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अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

.. 4 अपराजितपृच्छा
इत्यमनन्तर अष्टाशीतितपसानां तपश्चर्या —
अगस्त्यः कश्यपश्चैव याज्ञवल्क्योऽथ कौशिकः ।
भारद्वाजो वैश्रवणो वसिष्ठो नारदस्तथा ॥ 15 ॥
पाराशरो जमदग्निर्मार्कण्डेयानकौ तथा।
मरीचिर्गौतमोऽग्निश्च भृगुर्वै एकशृङ्गकः ॥ 16 ॥
कपिलः पुलमाहेन्द्रौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
वसुदेवश्च दुर्वासाः कनकः शौनकस्तथा ॥ 17 ॥
भार्गवोऽर्थ सुराचार्यो ह्यङ्गिरा मनुजल्मुकः ।
वहाँ अगस्त्य, कश्यप, याज्ञवल्क्य, कौशिक, भारद्वाज, वैश्रवण, वसिष्ठ, नारद,
पराशर, जमदग्नि, मार्कण्डेय, मरीचि, गौतम, अग्नि, भृगु, शृङ्गी, कपिल, पुलमाहेन्द्र,
पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसुदेव, दुर्वासा, कनक, शौनक, भार्गव, सुराचार्य शुक्र,
अङ्गिरा, मनुजल्मुक थे।
अन्यदप्याह —
हरितोत्सङ्गनागेन्द्रा देवन्यः किंशुकस्तथा ॥ 18 ॥
पद्मकः पार्थुकः संपदङ्ग ईक्षण एव च।
विश्वामित्रश्च जनको व्यासवाल्मीकिनौ तथा ॥ 19 ॥
मैत्रेयो धर्मकश्चैव प्रचेता वैजयन्तकः ।
शान्तः समुद्रकश्चैव वैशम्पायनपाचकौ ॥ 20 ॥
जीवध्वनो बाल्यषष्टिः शम्भुश्रुर्णक एव च।
शुकात्रियमकाश्चैव विशाला ब्रह्मतेजसा ॥ 21 ॥
शान्तोऽथ विद्रुमश्चैर बहुधान्यो वो ( भ ?ग ) व्यस्तथा।
गर्गोऽथ लम्पटः ख्यातो नीलश्च सत्य एव च ॥ 22 ॥
मृगाक्षो वृषचक्रश्च शङ्खवर्णोऽर्थ लोमशः ।
चन्द्रभानुर्वज्रसूचिः किरातश्चाथ सम्भ्रमः ॥ 23 ॥
सुपर्णः श्यामतुङ्गश्च हेमकान्तिश्च देवलः ।
शिखिध्वजो महाकान्तिः शिवात्मा चन्द्रशेखरः ॥ 24 ॥
जयश्च विजयश्चैव सिद्धार्थश्चापराजितः ।
अष्टाशीतिः₈₈ समाख्याता ऋषयो ब्रह्मतेजसः ॥ 25 ॥
अधः शीर्षोर्ध्वपादाश्च वर्षाणां शतसङ्ख्यया।
हृष्टास्तुष्टास्तु सर्वेषु ज्ञानध्यानपरायणाः ॥ 26 ॥

सूत्र- १ ५
(इनके अतिरिक्त) हरित, उत्सङ्ग, नागेन्द्र, देवन्य, किंशुक, पद्मक, पार्श्वक,
संपदङ्ग, ईक्षण, विश्वामित्र, जनक, व्यास, वाल्मीकि, मैत्रेय, धर्मक, प्रचेता,
वैजयन्तक, शान्त, समुद्रक, वैशम्पायन, पाचक, जीवध्वन, बाल्यषष्टि, शम्भु,
चर्णक, शुक, अत्रि, यमक, विशाला, ब्रह्मतेजस्, शान्त, विद्रुम, बहुधान्य, गव्य,
गर्ग, लम्पट, ख्यात, नील, सत्य, मृगाक्ष, वृषचक्र, शङ्खवर्ण, लोमश, चन्द्रभानु,
वज्रसूचि, किरात, सम्भ्रम, सुवर्ण, श्यामतुङ्ग, हेमकान्ति, देवल, शिखिध्वज,
महाकान्ति, शिवात्मा, चन्द्रशेखर, जय, विजय, सिद्धार्थ, अपराजित व अठासी
महाख्याता ब्रह्मतेजस् ऋषिगण, नीचा सिर और ऊपर पाँव करके सैकड़ों वर्षों तक
शीर्षासन की तपस्या करते हुए, सभी ज्ञान ध्यान परायण महात्माओं को प्रसन्न किया
और सन्तुष्ट किया।
तत्र वनस्पतिवर्णनं —
केचित्कन्दफलाहाराः पञ्चगव्योपजीविताः ।
केचिद् विस्तृतपथ्याश्च केचिन्नक्षत्रभोजनाः ॥ २७ ॥
इनमें से कोई तो कन्द और फलाहारी थे। कोई पञ्चगव्य पर जीवित थे। कोई बहुत
ही पथ्यों को पालन करने वाले थे। कोई-कोई नक्षत्रानुसार भोजन करने वाले थे।¹
तत्र विश्वकर्मदिव्याश्रमवर्णनम् —
इत्येते ऋषयः सर्वे पृष्ठे वै गन्धमादने।
भूर्भुवः स्वर्भृतश्चैव वने दिव्यावतोत्तमे ॥ २८ ॥
ये सभी ऋषिगण गन्धमादन पर्वत के पृष्ठभाग में रहते थे। इनके द्वारा उच्चारित
गायत्री मन्त्र जाप के भूः भुवः स्वः के उच्चारण से वन दिव्य और उत्तम हो रहे थे।
अनेकधा वने तत्र चन्दनागुरुपादपाः ।
पुन्नागनागबकुला विविधा वृक्षजातयः ॥ २९ ॥
जातीचम्पकमन्दारा नीलरक्तोत्पलं तथा।
कङ्कोलकलवङ्गादि कर्पूरोद्द्रुमपादपाः ॥ ३० ॥
अतीवफलसंयुक्ता लताभिर्विविधाः कृताः ।
रक्तचन्दनवृक्षाश्च प्रभूततृणपादपाः ॥ ३१ ॥
उक्त वन में अनेक प्रकार के चन्दन, अगरु के पेड़, पुन्नाग, नाग, बकुल आदि

  1. तुलनीय— केचित्पुष्पफलाहाराः शीर्णपर्णाशिनस्तथा ॥ केचिद्गोमयभक्षाश्च जलाहारास्तथा परे। साग्निहोत्राः
    सुविद्वांसो मोक्षमार्गार्थचिन्तकाः ॥ (स्कन्द. प्रभास. 22, 21-22)

6 अपराजितपृच्छा
के विविध जातियों के वृक्ष थे। जाति-चमेली के पुष्प, चम्पक, मन्दार, नीलकमल,
रक्तकमल, कङ्कोल, लवङ्गादि, कर्पूर देने वाले पादप और बहुत ही फलों से लदी
विविध प्रकार की लताएँ थीं। रक्तचन्दन के वृक्ष और बहुत से तृण-पादप थे।
अगस्त्याम्बुरुहाशोकबिल्ववृक्षाः सचन्दनाः।
नागकेसरपनसा द्राक्षाखर्जूरदाडिमाः ॥ ३२ ॥
शालतालतमालाश्च हिन्तालमधुपादपाः।
कर्णिकारद्रुमा रम्या नानापुष्पफलान्विताः ॥ ३३ ॥
इसी प्रकार अगस्त्य, अम्बु वृक्ष, अशोक, बिल्व के वृक्ष चन्दन सहित थे।
नागकेसर, पनस, द्राक्षा, खर्जूर, दाड़िम, शाल, ताल, तमाल, हिन्ताल, मधुक के
वृक्ष और कर्णिकार के रमणीय वृक्ष नाना पुष्पों और फलों से लकदक थे।
चन्द्रकान्तकलाभूमिः क्वचिन्मरकतप्रभा।
प्रवालकसमाम्या क्वचित्स्फटिकनिर्मला ॥ ३४ ॥
कर्पूरकुङ्कुमसमपुष्पप्रकरसङ्कुला।
सधूपामोदबहुला कुङ्कुमैरिव सिञ्चिता ॥ ३५ ॥
वह भूमि चन्द्रमा के कलाओं-सी दीप्तिमान और कदाचित मरकत की प्रभा
जैसी प्रतीति देती थी। वह प्रवालक के समान रम्य और कदाचित स्फटिक के
समान मल रहित थी। वहाँ कर्पूर, कुङ्कुम के समान वर्ण वाले पुष्पों का पुञ्ज था
और धूपादि से सदा आमोदित रहता था तथा कुङ्कुम की भाँति प्रभविष्णुता से
सिञ्चित प्रतीत होता था।
इत्येवं भवनं दिव्यं दशयोजन_{10} विस्तरम्।
गवाक्षचन्द्रिकोपेतं वातायनसमन्वितम् ॥ ३६ ॥
वहाँ पर दिव्य भवन था जो दस योजन विस्तार लिए हुए था। वह भवन
गवाक्ष, चन्द्रिका के साथ ही वातायनों से युक्त था।
अभ्रंलिहैर्ध्वजैश्चित्रैश्चामरैश्च विभूषितम्।
घण्टाकोटिनिनादाढ्यनैकवादित्रसङ्कुलम् ॥ ३७ ॥
वह मेघों तक समुन्नत ध्वज-पताका, चित्रादि से अलङ्कृत चामरों से युक्त था।
वहाँ कोटि-कोटि घण्टाओं का निनाद होता था। नाना वाद्य वादकों का सङ्कुल वहाँ
विद्यमान था।
किङ्किणीरावणोपेतमर्धचन्द्रैर्विभूषितम्।
वितानसाहस्रयुतं चित्रपट्टादिशोभितम् ॥ ३८ ॥

7
सूत्र- १
प्रवेशनिर्गमोपेतं नरनारीजनाकुलम्।
वे ध्वजादि किङ्किणियों से युक्त और अर्द्धचन्द्रों से विभूषित थे। वहाँ नाना
कोणों वाले वितानों की निर्मितियाँ थीं जो चित्रपट्टादि से शोभित थीं। वहाँ प्रवेश
और निर्गम मार्ग पर नर-नारियों के समूहों का आना-जाना लगा रहता था।
तत्र सङ्गीतादीनामाह –
महामुरजशब्दैश्च गीतैश्च विविधैः पुनः ॥ ३९ ॥
मनोहरं गृहं दिव्य देवानाम्पि दुर्लभम्।
लास्यहास्यैश्च विविधाः क्रीडन्ते रुद्रकन्यकाः ॥ ४० ॥
देवकन्याश्च विविधा ऋषिनार्यस्तथोत्त्तमाः।
सहिता नृत्यमानाश्च मङ्गलैः कौतुकैः सह ॥ ४१ ॥
महामृदङ्गों के निनाद के साथ नाना प्रकार के गीत मनोहर, दिव्य गृहों में गाए जा
रहे थे जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ थे और उन गीत, वाद्यों के साथ कई रुद्र कन्याएँ
अपने लास्य नृत्य और हास्य से विविध प्रकारेण क्रीड़ा कर रही थीं। वे आमोद-प्रमोद में
तत्पर थीं। उक्त रुद्रकन्याओं के सङ्ग में विविध देवकन्याएँ तथा उत्तमोत्तम ऋषि नारियाँ,
महिलाएँ भी माङ्गलिक कौतुकों के साथ नृत्य में उनका साथ दे रही थीं।
त्रिसङ्गीतैश्च विविधैः प्रेक्षणीयं गणेश्वरैः।
गणाः किलकिलायन्ति प्रवल्गन्ति मुहुर्मुहुः ॥ ४२ ॥
इधर, इस प्रकार नाच-गान की तरह ही त्रिसङ्गीत (गायन, वादन व नर्तन) के
विविध प्रकारों से दर्शनीय गणेश्वरगण भी बारम्बार किलकिलाकर उछलते-कूदते हैं
और हंसते हुए नृत्यादि में मग्न थे।
भवनशोभावर्णनमाह –
इदं च भुवनं नित्यं शुद्धस्फटिकसन्निभम्।
वज्रवैडूर्यखचितं रत्नप्राकारशोभितम् ॥ ४३ ॥
इसी तरह वहाँ के भवनों की शोभा बहुत रमणीक प्रतीत होती थी। मानो वे शुद्ध
स्फटिक से निर्मित हो। यह भी लगता था कि मानो उनकी सुन्दरता में उनमें हीरे,
वैडूर्य, मणियाँ और नाना प्रकार के रत्नादि विजड़ित हों, ऐसी वहाँ की भित्तियाँ थीं।
तोरणैर्दिव्यमाख्यातं पूर्वापरयाम्योत्तरम्।
तन्मध्ये दिव्यपर्यङ्कं सिंहव्यालैरलङ्कृतम् ॥ ४४ ॥
हंसतुल्यं समारूढं शिरोद्धारद्वयान्वितम्।

8 अपराजितपृच्छा·
उक्त भवनों के पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण में चारों ही ओर दिव्य तोरणों की
शोभा है व उनके मध्य में दिव्य पर्यङ्क-शय्या सजी हुई है जिसे सिंह-व्याल आदि
के चित्र-कौशल से अलङ्कृत किया हुआ है। इन पर्यङ्कों पर स्वच्छ, श्वेतवर्ण के
मसनद (सिरहाने) रखे हुए हैं जो ऐसे दिखाई देते हैं मानो दो हंस वहाँ पर
विराजित हों।
तत्र भगवान् विश्वकर्माणवर्णनमाह —
तत्रस्थं सुखमासीनं विश्वकर्ममहौजसम् ॥ 45 ॥
वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञं सर्वशास्त्रविशारदम् ।
सर्व विज्ञानवन्तं च सर्वज्ञं मानसागरम्¹ ॥ 46 ॥
(उन शिरोद्वारों के सहारे ही) वहाँ पर महाओजस् तेजस्वी भगवान विश्वकर्मा
सुखासन अवस्था में विराजमान है। भगवान् विश्वकर्मा वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद,
सामवेद, अथर्ववेद) एवं वेदाङ्गों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष एवं
छन्द) और तत्त्व (कूटस्थ पुरुष, प्रकृति, महत्तत्त्व, अहङ्कार, शब्द, स्पर्श, रूप, रस,
गन्ध, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, हस्त, पाद, जिह्वा, लिङ्ग, गुह्याङ्ग, श्रवण,
त्वक्, चक्षु, रसना, घ्राण तथा मन²) के मर्मज्ञ और सर्वशास्त्रों के विशारद है,
सर्वविज्ञानवन्त है और मानादि प्रमाणों के अगाध सिन्धुरूपेण ज्ञान के भी सर्वज्ञ है।
चतुर्भुजं ब्रह्मतेजस्तप्तकाञ्चनसन्निभम् ।
दीप्तकुण्डलशोभाढ्यं त्रिनेत्रं चन्द्रशेखरम् ॥ 47 ॥
अक्षसूत्रं वामहस्ते दक्षिणे तु कमण्डलुम् ।
पुस्तकं वामहस्तोर्ध्वे जपमाल्यां तु दक्षिणे ॥ 48 ॥
उनका तेजोमय स्वरूप चतुर्भुज हैं और ब्रह्मतेज से तप्त होकर तपाए गए स्वर्ण,
हेमकुन्दन के समान जगमगाहट कर रहा है। उनके कानों में दीप्त कुण्डलों की
शोभा वृद्धिस्पद है और उनके विशाल ललाट पर ज्ञान-चक्षु त्रिनेत्र और सिर पर
चन्द्रमा का दिव्य दर्शन हैं। उनके वाम हाथ में अक्षसूत्र हैं और दक्षिणी हाथ में
कमण्डलु है। इसी प्रकार उनके ऊपर के बाँये हाथ में (शिल्पविज्ञान की) पुस्तक
और ऊपरी दायें हाथ में वे जपमाला को धारण किए हैं।
ज्ञानदं मोक्षदं चैव विश्वहा सृष्टिकारकम् ।
तिष्ठन्तं च विनोदेन ह्यनेकँश्च कुतूहलैः ॥ 49 ॥


  1. यहाँ मानसागर से आशय रचनाकार के समय में प्रचलित कोई गणित-मपित ग्रन्थ भी हो सकता है।
  2. शुक्रनीति (4, 48); तुलनीय सांख्यदर्शन।

सूत्र- १ 9
ऐसी सुख मुद्रा में भगवान् विश्वकर्मा ज्ञानप्रदाता, मोक्षप्रदाता और विश्व के दुखों
के निवारक और सृष्टिकर्ता के रूप में अनेकों कुतूहल, आश्चर्यजनक कार्यों को
करते हुए विनोदपूर्वक, प्रसन्नचित्त से विराजित हैं।
अथ विश्वकर्मनामपर्यायदीनां —
विश्वकृद्विश्वकर्माणं त्वष्टारं देववर्धकिम्।
भूर्भुवर्भुवनेशस्य स्वर्गदेवस्य विश्रुतम् ॥ 50 ॥
भगवान् विश्वकर्मा के अनेक नाम विश्रुत हैं। जैसे— विश्वकृत, विश्वकर्मा,
त्वष्टा, देववर्द्धिकी, भूर्भुवः भुवनेश, स्वर्गदेव आदि।¹
पुनरुच्चार्य नामाथ प्रभाससूनुनन्दनम्।
दण्डवत् प्रणतो भूत्वा जानुभ्यां धरणीतले ॥ 51 ॥
भक्तिमान् भो महाभूत पृच्छति त्वपराजितः ।
और भी, कहें तो वे प्रभावसुनन्दन हैं। अस्तु, इन परमप्रभु विश्वकर्मा को
भूमि पर साष्टाङ्ग प्रणाम करके, दण्डवत् लेटकर, प्रणत होकर भक्तिभाव से
अभिभूत होकर अपराजित उनसे प्रश्न करते हैं।
अथापराजित प्रश्नं —
समचित्तं च सम्बोध्य ह्यज्ञानां ज्ञानदो भवान् ॥ 52 ॥
सूत्रशास्त्रार्णवमध्यादुद्धृतं सारबीजकम्।
सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं गुह्यं मध्यादुद्धरतो यथा ॥ 53 ॥
अपराजित बोले कि हे (महाभूत) प्रभु! आप मुझे समचित्त होकर सम्बोधित
करके मेरे अज्ञान को हटाते हुए मुझे ज्ञान प्रदान करें जिससे मैं समस्त सूत्रशास्त्रों
को, शिल्पज्ञान के शास्त्रों के महासागर के मध्य से अद्भुत सार बीज निकाल सकूँ
जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर होने और गुह्य होने पर भी मैं उसका उद्धार करके समझ
सकूँ।
निशाकरे चास्तमिते उदिते च दिवाकरे।
सूत्रार्थस्य प्रवक्तुवै ज्ञानं चक्षुः प्रकाशनम् ॥ 54 ॥


  1. तुलनीय : विश्वकर्म विमना आदिद्धाया धाता च विधाता परमोत संदृक्। तेषामिष्टानि समिषा मदन्ति यत्रा
    सप्तऋषिन् पर एक माहुः ॥ (ऋग्वेद 10, 82, 2) देखें यास्क भाष्य : विश्वकर्मा विभूतमनाः व्याप्ता धाता
    च विधाता च परमः च संद्रष्टा भूतानां । तेषां इष्टानि वा। कान्तानि वा। गतानि वा। मतानिं वा। नतानि वा।
    अद्भिः समोदन्ते। यत्र एतानि सप्त ऋषीणि ज्योतींषि। तेभ्यः परः आदित्य। तानि एतस्मिन् एकं भवन्ति।
    इति आदि दैवतम् । (निरुक्त : यास्कभाष्य 10, 26)

10 अपराजितपृच्छा
जिस प्रकार निशाकर के अस्त होने पर दिवाकर भगवान् सूर्य के उदित होने से
सर्वत्र प्रकाश प्रसारित हो जाता है, वैसे ही मेरे ज्ञान चक्षुओं में सूत्रार्थ का प्रकाश
प्रसारित हो जाएँ।
यद्यत्पृच्छामि तदहं सूत्रशास्त्रप्रकाशकम्।
देहि ज्ञानं प्रसादेन तारा तिमिरहरं यथा ॥ ५५ ॥¹
हे प्रभु ! मैं जो-जो भी प्रश्न सूत्रशास्त्र के प्रकाश करने के सम्बन्ध में करूँ, उस
पर कृपा करके मुझे ऐसा उज्ज्वल ज्ञान प्रदान करें जैसे तारों के प्रकाश को सूर्य का
प्रकाश हर लेता है।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रो(प्रयो)क्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजित पृच्छायां
गन्धमादनाधिकारो नाम प्रथमं सूत्रम् ॥ १ ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में गन्धमादन
अधिकार संज्ञक पहला सूत्र समाप्त हुआ ॥ १ ॥
सूत्रलक्षणं द्वितीयं सूत्रम् ॥ २ ॥
अथ सूत्रधारेण ज्ञातव्य विषयाः । अपराजित उवाच -
सृष्टिकौतूहलं देव उत्पत्तिर्भूतधातृभिः ।
ब्रह्माण्डं च कथं प्रोक्तं केन सङ्ख्या प्रमाणतः ॥ १ ॥
अपराजित (विश्वकर्मा के प्रति कहने लगे) हे देव ! आप इस सृष्टि के कुतूहल,
ब्रह्मा ने उसकी उत्पत्ति कैसे की, ब्रह्माण्ड की रचना कैसे हुई, उसका संख्या प्रमाण
क्या है, यह सब बताएँ ।
कया युक्त्या समुत्पन्नं वर्द्धितं केन हेतुना।
विकासः केन सञ्जातः कैराधारैश्च धार्यते ॥ २ ॥
धरायाः केचिदाधारा आकाशस्य कथं विदुः ।
के च मेर्वादयः शैलाः कैराधारेः कुलाचलाः ॥ ३ ॥
किस युक्ति से ब्रह्माण्डादि की रचना हुई, किस हेतु से उसका विस्तार होता है,

  1. 'यछत्पृच्छामि तब्यं हं सूत्रशास्त्र प्रद्योतक। तासु ज्ञानं प्रज्ञाहेन तारातिमिरहं यथा' इति 'न' पाठः ।
  2. इस अध्याय में ग्रन्थ में प्रतिपादित विषयों के बारे में कहा गया है। एक प्रकार से यह इस ग्रन्थ की
    विषय सूची भी है। संयोग से किञ्चित विषयों को छोड़कर प्रस्तुत पाठ में समस्त विषय आ गए हैं।
    जहाँ कहीं विषय खण्डित मिला है, प्रस्तुत पाठ में अन्य पाठ या ग्रन्थान्तर से उक्त विषय की पूर्ति का
    प्रयास किया गया है।

सूत्र-२ 11
किस प्रयोजन से विकास होता है और उसको कौन धारण करता है, धरती का
आधार कौन है, आकाश किस प्रकार स्थित है, मेरू आदि पर्वत और कुलाचल
शैल का आधार क्या है, यह भी कहें।
किं धरित्र्याः प्रमाणं च सप्त,द्वीपा वसुन्धरा।
समुद्राश्च कथं प्रोक्ता वनोपवनकाननम् ॥ 4 ॥
द्वीपद्वीपेषु क्षेत्राणां प्रमाणानि कथं विदुः ।
जम्बूद्वीपस्य मध्ये तु नवक्षेत्राणि, कानि च ॥ 5 ॥
सात द्वीपों को धारण करने वाली वसुन्धरा का प्रमाण क्या है, इस पर विद्यमान
समुद्र, वन-उपवन, कानन, द्वीप, उपद्वीप के क्षेत्रों का प्रमाण भी कहें। इस जम्बूद्वीप
के बीच कौन-कौन से नवद्वीप हैं, बताएँ।
उत्तमं भारतं क्षेत्रं तत्प्रमाणं च ख्यातु मे।
स्वेदाण्डोर्ध्वजरायुजो भूतग्रामः कथञ्चन ॥ 6 ॥
को धर्मः कुत्र क्षेत्रेषु रम्यकादौ वदेद्भगवान् ।
ये देशा भारते क्षेत्रे आश्रमा ग्रामसङ्ख्यया ॥ 7 ॥
इस उत्तम भारत क्षेत्र का प्रमाण क्या है, बताइए। स्वेदज, अण्डज, पिण्डज
और जरायुज जैसे भूत प्राणियों के विषय में बताएँ। किस क्षेत्र का क्या धर्म है,
कौन क्षेत्र रमणीय है, हे भगवान् ! आप बताएँ। इस देश की आश्रम व्यवस्था, ग्राम
संख्या आदि को भी स्पष्ट करें।
को धर्मः कुत्र देशे तु भरतक्षेत्रमध्यतः ।
कृतत्रेताद्वापरे तु चतुर्थे₄ वा कलौ युगे ॥ 8 ॥
युगान्ते च कथं धर्मो युगरूपानुदेवताः ।
धर्मः कृतयुगादीनां द्विजदेवयज्ञादयः ॥ 9 ॥
इस भरत क्षेत्र के बीच के किस देश का कौनसा धर्म है, कृतयुग, त्रेतायुग,
द्वापर और चौथे कलियुग के विषय में, युगान्त के धर्म, युगानुरूप देवताओं और
कृतयुगादि के धर्म, द्विज, देवयज्ञादि के विषय में भी कहें।
कश्च धर्मः कथं कीर्त्तिर्द्विजदेवालयादितः ।
आलयः सर्वसत्त्वानां वेश्महर्म्यप्रसाधनम् ॥ 10 ॥
वास्तूत्पत्तिः कथं तात देवादेश्च निघण्टुकम्।
एकपादादिकं वास्तु यावत्पदसहस्रकम् ॥ 11 ॥
हे तात ! इसी प्रकार धर्म के विषय में भी कहो और द्विजों की कीर्ति, देवालयों,

12 अपराजितपृच्छा
समस्त लोगों के लिए भवन, हवेलियों व प्रसाधनों, वास्तु की उत्पत्ति को भी कहो।
इसी प्रकार निघण्टु और एक पद से लेकर हजार पद तक के वास्तु पद विन्यास को
भी कहो।
मर्मोपमर्मवंशाश्च रेखाषट्कसंख्यादिकम्।
वज्रत्रिशूललाङ्गलं हस्तसूत्रादिपद्मकम् ॥ 12 ॥
बलिकर्मविधिं ब्रूहि वास्तुपादनिवासिनाम्।
विद्यात् स्थानानि सर्वाणि प्रासादभवनादितः ॥ 13 ॥
इसी प्रकार मर्म, उपमर्म, वंश, रेखा षट्क, संख्याओं, वज्र, त्रिशूल, हल, हस्त
सूत्रादि पद्मक, बलिकर्म की विधि भी कहो। वास्तुपदानुसार वहाँ न्यसित देवताओं
के विषय में कहो और समस्त प्रासाद, भवनों के स्थानों के विषय में कथन करें।
हस्तलक्षणमानं च देवतापादसम्भवम्।
मानोन्मानप्रमाणं च सर्वकर्मादिकारणम् ॥ 14 ॥
सूत्रधारो हि जानीयाद्वर्णकं रुतमेव च।
इसी क्रम में हस्त लक्षण, हस्तमान, हस्त के पदानुसार वहाँ के देवताओं,
मान-उन्मान के प्रमाण और उनका समस्त कर्मों में उपयोग, सूत्रधार की परीक्षा,
वर्णादि के विषय में भी कहें।
भूपरीक्षां शल्योद्धारं कीलिकारोपणादिकम् ॥ 15 ॥
वर्णगन्धरसास्वादप्लवादिभूमिलक्षणम्।
दीपवर्त्तिप्राग्विशुद्धिं दिशां च साधनादिकम् ॥ 16 ॥
भूमि की परीक्षा, शल्योद्धार, कीलिकारोपणादि के साथ ही वर्ण, गन्ध, रस,
स्वाद, प्लवादि के अनुसार भूमि के लक्षण, दीये की बाती के अनुसार पूर्वादि
दिशाओं का ज्ञान जिस विधि से सम्भव हो, उसको भी कहें।
प्रस्तारक्रमसूत्रं च राजधान्याः पुरादिकम्।
पुरग्रामनगराद्यं खेटं कूटं च कर्वटम् ॥ 17 ॥
पुरप्राकारपरिखाप्रतोलीमार्गगोपुरम्।
वेश्मानि राजवेश्यामानि सभां शालां गजाश्वयोः ॥ 18 ॥
भवनादि के लिए प्रस्तार क्रमसूत्र, राजधानी योग्य पुरों के अतिरिक्त जनवास
के उपयोगी पुर, ग्राम, नगर, खेट, कूट, कर्वट के विषय में कहें। पुर की
चहारदिवारी, परिखा, प्रतोली, मार्ग, गोपुर, योग्य महल, राजभवन, सभा, अश्व-
गजशालाओं के बारे में कथन करें।

सूत्र-२ 13
सूत्रपातविधिं ज्ञात्वाऽऽयव्ययादेश्च लक्षणम् ।
ज्योतिषे केवलं ज्ञानं स्त्रीपुरुषादिलक्षणम् ॥ 19 ॥
निर्माण कार्य के लिए सूत्रपात की विधि और आय-व्ययादि के लक्षण,
ज्योतिष, स्त्री-पुरुष लक्षणों के विषय में भी कहें।
प्रासादप्रतिमालिङ्गःजगतीपीठमण्डपान् ।
प्रासादान् विविधाकारान् वैराज्यकुलसम्भवान् ॥ 20 ॥
अष्टजातिक्रमच्छन्दो देशानुरूपसूत्रणे।
प्रासाद, प्रतिमा, लिङ्ग, जगती, पीठ, मण्डप, वैराज्यादि कुलों से बनने वाले
नाना प्रकार के प्रसादों, आठ जाति के छन्द और देशानुरूप सूत्र-प्रमाण के विषय में
भी कहने का कष्ट करें।
रेखाश्च विविधास्तत्र प्रासादे शिखरे मताः ॥ 21 ॥
घण्टाकलशध्वजानां प्रमाणं सृष्टिसम्भवम् ।
प्रतिष्ठा सप्तधा ख्याता कूर्माद्या च ध्वजान्तगा ॥ 22 ॥
प्रासादों के शिखरों के लिए प्रयुक्त होने वाली नाना प्रकार की रेखाओं,
शिखरोपयोगी घण्टा, कलश, ध्वजादि के निर्माण के प्रमाण, कूर्मादि सहित सात
प्रकार की प्रतिष्ठा और ध्वजान्तगामी विधियाँ कहें।
प्रासादे गर्भद्वारे च देवतानामनुक्रमः ।
द्वारदृष्टिपदस्थानं दिग्द्वारं च कथञ्चन ॥ 23 ॥
प्रासाद के गर्भद्वार और देवता नामानुक्रम, द्वार दृष्टि, पद स्थान, दिशाओं के द्वार
के विषय में भी कहने की कृपा करें।
द्वारलक्षणं प्रोक्तव्यं दारुकर्मरथारुहे (त्मके) ।
सिंहकर्णकपोतालीनिर्यूहच्छाद्यकं लुमम् ॥ 24 ॥
वितानानि विचित्राणि क्षिप्तान्युत्क्षिप्तकानिं च।
पद्मकं नाभिच्छन्दं च सभामार्ग मन्दारकम् ॥ 25 ॥
इसके अतिरिक्त, द्वार के लक्षण, काष्ठादि के लक्षण, सिंहकर्ण, कपोताली,
निर्यूह, छाद्यक, लुमा, वितान, चित्र-विचित्र क्षिप्त-अनुक्षिप्त, पद्मक, नाभिच्छन्द,
सभा, मार्ग, मन्दारक आदि के विषय में भी बताएँ।
प्रतिमालक्ष्मस्थानानि दृष्टिस्थानादिकं तथा।
भृत्यचारप्रभेदाश्च स्वस्वयानादिकं तथा ॥ 26 ॥

14 अपराजितपृच्छा
प्रतिमा, लाञ्छन के स्थान, दृष्टिस्थानादि, सेवकाचार के भेद और उनके
यानादि, वाहनों के विषयों में भी कहें।
तालप्रस्तारगीताद्यं वादित्रैः स्याच्चतुर्विधम्।
चित्रपट्टप्रभेदाश्च रेखाचित्रसमुद्भवाः ॥ 27 ॥
इसी प्रकार सङ्गीत में ताल, प्रस्तार छन्द, गीतादि, चार प्रकार के वाद्यों (तत्,
सुषिर, घन, आबद्ध), चित्रपट्ट के भेद, रेखाचित्रों के बनने की विधि कहें।
वर्णरूपरसवृत्तिभावानुभावकोद्भवाः।
शुद्धाबबद्धानि चित्राणि पत्राणि पञ्च एव च ॥ 28 ॥
शालभञ्जी प्रतांचारी लास्यताण्डवकादिकम्।
वर्ण, रूप, रस, वृत्ति, भाव, अनुभाव से बनने वाले, शुद्ध, आबद्ध चित्रों, पाँच
पत्रों, शालभञ्जिका, नृत्य में चारी, लास्य, ताण्डवादि नृत्यों के विषय में कहें।
भूषणानि विचित्राणि देवासुरनृणां किल ॥ 29 ॥
छत्रं सिंहासनं शय्यां यानानि चायुधानि च।
वेदिकानामलङ्कारं रत्नधातूद्भवं तथा ॥ 30 ॥
देवताओं, असुरों और मनुष्यों के नाना आभूषणों, छत्र, सिंहासन, शय्या, यान-
विमान, आयुध, वेदिका, अलङ्कार, रत्नों-धातुओं की उत्पत्ति के विषय में कहें।
एतत्सर्वं प्रसादेन कथय स्वयमीश्वर।
भक्तवत्सल देव त्वं प्रसादं कुरु मे प्रभो ॥ 31 ॥
हे स्वयं ईश्वर! भक्त वत्सल देव!! उक्त समस्त विषयों के विषय में आप प्रभु!
मेरे प्रति कहने का अनुग्रह करें।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
सूत्रलक्षणाधिकारो नाम द्वितीयं सूत्रम् ॥ 2 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में सूत्र
लक्षण अधिकार नामक द्वितीय सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 2 ॥
ब्रह्माण्डोत्पत्तिर्नाम तृतीयं सूत्रम् ॥ 3 ॥
विश्वकर्मोवाच —
शृणु वत्स प्रयत्नेन यत्त्वया परिपृच्छितम्।
कथयामि न सन्देहस्तव भ्रान्तिहरं च तत् ॥ 1 ॥

सूत्र- ३ 15
(अपराजित के प्रश्न करने पर) विश्वकर्मा बोले— सुनो पुत्र! तुमने परिश्रम से
जो-जो प्रश्न किए हैं, मैं तुम्हारा सन्देह और भ्रान्ति दूर करने को कहता हूँ।
ब्रह्माण्डोत्पत्ति वर्णनमाह —
पूर्वं ब्रह्माण्डमुत्पन्नं संसाराधारकं च तत्।¹
ततस्तस्मिन् समस्तं च जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ २ ॥
पहले ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई और संसार को धारण करने वाले की उत्पत्ति
हुई। इसके बाद उस पर समस्त स्थावर, जङ्गम जगत की उद्भावना हुई।
आद्योद्भवसृष्टिसूत्रं ब्रह्मज्ञानादिकोद्भवम्।
तदनुक्रमयुक्ती च कथयामि च साम्प्रतम् ॥ ३ ॥²
आदिकाल में सृष्टि किस रीति से उत्पन्न हुई, वैसे ही किस प्रकार ब्रह्मज्ञान का
उद्भव हुआ, ऐसी ही समस्त युक्तियों का मैं यहाँ अब कथन कर रहा हूँ।
नैव भूर्वायुराकाशं नैव चन्द्रार्कतारकम्।
देवासुरमनुष्याणां नोत्पत्तिं प्रलये विदुः ॥ ४ ॥³
पूर्वकाल में न तो पृथ्वी थी, न वायु न ही आकाश था, न चन्द्रमा था, न सूर्य
और न ही तारागणादि थे। इसी प्रकार न तो देवता थे, न असुर; मनुष्यों की उत्पत्ति
भी नहीं हुई थी, ऐसा विद्वज्जन कहते हैं।
न पृथ्वी सागरा द्वीपाः शैला मेर्वादयस्तथा।
भूतग्रामः समस्त्वेवं स्वेदाण्डोड्भिज्जरायुजाः ॥ ५ ॥⁴
तब पृथ्वी पर न सागर थे न द्वीप और न ही मेरु आदि पर्वत ही थे। इसी
प्रकार न कोई ग्रामादि बस्ती थी। इसके बाद, यहाँ समस्त स्वेदज (पसीने से उत्पन्न
होने वाले जीव), अण्डज (अण्डों से पैदा होने वाले जीव), जरायुज (जर से
उत्पन्न होने वाले जीव) पैदा हुए।
अन्ये च बहवो जीवाः कीटसर्पपतत्रिणः।
चतुरशीति लक्षाणि जीवयोनिरनेकधा ॥ ६ ॥⁵

  1. पूर्वं ब्रह्माण्डोत्पत्ति संसारोधारकोद्भवं इति पाठः ।
  2. आद्योद्भवसृष्टिसूत्रं (स्तत्र) ब्रह्माण्डादिकटोद्भवम् ( ?)। तस्यायुक्ति अनुक्रमेण कथयामि च साम्प्रतमिति
    पाठः।
  3. न च भूमि चराकाशान् चन्द्रादितारकान् च। देवासुरमनुष्याणां तस्योत्पत्ति प्रलायाम्बिभू इति पाठः ।
  4. न च पृथ्वी सागरोविद्व पमेवीदि शिलोद्भवन् । भूतग्रामोग्राममस्त्व वंस्वेत जाण्डद्विजा रज इति पाठः ।
  5. अन्येषां बहवोजीवाकीट सर्पपतङ्गादयः । चतुराशी तीगणांनि जीवयोनि अनेकधा इति पाठः ।

16 अपराजितपृच्छा
इसी प्रकार कीट, सर्प, पतङ्गादि बहुत प्रकार के जीव हुए— कुल चौरासी
लाख जीव योनियाँ कही गई हैं।
सृष्ट्यनन्तरे सम्भूताः सर्वे जीवानुरूपकाः।
सृष्टिस्तत्र यथान्यायं कथ्यते च यथाक्रमम्॥ ७॥
सृष्टि निर्माण के अनन्तर समस्त जीवरूपों की उत्पत्ति हुई, इस सृष्टि के विषय
में जैसा न्याय में कहा गया है, मैं यथाक्रम कहता हूँ।
कल्पान्तसम्भवा सृष्टिः संसारसृष्टिसञ्जिता।
मन्वन्तरमनुकान्तं युगान्तं चैव यादृशम्॥ ८॥¹
कल्प के अन्त में सृष्टि की उत्पत्ति हुई जिसको संसार नाम से कहा गया है।
इस मन्वन्तर के क्रम से, युगान्त की क्रिया को मैं कहता हूँ।
वर्षान्ते भावरूपाश्च ऋत्वन्ते तामसोद्भवः।
पक्षान्ते च सिताः कृष्णा दिनान्ते शर्वरी यथा॥ ९॥²
यहाँ वर्ष के अनन्तर (प्रकृति के) भावरूप ऋतुओं, (उजाले व) अन्धेरे की
उत्पत्ति हुई। पक्ष में शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष हुए और दिन के साथ ही रात्रि आदि हुए।
एतद् दृष्ट्वा विशेषेण कल्पान्त एवमुद्भवः।
कल्पे कल्पे पुनः सृष्टिर्जगत्स्थावरजङ्गमम्॥ १०॥
इस प्रकार अनेक विशेषताओं के साथ कल्पान्त में रचना होती है। प्रत्येक
कल्प के अन्त में पुनः पुनः स्थावर-जङ्गम वाली जगत सृष्टि होती है।
अपराजित उवाच —
आदिसृष्ट्युद्भवो देव ब्रह्माण्डादिसमुद्भवः।
ब्रह्माण्डं कथमुत्पन्नं कथं च द्वीपशैलयोः॥ ११॥
ब्रह्मा विष्णुः शशी सूर्य इन्द्रः स्कन्दो हुताशनः।
नैव भूर्वायुराकाशं न देवासुरमानुषाः॥ १२॥
वेदोद्भवा च या सृष्टिः कर्म चैव सनातनम्।
अस्माकं भक्तियुक्तानां कथयस्व परेश्वर॥ १३॥
अपराजित बोले— हे परमेश्वर! मैं भक्तिपूर्वक आपसे निवेदन करता हूँ कि मुझे
आदिकाल में सृष्टि कैसे उत्पन्न हुई; ब्रह्माण्डादि का उद्भव कैसे हुआ और इस ब्रह्माण्ड

  1. कल्पान्तोद्भवासृष्टी संसारासृष्टीकोद्भवा। मन्तरस्तनुक्रान्ता युगान्तामेव यादृशी इति पाठः।
  2. वर्षान्तो भावरूपाश्चरित्त्वर्तो मासोद्भवा। पक्षान्त शित कृष्णादि दिनान्ते शर्वशा यथा इति पाठः।

सूत्र- ३ 17
में कैसे द्वीप-पर्वतादि उत्पन्न हुए; कैसे ब्रह्मा, विष्णु, चन्द्रमा, सूर्य, इन्द्र, स्कन्द, अग्नि
हुए? तब न तो भूमि थी, न वायु न ही आकाश और देव-असुर और मानव ही थे फिर
वेदोद्भावा यह सृष्टि कैसे सनातनतः कर्म वाली हुई, कृपया इस विषय को कहिए।
विश्वकर्मोवाच —
अनादेरादिसम्भूतादन्धकारोद्भवं तमः।
आदौ तथान्धतमसं निराधारं निरन्तरम्॥ 14 ॥¹
अनादि काल में यह सृष्टि उत्पन्न हुई। लय के बाद जब इसकी उत्पत्ति हुई तब
अन्धकार ही था, अन्य कोई नहीं। आदिकाल में यह अन्धकार ही था जो निराधार
और निरन्तर था।
निराकारादकारश्च अकारादम्भउद्भवः।
अम्भसो रूपमाख्यातमम्बुदो रूक्षसुदूर्ध्वतः ? ॥ 15 ॥²
उस काल में निराकारादकार से ही आकाराद का उद्भव हुआ था। तब
जलार्णव से रूप सम्भूत रूप हुआ जो रूक्षरूप (जलाण्ड या बुलबुला) में उठा
हुआ था।
अव्यक्ताद् व्यक्तमापन्नमवर्णे वर्णतां विदुः।
व्यक्ताख्यं वर्णरूपं च फेनस्थानसमुत्थितम्॥ 16 ॥³
उक्त अव्यक्त से व्यक्त बुद्बुद अवर्णवत् हुआ, जैसा कि मनीषियों ने वर्णन
किया है, वह बाद में व्यक्त नाम से वर्णरूप हुआ और फेन के स्थान पर उठा हुआ
दिखाई देता था।
फेनवर्णे निबद्धं च ह्यण्डके रूपमाश्रितम्।
शनैः शनैः प्रवर्द्धन्ते लोलकाकाररूपिणः॥ 17 ॥⁴
वह अण्ड फेन के ही वर्ण से निबद्ध होने लगा और रूपाश्रित होने लगा।
धीरे-धीरे वह बड़ा होने लगा और दोलायमान रूप में आया।
वृद्धेर्वृद्धिः पुनस्त्वेवं शनैश्चापि महोद्भवः।
महोद्भवो महावृद्धिः शनैश्चापि विवर्द्धते॥ 18 ॥⁵


  1. अनाद्यानादि सम्भूता तमध्वजान्धकोद्भवा। यदा अन्धतमन्धश्च निरन्धाश्च निरन्तरा इति पाठः।
  2. निरन्धारे अकारेश्च अंकारेशुं भुकोद्भवा। अम्भोद्बवरूपाख्याता आशुकोद् इत उर्ध्वत इति पाठः।
  3. अव्यक्ताव्यक्तोपमानां अवर्णे वर्णित विभु। वर्णरूपं व्यक्ताकारं च फनस्थाने च सम्भवम् इति पाठः।
  4. फवर्णैन विबन्धश्च अण्डकं रुपमा स्थितः। शनैशनै प्रवर्द्धन्तो गोलाकाररुपिणः इति पाठः।
  5. वृद्धि पुस्त्यं शतैश्चापि महोद्भवम्। वृद्धीते महतोद्भग विअधोदे पृष्ठमावृत्तमिति पाठः।

18 अपराजितपृच्छा
ज्यों-ज्यों समय बीता, वह वृद्धि को प्राप्त होता रहा और महारूपवान् होता
चला गया। महोद्भव के साथ-साथ वह महावृद्धि को प्राप्त हुआ अर्थात् विशालकाय
होता चला गया।
क्रमसंवर्धनात्त्वेवं विकाशं प्राप्त सर्वथा।
वर्धते च महाभावर्ब्रह्माण्डं पृथुतां गतम् ॥ 19 ॥
वह क्रमशः बढ़ता हुआ, विकास को प्राप्त हुआ अपने महाभाव में ब्रह्माण्ड
तुल्य पृथुता की गति को पाने लगा।
अण्डव्यासपृथुमानं योजनैः शतकोटिभिः।
सुनिष्पन्नाण्डकं यातं विकाशं वै द्विधा स्थितम् ॥ 20 ॥¹
धीरे-धीरे उस अण्ड का व्यास और विस्तार का मान योजन से शतकोटि तक
होता चला गया। वह इससे भी दोहरे विकास को प्राप्त होता हुआ, अर्णव पर स्थित
था।
अर्धस्योर्ध्वं तथाकाशमर्धस्याधस्तु मेदिनी।
तन्मध्ये वै समस्तं च येषां शम्भुकोद्भवत् ? ॥ 21 ॥
उसी अण्ड के ऊपरी स्वरूप से आकाश और नीचे के स्वरूप से पृथ्वी की
रचना हुई। इसके बीच समस्त चराचर था जो कि शम्भू से उत्पन्न हुआ था।
स्वर्गलोकार्णवद्वीपाः शैलाः शम्भुसमुद्भवाः।
वनोपवनकाननं यथा रचितसम्भवम् ॥ 22 ॥
इसके साथ ही शिव ने स्वर्गलोक, समुद्र, द्वीप, पर्वत, वनोपवन, कानन आदि
की रचना की।
महामेरूद्भवमध्ये रचितं शम्भुकोद्भवम्।²
तस्योर्ध्वे तु परं देवं संसारसृष्टिकारणम् ॥ 23 ॥
इसी प्रकार पृथ्वी पर महामेरु की रचना हुई, यह शम्भू द्वारा रचित हुआ।
उसके ऊपर ही देव ने सांसारिक सृष्टि की।
एकविंशति₂₁ स्वर्गांश्च मेरुव्यङ्गसमुद्भवाः ?।
³शम्भूद्गवाः क्रमेणैव पात्रे पात्रमिवापरम् ॥ 24 ॥

  1. कस्याण्डकष्ट गमनं योजनै शतकोटिभिः। सुष्यैन्निश्नन्तऽकं जातं विकाशंवैद्विधास्थितमिति पाठः।
  2. महामेरूद्भवं मध्ये अपरचि सम्भूद्भवा इति पाठः।
  3. महामेरूद्भवं मध्ये योगे पात्रेपात्रभिवातपरमिति पाठः।

सूत्र- ३ 19
इसी प्रकार शिव ने इक्कीस स्वर्गों की रचना की और मेरु सहित अन्य अङ्गों
को उत्पन्न किया। ये लोक क्रमशः एक पात्र के ऊपर रखे अन्य पात्र की भाँति
स्थित हैं।
पातालं समधा₇ ख्यातं सप्तद्वीपा₇ वसुन्धरा।¹
सप्त₇लोकास्तथा चोर्ध्वं स्वर्गाणां त्वेकविंशतिः₂₁ ॥ २५ ॥
इसी तरह सात पाताल² और सात प्रसिद्ध द्वीपों³ वाली वसुन्धरा की रचना की।
इसमें सात लोक⁴ और ऊपर इक्कीस स्वर्गलोकों की रचना की।
ततः सरांसि प्रतिमा जलस्य तु यानिकाः।
पुष्पावाटी प्राकारो शाला द्विनयमुपवनं वेदिकान्त ध्वजा ? ॥ २६ ॥
इसके बाद, सरों, तालाबों, जलाशयों का स्वरूप (प्रतिमा) बना। साथ ही
उनमें तैरने वाले यानों (नौका, जहाजादि) की रचना हुई। इसी प्रकार पुष्पवाटिकाएँ
अपना आकार ग्रहण करने लगीं और, परकोटा, शालाएँ बनने लगीं। इसी प्रकार
विनय, उपवनयुक्त वेदिकाओं (चबूतरों) पर ध्वजाएँ फहराने लगीं।
शालकल्पद्रुमाणां ⁵परिवर्ति वनान्तदूर्प⁶हर्म्या ? ।
वली च पातालस्फटिकोपेतं वृसुरमुनिसुरा पीठिकार्गस्वर्गभूः ? ॥ २७ ॥
इसी प्रकार शाल जैसे विशाल कल्पद्रुमों के ऊपर की ओर हर्म्यावली अर्थात्
हवेलियों की पङ्क्तियुक्त भवनों की कतार जो अपने ऊपर तल से लेकर ऊपर तक
स्फटिक से ही निर्मित थी। यह वसुओं, मुनियों, सुरों, देवताओं की पीठिका आवास
रूपी स्वर्गभूमि जैसी प्रतीत होती थी।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
ब्रह्माण्डोत्पत्त्यधिकारो नाम तृतीयं सूत्रम् ॥ ३ ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में ब्रह्माण्ड
की उत्पत्ति अधिकार नामक तृतीय सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥

  1. पातालासप्तमाख्याता सप्तद्वीपा वसुन्धरा। सप्तलोकोर्द्धमाख्याता स्वर्गाणां चैकविंशति इति पाठः।
  2. अतलं वितलं चैव सुतलं च तलातलम्। महातलं च पातालं रसातलमधस्ततः ॥ (ब्रह्माण्डपुराण ब्रह्मखण्ड
    7, 13)
  3. जम्बू, शाल्मलि, क्रौञ्च, कुश, शाक, पुष्कर तथा प्लक्ष द्वीप।
  4. भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक व सत्य या ब्रह्मलोक।
  5. 'परिवर्ति' प्रकाशित पाठः।
  6. 'हर्म्या' स्यात्।

20 अपराजितपृच्छा
पातालद्वीपार्णवसूत्रणं (सूचनं) चतुर्थ सूत्रम् ॥ 4 ॥
अपराजित उवाच -
काचिच्छम्भूद्भवा सृष्टिः काचिद्देवांशसम्भवा ।
काचित्सृष्टिसमुद्भूता काचित्तद्वरदानतः ॥ 1 ॥
केचिच्छम्भूद्भवा वर्णा वनादीनां क्व चोदयः ।
निशासृष्ट्युद्भवाः केचिद् वनोपवनकाननम् ॥ 2 ॥
अपराजित बोले— हे प्रभु! यह बताइएगा कि कौनसी सृष्टि शम्भु के द्वारा और
कौनसी देवांश द्वारा सम्भूत हुई है? कौनसी सृष्टि स्वयं हुई और कौनसी सृष्टि
वरदान से हुई? इसी प्रकार शम्भु से कितने वर्ण उत्पन्न हुए और वनादिकों की
उत्पत्ति कैसे हुई तथा कोई वन, उपवन और कानन निशाचरों, राक्षसों व पिशाचों
द्वारा भी कैसे उत्पन्न किए गए हैं?
अथ पातालद्वीपार्णवसूत्राणं विश्वकर्मोवाच —
शम्भुजा भूधरा लोकाः पातालतलवासिनः ।
तथै (त्रै) सागरद्वीपाः शम्भुना रचिताः पुरा ॥ 3 ॥
पातालः सप्तधा त्वेवं ब्रह्मभागव्यवस्थितः ।
सप्तद्वीपाः समुद्राश्च आख्याता विष्णुसम्भवाः ॥ 4 ॥
विश्वकर्मा बोले— इस लोक में समस्त भूधर अर्थात् पहाड़ शम्भु द्वारा ही
उत्पन्न हुए हैं। इसी प्रकार समस्त पाताल तल के निवासी और समस्त सागरों के
द्वीप भी शम्भु द्वारा ही पूर्वकाल में रचित है। पहले के समय में पातालों के सात
भाग स्वयं ब्रह्मा द्वारा व्यवस्थित किए गए थे और सातों समुद्रों के सातों विख्यात
द्वीपों की रचना भगवान विष्णु द्वारा की गई।
रुद्रभागोद्भवालोकादीनां —
सप्तोर्ध्वलोकाश्च, ख्याता रुद्रभागसमुद्भवाः ।
स्वर्गश्च मर्त्यपातालौ स्वर्गाणां त्वेकविंशतिः₂₁ ॥ 5 ॥
इसी प्रकार सात ऊर्ध्वलोक जो विख्यात हैं, उनको स्वयं भगवान रुद्र ने ही
उत्पन्न किया। इस प्रकार से देखने पर हम पाते हैं कि स्वर्गलोक, मृत्युलोक और
पाताल लोकादि स्वर्गों की संख्या इक्कीस है।
पातालः स्वर्ग आख्यातो मर्त्यो द्वीपार्णवात्मकः ।
स्वर्गश्च लोक आख्यातस्त्रैलोक्यं नाम प्रोच्यते ॥ 6 ॥

सूत्र-४ 21
महोमेर्वादयः ख्याताः शम्भुना रचिताः किल।
अब मैं पाताल स्वर्ग कहलाने वाले, मृत्युलोक के द्वीपार्णव तथा स्वर्गलोक
नाम से कहे जाने वाले तीनों ही लोकों के नाम कहता हूँ। महामेरु आदि नाम से
विख्यात सभी पहाड़ भगवान शम्भु द्वारा रचित है।
अथ पृथ्वीविस्तारवर्णनं —
तेषामनुक्रमश्चात्र कथ्यते त्वपराजित ॥ ७॥
ब्रह्माण्डान्ते तु या पृथ्वी योजनैः शत ₁₀₀ कोटिभिः।
विनसन्त्यन्तरे लोका भुवनानि निवासिनाम् ॥ ८ ॥
हे अपराजित ! मैं उन सभी को अनुक्रम से तुम्हें यहाँ कहता हूँ। यह पृथ्वी
ब्रह्माण्ड के अन्त तक सौ करोड़ योजन तक फैली हुई है। इनके अनन्तर में अनेकों
भुवनों में निवास करने वाले लोक बसते हैं।
सरितश्च समुद्राश्च शैलाश्चैवं प्रकीर्तिताः।
तडागा विविधास्तत्र तीर्थश्च धर्मकीर्तनः ॥ ९ ॥
उन सभी में विविध प्रकार की सरिताएँ, समुद्र, शैल-पहाड़ जो ख्याति प्राप्त हैं
तथा विविध तड़ाग, तीर्थ आदि धर्मकीर्ति के स्थान पाए जाते हैं।
पातालान्ते च या पृथ्वी योजनैर्दशकोटिभिः।
तस्या अग्रं सहस्त्राणामेकोनविंशति स्तथा ॥ १० ॥
देवाग्निगुरुपूजा च धर्मतीर्थमहोत्सवः।
नदीसमुद्रदेवाश्च तीर्थादिपुण्यनिर्मलाः ? ॥ ११ ॥
अब देखिए कि पाताल के अन्त तक भी इस पृथ्वी की सीमा दस करोड़
योजनों की हैं। उससे भी आगे उन्नीस हजार देवाग्निपूजा, गुरुपूजा व धर्म तीर्थ के
महोत्सव के स्थान तथा नदी और समुद्र देवताओं के निर्मल पुण्य तीर्थ हैं।
तथा च पातालवर्णनं —
पातालभूधरा लोकास्तीर्थाणि पुण्यसागराः।
संस्थिताः कर्मयोगेन पात्रे पात्रमिवापरम् ॥ १२ ॥
अतलो वितलश्चैव सुतलो नितलस्तथा।
तलातलश्च विज्ञेयः ? (पातालः ) सप्तमोऽथ रसातलःः ॥ १३ ॥
ये सभी पाताल के पहाड़ों के लोक, तीर्थों के लोक पुण्य सागरों के लोक
कर्मयोग के द्वारा एक दूसरे पर इसी प्रकार बने हुए हैं जिस प्रकार घड़ों पर घड़े

22 अपराजितपृच्छा
रखे गए हों। इनके नाम हैं- (1.) अतल, (2.) वितल, (3.) सुतल, (4.)
नितल, (5.) तलातल (6. पाताल) और 7. रसातल।
पातालाः सप्तधा ख्याताः पात्रे पात्रमिवापरम्।
अविरचित विना शास्त्रे सृष्टिकालसमुद्भवाः ॥ 14 ॥
इस प्रकार सप्त पाताल एक दूसरे पर रखे गए पात्रों परिपात्रों के अनुसार विख्यात
हुए और ये सृष्टिकाल के समय ही बिना किसी शास्त्रीय आधार के निर्मित हुए हैं।
आदिपीठोद्भवं मानं द्वि ? सहस्त्रैर्लक्षयोजनैः ।
तलसङ्ख्यान्तरे विद्यात् पाताले सप्तधोच्छ्रिते ॥ 15 ॥
ततो द्विगुणविस्तीर्णाः क्रमेणापि सुसंस्थिताः ।
ब्रह्मसृष्ट्युद्भवांशे तु पातालतलमेव च ॥ 16 ॥
सबसे आदि में जो पीठ बनी, वह दो सहस्र लाख योजनों की थी। उसके ऊपर
एक-एक तल संख्या के अन्तर पर सात पाताल बनते गए। इससे भी दोगुनी विस्तार
वाली क्रमवार सुसंस्थित ब्रह्मा की सृष्टि में बने हुए पातालों के तल हैं।
तदूर्ध्वं सागरा द्वीपाः ¹शैलैश्चापि भूसंस्थिता ।
जम्बूद्वीपादिमानेन सप्तद्वीपा वसुन्धरा ॥ 17 ॥
तथा सप्तसमुद्राश्च प्रमाणेन प्रकीर्तिताः ।
इन सबके ऊपर सागर और द्वीप तथा पहाड़ों की भूमि पर स्थिति बनी हुई है।
इस भूमि पर यहाँ जम्बू द्वीपादि के मान से सात महाद्वीप इस वसुन्धरा पर बने हुए
हैं तथा सात समुद्र भी इनके ही प्रमाणानुसार बने हुए हैं।
अथ द्वीपनामवर्णनञ्च —
जम्बूः प्लक्षः कुशक्रौञ्चौ शाल्मलिश्च तथैव च ॥ 18 ॥
शाकस्तथा समाख्यातः पुष्कराख्यश्च सप्तमः ।
द्वीपाः सप्त समाख्याता अकृता शम्भुना हि ते ॥ 19 ॥
(उक्त द्वीपों के नाम हैं-) (1.) जम्बू, (2.) प्लक्ष, (3.) कुश, (4.)
क्रौञ्च, (5.) शाल्मलि, (6.) शाक और सातवाँ (7.) पुष्कर। ये सातों विख्यात
द्वीप शम्भु के द्वारा निर्मित हैं।
जम्बूद्वीपो लक्षमेकं योजनानां तु सङ्ख्यया ।
तत्परमर्णवा जाताः सप्तसृष्टिविरजिताः ॥ 20 ॥

  1. 'शनैश्चापि भू (त?) संस्थिता' प्रकाशित पाठः।

सूत्र-४ 23
सातश्च ? सप्तमां यान्ति क्रमेणापि सुसंस्थिताः ।
क्षारार्णवक्रमेणैव संस्थिताः सप्त सागराः ॥ २१ ॥
यह जम्बूद्वीप एक लाख योजन का है। इसके बाद ये सात सृष्टियों में बने
समुद्र आते हैं। ये सातों ही समुद्र सातवें तक क्रमवार सुसंस्थित है और क्षारार्णव
(लवणसागर) के क्रम से ये सातों सागर संस्थित है।
सागरान्ते भवेद् द्वीपो द्वीपान्ते चैव सागरः ।
समुद्राः संस्थिताः सर्वे नगरान्तेषु च विश्रुताः ॥ २३ ॥
अयुतायुतयोजनाः पृथगेकैकसागराः ।
विपुलागाधगम्भीरा आवर्तबहुलाकुलाः ॥ २४ ॥
इन सागरों के अन्त में अन्य द्वीप होते हैं और उन द्वीपों के अन्त में अन्य सागर
होते हैं। ये समुद्र इसी प्रकार एक दूसरे के बाद स्थित है जैसे किसीनगर के बाद
दूसरा नगर स्थित होता है। पृथक्-पृथक् ये सागर अयुतायुत योजनों अर्थात् अरबों
योजन के विस्तार में विस्तृत हैं और एक दूसरे से अलग-अलग भी हैं। ये सभी
सागर बहुत बड़े, बहुत गहरे, बहुत गम्भीर और बहुत ही भ्रमरियों युक्त उत्ताल
लहरों से आकुल-व्याकुल रहते हैं।
सागरनामानि —
क्षारः क्षीरोदधिः सर्पिमधुरिक्षुरसोदकः ।
समुद्राः सप्तधेत्युक्ताः सन्ति विष्णुसमुद्भवाः ॥ २५ ॥
(इन सागरों के नाम हैं—) (1.) क्षार, (2.) क्षीरोद, (3.) दधि, (4.)
सर्पि, (5.) मधु, (6.) इक्षु, (7.) रसोदक। ये सातों ही समुद्र भगवान् विष्णु द्वारा
रचित है।
कुलादीनां शैलनामानि —
नैकशैला कुलारम्या पृथ्वी च द्वीपसागराः ।
पृथुमानाः स्थिराः सर्वे शम्भोश्चाऽथ समुद्भवः ? ॥ २६ ॥
इस पृथ्वी पर अनेकों प्रकार के रम्य पहाड़ों के कुल समूह, द्वीप, सागर
विशाल प्रमाणयुक्त और स्थित है। ये सभी शम्भु की रचना हैं।
मेरुश्च मन्दरश्चैव तृतीयो गन्धमादनः ।
हिमवान् हेमकूटश्च निषधो नील एव च ॥ २७ ॥
श्वेतश्च शृङ्गवांश्चैव जाता अन्ये कुलाचलाः ।