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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 535 में से

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पृष्ठ 216

१७७ अपराजितपृच्छा
ये समस्त सातों ही द्वीप समान भाव से सागरों में फैले हुए हैं जिनके नाम हे
अपराजित! अब मैं तुम्हें कहता हूँ।
सागरनामानि —
क्षारोदं चैव क्षीरोदं सागरौ दधिसर्पिषोः ।
मध्विक्षूदं तथा ख्यातं रसोदं सप्तमं तथा ॥ २६ ॥
सप्तैते द्वीपान्तरेषु स्थिता मेरुप्रदक्षिणम्।
सप्तद्वीपार्णवाश्चैवं सृष्टिकाले समुद्भवाः ॥ २७ ॥
(१.) क्षारोद, (२.) क्षीरोद, (३.) दधि, (४.) सर्पि, (५.) मधु, (६.) इक्षु
तथा (७.) रसोद— ये सात सागरों के नाम विख्यात हैं। ये सभी सातों द्वीपान्तरों पर
मेरु के प्रदक्षिण क्रम में बने हुए सप्तद्वीपार्णव सृष्टिकाल में ही उत्पन्न हुए थे।
स्वर्गनामानि —
भुवर्लोकश्च स्वर्लोको महर्लोकस्तथा जनः।
तपश्च सत्यलोकश्च ज्ञानलोकश्च सप्तमः ॥ २८ ॥
इत्येकविंशतिस्वर्गा₂₁ अधिरचित ? शम्भूद्भवाः।
(अब सात स्वर्गों के नाम सुनो) इनमें पहला (१.) भुवर्लोक, (२.) स्वर्लोक,
(३.) महर्लोक, (४.) जनलोक, (५.) तपलोक, (६.) सत्यलोक और (७.)
ज्ञानलोक है। ये सब इक्कीस स्वर्ग विधिरचित है और स्वयंभू है, शम्भु के द्वारा
उद्भूत हुए हैं।
सृष्टिकाले सुदृष्टाश्च स्वर्गाणामेकविंशतिः ॥ २९ ॥
पातालाश्च ब्रह्मभागे सप्तैवं तु सुसंस्थिताः ।
तदूर्ध्वे सप्त चाख्याता विष्णुभागे द्वीपार्णवाः ॥ ३० ॥
सृष्टिकाल से ही ये भली प्रकार से देखे गए इक्कीस स्वर्ग है। सातों पाताल भी
ब्रह्मभाग में इसी प्रकार सुसंस्थित है। इनके ऊपर विख्यात सात द्वीपार्णव विष्णुभाग
में स्थित हैं।
पुष्करोर्ध्वे भुवर्लोकः स्वर्लोकश्च तदूर्ध्वतः ।
तथा चैवानन्यलोकाः शम्भुभागे व्यवस्थिताः ॥ ३१ ॥
बाह्यतः सप्तलोकानां शिवलोकस्तदूर्ध्वतः ।
इत्युच्छ्रिते महामेरो स्वर्गा एवं सुसंस्थिताः ॥ ३२ ॥
पुष्कर के ऊपर ही भुवर्लोक है, इसके ऊपर स्वर्लोक है। इसी प्रकार अन्य सभी
लोक शम्भुभाग में व्यवस्थित हैं। इन सात लोक के बाहर शिवलोक इनसे ऊपर है,