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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 213, कुल 535 में से

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पृष्ठ 213

सूत्र-३५ 165
विष्कम्भे च त्रिगुणिते तद्दशांशसमन्विते ।
परिधिश्च समस्तोऽसौ समुद्रान्तक्षितेः स्मृतः ॥ ४ ॥
एकविंशतिकोटीनां समलक्षाणि चाग्रतः ।
ततः परं सहस्राणि सङ्ख्यया सप्तविंशतिः ॥ ५ ॥
एवं समस्तपरिधिर्वृत्ताकारा च मेदिनी ।
त्रैलोक्यमध्ये चैवं सा तलाद्याश्चैव बाह्यतः ॥ ६ ॥
इसका व्यास दस करोड़ योजनों का बताया गया है और एक लाख उन्नीस
हजार विष्कम्भ के तिगुने तथा उसके समांश युक्त परिधि की समुद्रान्ता पृथ्वी की
कही गई है अर्थात् विष्कम्भ से 3¹/⁷ परिधि है। इक्कीस करोड़, सात लाख, एक
हजार- इस प्रकार समस्त परिधियुक्त वृत्ताकार में यह पृथ्वी है जो तीनों ही लोकों
के मध्य में तलादि पातालों के बाहर है।
स्वर्गपातालनामादीनां —
एकविंशतिस्वर्गांश्च मेरुमावृत्य दक्षिणम् ।
परितश्चार्णवाः सप्त रचिताश्च समस्तकाः ॥ ७ ॥
तलश्च वितलश्चैव सुतलो नितलस्तथा ।
तलातलो रसातलः पातालः सप्तमस्तथा ॥ ८ ॥
इस प्रकार मेरु को आवृत्त करते हुए दक्षिण की ओर इक्कीस स्वर्ग है जिनके
बाद में सात महासागर रचे गए हैं। अब पाताललोक के नाम सुनो जो इस प्रकार
हैं— (1.) तल, (2.) वितल, (3.) सुतल, (4.) नितल, (5.) तलातल, (6.)
रसातल और सातवाँ (7.) पाताल।
आदौ मेरुः कमोद्भूताः पात्रे पात्रमिवापरम् ।
एते च सप्तपातालाः सृष्टिकालसमुद्भवाः ॥ ९ ॥
उद्भूतश्चादितो मेरूर्द्विसहस्रैश्च योजनैः ।
द्विद्विसहस्रान्ते पुनः पातालाः सप्तधोदिताः ॥ १० ॥
आदि में तो यह मेरु उत्पन्न हुआ और बाद के क्रम में जैसे घड़े-पर-घड़े रखे
जाते हैं, वैसे ही एक दूसरे पर ये सातों पाताल भी क्रमानुसार सृष्टिकाल में उत्पन्न
हुए। आदि में मेरु पर्वत पृथ्वी में से दो हजार योजन ऊँचा ऊठा और इसी प्रकार
दो-दो हजार योजनों के अन्तर पर उसमें सातों पाताल नीचे की ओर से उठते चले
गए।