सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 91

42 अपराजितपृच्छा
भूराज्यनिवेशनो नाम नवमं सूत्रम् ॥ ९ ॥
अपराजित उवाच -
के च देवाः स्थिता लोके सप्तद्वीपेषु के स्थिताः ।
सिन्धूपकण्ठनिर्वासाः के च शैलाश्रमस्थिताः ॥ १ ॥
कानि क्षेत्राणि द्वीपेषु कास्तथा वासभूमयः ।
राजानः के च तत्रोक्ताः कथयस्व जगत्प्रभो ॥ २ ॥
अपराजित बोले - सप्त द्वीपों तथा लोकों में कौन-कौन से देवता निवास करते
हैं तथा समुद्र के किनारे रहने वाले और पर्वतों के आश्रमों में रहने वाले कौन हैं,
किन-किन क्षेत्रों और द्वीपों में रहने वालों की वासभूमि कैसी है, उनके राजा कौन
हैं, हे जगत्प्रभो ! आप यह सब कहिए।
विश्वकर्मोवाच -
शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि द्वीपानां चैव लक्षणम् ।
प्रमाणं च तथोक्तानां कथये तव साम्प्रतम् ॥ ३ ॥
द्वीपांश्च कथयिष्यामि सप्तद्वीपा तु मेदिनी ।
पृथक् पृथक् महाराज्यं कथयामि समाहितः ॥ ४ ॥
विश्वकर्मा बोले - हे वत्स सुनो ! मैं तुम्हें द्वीपों के लक्षण तथा उनके कहे गए
प्रमाण, लम्बाई-चौड़ाई, विस्तारादि अब कहता हूँ। इस सप्तद्वीपा मेदिनी के पृथक्-
पृथक् द्वीपों, महाराज्यों के विषय में विस्तार से कहता हूँ।
पृथुश्च कुशक्रौञ्चौ च शाकः शाल्मलिकस्तथा ।
गोमेदः पुष्कराख्यश्च सप्तद्वीपा नृपैः कृता ॥ ५ ॥
महाराजाभिधानैश्च सप्तद्वीपाभिधानकम् ।

  1. पृथु, 2. कुश, 3. क्रौञ्च, 4. शाक, 5. शाल्मलि, 6. गोमेद और 7. पुष्कर ये
    सात द्वीप राजाओं ने किए हैं। इन सप्तद्वीपों के अधिनायक महाराजा के अभिधान
    (उपाधि, पदवी) से सुशोभित होते हैं।
    पुष्कराख्यो महाराजः सप्तद्वीपदीपकः ॥ ६ ॥
    गोमेदस्य गोमेदः शाल्मलेः शाल्मलो नृपः ।
    शाकश्च शाकद्वीपे च क्रौञ्चः क्रौञ्चाधिपस्तथा ॥ ७ ॥
    कुशश्च कुशद्वीपे च महोत्कटा महाबलाः ।
    महारूपाश्च भूपालाः संस्थिता मेरुदक्षिणे ॥ ८ ॥