अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
216 अपराजितपृच्छा
इस प्रकार 108 वर्ण इन नक्षत्रों के चरण के कहे जाते हैं जिससे सारा
अवकहोडा चक्र पूरा क्रमवार बनता है।
अथ राशिचरणविचारमाह —
अश्विनीभरणीधिष्ण्ये कृत्तिकाप्रथमांघ्रिकम्।
मेषः स्यात् कृत्तिकापादत्रितयं रोहिणी तथा ॥ 20 ॥
वृषभो मृगपूर्वार्धं तदर्धं च तथार्द्रभम्।
पादत्रयं पुनर्वस्वोः स राशिर्मिथुनाभिधः ॥ 21 ॥
तदन्त्योऽघ्रिस्तथा पुष्यो ह्याश्लेषा कर्कटाभिधः।
मघापूर्वोत्तराद्योऽघ्रिः सिंहस्तच्चरणत्रयम् ॥ 22 ॥
(उक्त चक्र के बाद नक्षत्रानुसार राशिज्ञान कहा जा रहा है) अश्विनी, भरणी
और कृत्तिका के एक पाद या चरण पर्यन्त मेष राशि गिनी जाती है। कृत्तिका के
तीन चरण, रोहिणी और मृगशिरा के दो चरण वृष राशि; मृगशिरा के दो चरण,
आर्द्रा और पुनर्वसु के तीन चरण मिथुन राशि; पुनर्वसु का अन्तिम चरण, पुष्य और
आश्लेषा से कर्क राशि; मघा, पूर्वाफाल्गुनी और उत्तराफाल्गुनी के एक चरण से सिंह
राशि होती है।
हस्तचित्राभपूर्वार्धं कन्या चित्रोत्तरं दलम्।
स्वातिभं च विशाखायाश्चरणत्रितयं तुला ॥ 23 ॥
तदन्त्योघ्र्यनुराधाख्ये ज्येष्ठाभं वृश्चिकः स्मृतः।
मूलं पूर्वोत्तराषाढाप्रागङ्घ्रिः कथितो धनुः ॥ 24 ॥
उत्तराफाल्गुनी के तीन पाद, हस्त तथा चित्रा के दो चरण कन्या; चित्रा के
अन्तिम दो चरण, स्वाती, विशाखा के तीन चरणों से तुला; विशाखा का अन्तिम
चरण, अनुराधा और ज्येष्ठा से वृश्चिक; मूल, पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़ का एक चरण
धनु राशि होती है।
उत्तराङ्घ्रित्रयं कर्णे धनिष्ठाप्रथमार्धकम्।
मकराख्यो धनिष्ठाद्विदलं च शततारका ॥ 25 ॥
पूर्वापादत्रयं कुम्भस्तदन्यश्चरणस्तथा।
ऊभाभं रेवती चैव मीनराशिः प्रकीर्तितः ॥ 26 ॥
इसी प्रकार उत्तराषाढ़ के तीन चरण शेष, श्रवण और धनिष्ठा के दो चरण से मकर
राशि; धनिष्ठा के अन्तिम दो चरण, शतभिषा और पूर्वाभाद्रपद के तीन चरण कुम्भ
और पूर्वाभाद्रपद का अन्तिम चरण, उत्तराभाद्रपद और रेवती से मीन राशि होती है।
सूत्र-४५ 217
राशिनामानि —
मेषो वृषोऽथ मिथुनं कर्कटः सिंहकन्यके ।
तुलाथ वृश्चिको धन्वी मकरः कुम्भमीनकौ ॥ २७ ॥
द्वादशैव राशयः स्युर्मेषाद्याः सम्प्रकीर्तिताः ॥
इस प्रकार मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर,
कुम्भ और मीन— ये बारह राशियाँ मेषादि क्रम से कही गई हैं।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्त श्रीभुवनदेवाचार्योपराजितपृच्छायां
अवकहोटाचक्रज्योतिषाधिकारो नाम चतुश्चत्वारिंशं सूत्रम् ॥ ४४ ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में
अवकहोटाचक्रज्योतिष अधिकार नामक चवालीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ४४ ॥
अवकहोटाचक्रज्योतिषं ज्योतिषफलं पञ्चचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ ४५ ॥
विश्वकर्मोवाच —
दस्रोयमोऽनलो धाता चन्द्रः शिवस्तथादितिः ।
वाक्पतिर्नागपितरौ भगार्यमदिवाकराः ॥ १ ॥
त्वष्टा च वायुरिन्द्राग्नी मित्र इन्द्रश्च नैर्ऋतिः ।
जलं च विश्वेदेवाश्च विधिर्विष्णुस्तथा वसुः ॥ २ ॥
वरुणाऽजैकपाच्चैव तथाहिर्बुध्न्यपूषणौ ।
इत्यश्विन्यादिनक्षत्रदेवनामानि सन्ति हि ॥ ३ ॥
(इस प्रकरण में अश्विन्यादि क्रम से नक्षत्रों के स्वामी के नाम कहे जा रहे हैं) 1.
अश्विनी नक्षत्र का स्वामी दस्र या अश्विनीकुमार, 2. भरणी का यम, 3. कृत्तिका का
अग्नि, 4. रोहिणी का धाता, 5. मृगशिरा का चन्द्र, 6. आर्द्रा का शिव, 7. पुनर्वसु का
अदिति (देवमाता), 8. पुष्य का वाक्पति (बृहस्पति), 9. आश्लेषा का नाग, 10. मघा
का पितर, 11. पूर्वाफाल्गुनी का भग, 12. उत्तराफाल्गुनी का अर्यमा, 13. हस्त का
दिवाकर, 14. चित्रा का त्वष्टा, 15. स्वाति का वायु, 16. विशाखा का इन्द्राग्नि, 17.
अनुराधा का मित्र, 18. ज्येष्ठा का इन्द्र, 19. मूल का नैर्ऋति (राक्षस), 20. पूर्वाषाढ़ा
का जल, 21. उत्तराषाढ़ा का विश्वेदेव, 22. अभिजित् का विधि, 23. श्रवण का विष्णु,
24. धनिष्ठा का वसु, 25. शतभिषा का वरुण, 26. पूर्वाभाद्रपद का अजैकपाद, 27.
उत्तराभाद्रपद का अहिर्बुध्न्य तथा 28. रेवती नक्षत्र का स्वामी पूषा है।¹
- दैवज्ञवल्लभ में श्रीपति भट्टाचार्य ने यही सूची दी है— भेशाः क्रमशोश्वनौयमाग्निः केन्दुशर्वोदिति
218 अपराजितपृच्छा
अथ योनिवैरमाह —
योनिवैरं च कथये गणानां च समुद्भवम्।
अश्वोगजश्छागसर्पौ सर्पश्वानबिडालकाः।
मेषो बिडालकश्चैव मूषको मूषकश्च गौः॥ ४॥
महिषी च ततो व्याघ्रो महिषो व्याघ्रकः क्रमात्।
मृगो मृगस्तथा श्वा च कपिर्नकुल एव च॥ ५॥
नकुलो वानरः सिंहस्तुरगो मृगराट् च गौः।
इभ एताः क्रमेणैव ह्यश्विन्यादिभयोनयः॥ ६॥
अब मैं गणों से बनने वाले योनि वैर के विषय में कहता हूँ। अश्व, गज, छाग,
सर्प मे; सर्प, श्वान, बिडाल में; मेष और बिडाल में; मूषक, मूषक में और गौ में;
महिषी और व्याघ्र में; महिष और व्याघ्र में भी; मृग, मृग में और श्वान में; कपि
और नकुल में; नकुल और वानर में; सिंह और तुरग में; मृगराज और गौ में, हाथी
में— ये सब क्रम से अश्विनी आदि में भयोत्पादक कहे गए हैं।
स्थिरचरद्विस्वभावमृदूग्रातुरतेजसः।
अष्टाविंशतिकं₂₈ यावद् भचतुष्कनिबन्धनम्॥ ७॥
स्थिर, चर, द्विस्वभाव, मृदु, उग्र, आतुर, तेजस— सभी अट्ठाईस नक्षत्र इन चार
कोटियों में परिबद्ध होते हैं।
गोव्याघ्रं गजसिंहं च महिषाश्वं श्वहारिणम्।
बभ्रुसर्पं कीशमेषं बिडालोन्दुरकं तथा॥ ८॥
चतुर्दश भद्विकानां योनिवैरं च समधा।
जीवकाद्द्जेयाः। परनोथभगोर्यमाभिधानो मार्तण्डोमुखर्द्धकिः समीरः॥ पुरहूतहुताशनौ च मित्रं
शक्रोनिरृतिरथो जलं च विश्वेक। हरिवसवोम्बुपाजपादोऽहिर्बुध्न्यः कथितस्त तस्य पूषाः॥ (दैवज्ञवल्लभ,
बड़ौदा ओरियंटल इंस्टीट्यूट में विद्यमान मातृका, 5, 1-2)
विष्णुधर्मोत्तरपुराण में कृतिका से नक्षत्र स्वामी की गणना की गई है। अश्विन्यादि के क्रम से गणना की
देन वराहमिहिर की है। पुराणकार की मान्यता है— अतः परं प्रवक्ष्यामि तव नक्षत्रदैवताः। कृत्तिका
चाग्निदैवत्या रोहिण्यर्केश्वरा स्मृता॥ इन्द्रर्क्षः सौम्यदैवत्यो रौद्री आर्द्रा तथा स्मृता। पुनर्वसुस्तथादित्यो
पुष्यश्च गुरुदेवतः॥ आश्लेषा सर्पदैवत्या मघा च पितृदेवता। भाग्याश्च पूर्वफाल्गुन्य आर्यमाश्च तथोत्तराः॥
सावित्रश्च तथा हस्तश्चित्रा त्वाष्ट्री प्रकीर्तिता। स्वातिक्ष वायुदैवत्यो मूलञ्च तदुदाहृतम्। आप्यस्त्वाषाढ पूर्वाः
स्युश्चोत्तरा वैश्वदैवताः॥ ब्राह्मी चैवाभिजित्प्रोक्ता श्रवणो वैष्णवः स्मृतः। वासवं च तथा ऋक्षं धनिष्ठा
प्रोच्यते बुधैः॥ तथा शतभिषक्प्रोक्त नक्षत्रे वारुणं नृप। आजं भद्रापदापूर्वा आहिर्बुध्न्यं तथोत्तरा॥ पौष्णं च
रेवती चार्थमश्विनी चाश्विदैवतम्। भरण्याश्च तथा याम्य प्रोक्तास्ते ऋक्षदैवताः॥ (विष्णुधर्मोत्तर. 1, 84,
13-21, तुलनीय — बृहत्संहिता 98, 4-5)
सूत्र-४५ 219
गौ-व्याघ्र में, गज-सिंह में, महिष-अश्व में, श्वान-हरिण में, नकुल-सर्प में,
वानर-मेष में, बिडाल और उन्दर में - इन चौदहों में योनि वैर सात प्रकार का
कहा गया है।
अथाष्टकवर्गमाह -
अष्टवर्ग तथा चैषां कथयाम्यपराजित ॥ ९॥
अकचटतपयशा ( इत्येते ) अष्टवर्णाः ।
आऽऽद्याः शान्ता अष्टवर्णा दैवज्ञवचनैः शुभाः।
अब हे अपराजित ! मैं अष्टवर्ग के बारे में कहता हूँ। अकचट तपयश - ये
अष्टवर्ण कहे जाते हैं। आ से आरम्भ होने वाले अष्टवर्णों को ज्योतिषियों के वचनों
में शान्त और शुभ कहा गया है।
दम्पती स्वामिभृत्यै च ग्रहग्रामाधिपे गणाः ॥ १०॥
साध्यवर्गे दशगुणे परवर्गेण मिश्रिते ।
वसुभिश्च हरेद्भागं यच्छेषं लभ्यमादिशेत् ॥ ११॥
इनसे पति-पत्नी, स्वामी-सेवक, ग्रह और ग्रामाधिपतियों का गणन करते हैं।
साध्य वर्ग में दश से गुणित करते हैं, परवर्ग में मिश्रित करके, आठ से भाग दें और
जो लब्ध हो, उसे ग्रहण करें।
एवं वर्ग पुनः शोध्यमनेनानुक्रमेण च।
शेषोद्धरितमध्यपात्य वृद्धयर्थे दैवदैत्यकः ? ॥ १२॥
तस्य लभ्यं च योऽग्रतः पृष्ठोऽसौ ददते ध्रुवम् ।
लाभालाभौ चैव येषां कथये त्वपराजित ॥ १३ ॥
इस प्रकार वर्ग को पुनः शोधन करके इसी प्रकार के अनुक्रम से शेष को
उद्धरित करके मध्यमान करके बुद्धि के लिए दैव-दैत्य (?) उसके लब्ध को आगे
रखें और पीछे को ध्रुव स्थिर देवें। इससे जो लाभ-हानि होती है, उसको हे
अपराजित ! मैं कहता हूँ।
अईऊए तार्क्ष्यः पूर्वे आग्नेय्यां च कखादिकाः ।
दक्षिणे च छावर्गाश्च नैर्ऋते च टठादिकाः ॥ १४॥
पश्चिमे तथादिवर्गा वायव्ये च पफादिकाः ।
उत्तरे च यरलवा ईशाने शषासास्तथा ॥ १५॥
इति वर्गाष्टकम् ।
अ ई ऊ ए नक्षत्रों को पूर्वदिशा में, क ख आदि को आग्नेय दिशा में, छ वर्ग
220 अपराजितपृच्छा
को दक्षिण दिशा में, टठादि को नैर्ऋत्य दिशा में, त थ आदि वर्ग को पश्चिम दिशा
में, प फ आदि को वायव्य दिशा में, य र ल व को उत्तर दिशा में और श ष स
आदि को ईशान कोण में (न्यसित करें)।
अथोष्टोत्तरीदशामाह —
रविचन्द्राङ्गारबुधशनिवाक्यपतिराहवः ।
तथा शुक्रः समाख्याताः प्राच्यादिषु प्रदक्षिणम् ॥ 16 ॥
षट्₆ तथा तिथयश्चैव₁₅ वसवश्च₈ समदश₁₇ ।
दश₁₀ चैकोनविंशति₁₉र्द्वादश₁₂ त्वेकविंशतिः₂₁ ॥ 17 ॥
सूर्यादेः क्रमयोगेन प्राच्यादिषु प्रदक्षिणम् ।
भुक्तिमार्गदशाश्चैव वर्षाणां सङ्ख्यया तथा ॥ 18 ॥
(अब अष्टोत्तरीदशा का वर्णन किया जा रहा है) सूर्य, चन्द्र, मङ्गल, बुध,
शनि, बृहस्पति, राहु तथा शुक्र— ये सब प्राची अर्थात् पूर्व दिशा से प्रदक्षिणतः रहते
हैं। छह, पन्द्रह, आठ, सत्रह, दस, उन्नीस, बारह तथा इक्कीस सूर्य के आदि क्रम से
पूर्व दिशा की ओर से प्रदक्षिणतः रहते हैं। इस प्रकार महादशाओं के भोग मार्ग के
वर्ष की संख्या होती है।¹
यस्य नामाक्षरं प्रोक्तं विभक्ती ? चर्क्षभुक्तयां ।
तेषामनुक्रमेणैव कथयेऽन्तर्दशाफलम् ॥ 19 ॥
- यहाँ ग्रन्थकार ने अष्टोत्तरी महादशा का वर्णन किया है। ज्योतिषशास्त्र में कहा गया है कि गुर्जर-मरु,
कच्छ, सौराष्ट्र, पाञ्चाल, सिन्धु पर्वतादि क्षेत्र में अष्टोत्तरी दशा से जातक का विचार किया जाना
चाहिए— गूर्जरे कच्छसौराष्ट्रे पाञ्चाले सिन्धुपर्वते। एतेष्वष्टोत्तरी श्रेष्ठाऽन्यत्र विंशोत्तरीयता ॥ बृहत्पाराशर
होराशास्त्र में महर्षि पराशर ने मैत्रेयी के प्रश्न पर विंशोत्तरी की श्रेष्ठता के साथ ही अष्टोत्तरी की दशा को
भी स्वीकार्य किया है। 'मानसागरी' में कहा गया है कि शुक्ल पक्ष में जन्म हो तो अष्टोत्तरी तथा
कृष्णपक्ष में जन्म हो तो विंशोत्तरी दशा से विचार करना चाहिए। साथ ही मानसागरीकार ने अष्टोत्तरी
दशा का विवरण भी दिया है। (मानसागरी : मानसागरकृत व्या. विजयकान्त मिश्र शास्त्री, वाराणसी
1999, 5, 14-15 व 23)
सूत्रधार मण्डन के अनुसार इस दशा में क्रमानुसार सूर्य, चन्द्र, मङ्गल, बुध, शनि, गुरु, राहु व शुक्र—
इन आठ ग्रहों को दशाधिप बताया है, इसमें केतु की दशा नहीं होती। (राजवल्लभ. 12, 35)
इसकी विधि मानसागरी में आई है। पहले दशा को दशा से गुणा करें और 9 का भाग दें। इस प्रकार
मास को निकालकर शेष को 30 से गुणाकर 9 का भाग दें, जिससे दिन निकलता है और पुनः शेष को
60 से गुणाकर यदि 9 का भाग दें तो घटी निकलती है। इस प्रकार दशा में अन्तर्दशा को जाना जा
सकता है— नवभिर्वर्षैर्मासः शेषमर्कगुणं कुरु। मासान् क्षिपत्वा ततांस्त्रंशद्गुणं तत्र दिन क्षिपेत्॥
अष्टोत्तरशतेनाप्तं 108 दिनं तद्द्द्युवका बुधाः। तच्च षष्टिगुणं कृत्वा तन्मध्ये घटिकाः क्षिपेत्॥
अष्टोत्तरशतैर्भागं 108 लब्धाङ्के घटिकाः वदेत्। शेषं षष्टि 60 गुणं कृत्वा स्वहरैर्भागमाहरेत॥ लब्धाङ्के च
एवं तेषां शेषां लब्धि ...
सूत्र-४५ 221
एकैकदशयुक्तांश्च प्रवर्तन्ते चाष्टौ दशाः ।
भुक्तमानभुक्तायुक्ता ? दशाश्चैव दशोद्भवाः ? ॥ २० ॥
वरिष्यन्ते दि( द )शासाध्य दिनान्ते चारुवर्द्धनम ? ।
अष्टद( त्रिं )श कृत्वानं भक्ते ग्रहाष्टौ भुक्त व दशा ? ॥ २१ ॥
जातक का जो नामाक्षर हो, उसके नक्षत्रों की भुक्ति देखकर, उसी के अनुक्रम
से अन्तर्दशा और उसका फल कहा जाना चाहिए।¹ एक-एक दशा में आठों ही
अन्तर्दशाएँ चलती हैं और भुक्ता व भुक्तमान दशा दस प्रकार की होती है ।
दशासाध्या का वरण दिनान्त में ठीक वर्धन युक्त होता है(?)। अष्ट व त्रिंश का
भाग देने से आठों भुक्त दशा निकल आती है।
अथ सूर्यदशाफलमाह —
सक्लेशाः कार्यहीनाश्च गृहसन्तापवर्द्धनम् ।
शत्रुक्षयस्तेजोवृद्धिभास्करस्य दशाफलम् ॥ २२ ॥
जातक के जब सूर्य की महादशा चलती हो तब क्लेश, कार्यहीनता, गृह
सन्तापवर्द्धन लेकिन शत्रुओं का क्षय और तेजस्विता में वृद्धि होती है ।
चन्द्रदशाफलमाह —
शत्रुश्च जायते मित्रममृतवाग् जनप्रियः ।
लभते चोत्सवं नित्यं शैत्यं चन्द्रदशाफलम् ॥ २३ ॥
जातक के जब चन्द्र की महादशा चलती है तब शत्रु भी मित्र बन जाते हैं,
वाणी में अमृत तुल्य मधुरता आती है। लोकप्रियता बढ़ती है। उत्सवधर्मिता होती है
एवं शान्ति रहती है ।
अथाङ्गारकदशाफलमाह —
क्रूररोगा जनाः सर्वे ह्यग्निदाहोद्भवादिकम्।
अर्थक्षयो दिने नित्यमङ्गारकदशाफलम् ॥ २४ ॥
- इसको निम्न सारणी से समझा जा सकता है—
दशेश सू. चं. मं. बु. श. बृ. श शु.
वर्ष 6 15 8 17 10 19 12 21
नक्षत्र आ. म. ह. अनु. पू.षा. ध. उ.मा. कृ.
पुन. पू.फा. चि. ज्ये. उ.षा. श. रे. रो.
पुष्य उ.फा. स्वा. मू. अभि. पू.भा. भ. मृ.
श्ले विशा. श्रवण
222 अपराजितपृच्छा
मङ्गल की महादशा में लोग क्रूर रोगों से ग्रस्त होते हैं। अग्निदाह की सम्भावना
रहती है। धन का क्षय होता है।
बुधदशाफलमाह —
बुद्धिवृद्ध्यर्थवृद्धी च सस्नेहं शोकशान्तिकम्।
धनपुत्रभार्यामित्रं बुधग्रहदशाफलम् ॥ 25 ॥
बुध की महादशा में बुद्धि बढ़ती है। स्नेह बढ़ता है और शोक का निवारण
होकर शान्ति की प्राप्ति होती है। धन, पुत्र, भार्या, मित्र सभी अनुकूल होते हैं।
अथ शनिदशाफलमाह —
देशत्यागो भय पीडा मित्रैः सह विरोधनम्।
पुत्रबन्धुस्त्रीवियोगः शनैश्चरदशाफलम् ॥ 26 ॥
शनि की महादशा में अपना देश त्यागना पड़ता है। भय बढ़ता है। पीड़ा होती
है, मित्रों से विरोध हो जाता है और पुत्र, बन्धु व स्त्री से वियोग हो जाता है।
गुरुदशाफलमाह —
आरोग्यं राज्यसन्मानमर्थवृद्धिः सदाजयः।
पूज्यन्ते गुरुतुल्याश्चाशोका गुरुदशाफलम् ॥ 27 ॥
जब गुरु की महादशा आरम्भ होती है तो आरोग्य में वृद्धि होती है। राज्य से
सम्मान मिलता है। धन की वृद्धि होती है और सदा विजय मिलती है। लोग जातक
की गुरु तुल्य भाव से पूजा आरम्भ करते हैं। कोई शोक नहीं रहता।
राह्वादशाफलमाह —
सदा पीडा गृहबन्धुस्थानत्यागोऽथ जायते।
राजगृहदण्डदुःखं प्रोक्तं राहुदशाफलम् ॥ 28 ॥
राहु की महादशा नित्य कष्ट पीड़ा बनाए रखती है। गृहत्याग, बन्धु त्याग और
स्थान त्याग सम्भव है। राजदण्ड की आशंका भी रहती है और दुःख-पीड़ा की
वृद्धि होती है।
शुक्रदशाफलमाह —
तेजः सदा च सन्मानं पुत्रलाभो धनागमः।
सुखमाप्नोति शारीरं शुभं शुक्रदशाफलम् ॥ 29 ॥
इति दशाफलम्।
सूत्र-४५ २२३
शुक्र की महादशा में सदा तेज में वृद्धि होती है। सम्मान मिलता है। पुत्र जन्म
का लाभ मिलता है। धन की प्राप्ति होती है। सुख मिलता है व शरीर स्वस्थ रहता
है।¹
अथ चन्द्रस्य द्वादशावस्थामाह —
चन्द्रस्यापि तथावस्था द्वादशैव₁₂ भवन्ति च।
तथा राशिगते चन्द्रे रुद्रघट्यः सपांदिकाः₁₁₁॥ ३० ॥
प्रवासा च तथा नष्टा मृता जया च हसिता।
कम्पिता ज्वरिता स्वस्था भुक्तस्वप्ना जाग्रता ? भोग्या ॥ ३१ ॥
चन्द्रमा की बारह दशाएँ होती हैं। जब-जब किसी राशि में चन्द्रमा का प्रवेश
होता है, तब वह सवा ग्यारह घटिका तक रहता है। चन्द्रमा की द्वादश अवस्थाएँ
हैं— १, प्रवासावस्था, २. नष्टावस्था, ३. मृतावस्था, ४. जयावस्था, ५. हसितावस्था,
६. कम्पितावस्था, ७. ज्वरितावस्था, ८. स्वस्थावस्था, ९, भुक्तावस्था १०.
स्वप्नावस्था, ११. जाग्रतावस्था एवं १२. भोग्या।²
तस्यफलमाह —
प्रवासायां प्रवासः स्यात् नष्टायां हानिमोदिशेत्।
मृतायां मृत्युसम्भूतिर्जयायां जयमादिशेत् ॥ ३२ ॥
- गरुडपुराण में ग्रहों की महादशा का फलाफल बताया गया है कि सूर्य की दशा दुःख देने वाली होती है
और उद्वेग पैदा करती है तथा राजा का नाश करती है। चन्द्र की दशा ऐश्वर्य देने वाली, सुख पैदा करने
वाली तथा मनोन्कूल अन्नदायक होती है। मङ्गल की दशा दुःखदायिका, राज्यादि विनाशकारक होती
है। बुध की दशा दिव्य स्त्री का लाभ, राज्य प्राप्ति व कोष वृद्धिकारक है। शनि की दशा राज्यनाशक
और बन्धु-बान्धवों को कष्टदायक होती है। बृहस्पति की दशा राज्यलाभ व सुखसमृद्धि तथा धर्मदायक
होती है। राहु की दशा राज्य का नाश करती है, व्याधिकारक तथा दुःखदायक है। शुक्र की दशा में
गज, अश्व, राज्य तथा स्त्री का लाभ होता है। (गरुडपुराण अध्याय 60) - प्रथम प्रवास, द्वितीय नष्ट, तृतीय जय, चतुर्थ अमृत, पञ्चम हास्य, षष्ठ रति, सप्तम क्रीडित, अष्टम सुप्त,
नवम भुक्त, दशम ज्वर, एकादश कम्पित और द्वादश सुस्थिर अवस्था होती है। ये अपने नाम के
अनुसार ही फल प्रदान करती है—प्रवासनष्टाख्यजयामृताख्या हास्यारतिः क्रीडितसुप्तभुक्ता। ज्वराह्वया
कम्पित सुस्थिरा च द्विषट् च सङ्ख्या हिमगोरवस्था॥ (ज्योतिषरत्नमाला 11, 8) नारद ने अवस्थाएँ ज्ञात
करने के लिए कहा है कि अश्विनी आदिगत नक्षत्रों की संख्या को साठ से गुणाकर वर्तमान नक्षत्र घटी
प्रमाण जोड़ दें और उसमें चार का गुणाकर 45 से भाजित करने से जो शेष रहे, उसमें 12 का भाग देने
पर प्रथम से शून्य या द्वादश तक अवस्थाएँ स्वीकारनी चाहिए— चन्द्रस्य द्वादशावस्था दिवा रात्रो
यथाक्रमात्। यत्रोद्वाहादिकार्येषु संज्ञातुल्यफलप्रदा॥ षष्टिघ्नं चन्द्रनक्षत्रं तत्कालघटिकान्वितम्।
वेदघ्नमग्निपुवेदाप्तमवस्था भानुभाजिताः॥ प्रवासनष्टाख्यमृता जयाहास्यारतिर्मुदा। सुप्तिर्भुक्ति
ज्वराकम्पसुस्थितिनामिर्संनिभाः॥ (नारदसंहिता 13, 6-8)
224 अपराजितपृच्छा
हसितायां च हास्यं स्यात् कम्पितायां च कम्पनम्।
ज्वरितायां ज्वरपीडा स्वस्थायां स्वस्तिकोद्भवः ॥ ३३ ॥
भुक्तायां भोजनप्राप्तिः सुप्तायां चैव निद्रितम्।
जागर्तिर्जागृत्तायां च भोग्यायां बहुभोग्यता ॥ ३४ ॥
इनके नामानुसार ही चन्द्रमा की प्रवासावस्था में प्रवास होता है, नष्टावस्था में
हानि, मृतावस्था में मृत्यु की आशंका रहती है। जयावस्था में विजय होती है और
हसितावस्था में प्रसन्नता होती है। कम्पितावस्था में भय से कम्पन होता है और
ज्वरितावस्था में ज्वर पीड़ा होती है। स्वस्थावस्था में स्वस्त्यायन का उदय होता है।
भुक्तावस्था में भोजन की प्राप्त और सुप्तावस्था में निद्रा होती है। जाग्रतावस्था में
जाग्रति बनी रहती है। भोग्यावस्था में जातक को बहुत प्रकार के भोगों का सुख
सुलभ होता है।
पञ्चत्रिंशोत्तरशतं घटिका राशिकोद्भवाः ।
राशिद्वादशके चैव शुभ्रश्चन्द्रो यथाबलम् ॥ ३५ ॥
राशियों से 135 घटिकाएँ उत्पन्न होती हैं। इन बारह राशियों में शुभ चन्द्र हो
तो वह बलवान होता है।¹
जन्मानुसारेणचन्द्रदशासफलमाह —
जन्मस्थः कुरुते पुष्टिं जन्मनक्षत्रवर्जितम्।
तथानुक्रमतश्चैव द्वितीये नैव निर्वृतिः ॥ ३६ ॥
जन्मस्थ बलवान चन्द्रमा पुष्टि करता है चाहे जन्म नक्षत्र कोई भी हो, उससे
कोई तात्पर्य नहीं है। इसी अनुक्रम में दूसरे गृह में शुभ चन्द्रमा बलवान हो तो
काम-धन्धे में कोई कमी नहीं होती, धनागम बना रहता है।
तृतीये राजसन्माजं चतुर्थे कलहागम्।
पञ्चमेऽर्थपरिश्रंशः षष्ठे चैव धनागमः ॥ ३७ ॥
यदि तृतीय स्थान में चन्द्रमा हो तो राज्य की ओर से सम्मान मिलता है किन्तु
- मुहूर्तकल्पद्रुम में कहा गया है कि मेष आदि द्वादश राशियों में क्रम से अपने नामानुसार फल देने वाली
चन्द्रमा की अवस्थाएँ हैं— 1. प्रवासावस्था (11.15 घटी-पल) 2. नष्टावस्था (22.30 घटी-पल) 3.
मृतावस्था (33.45 घटी-पल) 4. जयावस्था (45.00 घटी) 5. हास्यावस्था (56.15 घटी-पल) 6.
प्रीति या कामोपभोग (67.30 घटी-पल) 7. क्रीड़ावस्था (78.45 घटी-पल) 8. सुप्तावस्था (90.00
घटी) 9. भुक्तावस्था (101.15 घटी-पल) 10. ज्वरावस्था (112.30 घटी-पल) 11. प्रकम्पावस्था
(123.45 घटी-पल) और 12 स्थिरावस्था (135.00 घटी)— प्रवासनष्टे च मृता जया च हास्या च
मुत्क्रीडनसुप्तभुक्ताः ॥ ज्वरप्रकम्पस्थिरनामधेया नाम्ना समं तासु फलं शुभेषु। (मुहूर्तकल्पद्रुम 10, 25)
ताराबलमाह -
Wait, is it "अथ चन्द्र-ताराबलमाह —" or "अथ चन्द्र-ताराबलमाह —"?
It is "अथ चन्द्र-ताराबलमाह —"
Line 13:
शुक्लपक्षे चन्द्रबलं कृष्णे ताराबलं शुभम्।
Line 14:
द्विपञ्चनवमे चन्द्रः शुक्लपक्षे तु कामदः ॥ ४० ॥
Line 15:
शुक्लपक्ष में चन्द्रमा का बल बढ़ा हुआ होता है जो शुभ है परन्तु कृष्णपक्ष में
Line 16:
तारा बल प्रशस्त माना जाता है। दूसरे, पाँचवें और नवें भाव में चन्द्रमा शुक्ल पक्ष
Wait, "तारा बल" or "ताराबल"? Space between तारा and बल.
"शुक्ल पक्ष" or "शुक्लपक्ष"? Space between शुक्ल and पक्ष.
Line 17:
में बड़ा ही लाभप्रद और कामनापूर्ति करने वाला होता है।²
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सूत्र-४५ 225
Text:
चतुर्थ स्थान में चन्द्रमा कलहकारी होता है। पाँचवें गृह में चन्द्रमा धननाश करता है
और छठवें स्थान में चन्द्रमा हो तो धनागम होता है।
सप्तमे राजपूजा च ह्यष्टमे प्राणनाशनम्
226 अपराजितपृच्छा
तिथिस्त्वेकगुणा प्रोक्ता नक्षत्रञ्च चतुर्गुणम् ।
करणः षोडशगुणो वारश्चाष्टगुणो मतः ॥ 41 ॥
इनमें भी तिथि का बल मात्र एक गुण ही होता है जबकि नक्षत्र सदा ही उससे
चौगुना फलदायी होता है । इससे सोलह गुणा फल करण बल का कहा है और वार
बल इससे आठ गुना फल देता है।¹
द्वात्रिंशद्गुणको योगस्ताराश्चतुःषष्टिगुणाः ।
चन्द्रः शतगुणः प्रोक्तस्तस्माच्चन्द्रबलं बलम् ॥ 42 ॥²
इसी प्रकार बत्तीस गुणा फल योग से और ताराओं से चौंसठ गुणा फल का
लाभ होता है परन्तु ध्यान रहे कि चन्द्रमा का फल सदा ही सौ गुणा माना गया है ।
इसीलिए चन्द्रबल को ही सही तौर पर बल कहा गया है ।
न सूर्यवेधो दशचक्रसङ्कुलम् गण्डेऽतिशूले परिधे च वैधृते ।
न राहुपृथ्वीग्रहयोग... ...( यद्येव ) हनते चन्द्र सहस्रदोषम् ॥ 43 ॥
सूर्यवेध, दशचक्र समूह का गण्ड, अतिशूल, परिघ, वैधृति, राहु-पृथ्वी योग
ग्रहणादि कोई भी दोष नहीं होते क्योंकि केवल एक चन्द्रमा के बलवान शुभ होने
पर हजारों दोषों को अकेला ही हर लेता है ।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योपराजितपृच्छायां
ज्योतिषलक्षणाधिकारो नाम पञ्चचत्वारिंश सूत्रम् ॥ 45 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में ज्योतिष
लक्षण अधिकार नामक पैंतालीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 45 ॥
- राजमार्तण्ड में यह श्लोक इस प्रकार आया है— तिथिरेकगुणा प्रोक्ता नक्षत्रञ्च चतुर्गुणम्। वाराश्चाष्टगुणश्चैव
चन्द्रः शतगुणः स्मृतः॥ (ज्योतिर्निबन्ध पृष्ठ 62, श्लोक 25) राजमार्तण्ड के मूल पाठ में 41-42वें श्लोक
इन श्लोकों का पाठान्तर इस प्रकार आया है— तिथिरेकगुणा प्रोक्ता वारश्चैव चतुर्गुणः। ऋक्षं
षोडशमित्याहुर्योगश्चैव शताधिकः॥ सहस्रांशा रविः प्रोक्तश्चन्द्रो लक्षगुणाधिकः। वर्जयित्वा बलं सर्वं
तस्माच्चन्द्रबलाबलम्॥ (राजमार्तण्ड 596-597) - उक्त दोनों श्लोक नारद के हैं, अत्यल्प पाठान्तर के साथ ये तुलनीय हैं— तिथिस्त्वेकगुणा प्रोक्ता नक्षत्रं च
चतुर्गुणम्। वारश्चाष्टगुणः प्रोक्तः करणं षोडशान्वितम्॥ द्वात्रिंशल्लक्षणो योगस्तारा षष्ठिगुणा स्मृता। चन्द्रे
शतगुणं पुंसां तस्माच्चन्द्रबलं बलाधिकम्॥ (बृहद्दैवज्ञरञ्जनम् 27, 10-11 पर उद्धृत)
सूत्र-४६ 227
ज्योतिषलक्षणात्मकं षट्चत्वारिंशं सूत्रम् ॥ ४६ ॥
विश्वकर्मावाच । नक्षत्रसञ्ज्ञा च प्रत्येकनक्षत्रकृत्यानि । तत्रैव पार्श्वतोमुखीनक्षत्रं —
रेवती चाश्विनी चित्रा हस्तः स्वातिपुनर्वसू ।
अनुराधा मृगो ज्येष्ठा नवैताः पार्श्वतोमुखाः ॥ १ ॥
विश्वकर्मा बोले— रेवती, अश्विनी, चित्रा, हस्त, स्वाती, पुनर्वसु, अनुराधा
मृगशिरा और ज्येष्ठा— ये नौ नक्षत्र पार्श्वतोमुखी कहे जाते हैं।
गजोष्ट्राश्वाजमहिषवृषादेर्दमनं शुभम् ।
कुर्याद्वेश्मप्रवेशादि गमनागमने तथा ॥ २ ॥
इन नक्षत्रों में हाथी, ऊँट, घोड़े, अज, महिष, वृष आदि का दमन
(बधियाकरण) शुभ है। घर में आते-जाते समय भी इनका मिलना शुभ हैं।
अरहट्टचक्रयन्त्रं रथप्रभृतियापनम् ।
प्रमाणं प्रेरणं चैव कार्यं वै पार्श्वतोमुखैः ॥ ३ ॥
इसी प्रकार रहट या जलोत्थान यन्त्र का सञ्चालन, रथादि वाहनों को चलाना,
इनको प्रमाणित करना, प्रेरित करना आदि सभी कार्य इन पार्श्वतोमुखी नक्षत्रों में
करना हो तो ठीक रहता है।
अधोमुखीनक्षत्रं —
कृत्तिका भरणी चैव मघा मूलविशाखिके ।
तिस्रः पूर्वास्तथाश्लेषा ह्यधोवक्त्राः प्रकीर्तिताः ॥ ४ ॥
कृत्तिका, भरणी, मघा, मूल, विशाखा, चित्रा, पूर्वा, आश्लेषा— ये सब
अधोमुखी नक्षत्र माने जाते हैं।
वापी कूपतडागानि तथा भूमिगृहाणि च ।
विद्यारम्भं निधानं च पातालादिप्रवेशनम् ॥ ५ ॥
इनमें वापी, कूप, तड़ाग, भूमिग्रहण, विद्यारम्भ, निधान (पूँजी गाड़ना),
पाताल-गुहादि में प्रवेश कार्य किए जाते हैं।
ऊर्ध्वमुखीनक्षत्रं —
पुष्यार्द्रे रोहिणी चैव धनिष्ठा चोत्तरात्रयम् ।
श्रवणं शतताराश्च नवैवोर्ध्वमुखाः स्मृताः ॥ ६ ॥
पुष्य, आर्द्रा, रोहिणी, धनिष्ठा, उत्तरात्रय (उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ व
उत्तराभाद्रपद), श्रवण, शतभिषा— ये नौ ऊर्ध्वमुखी नक्षत्र कहे जाते हैं।
228 अपराजितपृच्छा
आसु राजाभिषेकं च पट्टबन्धं महोत्सवम्।
प्रासादं च गृहं चैव पताका छत्रचामरम्॥ ७॥
आरामनगरारम्भं निधीनां तु निषेचणम्।
ऊर्ध्ववक्त्रेषु कर्माणि तानि सर्वाणि कारयेत्॥ ८॥
इन नक्षत्रों में जो कार्य होते हैं उनमें राज्याभिषेक, पट्टबन्ध, महोत्सव, प्रासाद,
गृह, पताका, छत्र, चामर, बगीचे, नगर-निवेशारम्भ, राशि निवेशन मुख्य हैं अर्थात्
ऊर्ध्वमुखी नक्षत्रों में उक्त कार्य करने चाहिए।¹
राक्षसगुणप्रधानाः -
मघाश्लेषा विशाखा च कृत्तिका शततारका।
चित्रायुक्ता धनिष्ठा च ज्येष्ठा मूलं च राक्षसः॥ ९॥
मघा, आश्लेषा, विशाखा, कृतिका, शतभिषा, चित्रा, धनिष्ठा, ज्येष्ठा और मूल—
ये नक्षत्र राक्षस गुण प्रधान होते हैं।
मनुष्यगुणप्रधानाः -
पूर्वास्तिस्रो रोहिणी च ह्यार्द्रा च भरणी तथा।
तिस्रश्चैवोत्तरावैवं मनुष्यः सम्प्रकीर्तितः॥ १०॥
तीनों पूर्वा, रोहिणी, आर्द्रा, भरणी और तीनों उत्तरा— ये नौ नक्षत्र मनुष्य गुण
(गण क्रम से) प्रधान माने जाते हैं।
देवगुणप्रधानाः -
मृगाश्विनी रेवती च हस्तः स्वातिपुनर्वसू।
पुष्यानुराधाश्रवणमिति देवगणः स्मृतः॥ ११॥
- राजवल्लभ. में भी यह वर्णन आया है। इसे इस तालिका से स्पष्ट किया जा सकता है—
क्रम संज्ञा नक्षत्रों के नाम करणीय कार्य - अधोमुख पूर्वात्रय, आश्लेषा, मघा, भूमिखात, विधिरोपण, उग्रकार्य
कृतिका, मूल, भरणी,
विशाखा - पार्श्वमुख चित्रा, अश्विनी, अनुराधा, वाहन, यन्त्र, हलारोहण, पशुकृत्य
पुनर्वसु, स्वाती, ज्येष्ठा,
मृगशिरा, रेवती, हस्त - ऊर्ध्वमुख पुष्य, उत्तरात्रय, आर्द्रा, गृहप्राकार, देवगृह, उच्चहर्म्य,
श्रवण, धनिष्ठा, रोहिणी, छत्र-चामर, राज्याभिषेक
शतभिषा
सूत्र-४६ 229
मृगशिरा, अश्विनी, रेवती, हस्त, स्वाती, पुनर्वसु, पुष्य, अनुराधा और श्रवण—
ये नौ देवगण प्रधान नक्षत्र माने जाते हैं।
स्वगणे चोत्तमा प्रीतिर्मध्यमा देवमानुषे ।
देवासुरे च कलहो मरणं नरराक्षसे ॥ 12 ॥
उक्त नक्षत्रों में अपने गण वाले नक्षत्रों में उत्तम प्रीति होती है। देवगण और
मनुष्यगण नक्षत्रों में मध्यम प्रीति होती है। देवगण और राक्षसगण नक्षत्रों में कलह
होता है और राक्षसगण तथा मनुष्यगण में मरण की आशंका रहती है।
सूर्यपातस्ययोगमाह —
आदित्ये द्वादशे ऋक्षे वर्जयेद् रविपातशः।
मृत्युरष्टादशाश्चैव कम्पो वै एकोनविंशतिः ? ॥ 13 ॥
सूर्य अपने से बारहवें नक्षत्र पर रवि पातशः योग बनाता है। अतः ऐसे योग में काम
नहीं करना चाहिए। इसी तरह सूर्य अठारहवें नक्षत्र पर मृत्युयोग और उन्नीसवें नक्षत्र पर
कम्पयोग बनाता है। अतः ये योग भी वर्जित है, शुभ नक्षत्रों को ही ग्राह्य समझें (?)।
एकविंशतिमे ऋक्षे निर्घातं पतते सदा।
योगानेतान् रविपातान् वर्जयेच्छुभकर्मसु ॥ 14 ॥
इक्कीसवें नक्षत्र पर सूर्य आने पर सदा निर्घातपात् योग होता है। अतः इन सभी
रविपात योगों को शुभ कर्म अवसर पर वर्जनीय कहा गया है।
ग्रहाणां जन्मनक्षत्रं वर्जयेच्छुभकर्मसु ।
एते कलङ्क योगाः स्युर्गृहजन्मसु दूषिताः ॥ 15 ॥
जन्म नक्षत्र के ग्रहों को भी शुभ कर्म में वर्जनीय कहा है। ये सभी कलङ्क योग
कहे गए हैं, जो गृहजन्म से दूषित है।
त्रीणि च त्रीणि चाक्षाणि रविभौमशनिश्चराः ।
आलिङ्गितं धन्विनं चैव ? तृतीयमवलोकितम् ? ॥ 16 ॥
सूर्य, मङ्गल और शनिश्चर— ये तीनों जब तीन नक्षत्रों से आलिङ्गित या साथ,
धन्विन तथा तृतीय अवलोकित-दृष्टि सम्बन्ध बनाते हों तो ये भी कलङ्क योग हैं, जो
शुभ कर्म में वर्जित माने जाते हैं (?)।
अथ क्षेत्राधिपत्याह —
मेषवृश्चिकयोर्भौमः शुक्नो वृषतुलाधिपः।
बुधः कन्यामिथुनयोः सोमो वै कर्कटाधिपः ॥ 17 ॥
230 अपराजितपृच्छा
सूर्यक्षेत्रं भवेत्सिंहो धनुर्मीनाधिपो गुरुः।
शनिर्मकरकुम्भेश एते क्षेत्राधिपा ग्रहाः ॥ 18 ॥¹
ग्रह स्वामी रूप में मङ्गल मेष और वृश्चिक का; शुक्र वृष और तुला का; बुध
कन्या और मिथुन का; चन्द्रमा कर्क का; सूर्य सिंह राशि का; गुरु धनु और मीन
राशि का; शनि मकर और कुम्भ राशि का स्वामी अर्थात् क्षेत्राधिपति ग्रह होते हैं।
न पीडयन्ति स्वक्षेत्रे स्वमित्रे च ग्रहास्तथा।
विषमस्थाः पीडयन्ते भस्मीकुर्वन्ति विग्रहे ॥ 19 ॥
जब कोई ग्रह स्वक्षेत्र में हो और स्वमित्र के क्षेत्र में हो तो कभी भी पीड़ा नहीं
पहुँचाते, परन्तु विषम ग्रह के क्षेत्र में हो तो बड़े विग्रहकारक बन जाते हैं और
इतनी पीड़ा पहुचाते हैं कि वे भस्मसात कर देते हैं।
ग्रहमैत्री —
सोमश्च सूर्यभौमौ च त्रिदशाचार्य एव च।
स्नेहानुगाश्च चत्वारो मैत्री स्यात्तु परस्परम् ॥ 20 ॥
सोम, सूर्य, मङ्गल और गुरु— ये चारों परस्पर मित्र भाव में स्नेहपूर्वक रहते हैं।
भार्गवः सूर्यपुत्रश्च बुधश्चापि तृतीयकः ।
स्नेहानुगास्त्रयः प्रोक्ता मैत्री स्यात्तु परस्परम् ॥ 21 ॥
शुक्र, शनि और बुध— ये तीनों भी परस्पर स्नेह रहने से मित्रभाव वाले कहे
गए हैं।
ग्रहा एकत्र चत्वारिस्त्रिभिरेकत्र संस्थिताः ।
तेषां मध्ये रौद्रं घोरं महद्वैरस्य कारणम् ॥ 22 ॥
रविक्षेत्रे गते जीवे जीवक्षेत्रे गते रवौ।
विवाहं व्रतबन्धं च कुर्याद्देशान्तरं तथा ॥ 23 ॥
यदि तीन या चार ग्रहों की युति एक क्षेत्र में हो तो यह स्थिति उनमें महान् रौद्र
रूप में घोर वैर का कारण बनती है, रवि के क्षेत्र में गुरु हो या गुरु के क्षेत्र में रवि
हो तो ऐसे समय में विवाह, व्रतबन्ध और देशान्तर गमन वर्जित है।
(द्विर्द्वादशे त्रिकोणे च न कदाचित्षडष्टके )²
उद्वेगं कलहो हानिः सुखं नैव कदाचन ॥ 24 ॥
- ये श्लोक नारद से तुलनीय है— मेषवृश्चिकयोर्भीमः कन्यामिथुनयोर्बुधः। धनुर्मीन द्वयोर्मन्त्री शुक्नो वृषतुलेश्वरः ॥ शनिर्मकरकुम्भेश इत्येते राशिनायकाः । (नारदसंहिता 29, 32-33)
- प्रकाशित पाठे नोपलभ्यते।
सूत्र-४६ 231
द्विर्द्वादश, त्रिकोण और षडष्टक हो तो सम्बन्ध नहीं करें क्योंकि, ऐसे अवसर
पर उद्वेग, कलह और हानि होती है और सुख तो कभी भी सुलभ नहीं होता।
लग्नघटिकाप्रमाणं -
वक्ष्ये द्वादश लग्नानि घटिकानां प्रमाणतः।
सप्तपञ्चाशत्पलानि त्रिघट्यो मीनमेषयोः॥ २५॥
(विश्वकर्मा बोले कि) अब मैं बारह लग्नों को उनकी घटिकाओं तक सप्रमाण
कहता हूँ। मीन, मेष की घटिकाएँ 3 घड़ी और 57 पल की होती हैं।
वृषे कुम्भे चतस्त्रश्च षड्विंशति पलानि च।
मिथुन मकरे पञ्च घट्यो नव पलानि च॥ २६॥
वृष व कुम्भ की 4 घड़ी और 26 पल होती हैं। मिथुन और मकर की 5 घड़ी
और 9 पल होती हैं।
धनुः कर्कटयोः पञ्च सप्तत्रिंशत् पलैः सह।
सिंहवृश्चिकयोः पञ्च द्वात्रिंशच्च पलानि च॥ २७॥
धनु और कर्क की 5 घड़ी और 37 पल की होती है। सिंह और वृश्चिक की 5
घड़ी और 32 पल की होती है।
पञ्चैव कन्यातुलयोरेकोनविंशतिपलैः।
इत्थं लग्नप्रमाणानि प्रोक्तानि द्वादशैव च॥ २८॥
कन्या तुला की भी घटिकाएँ 5 घड़ी और 19 पल की होती हैं। इतने ये लग्न
प्रमाण बारहों लग्नों के कहे गए हैं।
दिवानिशालग्नानि -
कर्कटानि निशालग्नं नक्रादि दिनलग्नकम्।
लग्नानि षट् तथा रात्रौ दिने स्युः षट् तथैव च॥ २९॥
कर्कादि से रात्रि के लग्न और मकरादि से दिन के लग्न- इस तरह छह लग्न
रात्रि के और छह लग्न दिन के होते हैं।
अथ विप्रादीनाभिधानं -
वृश्चिकः कर्कटो मीनो ब्राह्मणाः परिकीर्तिताः।
धनुर्मेषस्तथा सिंहो राजानश्च शुभाः स्मृताः॥ ३०॥
कन्या वृषश्च मकरश्चैते वैश्या उदाहृताः।
मिथुन च तुला कुम्भः शूद्रा एते प्रकीर्तिताः॥ ३१॥
232
अपराजितपृच्छा
वृश्चिक, कर्क और मीन राशि की ब्राह्मण संज्ञा कही है। धनु, मेष और सिंह
राशि की क्षत्रिय संज्ञा; कन्या, मकर और वृष राशि की वैश्य संज्ञा और मिथुन, तुला
एवं कुम्भ राशि की शूद्र संज्ञा कही गई है।¹
विप्रः कार्यों द्वादशभिः क्षत्रियो नवभिस्तथा।
षड्लग्नैश्च भवेद् वैश्यस्त्रिभिः शूद्रः प्रशस्यते॥ 32॥
सामान्यतया बारह लग्नों से विप्र (ब्राह्मण) कार्य होते हैं। नौ लग्नों से क्षत्रिय
कार्य; छह लग्नों से वैश्य कार्य और तीन लग्नों से शूद्र कार्य प्रशस्त कहे गए हैं।
सिंहाली च घटवृषौ लग्नवेलासु चोत्तमाः।
प्रासादप्रतिमालिङ्गजगतीपीठमण्डपात् ॥ 33 ॥
प्रासाद, प्रतिमा, लिङ्ग, जगती, पीठ और मण्डप के लिए सिंह, वृश्चिक, कुम्भ
और वृष राशि के लग्न उत्तम माने गए हैं।
नगरारामनिवेशं प्रतिष्ठाऽम्बुनिधेस्तथा।
**गढदुर्ग
सूत्र-४७ 233
समपञ्चशलाकाश्च मद्रभिश्चककोत्तमम् ?।
स्वरे स्वामिकान्तारेषु ग्रहवेधविशोधनम् ॥ ३७॥
इसी प्रकार वेध दर्शन के लिए ग्रहों की स्थिति पञ्चशलाका और सप्तशलाका
चक्रों से उत्तम प्रकार से देखी जा सकती है। स्वर (वर = चुनाव) में स्वामी और
कान्तार (अपने एवं पराए एवं पति-पत्नी) क्षेत्र में ग्रह वेध विशोधन करना चाहिए।
रविवेधे च वैधव्यं चन्द्रे भृत्यं न जीवति।
कुजे प्रजाक्षयं विद्याद् वन्ध्या सोमसुते मता ॥ ३८ ॥
रवि वेध से वैधव्य, चन्द्र वेध से सेवक की मृत्यु, मङ्गल वेध से प्रजा को क्षति
जानना और सोमसुत अर्थात बुध के वेध से वन्ध्यत्व सूचित होता है।
प्रव्रज्या गुरुवेधे तु अपुत्रा शुक्रवेधतः ।
दुःखदा सूर्यपुत्रेण ग्रहवेधविशोधनम् ॥ ३९ ॥
गुरु का वेध होने से प्रव्रज्या करनी पड़ती है। शुक्र वेध से सन्तानहीनता होती
है तथा शनि के वैध से निश्चय ही दुःख आता है। इस प्रकार से यहाँ यह ग्रहों का
वेध विशोधन कहा गया।
इति सूत्रसन्ताणगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्त श्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
ज्योतिषलक्षणाधिकारो नाम षट्चत्वारिंशं सूत्रम् ॥ ४६ ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में ज्योतिष
लक्षण अधिकार नामक छियालीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ४६ ॥
गणितक्षेत्रनिर्णयो नाम सप्तचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ ४७ ॥
विश्वकर्मोवाच —
उद्धृत्य गणितात्सारं सर्वशास्त्रादिदीपकम्।
वेदाश्रः क्षेत्रवास्तुश्च वृत्तश्चाष्टाश्र एव च ॥ १ ॥
ज्ञेयो द्वात्रिंशदश्रश्च शिलायां विविधोत्तमः ।
षट्कोधश्च त्रिकोणश्च चन्द्रार्धो गोलकः परम् ॥ २॥
विश्वकर्मा बोले कि सभी शास्त्रों के दीपक-तुल्य माने जाने वाले गणितशास्त्र
का सार उद्धृत करके चतुरश्रक्षेत्र वास्तु, वृत्तक्षेत्र वास्तु, अष्टाश्रक्षेत्र वास्तु,
बतीसकोणीयक्षेत्र वास्तु को विविध प्रकार की उत्तम शिलाओं से षट्कोण, त्रिकोण,
अर्धचन्द्राकार तथा गोलाकार तक कहूँगा।
234 अपराजितपृच्छा
अथ गणितपादं —
आदौ गणितपादं च कथयिष्याम्यनुक्रमात् ।
तदन्तराणि क्षेत्राणि कथये विविधानि च ॥ ३॥
इसमें सबसे पहले 'गणित पाद' भाग को अनुक्रम से कहता हूँ, उसके बाद
विविध प्रकार के क्षेत्रों के विषय में कहूँगा।
एकात्पर्द्धादीनां गणनामाह —
एकं दश शतमस्मात् सहस्रमनु चायुतम् ।
नियुतं प्रयुतं तस्मादर्बुदन्यर्बुदे अपि ॥ ४ ॥
वृन्दं खर्वनिखर्वाणि शङ्कुपद्माम्बुराशयः ।
ततः स्यान्मध्यमन्त्यं च परं चापरमप्यतः ॥ ५ ॥
परार्धं चेति विज्ञेयं दशवृद्धयोत्तरोत्तरम् ।¹
संख्या-स्थानानुसार मान इस प्रकार बताया है कि एक (1), दस (10), शत
(100), सहस्र (1000), अयुत (10000), नियुत (100000), प्रयुत (1000000),
अर्बुद (10000000), अन्यर्बुद (100000000), वृन्द (1000000000), खर्ब
(10000000000), निखर्ब (100000000000), शङ्कु (1000000000000), पद्म
(10000000000000) और इसके बाद अम्बुराशि (100000000000000) मध्य
(1000000000000000), इसके उपरान्त अन्त्य (10000000000000000), पुनः
पर (100000000000000000), अपर (1000000000000000000) तथा इसी
प्रकार परार्ध (10000000000000000000) संज्ञक इन संख्याओं को उत्तरोत्तर दस-
दस की वृद्धि से जानना चाहिए।
अधोयोगे सङ्कलितास्तत् सङ्कलितमुच्यते ॥ ६ ॥
एक के नीचे एक संख्या रखते हुए उन्हें योग से सङ्कलित करने को सङ्कलित
अर्थात् जोड़ कहते हैं।
- इस प्रकार से एक, दश, सौ, हजार, दस हजार, नियुत, प्रयुत, अर्बुद, अन्यर्बुद वृन्द, खर्व, निखर्व, शङ्कु,
पद्म राशियाँ, संख्याएँ होती है। इनमें भी मध्यम, अन्त्य और परं और ऊपरं तथा उनसे परे भी परार्ध
आदि तक इन संख्याओं को समझना जो एक एक से दस गुनी वृद्धि को प्राप्त होती है। उक्त श्लोक ज्यों
के त्यों समराङ्गणसूत्रधार (9, 47-49) में आए हैं। अपराजित के इस अध्याय पर भास्कराचार्य कृत
लीलावती का प्रभाव भी परिलक्षित होता है। यही अध्याय सूत्रधार मण्डन कृत राजवल्लभ के 11वें
अध्याय का मूल उत्स रहा है। नारदपुराण में यह क्रमवार गणना इस प्रकार आई है— एकं दश शतं चैव
सहस्रायुतलक्षकम्॥ प्रयुतं कोटिसंज्ञां चार्वुदमब्जं च खर्वकम्। निखर्वं च महापद्मं शङ्कूर्जलाधिरेव च॥
अन्त्यं मध्यं परार्द्धं च संज्ञा दशगुणोत्तराः । (नारद, पूर्व. 54, 12-13)
सूत्र-४७ 235
अग्रेऽङ्काङ्क स्थापनीयस्तद्गुणैः पृष्ठपादतः ।
ऊर्ध्वमूर्ध्वं क्रमान्मूलं सङ्ख्या सङ्कलिता भवेत् ॥ 7 ॥
आगे-आगे अङ्कों की स्थापना करते हुए पीछे की संख्याओं के ऊपर से ऊपर
की मूल से क्रमवार जोड़ते जाने से (या गुणा से) संख्या सङ्कलित होती है।
एवं पादाश्च चत्वारो गणिताङ्कसमुच्यते ।
सङ्कलितं करणसूत्रामार्याद्वयंतैकोवृद्धिश्च ? ।
अधोयोगे सङ्कलीकृता तस्माद्देशोत्तरां च ? ॥ 8 ॥
इस प्रकार गणिताङ्क कहलाने वाले चार पाद होते है। सङ्कलित, करण सूत्र
को, आर्याद्वय अन्त में एक की वृद्धि ? नीचे योग करे सङ्कलित करें, उसके भेदशः
उत्तराच ? ।¹
अथ संख्यापद नामानि च -
अग्रपृष्ठो अग्रकोत्तरा वा शून्यपृष्ठोक्त ? ।
भवेद् दशोत्तरा वृद्धी........ ? ॥ 9 ॥
एकराशिस्तु गणिते मूलं वर्गो द्विराशिकः ।
त्रिराशिकोऽथवोक्तश्च घनो वै कर्णसम्पुटे ॥ 10 ॥
आगे पीछे के आगे के बाद वा शून्य पृष्ठोवत्त ? । दशोत्तरा वृद्धि होती है ? एक
ही संख्या से मूल संख्या को गणित करने से 'वर्ग द्विराशिक' बनता है। इसी तरह
एक ही राशि को मूल से तीन बार गणित करने से घन संख्या बनती है, जो 'कर्ण
सम्पुट' कहलाती है।
पदद्वयं हते पादे पदैस्तद् गुणितं तथा।
पदघ्नं च पदहतमित्यभिख्यं च राशिकम् ॥ 11 ॥
दो पाद को एक पाद से भाग देने पर जो संख्या आए, उसे पुनः पाद से गुणित
करे तो उसे 'पदघ्न' तथा 'पदहत राशि' कहते हैं।
- यहाँ पाठ भ्रष्ट होने से नारदीय निर्देश को देखना चाहिए। यथास्थानीय अङ्कों का योग या अन्तर क्रम या
व्युत्क्रम से करें। गुण्य के अन्तिम अङ्क को गुणक से गुणा करें। इसके बाद उसके पार्श्ववर्ती अङ्क को
भी उसी गुणक से गुणा कर दें। इस प्रकार आदि से अङ्क तक गुणा करने पर गुणनफल लब्ध हो जाता
है। इसी प्रकार भागफल जानने के लिए भी प्रयास करना चाहिए। जितने अङ्क से भाजन के साथ गुणा
करनेपर भाज्य में से घट जाए, वही अङ्क लब्धि अर्थात् भागफल होता है। दो समान अङ्कों के
गुणनफल को वर्ग कहा गया है। ज्ञानियों ने उसे ही कृति कहा है- क्रमादुत्क्रमतो वापि योगः कार्योत्तरं
तथा॥ हन्याद्गुणेन गुण्यं स्यात्तेनैवोपान्तिमादिकान्। शुद्धेद्धरोयदगुणश्च भाज्यान्त्यातफलं मुने ॥
समाङ्कतोऽथो वर्गः स्यात्मेयाहुः कृतिं बुधः। अन्त्यात्तु विषमात्यक्त्वा कृतिं मूलं न्यसेत् पृथक् ॥
इत्यादि... (नारद. पूर्व 54, 14-16)