अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-४५ २२३
शुक्र की महादशा में सदा तेज में वृद्धि होती है। सम्मान मिलता है। पुत्र जन्म
का लाभ मिलता है। धन की प्राप्ति होती है। सुख मिलता है व शरीर स्वस्थ रहता
है।¹
अथ चन्द्रस्य द्वादशावस्थामाह —
चन्द्रस्यापि तथावस्था द्वादशैव₁₂ भवन्ति च।
तथा राशिगते चन्द्रे रुद्रघट्यः सपांदिकाः₁₁₁॥ ३० ॥
प्रवासा च तथा नष्टा मृता जया च हसिता।
कम्पिता ज्वरिता स्वस्था भुक्तस्वप्ना जाग्रता ? भोग्या ॥ ३१ ॥
चन्द्रमा की बारह दशाएँ होती हैं। जब-जब किसी राशि में चन्द्रमा का प्रवेश
होता है, तब वह सवा ग्यारह घटिका तक रहता है। चन्द्रमा की द्वादश अवस्थाएँ
हैं— १, प्रवासावस्था, २. नष्टावस्था, ३. मृतावस्था, ४. जयावस्था, ५. हसितावस्था,
६. कम्पितावस्था, ७. ज्वरितावस्था, ८. स्वस्थावस्था, ९, भुक्तावस्था १०.
स्वप्नावस्था, ११. जाग्रतावस्था एवं १२. भोग्या।²
तस्यफलमाह —
प्रवासायां प्रवासः स्यात् नष्टायां हानिमोदिशेत्।
मृतायां मृत्युसम्भूतिर्जयायां जयमादिशेत् ॥ ३२ ॥
- गरुडपुराण में ग्रहों की महादशा का फलाफल बताया गया है कि सूर्य की दशा दुःख देने वाली होती है
और उद्वेग पैदा करती है तथा राजा का नाश करती है। चन्द्र की दशा ऐश्वर्य देने वाली, सुख पैदा करने
वाली तथा मनोन्कूल अन्नदायक होती है। मङ्गल की दशा दुःखदायिका, राज्यादि विनाशकारक होती
है। बुध की दशा दिव्य स्त्री का लाभ, राज्य प्राप्ति व कोष वृद्धिकारक है। शनि की दशा राज्यनाशक
और बन्धु-बान्धवों को कष्टदायक होती है। बृहस्पति की दशा राज्यलाभ व सुखसमृद्धि तथा धर्मदायक
होती है। राहु की दशा राज्य का नाश करती है, व्याधिकारक तथा दुःखदायक है। शुक्र की दशा में
गज, अश्व, राज्य तथा स्त्री का लाभ होता है। (गरुडपुराण अध्याय 60) - प्रथम प्रवास, द्वितीय नष्ट, तृतीय जय, चतुर्थ अमृत, पञ्चम हास्य, षष्ठ रति, सप्तम क्रीडित, अष्टम सुप्त,
नवम भुक्त, दशम ज्वर, एकादश कम्पित और द्वादश सुस्थिर अवस्था होती है। ये अपने नाम के
अनुसार ही फल प्रदान करती है—प्रवासनष्टाख्यजयामृताख्या हास्यारतिः क्रीडितसुप्तभुक्ता। ज्वराह्वया
कम्पित सुस्थिरा च द्विषट् च सङ्ख्या हिमगोरवस्था॥ (ज्योतिषरत्नमाला 11, 8) नारद ने अवस्थाएँ ज्ञात
करने के लिए कहा है कि अश्विनी आदिगत नक्षत्रों की संख्या को साठ से गुणाकर वर्तमान नक्षत्र घटी
प्रमाण जोड़ दें और उसमें चार का गुणाकर 45 से भाजित करने से जो शेष रहे, उसमें 12 का भाग देने
पर प्रथम से शून्य या द्वादश तक अवस्थाएँ स्वीकारनी चाहिए— चन्द्रस्य द्वादशावस्था दिवा रात्रो
यथाक्रमात्। यत्रोद्वाहादिकार्येषु संज्ञातुल्यफलप्रदा॥ षष्टिघ्नं चन्द्रनक्षत्रं तत्कालघटिकान्वितम्।
वेदघ्नमग्निपुवेदाप्तमवस्था भानुभाजिताः॥ प्रवासनष्टाख्यमृता जयाहास्यारतिर्मुदा। सुप्तिर्भुक्ति
ज्वराकम्पसुस्थितिनामिर्संनिभाः॥ (नारदसंहिता 13, 6-8)