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अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

सूत्र-३४ 163
(इस शास्त्र का सम्बन्ध सङ्गीत विद्या से है जिसमें) तत्, घन, मुरजादि विविध
प्रकार के वाद्यों, नृत्य सम्बन्धी लास्य, हास्य, ताण्डव आदि तालमूल से उत्पन्न होने
वाले ससस्वर, तीन ग्राम, इक्कीस मूर्च्छना, उनचास तान व स्वरमण्डल, छह राग,
छत्तीस रागिनियों का वर्णन किया गया है। यह वर्णन विजय के प्रति 'भरत' के नाम
से कहा गया था।¹
मन्दरस्थं सुखासीनं सिद्धार्थः पृष्टवान् पुरा।
तालुकण्ठस्वरशास्त्रं गणितं ज्योतिषं तथा ॥ 15 ॥
निघण्टुश्च व्याकरणं छन्दोलङ्कारसंयुतम् ।
मनुसाध्यसमुद्भूतं संसारपाशछेदनम् ॥ 16 ॥
मुक्तिमार्गरहस्यं च कथितं भक्तवत्सलैः।
तुर्योऽयं मानसः पुत्रः पृच्छति त्वराजितः ॥ 17 ॥
पूर्वकाल में मन्दर पर्वत पर सुखासन पर बैठे हुए सिद्धार्थ ने प्रश्न किया था।
इस पर जिस ग्रन्थ का कथन हुआ² उसमें तालुकण्ठ से सम्बद्ध स्वरशास्त्र,
गणितशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र, निघण्टु-शब्दकोष, व्याकरण, छन्दालङ्कार भी रहे हैं।
यह ग्रन्थ (सिद्धार्थ पृच्छा) मनुओं, साध्यों द्वारा संसार के सम्बन्धों को काटने
(संसारपाश के छेदन) के प्रयोजन से रचा गया। इनमें इन भक्तिवत्सल भक्तों पर
कृपा करने वाले महापुरुषों ने मुक्तिमार्ग का रहस्य भी कहकर समझाया है। अब
चौथा मानसपुत्र अपराजित यह प्रश्न करता है।
ग्रन्थोत्पत्तिवर्णनं, अपराजित उवाच —
अस्मच्चित्ते प्रबोद्धव्यं जयाय पृच्छते च यत्।
विजयश्च सिद्धार्थश्च पृच्छायां यत्तथैतयोः ॥ 18 ॥
भवान् पुष्पकमारुह्य प्रोक्तवान् यदनुग्रहात्।
पूर्वं सर्वं प्रसादेन कथयस्व जगत्पते ॥ 19 ॥
अपराजित ने कहा— आपने कृपाकर मेरे चित्त को प्रबोध किया है। आपने
पूर्व में कथित जयपृच्छा और उसी प्रकार विजयपृच्छा तथा सिद्धार्थपृच्छा के विषय

  1. विजयपृच्छा नामक यह मूल ग्रन्थ वर्तमान में अनुपलब्ध हैं किन्तु नाट्यशास्त्र व उसकी वृत्ति,
    विष्णुधर्मोत्तर पुराणोक्त नृत्तसूत्राध्याय, सङ्गीतरत्नाकर, सङ्गीतराज, सङ्गीतमकरन्द आदि में उक्त समस्त
    विषय मिलते हैं।
  2. सिद्धार्थपृच्छा संज्ञक ग्रन्थ अद्यावधि अनुपलब्ध, असूचित है। ये अधिकांश विषय नारदपुराण के
    पूर्वभाग में प्रकीर्णित हैं और अग्निपुराण में भी आए हैं। हेमाद्रि के व्रतखण्ड में सिद्धार्थपृच्छा के श्लोक
    मूर्तिलक्षणों के प्रसंग में उद्धृत हैं।

164 अपराजितपृच्छा
में भी मुझे समझाया है। अब हे जगत्पते ! आप पुष्पक विमान पर आरूढ़ हो जाएँ
और मेरे पर अनुग्रह कर जो कुछ आपने पूर्व में कहा है, उस सब विषयों को मेरे
प्रति यहाँ (इस ग्रन्थ के प्रयोजन से) पुनः कृपाकर कहें।¹
पुष्पकं तु समारुह्य मेरुमार्गप्रदक्षिणम्।
अवालोकि तथा चैषा समुद्रान्ता च मेदिनी ॥ २० ॥
इस पर पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर मेरुपर्वत के मार्ग से प्रदक्षिणा करते
हुए समस्त पृथ्वी को समुद्रपर्यन्त देखते हुए विश्वकर्मा आगे बढ़े।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
जयविजयसिद्धार्थपृच्छाधिकारो नाम चतुस्त्रिंशं सूत्रम् ॥ ३४ ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में जय-
विजय-सिद्धार्थपृच्छा अधिकार नामक चौंतीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ३४ ॥
एकविंशतिस्वर्गा नाम पञ्चत्रिंशं सूत्रम् ॥ ३५ ॥
विश्वकर्मोवाच —
पुष्पकं तु समारुह्य मेरुमाश्रित्य दक्षिणम्।
विलोकिता भूतधात्री समुद्रान्ता च मेदिनी ॥ १ ॥
अथातो भूतधात्रीणां प्रमाणं च प्रवक्ष्यते ।
विष्कम्भः परिधिश्चैव बाहुल्यं (क्षेत्राणां) शृणु ॥ २ ॥
पुष्पक विमान पर आरूढ़ हो, सुमेरु पर्वत के आश्रय से प्रदक्षिणा करते हुए
और समुद्रान्त तक के प्राणियों को धारण करने वाली धरती को देखते हुए भगवान्
विश्वकर्मा ने कहा कि अब मैं प्राणीमात्र को धारण करने वाली इस पृथ्वी का प्रमाण
बताता हूँ। तुम इसके विष्कम्भ या व्यास, परिधि और क्षेत्र के बाहुल्य के बारे में
सुनो।
पृथ्वीप्रमाणमाह —
योजनानि तु विष्कम्भो दशकोट्यः प्रकीर्तितः ।
लक्षस्याग्रे सहस्राणामेकोनाविंशतिस्तथा ॥ ३ ॥

  1. इस प्रकार इस ग्रन्थ में जयपृच्छा, विजयपृच्छा, सिद्धार्थपृच्छा के समस्त विषयों का वर्णन होना सिद्ध
    होता है। विमानारूढ़ होकर विषय वर्णन करने से यहाँ आशय ग्रन्थकार के यायावर होकर ग्रन्थ विषयों
    की संग्राहानुभूति भी सम्भव है। वैसे ग्रन्थकार ने एकाधिक देशों की यात्रा की और वहाँ के भूगोल,
    परम्पराओं को स्वयं जाना व तदोपरान्त ही उन्हें लिखित रूप दिया।

सूत्र-३५ 165
विष्कम्भे च त्रिगुणिते तद्दशांशसमन्विते ।
परिधिश्च समस्तोऽसौ समुद्रान्तक्षितेः स्मृतः ॥ ४ ॥
एकविंशतिकोटीनां समलक्षाणि चाग्रतः ।
ततः परं सहस्राणि सङ्ख्यया सप्तविंशतिः ॥ ५ ॥
एवं समस्तपरिधिर्वृत्ताकारा च मेदिनी ।
त्रैलोक्यमध्ये चैवं सा तलाद्याश्चैव बाह्यतः ॥ ६ ॥
इसका व्यास दस करोड़ योजनों का बताया गया है और एक लाख उन्नीस
हजार विष्कम्भ के तिगुने तथा उसके समांश युक्त परिधि की समुद्रान्ता पृथ्वी की
कही गई है अर्थात् विष्कम्भ से 3¹/⁷ परिधि है। इक्कीस करोड़, सात लाख, एक
हजार- इस प्रकार समस्त परिधियुक्त वृत्ताकार में यह पृथ्वी है जो तीनों ही लोकों
के मध्य में तलादि पातालों के बाहर है।
स्वर्गपातालनामादीनां —
एकविंशतिस्वर्गांश्च मेरुमावृत्य दक्षिणम् ।
परितश्चार्णवाः सप्त रचिताश्च समस्तकाः ॥ ७ ॥
तलश्च वितलश्चैव सुतलो नितलस्तथा ।
तलातलो रसातलः पातालः सप्तमस्तथा ॥ ८ ॥
इस प्रकार मेरु को आवृत्त करते हुए दक्षिण की ओर इक्कीस स्वर्ग है जिनके
बाद में सात महासागर रचे गए हैं। अब पाताललोक के नाम सुनो जो इस प्रकार
हैं— (1.) तल, (2.) वितल, (3.) सुतल, (4.) नितल, (5.) तलातल, (6.)
रसातल और सातवाँ (7.) पाताल।
आदौ मेरुः कमोद्भूताः पात्रे पात्रमिवापरम् ।
एते च सप्तपातालाः सृष्टिकालसमुद्भवाः ॥ ९ ॥
उद्भूतश्चादितो मेरूर्द्विसहस्रैश्च योजनैः ।
द्विद्विसहस्रान्ते पुनः पातालाः सप्तधोदिताः ॥ १० ॥
आदि में तो यह मेरु उत्पन्न हुआ और बाद के क्रम में जैसे घड़े-पर-घड़े रखे
जाते हैं, वैसे ही एक दूसरे पर ये सातों पाताल भी क्रमानुसार सृष्टिकाल में उत्पन्न
हुए। आदि में मेरु पर्वत पृथ्वी में से दो हजार योजन ऊँचा ऊठा और इसी प्रकार
दो-दो हजार योजनों के अन्तर पर उसमें सातों पाताल नीचे की ओर से उठते चले
गए।

166 अपराजितपृच्छा
अधस्तात्तु तथा द्व्यष्टसहस्रैर्योजनैर्गतः ।
मेरुर्वै चतुरशीतिसहस्रयोजनोच्छ्रितः ॥ 11 ॥
पृथगेकैकपाताले नवनागकुलानि च।
नवकानि सप्त चेत्थं त्रिषष्टिः₆₃ कुलपन्नगाः ॥ 12 ॥
इन नीचे वाले पातालों में सोलह हजार योजन तक जाने पर मेरु चौरासी हजार
योजन ऊँचा उठा। इन पातालों में भी एक-एक पृथक् पाताल में नौ नागों के कुल
कहे गए हैं और इनके भी इसी तरह सातों पातालों में 9 × 7 के हिसाब से नागों
के कुल 63 कुल होते हैं।
नागकुलनामश्च —
प्रोक्तानि पृथगेवं च नवनागकुलानि च।
उरगाः सप्तपातालसंस्थिताः सप्त₇ वै क्रमात् ॥ 13 ॥
पद्मः कर्कोटकश्चैव पुण्डरीकोऽथ तक्षकः ।
आनकः शङ्खचूडश्च वासुकिः सप्तमस्तथा ॥ 14 ॥
इस प्रकार पृथक् रूप में नौ नागकुल कहे गए हैं। सात पातालों में संस्थित
सात उरग या नागों के क्रमानुसार नाम हैं— (1.) पद्म, (2.) कर्कोटक, (3.)
पुण्डरिक, (4.) तक्षक, (5.) आनक, (6.) शङ्खचूड और सातवाँ (7.) वासुकि।
सप्तपातालाधिराजा महोत्कटमहाबलाः ।
रौद्राश्च विद्रुताः सर्व्वे ह्यगम्या वीरविक्रमाः ॥ 15 ॥
उक्त सभी सातों ही पातालों के अधिराज है और बड़े ही विकट, महाबलवान
हैं। ये सभी बड़े भयानक, बड़े तीव्रगामी और इतने वीर विक्रम हैं कि इनको कोई
पार नहीं पा सकता।
तले तु पद्मको राजा वितले स्यात्कर्कोटकः ।
सुतले पुण्डरीकश्च नितले स्यात्तु तक्षकः ॥ 16 ॥
तलातले आनकश्च शङ्खचूडो रसातले।
वासुकिर्नागराजन्द्रः पाताले सर्वतोऽधिपः ॥ 17 ॥
एकैके नवकुलकास्त्रिषष्टिः₆₃ कुलपन्नगाः ।
तल का राजा पद्मक₁ है, वितल का राजा कर्कोटक₂, सुतल का पुण्डरिक₃,
नितल का तक्षक₄, तलातल का आनक₅, रसातल का शङ्खचूड़₆ तथा वासुकि, नाग
राजेन्द्र पाताल में सबके अधिपति कहे गए हैं। इस प्रकार एक-एक नौकुलों के
तिरेसठ नागकुल होते हैं।

सूत्र-३५ 167
धरत्र्यां द्वीपनामानि —
सप्तपातालतश्चोर्ध्वं द्वीपाः स्युर्द्वीपतः परे ॥ 18 ॥
जम्बूः प्लक्षः कुशः क्रौञ्चः शाकः शाल्मलिकस्तथा ।
सप्तमः पुष्कराख्यश्च सप्तद्वीपा तु मेदिनी ॥ 19 ॥
इन सात पातालों के ऊपर कई द्वीप हैं और इन द्वीपों के ऊपर ( 1. ) जम्बू,
( 2. ) प्लक्ष, ( 3. ) कुश, ( 4. ) क्रौञ्च, ( 5. ) शाक, ( 6. ) शाल्मलि तथा ( 7. )
पुष्कर द्वीप है। इसी प्रकार यह पृथ्वी सप्तद्वीपा कही गई है।
नृपाभिधानतः प्रोक्तं सप्तद्वीपाभिधानकम् ।
पुष्कराख्यो महाराजा द्वीपे सप्तमकेऽधिपः ॥ 20 ॥
गोमेदेशश्च गोमेदः शाल्मलिके च शाल्मलिः ।
शाकस्तु शाकद्वीपेशः क्रौञ्चः क्रौञ्चाधिपस्तथा ॥ 21 ॥
कुशेशस्तु कुशः प्रोक्ता महोत्कटो महाबलः ।
अब इन सात द्वीपों के क्रमवार नृपों के नामों के विषय में कहता हूँ। सातवाँ
द्वीप पुष्कर नाम का है जिसके अधिपति महाराज पुष्कर है। गोमेद द्वीप के राजा
गोमेद, शाल्मलि द्वीप के शाल्मलि, शाक द्वीप के शाक और क्रौञ्च द्वीप के क्रौञ्च
अधिपति है। कुशद्वीप का अधिपति कुश नाम से है जो बड़ा ही विकट और
महाबलवान है।
महाविक्रमभूपालाः संस्थिता मेरुदक्षिणम् ॥ 22 ॥
मेरुदक्षिणकुक्षौ च महाजम्बुतरूद्भवः ।
यस्य नाम्ना तु विख्यातो जम्बुद्वीपः स उच्यते ॥ 23 ॥
इस मेरु के दक्षिण कुक्षों में महापराक्रमी राजा बसे हुए हैं। मेरु के दक्षिण में
एक महान् जम्बूतरी या जामुन का वृक्ष है। इसी के नाम से विख्यात् होने से इसको
जम्बू द्वीप कहा जाता है (जैसा कि वायुपुराण में भी आया है)।
एकछत्रं पृथो राज्यं जम्बुद्वीपे प्रकीर्तितम् ।
क्षीरार्णवमध्ये चेवं पृथुत्वं लक्षयोजनः ॥ 24 ॥
इस जम्बू द्वीप का एक छत्र राजा पृथु के नाम से विख्यात है। यह जम्बू द्वीप
क्षीरार्णव के बीच में एक लाख योजन के विस्तार वाला है।
समस्ताः समभूयास्तु प्रयुक्ता द्वीपसागराः ।
अभिधानानि चैतेषां कथ्यन्ते त्वपराजित ॥ 25 ॥

१७७ अपराजितपृच्छा
ये समस्त सातों ही द्वीप समान भाव से सागरों में फैले हुए हैं जिनके नाम हे
अपराजित! अब मैं तुम्हें कहता हूँ।
सागरनामानि —
क्षारोदं चैव क्षीरोदं सागरौ दधिसर्पिषोः ।
मध्विक्षूदं तथा ख्यातं रसोदं सप्तमं तथा ॥ २६ ॥
सप्तैते द्वीपान्तरेषु स्थिता मेरुप्रदक्षिणम्।
सप्तद्वीपार्णवाश्चैवं सृष्टिकाले समुद्भवाः ॥ २७ ॥
(१.) क्षारोद, (२.) क्षीरोद, (३.) दधि, (४.) सर्पि, (५.) मधु, (६.) इक्षु
तथा (७.) रसोद— ये सात सागरों के नाम विख्यात हैं। ये सभी सातों द्वीपान्तरों पर
मेरु के प्रदक्षिण क्रम में बने हुए सप्तद्वीपार्णव सृष्टिकाल में ही उत्पन्न हुए थे।
स्वर्गनामानि —
भुवर्लोकश्च स्वर्लोको महर्लोकस्तथा जनः।
तपश्च सत्यलोकश्च ज्ञानलोकश्च सप्तमः ॥ २८ ॥
इत्येकविंशतिस्वर्गा₂₁ अधिरचित ? शम्भूद्भवाः।
(अब सात स्वर्गों के नाम सुनो) इनमें पहला (१.) भुवर्लोक, (२.) स्वर्लोक,
(३.) महर्लोक, (४.) जनलोक, (५.) तपलोक, (६.) सत्यलोक और (७.)
ज्ञानलोक है। ये सब इक्कीस स्वर्ग विधिरचित है और स्वयंभू है, शम्भु के द्वारा
उद्भूत हुए हैं।
सृष्टिकाले सुदृष्टाश्च स्वर्गाणामेकविंशतिः ॥ २९ ॥
पातालाश्च ब्रह्मभागे सप्तैवं तु सुसंस्थिताः ।
तदूर्ध्वे सप्त चाख्याता विष्णुभागे द्वीपार्णवाः ॥ ३० ॥
सृष्टिकाल से ही ये भली प्रकार से देखे गए इक्कीस स्वर्ग है। सातों पाताल भी
ब्रह्मभाग में इसी प्रकार सुसंस्थित है। इनके ऊपर विख्यात सात द्वीपार्णव विष्णुभाग
में स्थित हैं।
पुष्करोर्ध्वे भुवर्लोकः स्वर्लोकश्च तदूर्ध्वतः ।
तथा चैवानन्यलोकाः शम्भुभागे व्यवस्थिताः ॥ ३१ ॥
बाह्यतः सप्तलोकानां शिवलोकस्तदूर्ध्वतः ।
इत्युच्छ्रिते महामेरो स्वर्गा एवं सुसंस्थिताः ॥ ३२ ॥
पुष्कर के ऊपर ही भुवर्लोक है, इसके ऊपर स्वर्लोक है। इसी प्रकार अन्य सभी
लोक शम्भुभाग में व्यवस्थित हैं। इन सात लोक के बाहर शिवलोक इनसे ऊपर है,

सूत्र-३६ 169
इससे भी ऊँचा महामेरु है जहाँ स्वर्ग इसी प्रकार सम्यक् प्रकार से स्थित है।
लोकाश्च सप्त चाख्याता मृत्युलोके द्वीपार्णवाः ।
पातालाः सप्तधा चैव त्रैलोक्यमिति प्रोच्यते ॥ ३३ ॥
एकविंशतिस्त्रैलोक्ये स्थिताः स्वर्गा यथाक्रमम् ।
ऊर्ध्व चैव भवस्थानं पात्रे पात्रमिवापरम् ॥ ३४ ॥
सात लोक विख्यात् है। मृत्युलोक में द्वीपार्णवों में पाताल भी सात और इन
सबको त्रैलोक्य कहते हैं। इन इक्कीस त्रिलोकों में स्वर्ग क्रमवार स्थित है। ये सभी
भवस्थान से ऊपर की ओर ऊपरोपरि इसी प्रकार स्थित हैं जैसे कि कलशों पर
कलश होते हैं।¹
मध्ये च जम्बुद्वीपस्य प्रमाणमपि कथ्यते ।
मेर्वाद्या मुख्यशैलाश्च क्षेत्राणि च समासतः ॥ ३५ ॥
इस जम्बू द्वीप के मध्य का प्रमाण भी कहता हूँ। मेरु से लेकर मुख्य-मुख्य
पर्वतों और क्षेत्रों के बारे में भी मैं आगे संक्षेप से कहूँगा।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
मेकविंशतिस्वर्गाधिकारो नाम पञ्चत्रिंशत्तमं सूत्रम् ॥ ३५ ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में इक्कीस
स्वर्गाधिकार नामक पैंतीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ३५ ॥
महापर्वतप्रमाणं षट्त्रिंशं सूत्रम् ॥ ३६ ॥
विश्वकर्मावाच —
जम्बूद्वीपप्रमाणं च विस्तारे लक्षयोजनैः ।
तस्यान्ते वृत्तपरिधौ समस्तं च क्षीरार्णवम् ॥ १ ॥
विश्वकर्मा बोले— जम्बूद्वीप का प्रमाणतः विस्तार एक लाख योजन का है।
इसके अन्तमें चारों ओर वृत्त की परिधि रूप में समस्त क्षीरार्णव है।
क्षेत्राणां क्षेत्रमानं च पर्वताश्च मेधोपमाः ।
महापर्वतोद्द्भवाश्चाप्रमाणा मानवर्जिताः ॥ २ ॥

  1. यही वर्णन ग्रन्थ के चौथे व अन्य सूत्रों में भी आया है— सप्तोर्ध्वलोकाश्च ख्याता रुद्रभागसमुद्भवाः ।
    स्वर्गश्च मर्त्यपातालौ स्वर्गाणां त्वेकविंशतिः ॥ (अपराजित. 4, 5) अर्थात्— सात ऊर्ध्वलोक जो विख्यात
    हैं, उनको स्वयं भगवान रुद्र ने ही उत्पन्न किया। इससे हम पाते हैं कि स्वर्गलोक, मृत्युलोक और
    पाताललोकादि स्वर्गों की संख्या इक्कीस है।

170 अपराजितपृच्छा
इसके क्षेत्रों का क्षेत्रमान तथा इसके पर्वत विशाल मेघों, बादलों जितने बड़े हैं
जिनका प्रमाण और उद्भव का मान बताना अत्यन्त दुष्कर है अर्थात् इनका अनुमान
भी नहीं लगाया जा सकता है।
जम्बूद्वीपस्य मध्ये तु मेरुश्च पर्वतो महान्।
स्थितौ मेरोः पूर्वतश्च मन्दरो गन्धमादनः ॥ ३ ॥
इस जम्बूद्वीप के मध्य में स्थित है महान मेरुपर्वत जिसके पूर्व की ओर मन्दर
और गन्धमादन पर्वत है।
हिमवान् हेमकूटश्च महोशैलस्य दक्षिणे ।
पश्चिमे पर्वतौ रम्यौ निषधो नील एव च ॥ ४ ॥
इसी तरह हिमवान, हेमकूट नामक महापर्वत मेरु के दक्षिणी ओर है और मेरु
के ही पश्चिम में बड़े सुन्दर निषध और नील पर्वत हैं।
श्वेतश्च शृङ्गवांश्चैव मेरोरुत्तरतः स्थितौ ।
एते चाष्टकुला रम्या दिक्षु चैवं व्यवस्थिताः ॥ ५ ॥
श्वेत और शृङ्गवान पर्वत मेरु के उत्तर में स्थित है। ये सभी पर्वतों के आठों ही
कुल बड़े सुन्दर है और अपनी-अपनी दिशाओं में व्यवस्थित है।
देशे समुद्रापकण्ठे महाशैलाः पुरोभवाः ।
उदयाद्रिर्मलाशैलः पूर्वायां च बलादिषु ? ॥ ६ ॥
जम्बूद्वीप के समुद्रों के उपकण्ठ अर्थात् किनारे के प्रदेश में जो महान पर्वत
पहले उत्पन्न हुए हैं, उनमें उदयाद्रि नामक जो महाशैल है, वह पूर्व दिशा की ओर
विस्तृत है (चलादिषु ?)।
वारुण्यां तु महावृद्धस्त्रिकूटाख्यश्च दक्षिणे ।
उत्तरे द्विपशैलाख्यः संस्थिताः स्युरनुक्रमैः ॥ ७ ॥
जम्बूद्वीप की वारुणी दिशा में महावृद्ध और दक्षिणी दिशा में त्रिकूट पर्वत है
तथा उत्तर में द्विपशैलाख्य अर्थात् हाथियों का कदली वन वाला पर्वत है। ये सब
अनुक्रम में स्थित है अर्थात् दिशावार अवस्थित है।
द्वयष्टसहस्रमध्यस्थः सप्तपातालतो भवः ।
सपद्मकर्णकाकारैर्मेरुः काञ्चनकन्दरैः ॥ ४ ॥
सोलह हजार के मध्य में सप्तपाताल से उत्पन्न पद्म के सहित कर्णिका दण्डी के
आकार में मेरु पर्वत सोने की-सी कन्दरों से युक्त है।

सूत्र- ३६ 171
योजनैर्दशसाहस्रैः पृथुत्वं मेरुमस्तके।
द्वात्रिंशद्भिः सहस्त्रैश्च जम्बूद्वीपस्य मस्तके ॥ ९ ॥
वह दस हजार योजन के विस्तार वाला, मोटाई लिए हुए मस्तक अर्थात् शिखर
वाला है और यह जम्बूद्वीप के मस्तक पर बत्तीस हजार योजन में फैला हुआ है।
मन्दरो हेमकूटश्च निषधश्च श्वेताचलः ।
भूदण्डवत्प्रमाणाश्च सहस्त्रयोजनोच्छ्रिताः ॥ १० ॥
इस जम्बूद्वीप. में मन्दर, हेमकूट, निषध तथा श्वेताचल इस भूमि को नापने वाले
दण्ड की भाँति है और प्रमाण में एक हजार योजन ऊँचाई के हैं।
हिमवान् शृङ्गवांश्चैव नीलो वै गन्धमादनः ।
प्रमाणं योजनैः ख्यातं सार्धद्वयं समुच्छ्रितेः ॥ ११ ॥
इसी प्रकार हिमवान, शृङ्गवान, नील और गन्धमादन भी प्रमाण में ढाई हजार
योजन ऊँचे हैं।
मन्दरस्य तुलोदयाक्ष चतुराशी त्रिकूटो द्युतः ?।
महाविन्ध्योदयतुल्यः शैलोऽन्यस्त्रिकूटस्तथा ॥ १२ ॥
उच्छ्रयो द्विगुणस्तारात् तदर्ध मध्यतुङ्गता ।
एवं मानं च शैलानां कथितं त्वपराजित ॥ १३ ॥
मन्दर के तुलोदयाक्ष, चतुराशी, त्रिकूट और द्यूत हैं जो महा विन्ध्योदय के
समान है और अन्य पर्वत त्रिकूट तथा ऐसे अन्य ऊँचाई में उनसे दुगुने हैं और
ऊँचाई में उनसे आधे हैं। वे मध्यम तुङ्ग अर्थात् मध्यम ऊँचाई के पर्वत है। हे
अपराजित ! इस प्रकार का मान मैंने इन पर्वतों का कहा है।
मन्दरो गन्धमादश्च याम्योत्तरे च दण्डवत् ।
हिमवान् हेमकूटश्च पूर्वापरे स्थितौ तथा ॥ १४ ॥
मन्दर, गन्धमादन याम्योत्तर दिशा में लम्बाई में दण्डवत फैले हुए हैं और
हिमवान, हेमकूट पूर्वापर लम्बाई में दण्डवत स्थित है।
उत्तरे ? नीलनिशधौ श्वेतशृङ्गी पूर्वापरौ ? ।
कुलाचलाश्च कर्णस्था विदिशोद्भवसागरेः ? ॥ १५ ॥
उत्तर की ओर नील और निषध; श्वेत और शृङ्गी पूर्व व पश्चिम की ओर;
कुलाचल और कर्ण विदिशोद्भव होकर सागर के किनारे पर स्थित है।
इत्यमनन्तर क्षेत्रसीमाविस्तारमाह —
क्षेत्रसीमा प्रमाणाख्यं मेरुमावृत्य दक्षिणेः ।

172 अपराजितपृच्छा
शैलान्तरेषु क्षेत्राणि कथयामि समासतः ॥ 16 ॥
अब मैं क्षेत्र सीमाओं का प्रमाण मेरु के चारों ओर दक्षिण के पहाड़ों के अन्तर
में पड़ने वाले क्षेत्रों आदि का संक्षेप में कहता हूँ।
उदयाद्रिश्च पूर्वे तु त्रिकूटः स्यात्तु दक्षिणे।
महाविन्ध्योऽपरे चैवं द्वीपशैलाः पूर्वोत्तरे ॥ 17 ॥
पूर्व की ओर जो उदयाद्रि है और दक्षिण की ओर त्रिकूट पर्वत है तथा
महाविन्ध्यों परे भी द्वीपशैल पर्वत पूर्वोत्तर दिशा में है।
तेषामन्ते समुद्राश्च संस्थिताः स्युः प्रदक्षिणम्।
तेषामन्ते पुनर्द्वीपो द्वीपान्ते चैव सागराः ॥ 18 ॥
इन सब के अन्त में समुद्र संस्थित है जो प्रदक्षिणा करता हुआ-सा प्रतीत होता
है। इसके अन्त में पुनः द्वीप है और उन द्वीपों के अन्त में पुनः सागर है।
सप्तद्वीपाः समुद्राश्च क्रमेणापि सुसंस्थिताः।
जम्बूद्वीपप्रमाणेन द्विगुणा द्विगुणोत्तराः ॥ 19 ॥
इस तरह सात द्वीप और सात सागर क्रमवार बने हुए हैं जो जम्बूद्वीप के प्रमाण
से प्रत्येक एक दूसरे से दुगुने होते जाते हैं।
इयं युक्तिर्विधातव्या द्वीपे द्वीपे तु शैलजाः ? ।
संस्थिताः क्रमयोगेन पूर्वापरयाम्योत्तरे ॥ 20 ॥
इस युक्ति से द्वीप-द्वीप में शैल बने हुए हैं जो क्रमवार स्थित है। एक दूसरे के
बाद दक्षिण से उत्तर दिशा तक विस्तार में फैले हुए हैं।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
महापर्वतप्रमाणाधिकारो नाम षट्त्रिंशं सूत्रम् ॥ 36 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में महापर्वत
प्रमाण अधिकार नामक छत्तीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 36 ॥
विश्वकर्मोवलोकितपृथ्वीनवखण्डानिं सप्तत्रिंश सूत्रम् ॥ 37 ॥
विश्वकर्मोवाच —
राजेन्द्रस्य पृथोः पूर्वमष्ट₈ पुत्रा प्रकीर्तिताः ।
अष्टवर्षाधिपतय आत्मराज्यं तु मध्यतः ॥ 1 ॥
विश्वकर्मा बोले कि पृथु राजा के आठ पुत्र पूर्वकाल में कहे गए हैं जो आठ
प्रदेशों के अधिपति बनाए गए और राजा पृथु ने अपना राज्य उन प्रदेशों के

सूत्र-३७ 173
मध्यवाले प्रदेश में रखा था।
तद्विभक्तानि क्षेत्राणि क्षारार्णवस्य मध्यतः।
शैलान्तरेषु ख्यातानि क्षेत्राणि नव सङ्ख्यया ॥ २ ॥
क्षारार्णव या लवण सागर के मध्य के इन क्षेत्रों को उन पुत्रों में विभक्त करके
अलग-अलग पहाड़ों के अन्तर से सीमाबद्ध करके इस प्रकार से अपने राज्य सहित
कुल नौ संख्या में क्षेत्रों का निर्माण किया।
इलाक्षं दिव्यकं चैव भारतं हरिवर्षकम्।
किम्पुरुषः केतुमालः सम्भवो मानदण्डकः ॥ ३ ॥
रम्यकं मध्यक्षेत्रं च मेरुमावृत्य दक्षिणम्।
एतानि नवक्षेत्राणि जम्बूद्वीपस्य मध्यतः ॥ ४ ॥
इलाक्ष, दिव्यक, भारत, हरिवर्ष, किंपुरुष, केतुमाल, सम्भव, मानदण्ड और
नवाँ रम्यक— इस प्रकार ये सभी मध्य क्षेत्र और मेरु पर्वत की परिक्रमा करके
दक्षिण में स्थित थे। ये सभी नवक्षेत्र जम्बूद्वीप के मध्य में थे।¹
मन्दरो हेमकूटाख्यो निषधः श्वेतपर्वतः।
एतन्मध्ये रम्यकं च मेरुमावृत्य दक्षिणम् ॥ ५ ॥
मन्दर, हेमकूट, निषध, श्वेतपर्वत और इनके मध्य में रम्यक है। ये सभी
मेरुपर्वत के चारों ओर वृत्ताकार होते हुए दक्षिण में स्थित पर्वत है।
मन्दरगन्धमादनमध्ये चेलावृतोद्भवः।
गन्धमादनोदयाद्रिमध्ये दिव्यकमुच्यते ॥ ६ ॥
मन्दर और गन्धमादन के मध्य में इलावर्त तथा गन्धमादन और उदयाद्रि के
मध्य दिव्यक है।
हिमवद्धेमकूटान्तर्वर्षो नाम्ना हरिस्तथा।
त्रिकूटहिमवन्तर्वर्षो भारत उच्यते ॥ ७ ॥
हिमवत् और हेमकूट के बीच के वर्ष अर्थात् क्षेत्र का नाम हरि है तथा त्रिकूट
और हिमवन्त के बीच के वर्ष अर्थात् क्षेत्र का नाम भारत कहा जाता है।
निषधनीलयोर्मध्ये किम्पुरुषो नाम्नोत्तमः।
नीलाम्बुध्योर्मध्यतश्च केतुमालश्च नामतः ॥ ८ ॥

  1. विष्णुपुराण में आया है— इन्द्रद्वीपः कसेरुश्च ताम्रपर्णो गभस्तिमान् ॥ नागद्वीपस्तथा सौम्यो गन्धर्वस्त्वथ
    वारुणः। अयं तु नवमस्तेषां द्वीपः सागरसंवृतः॥ (2, 3, 6-7)

174
निषध और नील के मध्य के क्षेत्र को भी किम्पुरुष उत्तम नाम से जाना जाता
है। नीलम्बुध के मध्य में केतुमाल नाम से जाना जाता है।
निषधनीलयोर्मध्ये किम्पुरुषः नाम्नोत्तमः ।
नीलाम्बुध्योर्मध्यतश्च केतुमालश्च नामतः ॥ 9 ॥
उक्त श्लोक पुनर्प्रकाशित हुआ है।
श्वेतशृङ्गवतोर्मध्येप्रम्प्यको नाम नामतः ।
शृङ्गवद् द्वीपशैलान्तर्मानदण्डसमुद्भवः ॥ 10 ॥
श्वेत और शृङ्गव के मध्य क्षेत्र को रम्यक् नाम दिया गया है। शृङ्गवद और द्वीप
शैलान्त के बीच मानदण्ड का उद्भव हुआ।
शुद्धस्फाटिकसङ्काशा दिव्याभरणभूषिताः ।
चन्द्रकान्त्यमृताहारा नरा नार्योऽयुतायुषः ॥ 11 ॥
इलावर्ते ज्ञानयुता नरनारीस्वरूपिणः ।
इन सभी क्षेत्रों के अरबों की संख्या में नर-नारी निवास करते हैं जो सब शुद्ध
स्फटिक के समान गौर वर्ण के हैं और ये सभी जन दिव्याभरणों से विभूषित हैं तथा
चन्द्रमा के समान शीतल कान्ति युक्त और अमृत का आहार करने वाले हैं। इलावर्त
के सभी नर-नारी ज्ञानवान और स्वरूपवान है।
अथ दिव्यवर्षवर्णनम् —
अथातो दिव्यवर्षं च कथयामि समासतः ॥ 12 ॥
धूलिता भस्माङ्गरागाः क्रूरा उग्रा मलीकृताः ।
जटामुकुटशोभाढ्या दिव्यक्षेत्रेऽयुतायुषः ॥ 13 ॥
अब मैं दिव्य वर्ष के अर्थात् क्षेत्र के बारे में संक्षेप से कहता हूँ। अङ्ग में भस्म,
राग से धूलित, क्रूर स्वभाव के तथा उग्र रूपी मैले-कुचैले, जटामुकुट धरे लोग
अरबों की संख्या में दिव्य क्षेत्र में बसते हैं।
शतायुषो हरिवर्षे बौद्धाख्या हीनतेजसः ।
गौरश्यामा नरा नार्यो बुद्धधर्मप्रपालकाः ॥ 14 ॥
सौ वर्ष की आयु पाने वाले बौद्ध नाम से विख्यात्, हीन तेज वाले, कुछ गोरे
और कुछ काले श्यामवर्णी नर-नारी बुद्धधर्म को पालने वाले लोग हरिवर्ष में
निवास करते हैं।
श्यामा गौराश्चतुर्वर्णो भरते च शतायुषः ।
देवाग्निगुरुभक्ताश्च वेदशास्त्रप्रपारगाः ॥ 15 ॥

सूत्र- ३७ 175
श्याम वर्णी, गौर वर्णी चारों ही वर्णों के लोग सौ वर्ष तक की आयु तक जीने
वाले भारत में रहते हैं। वे सभी देवता, अग्नि और गुरुभक्ति में लीन और वेद
शास्त्रादि में पारङ्गत होते हैं।
चतुरशीतिविद्यासु सूत्रकर्मसु कौशलाः ।
धर्मशास्त्रादिनिपुणा भोगयुक्ता विभूतिकाः ॥ 16 ॥
ये सभी चौरासी प्रकार की विद्याओं में तथा सूत्रकर्म-शिल्प में कुशल और
धर्म शास्त्रादि में निपुण तथा सभी भोगों से युक्त और विभूतियों से सम्पन्न हैं।
नराः श्वेताः किंपुरुषे महारूपास्तथा स्त्रियः ।
युक्ताः केशाद्यलङ्कारै रमन्ते कामवन्दकाः ॥ 17 ॥
किंपुरुष क्षेत्र के नर-नारी सभी गौरवर्ण और महान् रूपवाले होने से केशादि
अलङ्कारों से युक्त रहते हुए तरह-तरह की काम-क्रीड़ा में मौज-मस्ती में रहते हैं।
केतुमाले किन्नराणां नार्यो रूपसमन्विताः ।
सर्वे धर्मरताश्चैव त्रिशतायुष्कजीवनाः ॥ 18 ॥
केतुमाल क्षेत्र में किन्नरगणों की नारियाँ बड़ी रूप-यौवना समन्वित है और
सभी धर्मभावना में लीन रहते हुए तीन सौ वर्षों तक की आयु तक जीवित रहते हैं।
सम्भवे ब्रह्मतेजस्विवेदशास्त्रादिपारगाः ।
पञ्चशतवर्षायुषः पद्मरागनिभोदराः ॥ 19 ॥
सम्भव क्षेत्र के निवास ब्रह्मतेज से युक्त होते हैं और वे सभी वेद शास्त्रादि में
पारङ्गत होते हैं तथा पाँच सौ वर्षों तक जीवन यापन करने वाले पद्मराग के समान
उदर वाले होते हैं।
मानदण्डे प्रचण्डाश्च नरा नार्यो ज्ञानोद्भवाः ? ।
योगीन्द्राश्चायुतायुष्का दिव्या नार्योऽग्नितेजसः ॥ 20 ॥
इसी प्रकार मानदण्ड क्षेत्र के नर-नारी बड़े ही प्रचण्ड और ज्ञानी होते हैं। यहाँ
के योगीन्द्र तो अरबों वर्षों की आयुष्य वाले होते हैं। नारियाँ भी अग्नि के तेज के
समान दिव्य होती है।
रम्यके दिव्यरूपाश्च नरा नारीगणास्तथा ।
देवलोके तत्पराख्या देवरूपानुरूपकाः ॥ 21 ॥
रम्यक क्षेत्र के नर दिव्यरूप होते हैं। नारियाँ भी वैसी ही होती हैं। देवलोक में
तत्परता वाले ये देवरूप के अनुरूप ही होते हैं।

सूत्र-३८ 177
ग्रामाणां च तथा सङ्ख्या देशानां च प्रमाणतः ।
राज्ञां च युक्तिमानं च अलङ्कारैस्तद्रूपतः ॥ २ ॥
अब यहाँ के ग्रामों तथा देशों की प्रमाणतः संख्या और यहाँ के राजागणों के
युक्तिमान और उनके अनुरूप अलङ्करणों यानी पदवियों को बताता हूँ।¹
कान्यकुब्जे ग्रामसङ्ख्या षट्त्रिंश₃₆ल्लक्षकाणि च ।
अष्टादश₁₈ लक्षमानं राज्यं गौडेश्वरे मतम् ॥ ३ ॥
कान्यकुब्ज की ग्राम संख्या छत्तीस लाख है और यहाँ के राजा गौड़ेश्वर की
पदवी या उपाधि धारण करते हैं जिनकी आय अठारह लाख मान कही गई है।
तदर्ध₁₈ कामरूपाश्च तत्समं मण्डलेश्वरम् ।
कार्त्तिकपुरे तत्सङ्ख्या चौडे लक्षद्वासमतिः₁₄॥ ४ ॥
इसका आधा कामरूप या आसाम है जहाँ के मण्डलेश्वर की पदवी प्राप्त राजा
की आय भी इसी के अनुरूप आधी है। कार्त्तिकपुर में भी संख्या उतनी ही अर्थात्
अठारह लाख है और यहाँ के अधीश्वर चौड़ कहलाते हैं जिनकी (वार्षिक) आय
चौदह लाख है।

  1. स्कन्दपुराण के माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड में राजा शतशृङ्ग के उत्तराधिकारियों के वर्णन में कुलदेवी
    कुमारी द्वारा भारतवर्ष के नौ खण्डों के बहत्तर विभाग करने का वर्णन है। इसमें मण्डल प्रदेश में चार
    करोड़ ग्राम व बालाक प्रदेश में ढाई करोड़ ग्राम निर्धारित किए गए। प्रदेशानुसार ग्रामों की संख्या इस
    प्रकार दी गई है—
    खुरासाहणक = सवा करोड़ ग्राम, अन्थल = चार लाख, नेपाल = एक लाख, कान्यकुब्ज = छत्तीस
    लाख, जनक = बहत्तर लाख, गौड़ = अठारह लाख, कामरूप = नौ लाख, लाहर्व व भालदेश = नौ-नौ
    लाख, कान्तिपुर = नौ लाख, माचिपुर = नौ लाख, जालन्धर व लोहपुर = नौ लाख, पाम्बीपुर व रटराज
    = सात-सात लाख, हरिआल = पाँच लाख, इड् = साढ़े तीन लाख, षाम्भण वाहक = साढ़े तीन लाख,
    नीलपुर = इक्कीस हजार, अम्ल = एक लाख, नरेन्द्र = सवा लाख, तिलङ्ग = सवा लाख, मालव =
    अठारह लाख बानवे हजार, सयम्भर = सवा लाख, मेवाड़ = सवा लाख, बागुरि = अस्सी हजार, गुर्जर
    = सत्तर हजार, पाण्डु = सत्तर हजार, तेजाकुति = बयालीस हजार, काश्मीर मण्डल = अड़सठ हजार,
    कौङ्कण = छत्तीस हजार, लघु कौङ्कण = चौदह सौ चालीस, सौराष्ट्र = पचपन हजार, ताड़ = इक्कीस
    हजार, अतिसिन्धु, अश्वमुख, सजानुहुति, वेणु, द्रविड़, भद्राश्व एवं देवभद्रार्श्व = दस-दस हजार, चिरायुष
    व यमकोटि = छत्तीस-छत्तीस हजार, रोमक = अठारह करोड़, कामरु, कर्णाटक तथा जाङ्गल = सवा-
    सवा लाख, स्त्रीराज्य = पाँच लाख, पुलस्ति = दस लाख, काम्बोज व कौशल = दस-दस लाख,
    वाहीक = चार लाख, लङ्का = छत्तीस हजार, वर्धमान = चौसठ हजार, सिंहलद्वीप = दस हजार,
    पाण्ड्य = छत्तीस हजार, भयानक = एक लाख, वरेन्द्रक = तीस हजार, मूलस्थान = पच्चीस हजार,
    यवन = चालीस हजार, पक्षबाहु = चार हजार ग्राम है। इस प्रकार बहत्तर देशों और उनके ग्रामों की
    संख्या है। भारतवर्ष के कुल ग्रामों की संख्या 96 करोड़, 72 लाख व 36 हजार है। (कुमारिकाखण्ड
    39, 125-163)

178 अपराजितपृच्छा
दक्षराज्ये सार्धसप्तलक्षाणि चैव सङ्ख्यया।
अष्टादश च लक्षाणि सहस्राणि द्विनवतिः ॥ ५ ॥
उज्जयिन्यां वै सपादलक्षाणि च स्वयम्भरे।
ललाटे गुर्जरे कच्छे सौराष्ट्रे लक्षकद्वयम् ॥ ६ ॥
दक्षराज्य में ग्रामों की संख्या साढ़े सात लाख है और उनसे होने वाली आय
भी साढ़े सात लाख ही है। उज्जयिनी के ग्रामों की संख्या अठारह लाख है और
आय भी अठारह लाख है। स्वयम्भर (साम्भर) राज्य की ग्राम संख्या सवा लाख है
तथा लाट, गुर्जर, कच्छ और सौराष्ट्र की ग्राम संख्या दो-दो लाख है।
सार्धत्रयं मरुकोटे लक्षाणां मरुमण्डले।
सिन्धुसागरदेशे तु सार्धलक्षत्रयं स्मृतम् ॥ ७ ॥
मरुकोट के ग्रामों की संख्या साढ़े तीन लाख है तथा मरुमण्डल, सिन्धुसागर
देश के ग्रामों की संख्या भी साढ़े तीन लाख मानी गई है।
खुरषाणे चत्वारिशल्लक्षाणि च तथैव च।
त्रिगर्तके द्विलक्षाणि तथा ग्रामास्तु सङ्ख्यया ॥ ८ ॥
खुरासान के ग्रामों की संख्या चार लाख है तथा इसी तरह त्रिगर्त के ग्रामों की
संख्या दो लाख है और उनके आय भी उतनी ही है।
सूर्यलक्षाण्यहिराज्ये षट्सार्धानि गुडाद्वीपे।
जलन्धरे सार्धत्रयं तथा लक्षाणि सङ्ख्यया ॥ ९ ॥
अहिराज्य की ग्राम संख्या बारह लाख और गुडाद्वीप की साढ़े छह लाख,
जालन्धर की साढ़े तीन लाख है।
ग्रामाः षष्टिसहस्राणि तथा षष्टिशतानि च।
षष्टित्रयस्तथा चैव चेत्थं काश्मीरमण्डलम् ॥ १० ॥
स्त्रीराज्यं च त्रिकूटाख्यं काश्मीरपूर्वगणाधिपः ?( पञ्चलक्षाधिश्च ) ।¹
हिमवान् दण्ड आख्यातो वर्षे भारतके तथा ॥ ११ ॥
काश्मीर मण्डल के ग्राम साठ हजार, साठ सौ तिरसठ है। काश्मीर के पूर्व में
त्रिकूट नाम का स्त्री गणराज्य है जहाँ स्त्रियाँ ही राज करती है। यही हिमवान् अर्थात्
हिमालय पर्वत भारतवर्ष की दण्डमान दीवार की तरह स्थित है।

  1. 'पञ्चलक्षाधिश्च' इति स्यात्। तथा च स्कन्दपुराणे माहेश्वरखण्डे— पञ्चलक्षाश्च ग्रामाणां स्त्रीराज्यं
    परिकीर्तितम ॥ ( कुमारिकाखण्ड 39, 53)

सूत्र- ३८ <span style="float: right;">179</span>
महापर्वताश्रिताश्च सजलाशयवर्तिनः ।
पर्वतार्णवमध्यस्थाः सजला देशसम्भवाः ॥ 12 ॥
इस हिमालय महापर्वत के आश्रय में अनेकों सजल जलाशय है इसलिए यह
भारत वर्ष हिमालय पर्वत और सागर के मध्य एक बहुत ही सम्पन्न सजल देश
सम्भव हो सका है।
सिन्धुसागरतो देशाः काश्मीरान्ता जलैर्युताः ।
गौडबङ्गकामरूपाः सजलाः कार्तिकेश्वरे ॥ 13 ॥
इसी के फलस्वरूप सिन्धुसागर तक के देशों से लेकर काश्मीर के अन्त तक
के देश सभी पूर्णतः जल से सम्पन्न है और गौड़, बङ्ग, कामरूप, कार्तिकेश्वर आदि
भी सजल, सम्पन्न क्षेत्र है।
महापर्वताश्रमा वै हिमाद्रौ गन्धमादने ।
श्वेतशृङ्गे हेमकूटे नीलनिशधमन्दरे ॥ 14 ॥
इस हिमालय महापर्वत में अनेकों आश्रम है जिनमें गन्धमादन, श्वेतशृङ्ग,
हेमकूट, नील, निष

180 अपराजितपृच्छा
आत्रिकूटं हिमाद्यन्तं योजनैः शतपञ्चभिः ।
पूर्वापरौतोयनिधी हिमदण्डश्च भारते ॥ १९ ॥
आत्रिकूट अर्थात् त्रिकूट से लेकर हिमालय के अन्त तक की लम्बाई पाँच सौ
योजन की कही गई है और पूर्वा-पर स्थिति में तोयनिधि, समुद्रपर्यन्त फैलकर
भारतवर्ष के लिए एक हिमदण्ड अर्थात् हिमालय की दीवार बनकर खड़ा है।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
भरतक्षेत्रग्रामसङ्ख्यानृपराज्यप्रमाणसङ्ख्याधिकारो नामाष्टात्रिंशत्तमं सूत्रम् ॥ ३८ ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में भरत क्षेत्र
की ग्राम संख्या, नृपराज्य प्रमाण संख्या अधिकार नामक अड़तीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ३८ ॥
वनयात्रानामैकोनचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ ३९ ॥
विश्वकर्मोवाच —
मेरुश्च मन्दरश्चैव पर्वतो गन्धमादनः ।
हिमवान् हेमकूटश्च निषधो नील एव च ॥ १ ॥
श्वेतश्च शृङ्गवांश्चैव महाशैलाः प्रकीर्तिताः ।
एते पर्वतराजाश्च महावननदीभवाः ॥ २ ॥
विश्वकर्मा बोले कि मेरु, मन्दर, गन्धमादन, हिमवान, हेमकूट, निषध, नील,
श्वेत, शृङ्गवान आदि सब महाशैल कहे गए हैं। ये सभी पर्वतराज हैं और इनसे
महावन और महानदियाँ उत्पन्न हुई हैं।
महेन्द्रौ मलयश्चैव महाविन्ध्यस्तथैव च ।
हिमाद्रिः पारियात्रश्च श्रीशैलश्च तथाऽर्बुदः ॥ ३ ॥
महावनानि ख्यातानि शृणु चोपवनानि च ।
त्रिधोदितं च क्रमतो वनोपवनकाननम् ॥ ४ ॥
महेन्द्र, मलय, महाविन्ध्याचल, हिमाद्रि, पारियात्र, श्रीशैल तथा अर्बुद ये सब
महावनों के लिए विख्यात है। अब उपवनों के विषय में सुनो, जो कि तीन प्रकार
के हैं। यथा— 1. वन, 2. उपवन और 3. कानन।
उपवनदीनां लक्षणं —
यत्र देशाश्च विरला वनकूलेषु संस्थिताः ।
उपवनानि ज्ञेयानि येषु ग्राह्या द्रुमाः शिलाः ॥ ५ ॥

सूत्र-३९ 181
जिन देशों में विरले वनों के समूह स्थित है, उन्हें उपवन समझना चाहिए।
इनसे जलाऊ लकड़ी के पेड़ तथा वहाँ स्थित खदानों से शिलाएँ ली जा सकती हैं।
कीर्तिमान् कीर्तयेद्यत्र रोप्यमाना द्रुमैर्लताः।
काननं तच्च विज्ञेयं नृपक्रीडनहेतुकम् ॥ ६॥
जिन प्रसिद्ध वनों में द्रुम, लतादि का रोपण किया गया हो और जिनको
राजाओं की क्रीड़ा के लिए यथा मृगया, आखेटादि के लिए छोड़ा गया हो, उन वनों
को कानन कहते हैं।
क्रमागतं शम्भुभवं वनोपवनकाननम्।
वनयात्रा तु कर्तव्या तेषां कूलसमाश्रितैः ॥ ७॥
इन वन, उपवन और काननों में क्रमशः शम्भु, शिव की स्थापना करनी चाहिए
और इन वन, उपवन, काननों के किनारे इन शिव स्थानों की स्थापना करके वहाँ
इनके दर्शनार्थ वनयात्राएँ करना भी परम कर्त्तव्य समझना चाहिए।
योग्याः प्रासादप्रतिमालिङ्गगेहादिके तथा।
प्रशस्ता दारुशैलाश्र ग्राह्या यत्र सदा स्मृताः ॥ ८॥
इन स्थानों में योग्यतानुसार प्रासाद, प्रतिमा, लिङ्ग, गृहादि प्रशस्त माने गए हैं।
इनके निर्माण के लिए सदा ही पाषाण और पेड़, काष्ठादि ग्राह्य माने गए हैं।
अशोकशोकखदिराः कदम्बा देवदारवः।
श्रीपर्णास्तिनिशाश्चैव सरलाश्चन्दनास्तथा ॥ ९॥
भूर्जत्रिमिसश्रेण्यश्च ? शाल्मलीरक्तचन्दनाः।
अन्येऽपि बहवो वृक्षा महत्यश्च शिलास्तथा ॥ १०॥
इनके योग्य वृक्षों में अशोक, शाक, खदिर, कदम्ब, देवदारू, श्रीपर्ण, तिनिश,
सरल, चन्दन, भूर्ज, त्रिमिस, श्रेणी, शाल्मली, रक्तचन्दन आदि अन्य भी बहुत से
वृक्ष हैं। महान शिलाएँ भी ग्राह्य हैं।
संछन्ना बहुभिः पत्रैः प्रदेशा यत्र संस्थिताः।
सरित्तीरं समाश्रित्य रविरश्मिविवर्जिताः ॥ ११॥
(शिला, काष्ठ ग्रहणावसर पर यह विचारणीय है कि) जिस स्थान के प्रदेश
पूरी तरह बहुत से पत्रों से ढके हुए हों और नदी के किनारे के स्थान हों जहाँ इतनी
छाया हो कि सूर्य की किरणें भी भूमि पर नहीं पहुँच पाती हों।
ईशान्यन्त वादिनेत्रं पूर्ववातैः प्रपादिताः।
अन्यवातैर्हताह्येषु अप्रशस्ताः शुभप्रदाः ? ॥ १२॥

182 अपराजितपृच्छा
वन में जाते समय वायु प्रवाह पर विचार करना अपेक्षित है। ईशानकोण के
अन्त से जब ध्वनि करती हुई जोर की हवाएँ बहती हुई आती है और उनके साथ
अन्य हवाएँ भी आहत होती हो तो यह अनुचित और अशुभ है।
सुप्रदेशाः सुसङ्ग्राह्याः सर्वकामफलप्रदाः ।
अप्रशस्ता अन्यकाले निमित्तं चोपलक्षयेत् ॥ 13 ॥
जहाँ-जहाँ सुप्रदेश पाए जाएँ उन्हें सुसंग्रह पूर्वक ग्राह्य किया जाए जिससे सभी
कामनाओं की शुभफलप्रद पूर्ति होती है तथा जो भी अप्रशस्त प्रदेश हों, उन्हें अन्य
काल के निमित्त शकुन हेतु भी दरगुजर कर देना चाहिए।
दिव्यानि चैव भौमानि शुभानि चाशुभानि च ।
प्रशस्तानि शुभान्यत्र चाशुभानि विवर्जयेत् ॥ 14 ॥
दिव्यों की, देवातादिकों की भूमि शुभ और अशुभ होती है उनमें वही प्रशस्त हैं
जो शुभ है, परन्तु जो अशुभ हो उन्हें छोड़ देना चाहिए।
नानाविधानिमित्तानि —
निमित्तानि गजश्चाश्वो वृषभश्च रथो विदुः ।
घृतं पुष्पाक्षते विप्रः कन्या रम्भा च गौर्मृगः ॥ 15 ॥
शतपत्रं च वैश्या च नृपः कुम्भश्च दीपकम् ।
वस्त्रयुग्मं फलं छत्रं यानं झम्पानमासनम् ॥ 16 ॥
वसुन्धरा धृत्यमानाय ? बहलं धान्यं पत्रादिकम ? ।
एतेषु दृश्यमानेषु निष्पत्तिः सुश्रियस्तथा ॥ 17 ॥
अब यात्राकाल में होने वाले निमित्तों या शकुनों के बारे कहता हूँ। गज, अश्व,
वृषभ, रथ, विद्वान, घृत, पुष्प, अक्षत, विप्र, कन्या, केला, गाय, मृग, शतपत्र या
तुलसीपत्र, वैश्या, राजा, घट, दीपक, दो वस्त्रों की जोड़ी, फल, छत्र-यान, पङ्खा,
आसन, वसुन्धरा, धृतिमान, बहुत धान्य पत्रादिक- यदि ये सब यात्रा काल में
दिखाई पड़े, तो अच्छे शकुन या श्रीवृद्धिकारक समझना चाहिए।¹

  1. पूर्वोक्त शकुन काश्यपशिल्पम्, समराङ्गण आदि में भी आए हैं। ये श्रीपति के मत से तुलनीय है—
    भृङ्गाराञ्जनवर्द्धमान मुकुराबद्धेकपञ्चा मिषोष्णीष क्षीरनुयानपूर्ण कलशच्छत्राणि सिद्धार्थकाः ।
    वीणाकेतनमीनपङ्कज दधिक्षौद्राय्य गोरोचनाः कन्याशङ्खसितोक्ष वस्तुमनोविप्राश्चरत्नानि च ॥
    प्रज्वलज्वलनदन्ति तुरङ्गाभद्रपीड गणिकाङ्कुशमृत्स्नाः । अक्षतेक्षुफलचामरभक्षाण्यायुधानि च भवन्ति
    शुभानि ॥ भेरिमृदङ्ग मृदुमर्दल शङ्खवीणा वेदध्वनिर्मधुरमङ्गलगीतघोषाः । पुत्रान्विता च युवतीः सुरभिः
    सवत्सा धौताम्बरश्चरजकोऽभिमुखः प्रशस्तः ॥ (ज्योतिषरत्नमाला 15, 62-64)

सूत्र-३९ 183
तैलाभ्यक्तस्तथाहिश्च मुक्तकेशाः स्त्रियस्तथा।
काष्ठभारं चाग्रहीनं विधवा गुरुषादिकम् ? ॥ १८ ॥
उल्कापातो दिशादाहो महावातप्रवर्तनम्।
तारापातोऽशनिघातः परितः पांशुवर्षणम् ॥ १९ ॥
एतेषु दृश्यमानेषु च भविष्यन्ति वै श्रियः।
न गच्छेत् पदमेकं तु यदीच्छेच्च निवर्तनम् ॥ २० ॥
अशुभनिमित्त के विषय में कहा जा रहा है। तैलाभ्यङ्ग किए हुए, सर्प, खुले
केश वाली स्त्री, लकड़ी का भार लिए हुए सामने आता, आगे से हीन, विधवा,
गुरुघाति, उल्कापात, दिशाओं का दाह, झंझावात चलना, तारा टूटना, गाज गिरना,
इसके उपरान्त पत्थर बरसना— ऐसा यदि सामने दिखाई पड़े तो समझना चाहिए
कि भला नही होने वाला है।¹ उपर्युक्त अपशकुन होने पर कहीं बाहर जाना हो तो
भूल कर भी एक भी कदम आगे न बढ़ाएँ यदि इन अपशकुनों का निवर्तन करना
चाहते हों तो।
मेघगर्जनवृष्टी च मत्स्योदयानि शोभनम्।
अन्तरिक्षे भवेच्छेदः फलपुष्पनिपातनम् ॥ २१ ॥
वायुकां सुरङ्गिकं वागि वामे वृक्ष्याग्रसंस्थिताम् ?।
कौशिको वामतः श्रेष्ठो ह्यशुभो दक्षिणै तथा ॥ २२ ॥
इसी प्रकार यदि मेघ गर्जन के साथ वृष्टि होती हो, मीन राशि आदि का शुभ
उदय हो, अन्तरिक्ष में छेद हो और उससे फल तथा पुष्प गिरते हों। वायुका
सुरङ्गिक वागी (शकुन चिड़िया) वामभाग में वृक्ष पर बैठी हो, कौशिक या उल्लू
बायीं ओर श्रेष्ठ और दक्षिण और अशुभ है।
कङ्कणं हारकेयूरौ मुकूटं कुण्डलादिकम्।
एतेषु दृश्यमानेषु सर्वकामफलं भवेत् ॥ २३ ॥

  1. वराह का मत हैं कि यात्रा में कपास, औषध, काला अन्न, नमक, नपुंसक व्यक्ति, अस्थियाँ, ताल-
    हरताल, अग्नि, साँप, कोयला, विष, कङ्गुली, मल, छुरा, रोगी, वमन करने वाला, पागल,
    पक्षाघातपीड़ित, अन्धा, तृण, तुस-भूसी, क्षुधापीड़ित, तक्र, शत्रु, मुण्डित सिर, तेल लगाया व्यक्ति, खुले
    केश वाला, पापी, लाल कपड़े पहने व्यक्ति आदि अशुभ होते हैं— कार्पासौषधकृष्णधान्यलवणक्लीबा-
    स्थितानलं सर्पाङ्गारगराहिचर्मशकृतः केशारिसव्याधिताः। वातोन्मत्तजडान्धकतुणतुष क्षुत्क्षामतक्रारयो
    मुण्डाभ्यक्तविमुक्तकेशपतिताः काषायिणश्चाशुभाः ॥ (बृहद्योगयात्रा 27, 6; योगयात्रा 13, 14 एवं
    लघुटिकिनिका 9, 15)