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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 535 में से

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पृष्ठ 88

सूत्र-८
पुण्डरीकराज्यनिवासिनामाह —
कुङ्कुमाङ्कितनागास्तु ( सर्व ) दाश्वासकोद्भवा।
पद्मपुष्परसाहाराः स्वेच्छारूपा महाबलाः ॥ 17 ॥
रक्तोष्ठनखपादाश्च तथा च रक्तपाणयः।
राज्यं च पुण्डरीकस्य पाताले तु तृतीयके ॥ 18 ॥
कुङ्कुम के तिलक लगाए, सर्वदा गम्भीर श्वास लेते हुए, कमल के पुष्पों का
रसपान करने वाले, भ्रमरों की भाँति मनमौजी रूप बनाए हुए नवयुवतियों के
कमलाननों के शौकिन, छैल-छबीले और महाबलवान, सुडौल लालिमायुक्त नख-
ओष्ठ-पदतलों और कर-कमलों वाले लोग पुण्डरीक के राज्य, तीसरे पाताल के
निवासी हैं।
तक्षकस्य तथा राज्यं कथयामि समासतः।
रक्ताक्षाश्च महोत्साहा दिव्यरूपास्तथोत्तमाः ॥ 19 ॥
रक्ताक्षं च महद्भूतं रक्तोत्पवलमिवांभसि।
सस्थाव ( र ) तीररेखामण्डितं स्त्रीणां तनुमावृते ? ॥ 20 ॥
रक्तोत्पलदलाभासा मध्यक्षामाः स्तनोन्नताः।
पूर्णचन्द्राननाश्चैवं स्त्रियस्सन्ति सुशोभनाः ॥ 21 ॥
एवं तक्षकराज्यं वै पाताले तु चतुर्थके।
अब मैं तक्षक के राज्य के निवासियों के विषय में संक्षेप से कहता हूँ। वहाँ के
लोग मदमाते लाल रङ्गों वाली आँखों व दिव्य चमक वाले सुन्दर, उत्तम रूपवान
और परम उत्साही होते हैं। जल सरोवर में जिस प्रकार से लाल कमल शोभायमान
होते हैं, उसी प्रकार ये बड़ी-बड़ी अद्भुत लाल आँखों वाले छैले कामिनियों के सङ्ग
रतिक्रीड़ा में आई अपने तन पर पड़ी खरोंचों से मण्डित छैल-छबीली नवयुवतियों
के स्तनों से घिरे रहते हैं। जो लाल कमलदलों की आभा वाले सौन्दर्ययुक्त क्षीणकटि
और पीन पयोधरों युक्त पूर्णिमा के चन्द्रमा जैसे खिले-खिले सुशोभित मुख वाली
रमणियाँ हैं और तक्षक के राज्य चतुर्थ पाताल की निवासी हैं।
अथानन्तराज्यनिवासिनामाह —
पञ्चमेऽनन्तको राजा तस्य वक्ष्यामि साम्प्रतम् ॥ 22 ॥
नीलोत्पलदलाभासा अतसीपुष्पसन्निभाः।
मणिरत्नसुशोभाढ्या दिव्याभरणमण्डिताः ॥ 23 ॥