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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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अपराजितपृच्छा

वृश्चिक, कर्क और मीन राशि की ब्राह्मण संज्ञा कही है। धनु, मेष और सिंह
राशि की क्षत्रिय संज्ञा; कन्या, मकर और वृष राशि की वैश्य संज्ञा और मिथुन, तुला
एवं कुम्भ राशि की शूद्र संज्ञा कही गई है।¹
विप्रः कार्यों द्वादशभिः क्षत्रियो नवभिस्तथा।
षड्लग्नैश्च भवेद् वैश्यस्त्रिभिः शूद्रः प्रशस्यते॥ 32॥
सामान्यतया बारह लग्नों से विप्र (ब्राह्मण) कार्य होते हैं। नौ लग्नों से क्षत्रिय
कार्य; छह लग्नों से वैश्य कार्य और तीन लग्नों से शूद्र कार्य प्रशस्त कहे गए हैं।
सिंहाली च घटवृषौ लग्नवेलासु चोत्तमाः।
प्रासादप्रतिमालिङ्गजगतीपीठमण्डपात् ॥ 33 ॥
प्रासाद, प्रतिमा, लिङ्ग, जगती, पीठ और मण्डप के लिए सिंह, वृश्चिक, कुम्भ
और वृष राशि के लग्न उत्तम माने गए हैं।
नगरारामनिवेशं प्रतिष्ठाऽम्बुनिधेस्तथा।
**गढदुर्ग