सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 59

10 अपराजितपृच्छा
जिस प्रकार निशाकर के अस्त होने पर दिवाकर भगवान् सूर्य के उदित होने से
सर्वत्र प्रकाश प्रसारित हो जाता है, वैसे ही मेरे ज्ञान चक्षुओं में सूत्रार्थ का प्रकाश
प्रसारित हो जाएँ।
यद्यत्पृच्छामि तदहं सूत्रशास्त्रप्रकाशकम्।
देहि ज्ञानं प्रसादेन तारा तिमिरहरं यथा ॥ ५५ ॥¹
हे प्रभु ! मैं जो-जो भी प्रश्न सूत्रशास्त्र के प्रकाश करने के सम्बन्ध में करूँ, उस
पर कृपा करके मुझे ऐसा उज्ज्वल ज्ञान प्रदान करें जैसे तारों के प्रकाश को सूर्य का
प्रकाश हर लेता है।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रो(प्रयो)क्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजित पृच्छायां
गन्धमादनाधिकारो नाम प्रथमं सूत्रम् ॥ १ ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में गन्धमादन
अधिकार संज्ञक पहला सूत्र समाप्त हुआ ॥ १ ॥
सूत्रलक्षणं द्वितीयं सूत्रम् ॥ २ ॥
अथ सूत्रधारेण ज्ञातव्य विषयाः । अपराजित उवाच -
सृष्टिकौतूहलं देव उत्पत्तिर्भूतधातृभिः ।
ब्रह्माण्डं च कथं प्रोक्तं केन सङ्ख्या प्रमाणतः ॥ १ ॥
अपराजित (विश्वकर्मा के प्रति कहने लगे) हे देव ! आप इस सृष्टि के कुतूहल,
ब्रह्मा ने उसकी उत्पत्ति कैसे की, ब्रह्माण्ड की रचना कैसे हुई, उसका संख्या प्रमाण
क्या है, यह सब बताएँ ।
कया युक्त्या समुत्पन्नं वर्द्धितं केन हेतुना।
विकासः केन सञ्जातः कैराधारैश्च धार्यते ॥ २ ॥
धरायाः केचिदाधारा आकाशस्य कथं विदुः ।
के च मेर्वादयः शैलाः कैराधारेः कुलाचलाः ॥ ३ ॥
किस युक्ति से ब्रह्माण्डादि की रचना हुई, किस हेतु से उसका विस्तार होता है,

  1. 'यछत्पृच्छामि तब्यं हं सूत्रशास्त्र प्रद्योतक। तासु ज्ञानं प्रज्ञाहेन तारातिमिरहं यथा' इति 'न' पाठः ।
  2. इस अध्याय में ग्रन्थ में प्रतिपादित विषयों के बारे में कहा गया है। एक प्रकार से यह इस ग्रन्थ की
    विषय सूची भी है। संयोग से किञ्चित विषयों को छोड़कर प्रस्तुत पाठ में समस्त विषय आ गए हैं।
    जहाँ कहीं विषय खण्डित मिला है, प्रस्तुत पाठ में अन्य पाठ या ग्रन्थान्तर से उक्त विषय की पूर्ति का
    प्रयास किया गया है।