ता रक्तसमुद्भवाः।
पीताः पीतसमुत्पन्नाः कृष्णाश्च मेचकोद्भवाः॥ २४॥
श्यामाः श्यामसमुद्भूता नीलाश्च ज्योतिर्मण्डले।
निशा भासाद्भवोत्पन्नाः सङ्ख्याः सप्त प्रकीर्तिताः॥ २५॥
श्वेत सभी श्वेत वस्तुओं से बनते हैं, रक्त सभी लाल वस्तुओं से, पीत सभी पीली
वस्तुओं से, कृष्ण काली वस्तुओं से बनते हैं। श्यामा-सांवले रङ्गों की वस्तुओं से
तथा नीले नील की वस्तुओं से इस ज्योतिर्मण्डल में बनते हैं। इसी प्रकार (हरित)
हल्दी जैसी वस्तुओं से होते हैं, इन सबकी संख्या सात कही गई है।
रागद्वेषालसाश्चैव विमला मतसम्भवाः।
चतुर्विधा भूतग्राम मेतसांनि चतुर्विधा ?॥ २६॥
अण्डजा उद्भिजाश्चैव जरायुजाश्च स्वदेजाः।
चतुर्विधा योनिजाश्च संसारे सृष्टिसम्भवाः॥ २७॥
(1.) राग, (2.) द्वेष, (3.) आलस्य, (4.) विमल-निर्मलता और (5.) मल-
मैल से उत्पन्न होने वाले चार तरह के प्राणी समूह होते हैं जो भी सब चार प्रकार के
होते हैं। ये चारों (1.) अण्डज- अण्डों से उत्पन्न होने वाले, (2.) उद्भिज- पृथ्वी
पर उगने वाले पेड़-पौधे, (3.) जरायुज- गर्भ में उत्पन्न होने वाले मनुष्य, पशु आदि
और (4.) स्वेदज- पसीने से उत्पन्न होने वाले जूँ, खटमल आदि जीव। ये चार प्रकार

50 अपराजितपृच्छा
की योनियाँ हैं जिनसे यह संसार की सृष्टि सम्भव हुई है।¹
कामक्रोधलोभमोहभयादि पञ्चकोद्भवः।
एवमादि गुणोपेताः पञ्चकामेन्द्रियाणि च॥ 28 ॥
अब पञ्च कामेन्द्रियों से उनके गुणों से उत्पन्न होने वाले (1.) काम, (2.)
क्रोध, (3.) लोभ, (4.) मोह और (5.) भय को समझें।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
संसारभूतग्रामोत्पत्तिपञ्चतत्त्वनिर्णयाधिकारो नाम दशमं सूत्रम् ॥ 10 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में संसार
भूतग्राम उत्पत्ति पञ्चतत्त्व निर्णय अधिकार नामक दसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ॥ 10 ॥
पञ्चतत्त्वपञ्चगुणनिर्णयो नामैकादशं सूत्रम् ॥ 11 ॥
अपराजित उवाच -
कथं भवश्च जीवानां स्नेहः स्त्रीणां नृणां कथम्।
स्नेहात्त्वां परिपृच्छामि ह्लादयन्तं निजात्मजम् ॥ 1 ॥
अपराजित बोले - इस भव-संसार में जीवों में स्नेह किस प्रकार बनता है
और यहाँ के स्त्री-पुरुषों में भी लगाव किस प्रकार बनता है, यह सब मैं आपसे
स्नेह होने के कारण बड़ी नम्रतापूर्वक पूछता हूँ, अतः इसका उद्बोधन करके आप
अपने आत्मज मुझ अपराजित को आह्लाद-प्रसन्नता प्रदान करें।
विश्वकर्मोवाच -
शिवशक्तिस्नेहात्मकः कामश्च हृदयात्मजः।
ततः सम्युक्तयोगश्च शिवशक्ती परात्परे ॥ 2 ॥
इति कामस्य संयोगाच्छिवशक्तिप्रभावतः।
स्वयं ब्रह्मरुतेनैव नादबिन्दुसमुद्भवः ॥ 3 ॥
विश्वकर्मा बोले - शिव तथा शक्ति² के हृदय से उत्पन्न होने वाले काम से ही
शिव-शक्ति में स्नेहात्मक भाव की उत्पत्ति हुई तथा इससे ही यह संयुक्तयोग बन

  1. तथा च भागवतीगीतायां - अण्डजाः स्वेदजाश्चैवोद्भिजाश्चैव जरायुजा। अण्डजाः पक्षिसर्पाद्याः स्वेदजा
    मशकादयः॥ वृक्षगुल्मप्रभृतयश्चोद्भिजा हि विचेतनाः। जरायुजा महाराज मानुषाः पशवस्तथा॥
    शुक्रशोणितसम्भूतो देहो ज्ञेयो जरायुजः। (महाभागवत अपरनाम देवीपुराण 17, 6-8)
  2. अन्यच्च - शक्तिद्वयं हि मायया विक्षेपावृत्तिरूपकम्। विक्षेपशक्तिर्लिङ्गादिब्रह्माण्डन्तं जगत्सृजेत्॥
    अतर्हद्दृश्ययोर्भेदं बहिञ्च ब्रह्मसर्गयोः। आवृणोत्यपरा शक्तिः सा संसारस्य कारणम्॥ (वेदान्तसारटीका)

सूत्र-११ 51
सका जिससे शिव-शक्ति परात्पर, सबसे महान माने जाते हैं। यह सब काम के
संयोग से शिव-शक्ति का ही प्रभाव है जिससे स्वयं ब्रह्मा के हृदय में इसी तरह का
नाद और बिन्दू का समुद्भव हुआ।
एकीभूतं यदा काले त्वन्तकाले प्ररोहति।
सङ्क्रमच्छुक्ररक्तं तु ब्रह्मविष्णुशिवात्मजम् ॥ ४ ॥
इस तरह जब जिस काल में यह नाद और बिन्दू एकीभूत हुआ या मिला और
अन्त में जब वह एकीभूत स्वरूप शुक्र व रक्त के संक्रमण से मिलने से प्ररोहण
करने लगा, बढ़ने लगा तो वह ब्रह्मा, विष्णु और शिव का ही आत्मज-सन्तान है,
ऐसा समझना चाहिए।
पिण्डनिर्माणचरणमाह —
कललं त्वेकरात्रेण पञ्चरात्रैश्च बुद्बुदम्।
शोणितं दशरात्रैश्च मांसहीनं चतुर्दशैः ॥ ५ ॥
घनं मांसं विंशतिभिर्गर्भस्थं वर्द्धते क्रमात्।
एकमासे च सम्पूर्णे पञ्चतत्त्वानि धारयेत् ॥ ६ ॥
यह शुक्र-रक्त का एकीभूत रूप जब बढ़ता है तो एक रात्रि में उसका रूप
कलल कहा जाता है और वही जब पाँच रात्रि का हो जाता है तब बुद्बुद कहा
जाता है। दस रात्रि का हो जाने पर उसे ही शोणित कहते हैं और चौदह दिन का हो
जाने पर उस मांसहीन कहते है। इस प्रकार वह बढ़ते-बढ़ते बीस दिन में घन
मांसपिण्ड रूप बनकर गर्भस्थ होकर क्रमपूर्वक बढ़ता जाता है और पूरा एक मास
का हो जाने पर पञ्चतत्त्वों को धारण कर लेता है।
मासद्वये च सम्पूर्णे मांसपिण्डः प्रजायते।
मज्जास्थिनी त्रिभिर्मासैः केशाङ्गुल्यश्चतुर्थके ॥ ७ ॥
कर्णजिह्वानासिकाश्च रन्ध्रं मासे तु पञ्चमे।
कण्ठरन्ध्रोदरे षष्ठे गुह्यं चाण्डं च सप्तमे ॥ ८ ॥
सर्वाङ्गसन्धिसम्पूर्तिरष्टमासैः प्रजायते।
मासे च नवमे प्राप्ते गर्भस्थः स्मरति स्वयम् ॥ ९ ॥
यही जब दो मास का हो जाता है तो मांसपिण्ड बन जाता है। उसमें तीन मास
में मज्जा, अस्थि आदि बनती है और चौथे मास में उसके केश और अङ्गुलियाँ भी
बनने लगती है। इस तरह बढ़ते-बढ़ते पाँचवें मास में उसके कान, जिह्वा, नासिका
आदि के रन्ध्र बनते हैं। छठे मास तक बढ़ने पर तो इसमें कण्ठ के और उदर के

52 अपराजितपृच्छा
रन्ध्र-छिद्र तथा सातवें माह में उसके गुसाङ्ग और अण्डकोश बनते हैं। इस प्रकार
बढ़ते-बढ़ते वह कलल आठवें मास तक सभी अङ्गों की सम्पूर्ति से युक्त हो जाता
है और नवें मास में पहुँचने पर वह गर्भस्थ प्राणी स्वयं अपने आपको स्मरण करने
लगता है।¹
मातरं पितरं भ्रातॄन् पुत्रपौत्रादिकं तथा।
ज्ञानतोऽथ प्रार्थयते धर्मं च देवतादिकम्॥ 10 ॥
येनाहं न पतेयं वै संसारयोनिसङ्कटे।
अहं तं च करिष्यामि निःसृतो गर्भवासतः ॥ 11 ॥
इस प्रकार स्मरण करता हुआ वह अपने पूर्व के माता-पिता, भाई-बन्धु, पुत्र-
पौत्रादिकों को याद करता हुआ अपने धर्म और देवताओं की प्रार्थना करता है कि
जिससे मैं संसार में इस योनि सङ्कट गर्भवास में पुनः नहीं पहूँ, वही मैं करूँगा, यदि
मैं गर्भवास से बाहर आ जाऊँ।
विकासो जायते तस्य गर्भवासं ततस्त्यजेत्।
योनेर्यो निस्सरेत्तिर्यक् मृत्युस्तस्य भवेद् ध्रुवम्॥ 12 ॥
बधिरो वा भवेदन्धो जायते मूर्च्छनादिकम्।
एवं विनिःस्रतो जन्तुः संसारे मुह्यते क्षणात्॥ 13 ॥
इस प्रकार पूर्ण विकास हो जाने पर वह गर्भवास को तत्काल त्याग देता है।
इस अवस्था में यदि वह गर्भस्थ शिशु योनि से बाहर निकलते समय तिर्यक् अर्थात्
आड़ा पड़ जाए तो उसकी निश्चित ही मृत्यु हो जाती है, यह ध्रुव सत्य है। यदि
योनि से बाहर आते समय वह मूर्च्छित अवस्था में होता है तो बहरा अथवा अन्धा
हो जाता है परन्तु इस प्रकार स्वस्थ जन्म लेने वाला जन्तु जीव संसार को तत्क्षण
मोहित कर लेता है और सबको प्रसन्न कर देता है।

  1. वराहमिहिर का मत है कि गर्भाधान के पहले मास से लेकर सातवें मास तक क्रमशः शुक्र, मङ्गल, गुरु,
    सूर्य, चन्द्र, शनि और बुध मासाधिपति होते हैं। इनके प्रभाव से पहले मास में गर्भ का रूप कलल
    अर्थात् शुक्र-शोणित मिश्रित झिल्ली का आकार, द्वितीय में पिण्डाकार (घन) तीसरे में अवयव, चतुर्थ में
    अस्थिवाला, पाँचवें में त्वचा, छठे में रोम और सातवें में स्मृतियुक्त होता है। इसके बाद, आठवें से
    दसवें मास तक क्रमशः लग्नेश, चन्द्र और सूर्य मासाधिपति होते हैं। उनके प्रभाव से आठवें मास में
    असन (मातृभुक्त-अन्नभोजन), नवें मास में उद्वेग और दसवें मास में प्रसव होता है-
    कललघनावयवास्थित्वग्रोमस्मृति समुद्भवः क्रमशः। मासेषु शुक्रकुजजीवसूर्यचन्द्रार्कि सौम्यानाम्॥
    अशनोद्वेगप्रसवाः परतो लग्नेशचन्द्रसूर्याणाम्। कलुषैः पीडा पतनं निपीडितैर्निर्मलैः पुष्टिः ॥ (लघु जातकम्
    5, 6-7)