अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
334 अपराजितपृच्छा
इसी तरह राजाओं के महल, पुर आदि तथा कूपादिक और प्रासाद, देवमन्दिरों
तथा देवों के लिए केवल शास्त्रविहित हाथ (गज) ही मान्य है।
अथायनयनमाह —
दैर्घ्यं हन्यात्पृथुत्वेन हरेद्भागं ततोऽष्टभिः ।
शेषमायं चैव विद्याच्छास्त्रदृष्टं ध्वजादिकम् ॥ 8 ॥
लम्बाई से चौड़ाई के माप को गुणा करके प्राप्त गुणनफल में 8 का भाग दें, जो
शेष आएगा, उसे ध्वजादिक आय को शास्त्रीय दृष्टि से समझना चाहिए।
विधि — लम्बाई × चौड़ाई / 8 = क्रमशः 1 से 8 तक ध्वजादि आय।
आयनामानि —
ध्वजो धूम्रश्च सिंहश्च श्वानो वृषखरौ गजः ।
ध्वाङ्क्षश्चेति समुद्दिष्टाः प्राच्यादिषु प्रदक्षिणाः ॥ 9 ॥
इन आयों के नाम हैं- 1. ध्वज, 2. धूम, 3. सिंह, 4. श्वान, 5. वृष, 6. खर,
7. गज और 8. ध्वांक्ष। इनको सदा प्राच्यादि, प्रदक्षिणतः क्रम में लेना चाहिए।
अन्योऽन्याभिमुख्रास्ते च क्रमच्छन्दानुसारतः ।
पूर्वं च ये समुद्दिष्टाः आयुर्वृद्धिविधायकाः ॥ 10 ॥
ये परस्पर आमने-सामने हो सकते हैं, छन्द-क्रमानुसार हो सकते हैं, ऐसा पूर्व
में (मनीषियों द्वारा) कहा गया है। गृह में ये आयु की वृद्धि के विधायक अर्थात्
लाभदायक व अनुकूल होते हैं।
आय प्रयोजनमाह —
ध्वजः सिंहो वृषगजौ शस्यन्ते सुरवेश्मनि ।
अधमानां खरध्वजाङ्क्षधूम्रश्वानः सुखावहाः ॥ 11 ॥
देववेश्म अर्थात् मन्दिरादि में ध्वज, सिंह, वृष और गजाय प्रशस्त मानी गई है।
इनको ही उचित मान कर ग्रहण किया गया है, परन्तु इन से कम के लिए खर,
ध्वांक्ष, धूम और श्वानाय सुखप्रद होती है।
युगादिपरत्वेन ग्राह्यायाः —
ध्वजः प्रायः कृतयुगे त्रेतायां सिंह एव च ।
द्वापरे वृषबाहुल्यं गज एव कलौ युगे ॥ 12 ॥
ध्वज आय प्रायः सतयुग में तथा सिंह आय त्रेतायुग में और वृष बाहुल्य से
वृष आय द्वापर युग में तथा गज आय कलियुग में मान्य कही गई है।
सूत्र-६४ 335
विप्रादिजातिपरत्वेन ग्राह्यायाः -
कल्याणं कुरुते सिंहो नृपाणां च विशेषतः।
ध्वजः प्रशस्यते विप्रे वृषो वैश्ये उदाहृतः ॥ 13 ॥
सिंह आय विशेषकर राजा लोगों का कल्याण करती है जबकि ध्वजाय विप्रों
के लिए लाभकारी शुभ है और वृष आय वैश्यों के लिए उचित कही है।
उत्तरोत्तरमाख्याताश्चतुर्वर्णफलप्रदाः ।
ध्वजे चैवार्थलाभः स्याद् धूमे सन्ताप एव च ॥ 14 ॥
इस तरह ये आय चारों वर्णों के लिए उत्तरोत्तर कही गई है, जो उनके लिए
शुभ फलदात्री है। (अब इन के लाभ हानि भी देखें) ध्वज आय आने पर धन की
प्राप्ति होती है, अर्थ लाभ होता है परन्तु धूमाय आने पर सन्ताप का कारण बनता है।
सिंहे च विपुला भोगाः कलिः श्वाने सदा भवेत्।
धनधान्यं वृषे चैव स्त्रीदूषणं च रासभे ॥ 15 ॥
गजे भद्राणि पश्यन्ति ध्वाङ्क्षे च मरणं ध्रुवम्।
इसी तरह सिंह आय आने पर विपुल भोग उपलब्ध होते हैं परन्तु श्वान आय
आने पर सदा कलह होता रहता है। वृष आय आने पर धन-धान्य की प्राप्ति होती है
परन्तु खर आय आने पर स्त्रीवर्ग में दूषण फैलने की आशङ्का होती है। गज आय से
भला, सुन्दर होता है परन्तु ध्वांक्ष आय से निश्चित मरणान्तद कष्ट होता है।
अथ प्रशस्तऽऽयोच्यते -
प्रासादप्रतिमालिङ्गे जगतीपीठमण्डपे ॥ 16 ॥
वेदीकुण्डशुचिष्वेवं पताकाछत्रचामरे।
वापीकूपतडागानां कुण्डानां च जलाशये ॥ 17 ॥
ध्वजोच्छ्रयस्य संस्थाने ध्वजं तत्र निवेशयेत्।
(अब प्रशस्त आय कहाँ, कैसी हो उसके बारे में कहता हूँ) प्रासाद, प्रतिमा,
लिङ्ग, जगती, पीठ, मण्डप, वेदी-कुण्ड, शुचि, पताका, छत्र, चामर, वापी, कूप,
तड़ाग, कुण्ड, जलाशय और ध्वजा की ऊँचाई के स्थापन पर हमेशा ध्वज आय का
प्रयोग करना चाहिए।
आसने देवपीठेषु वस्त्रालङ्कारयोजने ॥ 18 ॥
केयूरमुकुटाद्ये च वेशयेच्च ध्वजं शुभम्।
इसी तरह आसन, देवपीठ, वस्त्रालङ्कार के नियोजन में, केयूर, मुकुट आदि
वेशों में भी ध्वज आय शुभ होती है।
336 अपराजितपृच्छा
अग्निकर्मसु सर्वेषु होमशालामहानसे ॥ १९ ॥
धूमोऽग्निकुण्डसंस्थाने होमकर्मगृहेऽपि वा ।
सभी प्रकार के अग्नि सम्बन्धी कार्यों में, यज्ञ-होमशाला, रसोईघर, अग्निकुण्ड
संस्थान में, होम करने के गृह में धूम आय देनी चाहिए।
आयुधानां समस्तानां नृपाणां भवनेषु च ॥ २० ॥
नृपासने सिंहद्वारे सिंहं तत्र निवेशयेत् ।
समस्त आयुधों के निर्माण, राजाओं के महलों में, राजा के सिंहासन तथा
राजप्रासाद के सिंहद्वार पर सिंह आय देनी चाहिए।
श्वानश्च म्लेच्छजातौ च गेहे श्वानोपजीविनाम् ॥ २१ ॥
तथा चाऽशुद्धसंस्थाने प्रशस्तः श्वानको मतः ।
म्लेच्छ जाति के लोगों के घरों में, श्वान पालने वाले लोगों के घरों में तथा सभी
अशुद्ध संस्थानों में श्वान आय ही प्रशस्त कही गई है।
वणिकर्मसु सर्वेषु भोज्यपात्रेषु मण्डपे ॥ २२ ॥
वृषस्तुरङ्गशालायां गोशालायां च गोकुले ।
सभी वणिक कर्मों (व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, शोरूम, दुकानादि के कलम,
फर्नीचर) में, खाने-पीने के पात्रों में, मण्डपों में, घुड़साल में, गोशाला में, गोकुलों
में वृष आय प्रशस्त कही गई है।
ततविततादिस्वरे वादित्रे विविधे तथा ॥ २३ ॥
कुलालरजकादीनां खरो गर्दभजीविनाम् ।
तत् वाद्य में, वितत् वाद्य में, अन्य तरह-तरह के वाद्यों (सुषिर, घनादि¹) में,
कुलाल-कुम्भकारों के यहाँ, रजकों (धोबी) और गधों द्वारा जीविका चलाने वालों
(ओड्रादि) के यहाँ खर आय प्रशस्त कही गई है।
गजश्च गजशालायां यानझम्पानयो रथे ॥ २४ ॥
शय्यायां शिविकायां च गजमुद्रा चतुष्कतः ।
अन्तःपुरे गृहे प्रोक्तः पिण्डांवास्यादिकोद्भवः ? ॥ २५ ॥
अन्योपस्करकादौ च मदनागारके गजः ।
इसी प्रकार गजशाला में, यान, झम्पान में, रथों में, शय्या में, शिबिका, तम्बू-
- वाद्यों का वर्णन अपराजित. में 237वें सूत्र में आया है। नाट्यशास्त्र, सङ्गीतरत्नाकर आदि ग्रन्थों में भी यह
वर्णन हुआ है। यथा— वाद्यतन्त्रीततं वाद्यं सुषिरं मतम् ॥ चर्मावनद्धवदनमवनद्धं तु वाद्यते घनो मूर्तिः
साभिघाताद् वाद्यते यत्र तद्धनम् ॥ (सङ्गीतरत्नाकर 6, 5-6)
सूत्र-६४ 337
डेरों (शिविर) में, गजमुद्रा की चौकी पर, अन्तःपुर में, पिण्ड आवास आदि गृहों
में, अन्य उपकरणों में भी, मदनागार अर्थात् रतिगृहों में, शीशमहल में गज आय
प्रशस्त होती है।
तथाऽरहट्टयन्त्रेषु जिनशालादिकेषु च ॥ २६ ॥
ध्वाङ्क्षः कल्याणकृच्चैव शिल्पकर्मोपजीविनाम् ।
अरहट्ट यन्त्रों अर्थात् जलोत्थान के लिए प्रयोक्तव्य रहटों में और जिनालयों में
ध्वांक्ष आय देना शिल्प कर्मोपजीवियों के लिए कल्याणकारक है।
स्वके स्वके वै स्थाने च सर्वे कल्याणकारकाः ॥ २७ ॥
मित्रस्नेहानुगाश्चैव ते सर्वे हितकामदाः ।
इस प्रकार जिस-जिस स्थान के लिए जो-जो आय कही गई है, उन आयों को
अपने-अपने स्थान पर देना कल्याणकारक है। जो मित्रों के स्नेह के अनुसार चलती
है, वे भी सभी हितकारी व कामनाओं को पूर्ण करने वाली होती है।
परस्परदेय आयानि —
वृषस्थाने गजं दद्यात् सिंहं वृषभहस्तिनोः ॥ २८ ॥
वृष के स्थान पर गज आय दी जा सकती है और सिंह के स्थान पर वृष आय
और गज आय दी जा सकती है।
ध्वजः सर्वेषुदातव्यो वृषो नाऽन्यत्रदीयते ।
गजाभिदृष्टिः सिंहः स्याद् वारुणाभिमुखो ध्वजः ॥ २९ ॥
वृषभः प्राच्याभिमुखो गजो वाम्यमुखस्तथा ।
सन्मुखा याम्योत्तराश्च अशस्ताः पृष्ठातोमुखाः ॥ ३० ॥
स्वके स्वके वै स्थाने च प्रशस्ताश्च त्रिदिक्षु च ।
ध्वज आय सभी स्थानों पर दी जा सकती है, परन्तु वृष आय को अन्यत्र कहीं
भी नहीं देना चाहिए। गज के सम्मुख सिंह आय हो, वारुणाभिमुख ध्वज आय हो,
वृषभ आय पूर्वाभिमुख हो, गज आय दक्षिणमुखी हो और ये सभी सम्मुख, दक्षिण-
उत्तर की ओर की तथा पृष्ठतोमुखी आए तो ठीक नहीं, अशस्त कही गई है। अपने-
अपने स्थान पर तो ये तीनों दिशाओं से प्रशस्त ही होती है।
अथाऽऽयस्वरूपाणि —
ध्वजः पुरुषरूपश्च सिंहः सिंहस्वरूपकः ॥ ३१ ॥
वृषो वृषभरूपाढ्यो गजो हस्तिस्वरूपकः ।
धूमो मार्जाररूपश्च श्वानः श्वानाधिरूपकः ॥ ३२ ॥
338 अपराजितपृच्छा
खरो गर्दभरूपाढ्यो ध्वाङ्क्षः काकस्वरूपकः।
(अब आयों के स्वरूप के विषय में कहा जा रहा है) ध्वज आय का पुरुष
रूप है। सिंह आय का सिंहरूप, वृष आय वृषभरूप है और गज आय हाथी का
रूप है। धूम आय मार्जार या बिलाव रूप और श्वान आय श्वान रूप है। खर आय
गर्दभ रूप है और ध्वांक्ष आय काकस्वरूपी है।
सर्वे च वृषभारूढाः ¹'पुरुषाकारमुदराः॥ ३३॥
तद्रूपकाश्च हस्ताभ्यां पादाभ्यां विहगानुगाः।
ग्रीवया सिंहरूपाश्च प्रबलाश्च महोत्कटाः॥ ३४॥
इन सभी आयों का आकार पुरुष जैसा, पेट भी वैसा ही होता है, वे वृषभारूढ़ हैं।
उनके हाथ भी पुरुष के हाथों जैसे है परन्तु उनके पाँवों का आकार पक्षियों के पंजों जैसा
होता है। उनकी ग्रीवा बड़ी प्रबल, महोत्कट और सिंह की गर्दन के आकार की होती है।
महागणेश्वराः प्रोक्ता अष्टदिक्क्षेत्रपालकाः।
वास्तुकर्मसु सर्वेषु आया दिक्पतयोऽष्ट हि॥ ३५॥
इन आयों को ही महागणेश्वर और अष्टदिक्-क्षेत्रपाल कहा गया है अस्तु, सभी
वास्तुकर्मों में ये आय आठों दिक्-क्षेत्रपाल ही है।
पूजिताः पूजयन्त्येव निघ्नन्ति चापदस्थिताः।²
साध्यक्षेत्र च त्रिपुटं प्रभिन्नं च नवांशकः॥ ३६॥
इनकी पूजा करते रहने से, ये अपने पद पर स्थित रहते हुए निर्विघ्न कार्य
करवाते हैं। इनके साध्य क्षेत्र त्रिपुट वाले है और इनके भाग नवांशक होते हैं।
अष्टौ तथाऽऽयस्थानानि मध्ये स्यात्कुलदेवता।
गृहस्याऽभिमुखाः शस्ताः मध्यमाश्च पराङ्मुखाः॥ ३७॥
इन आठों आय स्थानों के मध्य में कुल देवता का वास है। अस्तु, सभी आय
गृहों के सम्मुख शुभ होती है और विपरीत मुख वाली मध्यम होती है।
नगरभिमुखाः शस्ताः पुरबाह्ये तु देवताः।
देवानां प्रतिमा आया दिशापाला इति स्मृताः॥ ३८॥
- 'पुरुषाकारमुद्गला?' इति प्रकाशित पाठः। तुलनीय— मुखैः स्वनामसदृशा नराकारकरोदराः। हस्ताभ्यां
तद्रूपाढ्याः पादाभ्यां विहगाकृतिः॥ सर्वेषां सिंहवद्ग्रीवा प्रबलाश्च महोत्कटाः। (ज्ञानप्रकाशदीपार्णव 1,
35-36) - तुलनीय— महागणेश्वराः प्रोक्ताः क्षेत्रपाश्च दिशाष्टसु॥ वास्तुकर्मसु सर्वेषु आयादिक्पतयोऽष्ट हि। पूजिताः
पूजयन्त्येव निघ्नन्ति च पदे स्थिताः॥ (दीपार्णव 1, 36-37)
सूत्र-६४ 339
पुर के बाहर के जितने भी देव मन्दिरादि हों, वे नगराभिमुख ही शुभ होते हैं।
देव प्रतिमा की आय ही दिशापाल कही गई है, ऐसा जानें।
वसवः प्रतिदेवाश्च शिवयोगसमुद्भवाः।
यावत्तु शिवदेवत्वं यावच्चन्द्रार्कमेदिनी।
तावच्च वास्तुशास्त्रोक्ता आयाश्च समुदाहृताः॥ ३९॥
प्रत्येक देवता का आवास स्थान मन्दिरादि शिव के योग से ही समुद्भूत है।
अस्तु, इस जगत में जब तक सूर्य और चन्द्र रहेंगे और जब तक शिव का देवत्व
रहेगा तब तक ये वास्तुशास्त्रोक्त आय गण भी स्थिरता से विद्यमान रहेंगे।
साध्यक्षेत्रगुणाकारैरायाश्चैव प्रतिष्ठिताः।
यावत्तु क्षेत्रभक्तिश्च तावदायः प्रपालयेत् ॥ ४० ॥
आय जानने के सरल उपाय में है, साध्यक्षेत्र के गुणाकार ले आने के बाद आयों से
भाग देकर यवादि की सूक्ष्मता तक आयों को शुद्ध करके ग्रहण करना चाहिए।
खण्डितं स्फुटितं जीर्णं विशीर्णं स्फुटस्फोटितम्।
त्यक्त्वा च वास्तुदेवाद्यमायास्तेषु विवर्जिताः ॥ ४१ ॥
परन्तु, जो वास्तु खण्डित हो गया हो, फूट गया हो, फट गया हो, जीर्ण हो
चुका हो, विशीर्ण या विकृत हो गया हो, फूटकर बिखर गया हो और जिसको
वास्तु देवता भी छोड़कर चले गए हो- ऐसे भवनों, मन्दिरों या प्रासादों के
(पुनर्स्कार) प्रसङ्ग में आय निकालना स्पष्टतः वर्जित है।¹
अपदं तस्य संस्थानं मासान्ते सन्धिशोधितम्।
दिनाष्टके प्रलिप्ताङ्गं वर्जयन्ति च नित्यशः ॥ ४२ ॥
ऐसे जीर्ण संस्थानों को (वैसे ही या गिरे जानकर) मासान्त में सन्धियों को
शोधित करके जोड़कर ठीक करके आठवें दिन लीपते-पोतते रहें, प्रतिदिन नहीं।
भानूदये मण्डलं च पुष्पप्रकरसङ्कुलम्।
उदुम्बरोत्तरङ्गाढ्यं जलकुम्भादिपूजनम् ॥ ४३ ॥
ऐसे जीर्णोद्धार वाले भवन में सूर्योदय के समय प्रातःकाल ही मण्डल बनाकर
एक समूह में आकर तथा हाथों में पुष्पों के भार लिए हुए मन्दिर द्वार के उदुम्बर से
लेकर उत्तरङ्ग तक जल कुम्भादि से पूजन (प्रक्षालादि) करें।
- इस सम्बन्ध में विशेष जानकारी सूत्रधार गोविन्दकृत 'वास्तु उद्धारधोरणी' (सम्पादक : डॉ. श्रीकृष्ण
'जुगनू', चौखम्बा, बनारस, 2008 ई.) नामक ग्रन्थ का अवलोकन करना चाहिए।
340 अपराजितपृच्छा
गृह्णाति ¹हुताशनं स्वस्तिकैश्च महोत्सवैः ।
एवं वास्तावायाद्यं च श्रियं चिन्तति नित्यशः ॥ 44 ॥
इसी प्रकार अन्नादि से हवनादि करें जिससे अग्निदेव उस पूजा को ग्रहण करें।
स्वस्तिवाचन पूर्वक महोत्सव मनाते हुए उस जीर्ण भवन को पुनः निर्मित करें
जिससे सदा कल्याण बना रहे, श्रिय की प्राप्ति नित्य होती रहे।
अन्यदप्याह -
शिवस्य पुष्पैश्चरणौ सुपूजितौ वराङ्गनासेवनमल्पभोजनम्।
अनग्नशायित्वमपर्वमैथुनं चिरप्रनष्टां श्रियमानयन्ति ॥ 45 ॥
शिव के चरणों की पुष्पों से पूजा करें, वराङ्गना का सेवन नहीं करें,
अल्पभोजन करें, अनग्न रहकर ही सोएँ, अपर्व में ही स्त्रीसङ्ग करें, पर्वों² में करे तो
पहले के प्रनष्ट हुए जीर्ण भवनों में भी जीर्णोद्धार के बाद लक्ष्मी का आगमन हो
जाता है, श्री वृद्धि होती है और वे घर पुनः श्री सम्पन्न हो जाते हैं।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छाया-मायाधिकारो
नाम चतुःषष्टितमं सूत्रम् ॥ 64 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में
आयाधिकार नामक चौसठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 64 ॥
नक्षत्रराशिश्चन्द्रमैत्र्यनुक्रमो नाम पञ्चषष्टितमं सूत्रम् ॥ 65 ॥
विश्वकर्मोवाच-
आयानां यत्तुक्षेत्रं च गुणितव्यं प्रतिष्ठयेत्।
तत्क्षेत्रस्य फलं साध्यं गुणितं दैर्घ्यविस्तरैः ॥ 1 ॥
फले चाष्टगुणे तस्मिन् सप्तविंशतिभाजिते ।
यच्छेषं लभ्यते तत्र नक्षत्रं तद्गृहस्य च ॥ 2 ॥
विश्वकर्मा बोले कि जो भी क्षेत्र हो उनकी गुणित कर करके प्रतिष्ठा कर दें।
उस क्षेत्र का फल साधने के लिए उसके दैर्घ्य-लम्बाई और विस्तार-चौड़ाई को
- 'हुताशनं ?' इति प्रकाशि पाठः।
- अनग्नशयन व स्नान का धर्मशास्त्रों में निर्देश है— 'स्वस्त्वयं नैव नग्नेन' (महाभारत अनु. 104, 67); न
कदाचिद्रात्रौ नग्नः स्वपेत् (गौतमधर्मसूत्र 1, 9, 60); पर्वतिथियाँ क्रमशः 14, 8, 15, 30 व संक्रान्ति मानी गई
हैं— चतुर्दश्यष्टमी चैव ह्यमावस्या च पूर्णिमा। पर्वाण्येतानि राजेन्द्र रविसङ्क्रान्तिरेव च॥ तैलस्त्रीमांससम्भोगी
× × (विष्णुपुराण 3. 11. 119-120)
सूत्र-६५ ३४१
गुणा करें। इससे क्षेत्रफल (लम्बाई x चौड़ाई = क्षेत्रफल) निकल जाता है। उस
फल को 8 से गुणा करके जो राशि आए उसमें 27 का भाग दें और उस भागफल
में जो शेष बचे, उसे गृह की नक्षत्र संख्या समझनी चाहिए।¹
त्रिविध नक्षत्रगणमाह —
देवनृराक्षसानां च नक्षत्राणां त्रिधा गणः।
यस्य यस्याऽनुगा मैत्री वैरं स्याच्च परस्परम् ॥ ३॥
स्वगणे परमा प्रीतिर्मध्यमा दैवमानुषे।
मर्त्यराक्षसयोर्मृत्युः कलहो देवरक्षसोः ॥ ४ ॥
गणानुसार नक्षत्रों के तीन प्रकार के गण होते हैं— देवगण, मनुष्यगण और
राक्षसगण। जो नक्षत्र एक से गण वाले है, उनमें आपस में मैत्री होती है जबकि
अन्य में साथ होने पर वैर होता है। स्वगण के साथ तो परम प्रीति होती है, देव
और मानुष गण में मध्यम प्रीति होती है और मनुष्य और राक्षस गण में तो मृत्यु ही
समझें जबकि देव और राक्षस गण में सदा कलह रहता है।
नव देवगणाः प्रोक्ता मानुषा नव कीर्तिताः ।
नव रक्षोगणाश्चैव नक्षत्राणां त्रिधा गणः ॥ ५ ॥
(कुल 27 नक्षत्रों में) नौ देवगण, नौ राक्षसगण और नौ ही मनुष्यगण कहे गए
हैं, इस तरह नक्षत्रों के तीन प्रकार के गण होते हैं।
कृत्तिका मघा विशाखा आश्लेषा शततारका।
चित्रायुक्ता धनिष्ठा च ज्येष्ठा मूलं च राक्षसाः ॥ ६ ॥
मृगोऽश्विनी रेवती च हस्तः स्वातिः पुनर्वसू ।
पुष्यानुराधाश्रवणमेते देवगणः स्मृतः ॥ ७॥
तिस्रः पूर्वाश्च भरणी आर्द्रा वै रोहिणी तथा ।
उत्तरात्रयसंयुक्तः कीर्तितो मानुषो गणः ॥ ८ ॥²
इति नक्षत्राधिकारः ।
- उदाहरण — क्षेत्र की लम्बाई 6 गज 1 अङ्गुल; क्षेत्र की चौड़ाई 6 गज 1 अङ्गुल। इनके अङ्गुल
बनाए— 145 × 145 = 21025 अङ्गुल फल। इस फल को 8 से गुणा करके उसमें 27 का भाग देने
पर, गणितानुसार 21025 × 8 / 27 शेष रहे 17 जो अश्विनी नक्षत्र से गिनने पर 17वाँ अनुराधा नक्षत्र
आया जो कि उस गृह का नक्षत्र समझना चाहिए। - समराङ्गण. के श्लोक तुलनीय है— मृगाश्विरेवतीस्वात्यौ मैत्रं पुष्यपुनर्वसू ॥ हस्तः श्रवण इत्येष देवाख्यो नवको
गणः। विशाखा कृत्तिकाश्लेषा नैर्ऋतं वारुणं मघा ॥ चित्रा ज्येष्ठा धनिष्ठेति नवको राक्षसो गणः ॥ आर्द्राभरण्यौ
रोहिण्या तिस्रः पूर्वास्तथोत्तराः ॥ इति नक्षत्र नवकं विज्ञेयं मानुषे गणे। (समराङ्गण. 26, 45-48)
342 अपराजितपृच्छा
राक्षसगण के अन्तर्गत— कृत्तिका, मघा, विशाखा, आश्लेषा, शतभिषा, चित्रा,
धनिष्ठा, ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र परिगणित है। देवगणान्तर्गत— मृगशिरा, अश्विनी,
रेवती, हस्त, स्वाती, पुनर्वसु, पुष्य, अनुराधा व श्रवण ये नौ नक्षत्र होते हैं। इसी
प्रकार मनुष्यगण में— तीनों पूर्वा (पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, पूर्वाभाद्रपद), भरणी
आर्द्रा, रोहिणी और तीनों उत्तरा (उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद नक्षत्र
आते हैं।
अथ नक्षत्रान्राश्यानयनमाह —
अथ राशीः प्रवक्ष्यामि लब्ध्वा क्षेत्रफलेषु च।
तदनुक्रमयुक्तींश्च कथये तव साम्प्रतम्॥ ९॥
अब प्राप्त क्षेत्रफल के आधार पर राशि जानने की विधि कहता हूँ। उस विधि
को पूरे अनुक्रम के साथ बता रहा हूँ।
गृहक्षेत्रेषु यदृक्षं पञ्चत्रिंशशताहतम्।
षष्टिभिश्च हरेद्भागं भुक्तघट्यस्तु शेषतः॥ १०॥
ऋक्षभुक्तिक्रमयुक्ता स्वस्वराशिकसंज्ञिताः ?।
स्युर्मेषाद्या राशयश्च अश्विन्यादिक्रमेषु च॥ ११॥¹
गृहक्षेत्र का जो नक्षत्र आए, उसकी संख्या को 135 से गुणा करके जो फल आए,
उसको 60 से भाजित करे और जो शेष बचे वह क्रमयुक्त नक्षत्रभुक्ति होगी, उनकी
अपनी राशि बनेगी जो मेषादि राशि होगी जबकि अश्विन्यादि नक्षत्र क्रम होगा।
- पाठ शङ्कास्पद है, स्पष्ट न होने से इसे अन्य ग्रन्थों में देखना चाहिए। नक्षत्र से राशि जानने की विधि
'शिल्परत्नाकर' में इस प्रकार कही है— गृहक्षेत्रेषु यदृक्षं षष्टिघ्नं खशरोनितम्। पञ्चत्रिंशतशतैर्भक्ते शेषं वै
मेषकादयः ॥ (शिल्प. 1,125)
उदाहरण— माना कि क्षेत्र का नक्षत्राङ्क 5 (मृगशिरा है), उसको 60 से गुणा करने पर 60×5 = 300
आया। इस 300 से 50 घटाने पर 300-50 = 250 आया शेष। इस शेष को 135 से भाग देने पर
250/135 = 1 और शेष बचे 115 इस राशि को अङ्क 1 माने। उसे लब्धाङ्क 1 में जोड़े 1+1 = 2 तो
अङ्क 2 आया। यह 2 अङ्क या वृष राशि को बताता है। अस्तु, गृह की राशि वृष है।
यही बात ज्ञानप्रकाशदीपार्णव में इस प्रकार दी है— गृह क्षेत्रस्य यदृक्षं षष्टिभिर्गुणितं तथा। पञ्चत्रिंशच्छतं
भक्तं शेष मुक्तिरजादयः ॥ (दीपार्णव 1, 54)
उदाहरण—गृह के नक्षत्र (5) को 60 से गुणा करें (5 × 60 = 300) फिर उसे 135 से भाग दें जो
लब्धि आए उसे गत राशि और शेष रहे उसे चालू राशि जाननी चाहिए, 300 / 135 = 2, 30 / 135
अर्थात् लब्धि 2 से वृष राशि पूरी व शेष 30 से चालू राशि आई। मिथुन (शेष को 1 मानकर लब्ध 2 में
जोड़ें तो 2+1 = 3) मिथुन राशि। लगता है दीपार्णवकार ने 300 से 50 नहीं घटाया, इसी से यह अन्तर
आया है। यथा 300-50 = 250 / 135 गत राशि लब्धि 1 आती है शेष वृष हुई।
सूत्र-६५ ३४३
वास्तुचक्रादिचक्रेषु ग्रहवेधविशोधनैः।
अष्टाविंशतिरेवं च साभिजित् कृत्तिकादयः ॥ 12 ॥
वास्तु चक्रादि चक्रों को और ग्रह वेध के शोधन के लिए अभिजित् नक्षत्र के
साथ कृत्तिकादि अट्ठाईस नक्षत्र इस प्रकार लाने चाहिए।
वर्णानुसार प्रशस्तराशयः —
चातुर्वर्ण्यप्रशस्तांश्च राशीनथ वदाम्यहम्।
तत्र त्रयस्त्रयः प्रोक्ता विप्रशूद्रान्तमार्गतः ॥ 13 ॥
वृश्चिकः कर्कटो मीनो ब्राह्मणाः परिकीर्तिताः।
धनुर्मेषस्तथा सिंहो राजन्याश्च शुभाः स्मृताः ॥ 14 ॥
वृषः कन्या च मकर एते वैश्या उदाहृताः।
मिथुनं च तुला कुम्भस्त्रयः शूद्राः प्रकीर्तिताः ॥ 15 ॥
अब मैं चारों वर्णों के लिए जो-जो प्रशस्त राशियाँ हैं, उनके बारे में कहता हूँ।
ये तीन-तीन कही गई है जो कि विप्र से शूद्र वर्ण तक है। ब्राह्मण की राशियाँ
वृश्चिक, कर्क और मीन को कही है। क्षत्रिय या राजन्य की धनु, मेष तथा सिंह
राशि कही गई है। वैश्य के लिए वृष, मकर और कन्या राशि शुभ है और शूद्र वर्ण
के लिए मिथुन, तुला और कुम्भ राशियाँ शुभ कही गई हैं।
भवेद् द्वादशभिर्विप्रः क्षत्रियो नवभिस्तथा।
षड्राशिभ्यो भवेद् वैश्यस्त्रिभिः शूद्रः प्रशस्यते ॥ 16 ॥
इनमें 12 राशियाँ ब्राह्मण के लिए, 9 राशियाँ क्षत्रिय के लिए, 6 राशियाँ वैश्य
और 3 राशियाँ शूद्र के लिए प्रशस्त जाननी चाहिए।
चातुर्वर्णान्तरभेद एवमुक्तोऽपराजित।
प्रीत्यर्थं च पुनर्भेदं कथये तव साम्प्रतम् ॥ 17 ॥
हे अपराजित ! तुम्हें यह चातुर्वर्णान्तर भेद इस प्रकार से कहा गया। अब मैं
पुनः तुम्हारे स्नेह के कारण इनके भेद पूरी तरह कहता हूँ।
अथ षडष्टकादीनां —
षडष्टके ध्रुवं मृत्युः प्रीतिः स्यात् समसप्तमे।
अनिष्टं पञ्चनवमे पुष्टिर्दशचतुर्थके ॥ 18 ॥
इन राशियों में षडाष्टक (छठे-आठवें) होने पर निश्चय ही मरणान्तक पीड़ा
होती है परन्तु एक दूसरे के सम-सप्तम राशि होने पर प्रीति भी गाढ़ होती है।
344 अपराजितपृच्छा
राशिक नवपञ्चक होना अनिष्ट का सूचक है और चतुर्थ-दशम होना पुष्टिकारक
होता है।
तृतीयेकादशे मैत्री ¹द्वितीयद्वादशे रिपुः ।
राशयः षड्विधा एवमन्योन्यं पतिवेश्मनोः ॥ १९ ॥
राशि का तृतीय-एकादश होना मैत्रीकारक है परन्तु द्वितीय-द्वादश होना शत्रुता
का कारक है। इस तरह छह प्रकार से राशियों व गृहस्वामियों का अन्योन्य सम्बन्ध
बताया गया है।
चन्द्रस्थितिफलमाह —
गृहाग्रे च यदा चन्द्रो क्षयं वेश्म करोति हि।
राष्ट्रचौराग्निभयं घोरं चन्द्रे वै पृष्ठमागते ॥ २० ॥
धनधान्यक्षमारोग्यं कुरुते दक्षिणस्थिते ।
श्रीस्त्रीपुत्रा उत्तमाश्च चन्द्रे वै उत्तरे स्थिते ॥ २१ ॥
अब चन्द्र की स्थिति अनुसार फल देखते हैं। यदि गृह के आगे चन्द्र रहता है
तो गृह की क्षति करता है और चन्द्र पीछे रहता है तो रात्रि में चोरादि और अग्निभय
घोर होता है। चन्द्रमा यदि दायें हो तो धन-धान्य भूमि, आरोग्य प्रदाता होता है और
यदि चन्द्रमा उत्तर दिशा में स्थित हो तो स्त्री-पुत्रादि के लिए सर्वोत्तम होता है।
इत्यमनन्तर सप्तशलाक्यचक्रमाह —
सप्तोर्ध्वे स्थापयेद्रेखाः पुनर्भिन्नाश्च सप्तभिः ।
रेखाः प्रोक्तानि साभिजिन्नक्षत्राण्यष्टविंशतिः ॥ २२ ॥
कृत्तिकादीनीशान्यां शेषर्क्षाणि प्रदक्षिणे ।
हक्षेत्रोक्तमृक्षं च तत्र चन्द्रमुदीरयेत् ॥ २३ ॥
(सप्तशलाका चक्र के लिए) सात ऊर्ध्व रेखाएँ बनाएँ और सात ही इनको
काटती हुई आड़ी रेखाएँ बनाएँ। इस तरह अभिजित् सहित 28 नक्षत्रों की ये रेखाएँ
बनती हैं। कृत्तिकादि को ईशानकोण से आरम्भ करते हुए प्रदक्षिण क्रम में एक-
एक रेखाग्र पर नक्षत्रों के नाम लिखते जाएँ। इस क्षेत्र के इन नक्षत्रों पर चन्द्रमा की
स्थिति देखनी चाहिए।²
- मुद्रितपुस्तके 'तृतीयद्वादशे' इति पाठः। ज्योतिष की मान्यताओं में दो-बारह या बीया-बारहवाँ होना
वैरभाव का सूचक माना जाता है। - यह सप्तशलाका चक्र नक्षत्रों का वेध जानने हेतु बनाया गया है। आमने-सामने के नक्षत्रों का
सप्तशलाका वेध होता है। इनमें भी पाप ग्रह से वेध हो तो सम्पूर्ण नक्षत्र को त्यागना चाहिए और शुभ
सूत्र-६५ 345
ग्रहराश्यादि मैत्रीविचारः —
वेश्मपत्योर्भवेच्चैव गृहमैत्री परस्परम्।
द्वादशङ्गोक्ता राशयश्च नवैव च ग्रहास्तथा ॥ २४ ॥
गृह और गृहस्वामी की परस्पर ग्रह मैत्री हो, इन बारह राशियों और नवग्रहों
की भी ग्रह मैत्री होनी चाहिए।
तथैकराशिकाः केचित् केचिच्चैव द्विराशिकाः।
तदनुक्रमकं वक्ष्ये यदुक्तं परमेश्वरैः ॥ २५ ॥
कोई ग्रह एक राशि के स्वामी होते है और कोई ग्रह दो-दो राशियों के स्वामी
होते हैं, मैं यहाँ उनका अनुक्रम कहता हूँ, जैसा परमेश्वर ने पहले बताया था।
भौमस्य वृश्चिको मेषो भार्गवस्य तुला वृषौ।
बुधस्य कन्यामिथुने सोमस्यैवं तु कर्कटः ॥ २६ ॥
सिंहः सूर्यस्य क्षेत्रं स्याद् धनुर्मीनौ तथा गुरोः।
शनेश्च कुम्भमकरौ गृहक्षेत्राधिपा इति ॥ २७ ॥
मङ्गल की वृश्चिक और मेष राशि, शुक्र की तुला और वृष राशि, बुध की
कन्या व मिथुन राशि, चन्द्रमा की कर्क राशि, सूर्य की सिंह राशि, गुरु की धनु व
मीन राशि, शनि की कुम्भ और मकर राशि है— इसे ही गृह व गृहस्वामी के प्रसङ्ग
में भी समझें।
न पीडयन्त्यात्मक्षेत्रं स्नेहिनः क्षेत्रपालकाः।
रिपुगृहं पीडयन्ति भस्मीकुर्वन्ति विग्रहे ॥ २८ ॥
ये सभी क्षेत्रपाल राशिपति अपने स्वक्षेत्र को कभी हानि नहीं पहुँचाते और
अपने स्नेही मित्रों के क्षेत्र में होने पर भी हानि नहीं पहुँचाते परन्तु शत्रु के क्षेत्र में
आने पर ये ग्रह पीड़ाकारी हो जाते हैं और विग्रह कराते हैं।
स्यात्सूर्यमन्दयोर्वैरं तथा च कुजमन्दयोः।
गुरुशुक्रयोः स्याद्वैरं चन्द्रेण च बुधस्य तु ॥ २९ ॥
ग्रह से वेध हो तो केवल चरण वेध ही त्याज्य होता है। ऐसा नारदीय सूत्र का वचन है-
'पदभेवशुभैर्विद्ध अशुभैर्नैव कृत्स्नजः ।' मुहूर्त्ततत्त्वं में इसकी विधि आई है—सात रेखाएँ तिर्यक् और
सात ही रेखाएँ ऊर्ध्व रूप से खींचने पर सप्तशालाका चक्र बनता है। इसमें रुद्र अथवा ईशान की रेखा
पर कृत्तिका नक्षत्र लिखें और बाद में शेष नक्षत्रों का क्रमशः न्यास करें। यह न्यास अन्तिम सिरे तक
किया जाएगा और प्रत्येक रेखा के आमने-सामने नक्षत्र न्यास होगा। इन नक्षत्रों पर जो कोई ग्रह होगा
तो उसका सामने वाले नक्षत्र से वेध जानना चाहिए। यह वेध विवाहादि माङ्गलिक कार्यों के अतिरिक्त
अन्यत्र स्वीकार्य है। (मुहूर्त्त. 1, 5)
रवेरङ्गारकस्यैव मैत्री च गुरुचन्द्रयोः ।
एषां त्रयाणां वै मैत्री अन्येषां तु न विद्यते ॥ 30 ॥
सूर्य और शनि ग्रह में परस्पर वैर है। इसी तरह मङ्गल और शनि में भी वैर है।
गुरु व शुक्र का वैर है और चन्द्र व बुध का भी वैर है। सूर्य और मङ्गल की मैत्री है।
गुरु और चन्द्र की मैत्री है। इनकी तीनों में भी मैत्री है। अन्यों में यह मैत्री नहीं है।
स्पष्टार्थचक्र
| राशि | ग्रह | मित्रभाव | शत्रुभाव | समभाव |
|---|---|---|---|---|
| सिंह | सूर्य | चन्द्र गुरु मङ्गल | शुक्र शनि | बुध |
| कर्क | चन्द्र | सूर्य बुध | - | गुरु शुक्र मङ्गल शनि |
| मेष, वृश्चिक | मङ्गल | सूर्य चन्द्र गुरु | बुध | शुक्र शनि |
| मिथुन, कन्या | बुध | सूर्य शुक्र | चन्द्र | मङ्गल गुरु शनि |
| धन, मीन | गुरु | सूर्य चन्द्र मङ्गल | बुध शुक्र | शनि |
| वृषभ, तुला | शुक्र | बुध शनि | सूर्य मङ्गल | चन्द्र गुरु |
| मकर, कुम्भ | शनि | बुध शुक्र | सूर्य चन्द्र मङ्गल | गुरु |
| ग्रहाश्चत्वार एकत्र त्रय एकत्रसंस्थिताः । | ||||
| उभयोरन्तरं घोरं कालानल इवाऽपरः ॥ 31 ॥ | ||||
| यदि चार ग्रह एकस्थान पर एकत्र हो जाए या तीन ग्रह एक स्थान पर स्थित | ||||
| हो जाए अथवा इन दोनों के अन्तर की स्थितियाँ हो तो घोर विपत्ति (काल-अग्नि | ||||
| जैसी परिस्थितियाँ) होती है। | ||||
| इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां | ||||
| नक्षत्रराशिचन्द्रमैत्र्यनुक्रमो नाम पञ्चषष्टितमं सूत्रम् ॥ 65 ॥ | ||||
| इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में नक्षत्र- | ||||
| राशि-चन्द्र-मैत्री अनुक्रम नामक पैंसठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 65 ॥ | ||||
| व्ययांशकताराग्रहजीवमृत्युसर्वबलं षट्षष्टितमं सूत्रम् ॥ 66 ॥ | ||||
| अथ व्ययानयनं विश्वकर्मोवाच — | ||||
| नक्षत्रे वसुभि₈ भक्ते यच्छेषं व्ययमादिशेत् । | ||||
| अष्टौ व्ययास्तथाप्रोक्ता आयेष्वष्टसु योजिताः ॥ 1 ॥ | ||||
| विश्वकर्मा ने कहा कि नक्षत्र को 8 से भाजित करें, जो शेष रहे उसे 'व्यय' | ||||
| कहा जाता है। व्यय भी आठ कही गई है, जो आठ आयों के साथ योजित होती है। |
सूत्र-६६ 347
आयाश्च कथिताः पूर्वं व्ययानां लक्षणं शृणु।
एकैका यस्य संस्थाने व्ययाश्च त्रिविधाः स्मृताः ॥ २ ॥
आयों के बारे में तो पहले कहा जा चुका है। अब तुम इन व्यय के लक्षणों के बारे में
सुनो। एक-एक व्यय अपने संस्थान में तीन (पिशाच, राक्षस व यक्ष) प्रकार की होती है।
समो व्ययः पिशाचश्च राक्षसस्तु व्ययोऽधिकः।
व्ययो न्यूनो यक्षश्चैव धनधान्यकरः स्मृतः ॥ ३ ॥
पिशाचों का व्यय समान होता है; राक्षसों का व्यय अधिक होता है और यक्षों
का व्यय न्यून होता है। इसलिए इनका व्यय धन-धान्यकर कहलाता है।
अनायव्यये कर्तरि आयहीने व्यये तथा।
व्ययाधिक विनश्यन्ति अचिरेणै सर्वदा ॥ ४ ॥
अनाय से व्यय छुरी या कैंची (कर्तरीदोष) का काम करता है। आय हीन से
भी व्यय होता है और व्यय अधिक होने पर तो शीघ्र और सदा-सर्वदा के लिए
विनाश हो जाता है।
ध्वजादिष्वष्टस्वायेषु अष्टौ शान्तादिका व्ययाः।
प्रत्येकव्ययसंस्थाने आयो न्यूनेत्तरः स्मृतः ॥ ५ ॥
ध्वजादि आठों आयों में आठों ही शान्तिकादिक व्यय हैं। अस्तु, प्रत्येक व्यय
के संस्थानों में आय बहुत ही कम होती है।
व्ययनामानि -
शान्तः पौरः प्रद्योतश्च श्रियानन्दो मनोहरः।
श्रीवत्सो विभवश्चैव चिन्तात्मा च व्ययाः स्मृताः ॥ ६ ॥
- शान्त, 2. पौर, 3. प्रद्योत, 4. श्रियानन्द, 5. मनोहर, 6. श्रीवत्स, 7. विभव
और 8. चिन्तात्मा— ये आठ व्यय कही गई हैं।
प्रशस्ताप्रशस्त व्ययमाह —
आयस्थाने व्ययो योज्यो ह्यप्रशस्तो व्ययोऽधिकः।
व्ययो न्यूनस्तथा श्रेष्ठो धनधान्यकरः स्मृतः ॥ ७ ॥
आय स्थान में व्यय को लगाना अप्रशस्त अर्थात् ठीक नहीं है, क्योंकि व्यय
अधिक है। व्यय तो न्यून ही श्रेष्ठ होता है जो धन-धान्यकारक माना जाता है।
स्मृतो ध्वजे शुभः शान्तः नित्यं कल्याणकारकः।
भोज्यं पूजाफलं शान्तिर्नृत्यं गीतं सुरालये ॥ ८ ॥
348 अपराजितपृच्छा
ज्ञातव्य है कि ध्वज आय के साथ शान्त व्यय दिया जाना शुभ और नित्य
कल्याणकारक होता है तथा इससे भोज्य पदार्थ, पूजा के फल, शान्तिक नृत्य,
गीतादि मन्दिरों में बने रहते हैं।
धूमस्थाने यदा शान्तो हेमरत्नादिसम्भवः ।
अग्न्युपजीवकानां च धातुद्रव्यफलप्रदः ॥ 9 ॥
धूम आय के साथ यदि शान्त व्यय हो तो सोना-चाँदी रत्नादि सम्भव हो जाते
हैं जो अग्नि से उपजीविका चलाने वालों के लिए और धातु-द्रव्यों में फलप्रद है।
सिंहस्थाने च पौरश्चेत् सिंहवच्च पराक्रमैः ।
निहन्ति रिपुसैन्यानि ह्यात्मस्थाने महोत्सवाः ॥ 10 ॥
सिंह आय के स्थान पर पौर व्यय सिंह के समान ही पराक्रमी होता है, ऐसे
योग के फलस्वरूप रिपुओं के सैन्य दल स्वयं अपने स्थानों में मारे जाते हैं और
महोत्सव होते हैं।
प्रद्योतः श्वानसंस्थाने नित्यं भोगसुखावहः ।
शय्यासु वेश्मनि तथानेकभोगादिकामदः ॥ 11 ॥
श्वान आय के स्थान में प्रद्योत व्यय दिए जाने से नित्य भोग और सुख देने
वाला होता है। इससे गृह में विविध शय्या-सुख और ऐसे ही अनेक भोगादि से
मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
श्रियानन्दो वृषस्थाने नित्यं श्रीसुखशान्तिदम्।
व्यवहारोपस्करं च गुरुदेवार्चने रतिम् ॥ 12 ॥
वृष आय के स्थान में श्रियानन्द व्यय होने पर नित्य ही सुख और शान्ति बनी
रहती है। इससे व्यवहार में आने वाले सभी उपस्कर अर्थात् साधन सुलभ होते हैं
और गुरुदेव के पूजन-अर्चन में भी रुचि और प्रेम बना रहता है।
मनोहरः खरे युक्तः सर्वमनोरथप्रदः ।
समस्तभोगयुक्तानां तीर्थयात्राप्रकाशकः ॥ 13 ॥
खर आय के साथ मनोहर व्यय होने पर सब प्रकार के मनोरथ सिद्ध होते रहते
हैं। इससे समस्त भोगयुक्त साधन सुलभ होते हैं और तीर्थयात्रा का सौभाग्य भी
प्रकट होता है।
श्रीवत्सो गजसंस्थाने स्त्रीणां क्रीडात्मनः स्मृताः ।
शृङ्गारभोगयुक्तानां बलपुष्टिप्रदायकः ॥ 14 ॥
गज आय के संस्थान पर श्रीवत्स व्यय होने पर स्त्रियों में क्रीड़ा, आमोद-प्रमोद
सूत्र-६६ 349
का और शृङ्गार-भोग आदि के योग बनते है। अस्तु, ऐसा संयोग भी बल-पुष्टि
प्रदायक होता है।
विभवो ध्वाङ्क्षसंस्थाने शिल्पिनां हितकामदः।
सूत्रशास्त्रार्थसम्पन्ना भोगशृङ्गारनिश्चलाः ॥ 15 ॥
ध्वांक्ष आय के संस्थान में विभव व्यय होने पर शिल्पियों के हित और
कामनाओं की पूर्ति होती हैं। इससे वे सूत्रशास्त्रार्थ सम्पन्न होते है और उन्हें भोग-
शृङ्गार की उपलब्धि निश्चल बनी रहती है।
सर्वेषु शान्त आयेषु प्रशस्तः सर्वकामदः।
षट्सु सिंहादिषु शुभः पौरो धूमध्वजौ विना ॥ 16 ॥
सभी आयों में शान्त व्यय प्रशस्त और सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।
सिंहादि से छह आयों में पौर व्यय शुभ है, इनमें धूम, ध्वज ये दो आय नहीं होनी
चाहिए।
ध्वजे धूमे तथा सिंहे प्रद्योतादीन् विवर्जयेत्।
शेषाणां सुप्रशस्ताश्च तथा स्थानेषु पञ्चसु ॥ 17 ॥
ध्वज आय में धूम आय में तथा सिंह आय में प्रद्योतादि व्यय विवर्जित है, शेष
पाँच स्थानों में ये सुप्रशस्त हैं।
खरे वृषे श्रियानन्दो गजे ध्वाङ्क्षे च शोभनः।
मनोहरं त्यजेत्सोऽथ खरे ध्वाङ्क्षे गजे शुभः ॥ 18 ॥
खर आय और वृष आय स्थान पर श्रियानन्द व्यय, इसी तरह से गज आय
और ध्वांक्ष आय के साथ भी श्रियानन्द व्यय शोभन, लाभप्रद है परन्तु खर आय,
ध्वांक्ष आय और गज आय— तीनों में मनोहर व्यय को त्यागना ही शुभ है।
श्रीवत्सश्च गजे ध्वाङ्क्षे विभवो ध्वाङ्क्षके शुभः।
व्ययो न्यूनतरः श्रेष्ठो ह्यधिकश्चैव राक्षसः ॥ 19 ॥
गज आय, ध्वांक्ष आय के स्थान पर श्रीवत्स व्यय शुभ है। ध्वांक्ष आय के
स्थान पर विभव व्यय भी शुभ है। अस्तु, व्यय सदा न्यूनतम रहना ही श्रेष्ठ है।
अधिक व्यय तो राक्षसों का होता है।
चिन्तात्मकं व्ययं चापि आयेष्वष्टसु वर्जयेत्।
पिशाचकमायसमं न कुर्याच्छुभकर्मसु ॥ 20 ॥
इति व्ययाधिकारः।
इसी प्रकार आठों आयों के स्थान पर कभी भूल से भी चिन्तात्मक व्यय नहीं
350 अपराजितपृच्छा
आने देना चाहिए, इसे वर्जनीय कहा है। इसी तरह सम आय-व्यय भी पिशाचों की
होती है। अस्तु, इसे भी शुभकर्मों में त्यागना समुचित है।
अथांशाकाधिकारः —
शृणु वत्स यथा चांशो वास्तुवेदे त्रिधा स्मृतः।
एकैकक्रमयोगो वै शुभश्चाशुभ उच्यते ॥ 21 ॥
हे वत्स सुनो ! अंश भी वास्तु वेद में तीन प्रकार के होते है। ये सभी क्रम योग
से एक-एक शुभ और अशुभ कहलाते हैं।
यदुक्त मूलराशो च आयातर्थेषु फलं कृतम्।
तत्र राशौ व्यये मिश्रे गृहनामाक्षराणि च ॥ 22 ॥
गुणैर्भक्ते व्यये शेषं अंशकं त्रिविधं विदुः।
इन्द्रौ यमश्च राजा च त्रिभिर्नामभिरंशकाः ॥ 23 ॥¹
जैसे कहा गया है कि मूल राशियाँ आयों के लिए फल निकालने में काम में
ली जाती है, वहाँ राशियों के साथ व्ययों को मिलाने से गृहों के नामाक्षरों से गुणा
करके व्यय का भाग दें, जो शेष बचे उनके 'अंशक' तीन प्रकार से जाने। ये
क्रमशः 1. इन्द्र, 2. यम और 3. राजा— तीनों अंशों के ये तीन नाम हैं।
प्रासाद-प्रतिमा-लिङ्गे-जगतीपीठ-मण्डपे।
वेदी-कुण्डश्रुक्षु चैव इन्द्रश्चैव ध्वजादिषु ॥ 24 ॥
क्षेत्रपाल² नागेन्द्रे गणाध्यक्षे च भैरवे।
ग्रहमातृगणे देव्यामादित्ये च यमांशकः ॥ 25 ॥
प्रासाद, प्रतिमा, लिङ्ग, जगतीपीठ, मण्डप, वेदी-कुण्ड, श्रुवा के निर्माणादि में
इन्द्र व्यय ध्वजादि आय के साथ दें। क्षेत्रपाल, नागेन्द्र या गजराज, गणाध्यक्ष, भैरव,
ग्रह-मातृगण, देवियों, आदित्य में यमांशक व्यय देते हैं।
पुर-प्राकार-नगर-खेट-कूटे च कर्वटे।
हर्म्ये च राजवेश्मादौ शस्तो राजा तथा मतः ॥ 26 ॥
इसी प्रकार पुर, प्राकार-परकोटा, नगर, खेट-खेड़ा, कूट, कर्वट, हर्म्य,
राजवेश्म आदि में राजा अंशक देना प्रशस्त मत है।
- तुलनीय— व्ययं क्षेत्रफले क्षिप्त्वा गृहनामाक्षराणि च॥ भागं त्रिभिर्हरेत् तत्र यच्छेषु सोंऽशको भवेत्।
चतुरस्रो यथा मन्त्रो मुख्यो लग्ने नवांशकः॥ तथा गृहादिषु प्रोक्तं मुख्यत्वेनांशकत्रयम्। इन्द्रो यमश्च राजा च
त्रयो नामाभिरंशकाः॥ स्वनामतुल्यफलदा विज्ञातव्यास्त्रयोऽपि च। (समराङ्गण. 26, 37-39) - 'क्षेत्राद्विसंक्षा ?' इति प्रकाशित पाठः।
सूत्र-६६ 351
स्वर्गादिभोगयुक्तानां नृत्यगीतमहोत्सवे ।
प्रजावने च पाण्डित्ये इन्द्रांशश्चोत्तमो मतः ॥ 27 ॥
स्वर्गादि भोगों से युक्त प्रतीति देने वाले नृत्य-गीत महोत्सवों में, प्रजावनों,
पाण्डित्य दर्शक कार्यों के मंत्रों में भी इन्द्रांशक को ही प्रशस्त माना गया है।
विविधं च वणिक्कर्म मद्यमांसादिकं तथा ।
इत्युक्तं क्रमतश्श्रेत्यं प्रशस्तं च यमांशके ॥ 28 ॥
इसी प्रकार विविध प्रकार के वणिक् कर्मों में, मद्य-मांसादिकों में यमांशक को
ही प्रशस्त कहा गया है।
गजाश्वरथक्रीडायां यानजम्भानकादिके ।
स्वर्गादितुल्यभोगाश्च राजांशक उदाहृताः ॥ 29 ॥
गज, अश्व, रथ, क्रीड़ा में, यान, जम्भानादिक (पालकी आदि) एवं स्वर्ग के
समान भोगों में राजांशक को प्रशस्त कहा गया है।
त्र्यक्षराणि त्रिभेदाश्च त्रिदेवास्त्रिहुताशनाः ।
त्रयः कालास्त्रिसन्ध्याश्च रजः सत्वतमस्त्रयम् ॥ 30 ॥
तीन ही अक्षर (ओ, ऊ, म्), तीन भेद (स्वजातीय, स्वगत, विजातीय), तीन
देव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश), तीन अग्नि (गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि), तीन
काल (भूत, भविष्य, वर्तमान), तीन सन्धियाँ (स्वर, व्यञ्जन, विसर्ग या प्रातः
अपराह्न, सायंकाल) और (गुण भी) रज, सत्व और तम तीन हैं।
प्रमाणत्रयमेवं च ज्येष्ठमध्याधमैः क्रमात्।
त्र्यंशकं तु समानीय वास्तुवेदभवं ततः ॥ 31 ॥
इत्यंशकाधिकारः।
इस प्रकार के प्रमाणत्रय— ज्येष्ठ, मध्यम और अधम के क्रम से अंशकों को
भी लाकर वास्तुवेद बनता है।
अथ ताराधिकारः —
गणयेत्स्वामिनक्षत्राद्यावदृक्षं गृहस्य च ।
नवभिस्तु हरेद्भागं शेषास्ताराः प्रकीर्तिताः ॥ 32 ॥
स्वामी के नाम-नक्षत्र से लेकर गृह के नक्षत्र तक गणना करें और उसमें 9 का
भाग दें तो जो शेष रहे उसे 'तारा' कहा जाता है।
तारानामानि सफलं —
शान्ता मनोहरा क्रूरा विजया कलिका तथा।
352 अपराजितपृच्छा
पद्मिनी राक्षसी वीरा ह्यानन्दा नवमी स्मृता ॥ ३३ ॥
- शान्ता, 2. मनोहरा, 3. क्रूरा, 4. विजया, 5. कलिका, 6. पद्मिनी, 7.
राक्षसी, 8. वीरा और 9. आनन्दा— ये नौ ताराओं के नाम है।¹
शान्ता शान्तिकरी नित्यं मनोल्हादा मनोहरा ।
क्रूरा प्रवर्जिता प्राज्ञैश्चौराग्न्यादिभयङ्करी ॥ ३४ ॥
शान्ता तारा सदा शान्तिकारक होती है, मनोहरा तारा मन में आह्लाद उत्पन्न
करती है। क्रूरा तारा प्राज्ञों-विद्वानों के लिए वर्जित है और अग्नि आदि के भय
उत्पन्न करने वाली है।
विजया जयकल्याणा कलिका कलहप्रदा ।
पद्माया प्राप्यते सौख्यं महत्तीर्थफलं तथा ॥ ३५ ॥
विजया तारा विजय और कल्याण देने वाली तथा कलिका तारा कलह कराने
वाली है। पद्मिनी तारा से सुख मिलता है जैसे महान् तीर्थ का फल।
राक्षसी च तथा घोरा निशायां भयदायिनी ।
वीरा सौम्या भोगदा च ह्यानन्दानन्दकारिणी ॥ ३६ ॥
राक्षसी तारा भयङ्कर है और रात्रिकाल में भयोत्पादक है। वीरा तारा सौम्य है
और भोगों को देने वाली है तथा आनन्दा तारा आनन्द करने वाली है।
एवं नवविधाकारा निराकारा हि तारकाः ।
क्षीणश्चन्द्रो यदा वारे भवेत्तारा बलप्रदा ॥ ३७ ॥
इस प्रकार ये निराकार तारका नव प्रकार के आकार वाली है। जब चन्द्रमा
क्षीण होता है, तब उस वार के दिन तारा बलवान होती है।² - ताराओं के नामादि को लेकर शास्त्रों में दो रूप मिलते हैं। समराङ्गण. में कहा गया है—गणयेत्
स्वामिनक्षत्राद् यावत् स्याद् भवनस्य भम्॥ नवभिर्भाजिते तस्मिन् शेषं तारा प्रकीर्तिता।
जन्मसम्पद्विपत्क्षेमपापसाधकनैधनीः॥ मैत्रीपरममैत्र्यौ च प्राहुः संज्ञाः समाः फले।
त्रिसप्तपञ्चमीर्भर्तुर्गृहतारा विवर्जयेत्॥ आद्याद्वितीयाष्टम्यस्तु ताराः स्युरिह मध्यमाः। तथा ऋक्षेऽपि चानिष्टे
चन्द्रेऽष्टमगतेऽपि च॥ नयते दुरितं तारा चतुःषण्णवती नृणाम्। (समराङ्गण. 26, 40-44) इस प्रकार
यहाँ 1. जन्म, 2. सम्पद, 3. विपत्, 4. क्षेम, 5. प्रत्यरि, 6. साधक, 7. बध, 8. मित्र व 9. परममित्र
नाम से ताराओं की गणना हुई है। यही मत नारदसंहिताकार का है किन्तु जन्म सहित तीसरी, पाँचवीं व
सातवीं तारा को अशुभद बताया है— जन्मसम्पद्विपत्क्षेम प्रत्यरिस्साधको वधः। मित्रं परममित्रं च
जन्मभाच्च पुनः पुनः॥ जन्मत्रिप्रञ्चसप्ताख्या तारा नेष्टफलप्रदाः। (नारद. 13, 3-4) - कृष्ण पक्ष में चन्द्रबल की अपेक्षा ताराबल की प्रधानता होती है। क्षीण चन्द्रमा होने पर तारा वैसे ही
बलवान होती है जिस प्रकार पति के परदेश में होने पर पत्नी ही गार्हस्थ्य का सारा दायित्व निभाती है—
न खलु बहुलपक्षे शीतरश्मेः प्रभावः कथितमिह हि तारा वीर्यमार्यैः प्रधानम्। अतिविकल शरीरे प्रेयसि
सूत्र-६६ 353
क्रूरा च कलिका चैव राक्षसी तु तृतीयका।
क्रूराद्या इति वै तिस्रो वर्जयेच्छुभकर्मसु॥ ३८॥
शान्ता मनोहरा चैव विजया पद्मिनी तथा।
वीरा नन्देति षट्तारा नित्यं कल्याणकारिकाः॥ ३९॥
इति ताराधिकाराः।
उक्त ताराओं में पहली क्रूरा, दूसरी कलिका और तीसरी राक्षसी ताराओं को
'क्रूराद्यातिस्र' कहते हैं। इन्हें शुभ कर्मों में कभी नहीं लेना चाहिए, ये वर्जित हैं
परन्तु शान्ता, मनोहरा, विजया, पद्मिनी, वीरा, आनन्दा— ये छह ताराएँ नित्य ही
कल्याण करने वाली होती हैं।
अथाधिनायकमाह —
कर₂ राशि₁₂हतोत्था ये भागैर्हष्टं₈ तथोऽष्टभिः₈।
आधिपत्यं भवेच्छेषं नाम्ना च सदृशं फलम्॥ ४०॥
(अब अधिनायक के विषय में कहा जा रहा है) आधिपत्य ज्ञात करने के लिए
दो और बारह को गुणा कर (2 × 12 = 24), इनका चौंसठ (8 × 8 = 64) में
भाग दें तो जो शेष रहेगा, वह 'अधिपति' कहलाता है। जिस अधिपति का जो नाम
है, तद्नुसार ही उसका फल जानना चाहिए।
अधिपतिनामानि —
विकृत¹ कनकश्चैव धूम्रको विजयः स्वरः।
बिडालविजयौचैव दन्तः कान्तस्तथा मृगः॥ ४१॥
अधिपतियों के नाम हैं— विकृत, कनक, धूम्रक, विजय, स्वर, विडाल,
विजय, दन्त, कान्त और मृग।²
प्रोषिते वा प्रभवति खलु कर्तुं सर्वकार्याणि योषा॥ (ज्योतिषरत्नमाला 11, 5) लल्लाचार्य का भी यही मत
है— न कृष्णपक्षे शशिनः प्रभावो ताराबलं तत्र शुभं प्रदिष्टम्। देशान्तरस्थे विकले च पत्यौ सर्वाणि
कार्याणि करोति नारी॥ अत्रापि तारापतिवीर्यमेव वदन्ति पक्षद्वितयेऽपि केचित्। केचिच्च तासां
बलयुक्तमिन्दोर्बलं सदा देयमिति ब्रुवन्ति॥ (ज्योतिर्निबन्ध में उद्धृत पृष्ठ 49, श्लोक 8-9)
- 'वित्तत्य ?' इति प्रकाशित पाठः।
- यह पाठ त्रुटित जान पड़ता है। ज्ञानप्रकाशदीपार्णव में इसका पाठ मिलता है जो समझने योग्य है।
दीपार्णवकार का कहना है कि बुद्धिमान शिल्पी को गृह के उदय क्षेत्रफल के अङ्क के साथ गुणा करते
जो अङ्क आए उसे 8 से भाग करते जो शेष रहे, उसे अधिपति जाने और जो अधिपति सम हो वह शुभ
है। इनके नाम हैं—1. विकृत, 2. कर्णक, 3. धूम्रद, 4. वितथस्वर, 5. विडाल, 6. दुन्दुभि, 7. दान्त, 8.
कान्त—गेहस्योदयकं क्षेत्रफलने गुणयेद् बुधः। अष्टभिस्तु हरेच्छेषं शुभः सोऽधिपतिः समः॥ विकृतः