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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 278, कुल 535 में से

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पृष्ठ 278

सूत्र-४६ 231
द्विर्द्वादश, त्रिकोण और षडष्टक हो तो सम्बन्ध नहीं करें क्योंकि, ऐसे अवसर
पर उद्वेग, कलह और हानि होती है और सुख तो कभी भी सुलभ नहीं होता।
लग्नघटिकाप्रमाणं -
वक्ष्ये द्वादश लग्नानि घटिकानां प्रमाणतः।
सप्तपञ्चाशत्पलानि त्रिघट्यो मीनमेषयोः॥ २५॥
(विश्वकर्मा बोले कि) अब मैं बारह लग्नों को उनकी घटिकाओं तक सप्रमाण
कहता हूँ। मीन, मेष की घटिकाएँ 3 घड़ी और 57 पल की होती हैं।
वृषे कुम्भे चतस्त्रश्च षड्विंशति पलानि च।
मिथुन मकरे पञ्च घट्यो नव पलानि च॥ २६॥
वृष व कुम्भ की 4 घड़ी और 26 पल होती हैं। मिथुन और मकर की 5 घड़ी
और 9 पल होती हैं।
धनुः कर्कटयोः पञ्च सप्तत्रिंशत् पलैः सह।
सिंहवृश्चिकयोः पञ्च द्वात्रिंशच्च पलानि च॥ २७॥
धनु और कर्क की 5 घड़ी और 37 पल की होती है। सिंह और वृश्चिक की 5
घड़ी और 32 पल की होती है।
पञ्चैव कन्यातुलयोरेकोनविंशतिपलैः।
इत्थं लग्नप्रमाणानि प्रोक्तानि द्वादशैव च॥ २८॥
कन्या तुला की भी घटिकाएँ 5 घड़ी और 19 पल की होती हैं। इतने ये लग्न
प्रमाण बारहों लग्नों के कहे गए हैं।
दिवानिशालग्नानि -
कर्कटानि निशालग्नं नक्रादि दिनलग्नकम्।
लग्नानि षट् तथा रात्रौ दिने स्युः षट् तथैव च॥ २९॥
कर्कादि से रात्रि के लग्न और मकरादि से दिन के लग्न- इस तरह छह लग्न
रात्रि के और छह लग्न दिन के होते हैं।
अथ विप्रादीनाभिधानं -
वृश्चिकः कर्कटो मीनो ब्राह्मणाः परिकीर्तिताः।
धनुर्मेषस्तथा सिंहो राजानश्च शुभाः स्मृताः॥ ३०॥
कन्या वृषश्च मकरश्चैते वैश्या उदाहृताः।
मिथुन च तुला कुम्भः शूद्रा एते प्रकीर्तिताः॥ ३१॥