अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
सूत्र-३० 143
धर्मार्थकाममोक्षाणां ददामि यत्त्वदीप्सितम्।
नासत्यं नान्यथा चैवं त्वद्भक्त्या रोहिणीपते ॥ 22 ॥
(इस पर) ईश्वर बोले— हे तारकाधिप सोमराज! मैं तुम्हारी पराभक्ति से परम
तुष्ट हुआ हूँ अतः तुम कोई वर माँगो क्योंकि मैं तुम्हें यथेच्छ वर देना चाहता हूँ। हे
रोहिणीपति सोम, चन्द्रराजा तुम्हारी पर भक्ति के फलस्वरूप जिस तुम्हारे चाहे हुए
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त कराने वाला वर मैं तुम्हें दे रहा हूँ, वह कभी
भी असत्य नहीं होगा न ही किसी तरह अन्यथा होगा।¹
चन्द्र उवाच —
अस्माकमात्मनः पार्श्वे मानसाङ्गं सुधार्यकम् ? ।
ममाभिधानतश्चैवाऽवतारस्तव साम्प्रतम् ॥ 23 ॥
(वर माँगते समय) चन्द्र बोले— हे प्रभु! मैं तो यह वर माँगता हूँ कि आप
मेरे आत्मा के पास मानस अङ्ग धारण करके मेरे गात्र को ही अपना स्थान बनाते
हुए तुरन्त अवतरित हों।
देव्युवाच —
शशाङ्क देवदेवेश तिलकत्ववाप्नुहि।
अथातस्त्वं तत्तिलके तथा तिष्ठ मम प्रिय ॥ 24 ॥
(इस बीच पार्वती) देवी बोली— हे शशाङ्क! मैं तुम्हारे मस्तक पर देवदेवेश
महादेव शिव का तिलक लगा देती हूँ जिससे ज्योंहि यह तिलक तुम्हारे मस्तक पर
लगेगा, त्योंहि मेरे प्रिय स्वामी महादेव शिव तुम्हारे तिलक में स्थित हो जाएँगे।
ईश्वर उवाच —
त्वयेप्सितं वरं यच्च प्रयच्छामि हितैषिणे।
इच्छयात्ममुखनैवाऽसारसंसारमोक्षदम् ॥ 25 ॥
निश्चितात्मसुखैरेवं शान्तावस्था मुखबोधिनी ? ।
स्वप्रावस्थायां न सौख्यमात्मनो राहिणीपतेः ॥ 26 ॥
स्वप्रावस्थो यदा दृष्टो भस्मोद्धूलिततापसः।
स्कन्धारुह्य हतं चौरै ? अस्मत्त्वयि विनिवेदयेत् ? ॥ 27 ॥
- आद्य जगद्गुरु शङ्कराचार्य ने सोमनाथ की आराधना इस प्रकार की है— सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये
ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावंतसम्। भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्यते ॥
(द्वादशज्योतिर्लिङ्गस्तोत्र)
144 अपराजितपृच्छा
ईश्वर ने कहा कि तुम्हारे माँगे हुए जिस वरदान को मैं हित भावना से दे रहा
हूँ, वह इस असार संसार से मुक्ति दिलाने वाला है। मेरे मुख से जो यह ज्ञान तुम्हें
मिला है, यह निश्चित ही आत्मसुख एवं शान्तावस्था और हे रोहिणीपति सोम!
तुम्हारी आत्मा को भी सुख देने वाला है परन्तु तुम्हारी स्वप्नावस्था में नहीं, जागृत
रहने पर ही यह सम्भव है। यदि स्वप्नावस्था में तुम्हें भस्म-धूलि लगाए हुए कोई
तपस्वी दिखाई पड़ जाए जो किसी मारे गए चोर को अपने कन्धे पर उठाए हुए हो
और अपने बारे में तुम्हें ऐसा कहे कि-
तापस उवाच -
अहं सोम जगत्कर्ता वैरं स्यात्तु लङ्काधिपे।
त्वद्भक्तयाऽऽगतोऽहं वत्स चन्द्रनामाऽवतारतः ॥ २८ ॥
योगावस्थास्थितस्वेवं चिन्तात्मा रोहिणीपते।
उदकोल्लङ्घनं कृत्वा ऐन्द्रीं गतो दिशां प्रति ॥ २९ ॥
(उक्त तापस कहे कि) - हे सोम! मैं ही इस जगत का कर्ता भगवान् विष्णु हूँ
जिसका लङ्काधिपति रावण से वैर हो गया था वही मैं तुम्हारी भक्ति से हे वत्स!
चन्द्र नामावतार से आ गया हूँ। हे रोहिणीपति! इस प्रकार की योग स्थिति में
चिन्तात्मा होकर समुद्र को लाङ्घकर मैं, पूर्वदिशा की ओर गया।
कैलासाल्लिङ्गमानीय दानवेन्द्रो लङ्काधिपः।
आगमिष्यामि ? क्षेत्रैषु तस्य वाचा प्रबलोद्भवम् ? ॥ ३० ॥
ददामि ते त्वहं सोम सोमे वदति दुर्धरः।
क्षणार्धं तु धृतं विप्र यदाहं भो क्षितौ ततः ? ॥ ३१ ॥
गृहीत्वा सोमराजेन्द्रो लङ्कावधि वनैः स्थित ?।
उक्तं लिङ्गं तु राजेन्द्र क्षितौ भूत्वा तु निश्चलम् ? ॥ ३२ ॥
वह दानवेन्द्र लङ्कापति रावण कैलाश पर्वत से शिवलिङ्ग लाकर समस्त क्षेत्र में
उसकी प्रबल वाचा का उद्घोष करेगा कि मैं आ गया हूँ। हे सोम! वही शिवलिङ्ग
मैं तुम्हें देता हूँ और वह सोम को बड़े ही भयानक उद्धत ढंग से कहता है कि हे
विप्र! थोड़ी देर के लिए इस शिवलिङ्ग को थामे रहो जब तक कि मैं पृथ्वी पर
खड़ा रहूँ। उसे ग्रहण करके सोम राजेन्द्र तब तक ठहरा रहा जब तक लङ्काधिपति
रावण उस वन में स्थिर रहा और उसके आने की अवधि तक प्रतीक्षारत रहा परन्तु
जब रावण बड़ी अवधि तक नहीं आया तो शिवलिङ्ग को सोम राजेन्द्र ने धरती पर
रख दिया और निश्चल अर्थात् वहीं पर प्रतिष्ठित कर दिया।
सूत्र-३० 145
पूजितं लिङ्गराजेन्द्रं लङ्कावधि स्वस्थचेतसा ? ।
सोमाभिधानदेवत्वं सोमनाथ इति श्रुतम् ॥ ३३ ॥
शशाङ्कं मुकुटे धृत्वा तन्नाम शशिभूषणः ।
ईश्वरः सोमनाथाख्योऽवतरितः सोमेश्वरः ॥ ३४ ॥
जब तक लङ्काधिपति रावण के आने की अवधि हो, तब तक उसकी प्रतीक्षा
में वह सोमराजा बड़े स्वस्थचित्त से उस शिवलिङ्ग राज की पूजा में रहे। इसलिए
सोमराज राजा के द्वारा पूजित होने के कारण शिव वहाँ सोमाभिधान देवत्व के रूप
में सोमनाथ नाम से विख्यात् हुए। इस प्रकार चन्द्रमा को अपने मुकुट में धारण
करके और उसके ही नाम से शशिभूषण अर्थात् सोमनाथ नाम धरकर स्वयं ईश्वर
शिव ही सोमनाथ कहलाकर सोमेश्वर के रूप में अवतरित हुए हैं।
तदा सुरतरोर्वत्स प्रभासे भक्तिस्वागतः ।
जगन्नाथः सोमनाथस्त्रैलोक्ये चाऽपि दुर्लभः ॥ ३५ ॥
आरामनगरे रम्ये जगदाह्लादकारकः ।
जगन्नाथः सोमनाथस्त्रैलोक्ये चाऽपि दुर्लभः ॥ ३६ ॥
तब से ही हे वत्स! यह सुरतर देव प्रभास क्षेत्र में भक्ति के स्वागत से जगन्नाथ
सोमनाथ से आए हैं जो तीनों ही लोकों में दुर्लभ है। अस्तु, यह सदा ध्यान में
रखना चाहिए, बाग-बगीचों में, सुन्दर नगरों में ऐसे जगत को आनन्द प्रदान करने
वाले जगन्नाथ सोमनाथ तीनों लोकों में भी दुर्लभ हैं।
नाम्ना कैलासनगरे सोमनाथो महेश्वरः ।
संसारतारणो देवः संसारपाशछेदनः ॥ ३७ ॥
धर्मार्थकाममोक्षाणां वाञ्छितार्थफलप्रदम् ।
सर्वतीर्थ महोत्साहं स्वर्गादिभोगभुक्तिदम् ॥ ३८ ॥
कैलास नामक नगर में भी सोमनाथ नाम के महेश्वर देव हैं जो कि संसार से
तारण करवाकर संसार में पुनरागमन के पाश को ही काट देते हैं। ये सोमनाथ धर्म,
अर्थ, काम और मोक्ष के वाञ्छित फल के दाता हैं और समस्त तीर्थों में सबसे
महान और स्वर्गादिक भोग और मुक्ति प्रदाता है।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
विष्णुवाक्योद्धवारण्ये श्रीसोमेश्वरनिर्णयाधिकारो नाम त्रिंशं सूत्रम् ॥ ३० ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में विष्णु वाक्यानुसार
अरण्य में उद्धूत श्रीसोमेश्वर निर्णय अधिकार नामक उनतीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥
146 अपराजितपृच्छा
विष्णुवाक्योद्भवसोमनाथोक्तद्वादशशिवरात्रिं
निर्णयो नामैकत्रिंशं सूत्रम् ॥ ३१ ॥
विष्णुरुवाच —
ततश्चानन्तरं वत्स प्रभासे भुक्तिमुक्तिदे।
कृत्वा सोमेश्वरे भक्तिं पूजा स्यात्तु महोत्सवः ॥ १ ॥
चन्दनागुरुकङ्कोलकर्पूरैः कुङ्कुमादिकैः ।
पञ्चामृतादिस्नानैश्च धूपाद्यैश्च सुगन्धिभिः ॥ २ ॥
मन्त्रस्तोत्रगीतवाद्यैर्नृत्यैश्च सुरयोषिताम् ।
इन्द्राद्याश्च सुराः सर्वे ब्रह्माद्याश्च मुनीश्वरः ॥ ३ ॥
विष्णुश्च भगवान् देवो मरीचिः काश्यपो गणाः ।
सूर्याद्याश्च ग्रहाश्चैव तथा चैवं गणोत्तमाः ॥ ४ ॥
अष्टौ च वसवः सिद्धा वासुक्याद्याश्च पन्नगाः ।
पृथिव्यां यानि तीर्थानि पार्थिवाश्चैव भूतले ॥ ५ ॥
पातालस्वः सप्तके च पृथिव्यां सप्तकं तथा ।
आनीताश्च त्रयो लोकाः सुरासुरनरोरगैः ॥ ६ ॥
प्रभासेन कृता पूजा देवदेवजगद्गुरोः ।
तुष्टः प्रभासं देवेशः पुत्रत्वं समुपागमत् ॥ ७ ॥
विष्णु बोले — हे वत्स! इसके उपरान्त ही भुक्ति-मुक्ति प्रदान करने वाले
प्रभास क्षेत्र में भगवान् सोमेश्वर की भक्तिपूर्वक पूजा करके महोत्सव होने लगे।
चन्दन, अगरु, कङ्कोल, कर्पूर, कुङ्कुम और पञ्चामृत आदि से स्नान, धूप, सुगन्धित
द्रव्यों से, मन्त्र-स्तोत्र, गीत-वाद्य-नृत्यों से देवाङ्गनाएँ और इन्द्रादि देवगण, ब्रह्मादि
मुनीश्वर, भगवान् विष्णु देव, मरीचि, काश्यप गण, सूर्यादि सभी ग्रह और ऐसे ही
अनेक उत्तम गणों और आठों वसु, सिद्धगण, वासुकि आदि समस्त नाग पृथ्वी पर
जितने भी तीर्थ क्षेत्र और भूतल पर जितने भी राजा, सातों पातालों, सातों पृथ्वी
मण्डलों और तीनों लोकों के सुर-असुर-नर और नागों को निमन्त्रित करके प्रभास
क्षेत्रवासियों ने देव देव जगद्गुरु महेश्वर की पूजा की जिससे सन्तुष्ट होकर देवेश
भगवान् शिव महेश्वर ने प्रभास को पुत्रत्व प्रदान किया।
वाचस्पतेर्भागिनेयं वसुहृन्नन्द्रदायकम्।
प्रोवाच वचनं पुत्र एकादश ममांशकाः ॥ ८ ॥
सूत्र-३१ 147
सोमनाथः प्रभासश्च कर्दमः शशिभूषणः।
निष्कदाख्यः सहस्राक्ष ऋणमुक्तिः पापान्तकः ॥ ९ ॥
अर्कस्थाल्यमनार्कस्वरं ? तवपुत्रा एकादश ।
एकादशैते रुद्राक्ष प्रभासक्षेत्रसम्भवाः ॥ १० ॥
इस प्रकार बृहस्पति के भानजे और वसु के हृदय को आनन्द देने वाले उनके
पुत्र प्रभास को भगवान् शिव महेश्वर ने वचन दिया कि तुम्हारे ग्यारह पुत्र होंगे जो
मेरे ही अंशरूप होंगे। इनके नाम होंगे— 1. सोमनाथ, 2. प्रभास, 3. कर्दम, 4.
शशिभूषण, 5. निष्कद, 6. सहस्राक्ष, 7. ऋणमुक्ति, 8. पापान्तक, 9. अर्कस्थाली,
10. अनार्क और 11. स्वर। ये तुम्हारे ग्यारह पुत्र कहलाएँगे। ये सभी प्रभास क्षेत्र में
उत्पन्न एकादश रुद्रों के ही समान समझें।¹
विश्वकृद् विश्वकर्मा च त्वष्टा स्याद् देववर्धकः।
भूर्भुवर्भुवनेशश्च तथा भुवनदेवकः ॥ ११ ॥
पुनरुच्चार्य नामानि विश्वेशः त्रिदशेश्वरः।
विश्वश्च विश्वनिरतस्स्वयं च सृष्टिकोद्भवः ॥ १२ ॥
नासत्यावश्विनौ दस्रौ प्रोक्तौ देवचिकित्सकौ ।
जगत्कर्ता च रुद्रश्च प्रभासो वसुनन्दनः ॥ १३ ॥
सृष्टा च सर्वशिल्पानां जगन्नेत्रस्तदुद्भवः।
चतुर्दश्यां समुत्पन्नः स्त्रष्टा विश्वपतिस्तथा ॥ १४ ॥
कार्तिक्यां कृष्णपक्षे तु दीपोत्सवसमुद्भवः।
महोत्सवास्तथा पञ्च तृतीयो ²यावतीदिनी ॥ १५ ॥
स्वयं साक्षाद् रुद्रमूर्तिर्विश्वकृद् विश्वशेखरः।
विश्वकृद्, विश्वकर्मा, त्वष्टा, देववर्धकी, भूर्भुवः भुवनदेव, भुवनदेवक— इन
नामों को पुनः कहते हुए विश्वेश, त्रिदशेश्वर, विश्व, विश्वनिरत और सृष्टिकोद्भव,
नासत्य, अश्विनी, दस्र, देव चिकित्सक, जगतकर्ता, रुद्र, प्रभाव, वसुनन्दन, सृष्टा और
सभी शिल्पियों के जगतनेत्र³ स्वरूप आपकी उत्पत्ति चतुर्दशी को हुई। कार्तिकमास में
- इन्हीं से सोमपुरा शिल्पियों की एकादश गोत्रों का प्रवर्तन माना जाता है।
- 'यावनोदिनी ?' प्रकाशित पाठः। शब्दकल्पद्रुम में 'यावतिथः' शब्द के लिए कहा है— यावत्+ तस्य
पूरणे डट्। ऐसे में मनुस्मृति का यह वचन प्रमाण है— आद्याद्यस्य गुणांस्त्वेषामाप्नोति परःपरः। योयो
यावतिथश्चैषां सस तावद्गुणः स्मृतः ॥ (मनु. 1, 20) - ये विश्वकर्मा के नाम हैं। विश्वकर्मापुराण में विश्वकर्मा के सौ नामों की सूची है। यह यहाँ प्रासङ्गिक ही
148 अपराजितपृच्छा
कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को उत्पत्ति हुई तब हे विश्वपति ! दीपोत्सव मनाया गया और
अन्य महोत्सव रूप में पाँच तृतीया भी अगली तिथि (के पूर्ण अथवा उदयव्यापिनी)
सहित मानी गई है। आप स्वयं साक्षात् रुद्रमूर्ति विश्वकृत और विश्वशेखर है।
विश्वकर्मोवाच —
दीपोत्सवः कथं देव किमर्थश्च तदुद्भवः।
सुरोरगासुरनराः कुर्वन्ति कथमुत्सवम्॥ 16 ॥
विश्वकर्मा बोले — हे प्रभु ! दीपोत्सव क्या है और इसका प्रचलन किसलिए
है? देवता, नाग, असुर और मानवगण यह उत्सव कैसे मनाते हैं, सो कहिये।
ईश्वर उवाच —
द्वादश₁₂ दीपोत्सवानां श्रेष्ठाः स्युः कार्त्तिकादितः।
शिवरात्रयो द्वादश व्रतानामुत्तमा मताः॥ 17 ॥
आद्या मार्गशिरे कृष्णचतुर्दश्यां तिथौ भवेत्।
त्रयोदश्यामेकभोजी ह्युपोष्या च चतुर्दशी॥ 18 ॥
स्नानं कृत्वा चोदकेन यस्तिष्ठेलिङ्गमाश्रितः।
दिनान्ते च निशाप्राप्तौ कुर्याद् वै दन्तधावनम्॥ 19 ॥
ईश्वर बोले — कार्त्तिकादित¹ या कार्तिक से आरम्भ होने वाले बारह (मासों
के) दीपोत्सव श्रेष्ठ है और बारह शिवरात्रियों को व्रतों के लिए उत्तम माना गया है।
होगी— अज, अतुल, अधिकर्मिक, अधिनायक, अधिष्ठाता, अधीश्वर, अभिधेय, अभिनन्द्य, अभिरक्षक,
अभ्युदयकारी, अमन्द, अर्चनीय, आढ्यङ्कुर, आदिकर, आदिकर, आनन्त्य, आनन्दन, आयःशूलिक,
आराधनीय, ईरेश, ईक्षक, ईश्वर, उच्छण्ड, उत्तमश्लोक, उत्पादक, उद्यमी, एकाक्षर, एकान्त, ऐकात्म्य,
ऐश्वर्यवन्त, ओजस्वी, औपमिक, क, कष्टक विशोधक, कल्याणक, कार्मुक, कालाध्यक्ष, कालक्ष,
कीर्तिकीय, कुशाग्रबुद्धि, कृतकार्य, कृताभरण, कृतायास, कृतधी, कृतप्रतिज्ञ, कृतलक्षण, कृतसङ्कल्प,
कृतहस्त, कृती, कृत्य, कृपालु, केवक, केलिमुख, कौतुकप्रिय, क्रतुप्रिय, क्रतुपति, क्रियापटु, क्वाचित्क,
क्षन्ता, क्षिप्रकारी, ख्यातिप्राप्त, गणितज्ञ, गण्डकघ्न, गमनीय, गुणी, चक्रवर्ती, चक्री, चक्षुर, चण्ड,
चण्डविक्रम, चारक, चित्रकार, चिन्मय, छत्वरक, जगतीश्वर, जगत्स्त्रष्टा, जनाश्रय, जागरूक, जिष्णु,
तक्षक, तितिक्षु, तक्षिणकर्मी, त्यागी, त्रिकालविद्, त्वष्टा (त्वष्ट्र), दक्ष, दाता, दिव्य, दिष्णु, दृस, देववर्धिक
, धृतात्मा, नन्दक, नमस्य, नित्य, निपुण, नियामक, निरज, पटु, पारङ्गत, पृथु, ब्रह्मवत्, विश्वात्मा,
विश्वकर्मा, सर्वेश्वर और सृष्टिकर्ता। (शिल्पशास्त्रम् : सम्पादक-अनुवादक : श्रीकृष्ण 'जुगनू', चौखम्बा
संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी, 2008 ई., भूमिका, पृष्ठ 15)
- यहाँ कार्त्तिकादि वर्षारम्भ का सङ्केत है जो कि मेवाड़ के बाद गुजरात आदि में अद्यावधि प्रचलन में है।
अन्यत्र चैत्रादि या श्रावणादि वर्षारम्भ किया जाता है। ग्रन्थ के 19वें सूत्र (14-15) में भी इसी क्रम से
गणना है। विष्णु आदि पुराणों से ज्ञात होता है कि पूर्व गुप्तकाल तक नक्षत्रों की गणना कृत्तिकादित थी,
वराहमिहिर ने प्रथमतः अश्वन्यादित गणना की। यहाँ बारह शैवव्रतों का विधान किया गया है।
सूत्र-३१ 149
मार्गशीर्ष मास की कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि आद्या होती है और उसके लिए
त्रयोदशी को एकासन रखे तथा चतुर्दशी को उसका पारणा करें। जल से स्नान करके
शिवलिङ्ग के आश्रय में रहे और दिन के अन्त में आने पर दन्तधावन करें।
ततः शिवालये गत्वा पुष्पधूपादिसंयुतः।
पञ्चामृतैः स्नापयित्वा धूपैर्वै लेपनादिभिः ॥ २० ॥
पूजां कृत्वा त्रिरात्र्यन्तं स्तोत्रमन्त्रकगीतकैः ।
वादित्रैर्विविधैश्चैव स्वेच्छया चात्मशक्तितः ॥ २१॥
स्वयंभुवि तथा बाणे घाट्ये स्वगृहलिङ्गे ।
यामे यामे गते रात्रौ पूजां कृत्वा महोत्सवम् ॥ २२ ॥
इसके बाद शिवालय में जाकर पुष्प, धूपादि से संयुक्त होकर, पञ्चामृत और
धूप लेपनादि से स्नान कराके अपने सामर्थ्य के अनुसार पूरी श्रद्धा से तरह-तरह के
स्तोत्र मन्त्र, गीत आदि वाद्यों से तीन रात्रियों के अन्त तक पूजा करके स्वयंभुवि
लिङ्ग अथवा बाणलिङ्ग या फिर घड़े हुए अपने-अपने घर में पूजार्थ रखे शिवलिङ्ग
की रात्रि के प्रत्येक प्रहर बीतने पर पूजा करते हुए यह महोत्सव मनाया करे।
शिवरात्र्योत्सवविधिं-
शिवरात्र्युत्सवे चाल्यं शिवं स्तुत्वा समस्तकम्।
पुराणश्रवणं कृत्वा दानं चैव समानयेत् ॥ २३ ॥
प्रतियामोत्सवं कृत्वा स्वगृहं भावतो व्रजेत्।
दन्तधावनस्नानार्चाः कृत्वा चैव महोत्सवम् ॥ २४ ॥
अग्निपूजां ततः कृत्वा दत्त्वा चाहुतिपञ्चकम्।
द्वे द्वे कृत्वा मण्डले च बाह्ये मध्ये गृहेऽथवा ॥ २५ ॥
आत्मपादौ च प्रक्षाल्य तापसानां तथैव च।
भुक्तिस्थानं गृहमध्ये मण्डलेषु प्रदीयते ॥ २६ ॥
शिवरात्रि के उत्सव में चलकर जाना चाहिए और शिव की स्तुति करके
साष्टाङ्ग प्रणाम करें, पुराण (वायुपुराण, लिङ्गपुराण, शिवपुराणादि कथा) का श्रवण
करना चाहिए। दानपुण्य भी करने चाहिए। प्रतिदिन भी अपने घर में हर प्रहर इसी
जाबालश्रुति के दस शैवव्रतों का वर्णन शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता के अध्याय 37 में आया है। वहाँ
पर माघ मास के कृष्णपक्ष में शिवरात्रि तिथि का विशेष महत्व बताया गया है। जिस दिन आधी रात के
समय तक वह तिथि विद्यमान हो, उसी दिन उसे व्रत के लिए ग्रहण करना चाहिए। शुक्लपक्ष से मास
का आरम्भ मानने से फाल्गुन मास की कृष्णपक्ष की त्रयोदशी माघ मास की कही जाती है।
150 अपराजितपृच्छा
भाव का आचरण करता रहे। दन्तधावन, स्नान, अर्चा-पूजादि महोत्सव करता हुआ
हवन करे और पञ्चक आहुति प्रदान करें। इसके लिए घर में, घर के मध्य में अथवा
घर के बाहर दो-दो मण्डल बनाए। (भोजन से पूर्व) पहले अपने पाँवों का
प्रक्षालन करे। तदोपरान्त इस अवसर पर आमन्त्रित तपस्वी साधुओं के पाँवों का
प्रक्षालन करके उन्हें घर मध्य में भोजनशाला में भोज-प्राङ्गण में ले जाना चाहिए।
सम्प्राश्य शिवनैवेद्यं ततो दद्यातु भोजनम्।
भोजनानन्तरं दद्याद् दक्षिणां वस्त्रसंयुताम् ॥ २७ ॥
यज्ञोपवीतं पट्टं च पादुकां छत्रसंयुताम्।
क्षमापयेच्छिवं देवं मठं सम्प्राप्य तापसम् ॥ २८ ॥
(इसके बाद) उन तपस्वीगणों को शिव-नैवेद्य का प्रसाद प्रदान कर बाद में
सन्तोषपूर्वक भोजन करवाएँ और भोजनोपरान्त उन्हें वस्त्र के साथ दक्षिणा भी प्रदान
करे। यज्ञोपवीत, पट्टवस्त्र, पादुका, छाता भेंटकर भगवान् शिव से क्षमापन करते हुए
उन समस्त आगन्तुक तपस्वियों को उनके मठ तक आदरपूर्वक पहुँचाने जाए।
द्वादशोत्सवनामानि —
एवमुक्ता कृष्णचतुर्दशी मार्गशिरादिका।
मार्गादि कार्तिकान्तं च तासां नामानि द्वादश₁₂ ॥ २९ ॥
इस प्रकार से मृगशिरादिक कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के विषय में कहा गया है।
यहाँ कहे गए मार्गादि से कार्तिकान्त तक आने वाले बारहौं चतुर्दशी उत्सवों
(शैवव्रतों) की नामावली इस प्रकार है—
शिवा शान्ता सिद्धिदा च जया चैव मनोरमा।
कान्ताह्लादा च सौम्या च शुभा स्यात्तु मणिप्रभा ॥ ३० ॥
विश्वा विश्वकृदुद्भावा चेत्थं नामानि द्वादश₁₂।
मार्गादि कार्तिकान्तं च कृष्णपक्षे चतुर्दशी ॥ ३१ ॥
(1.) शिवा, (2.) शान्ता, (3.) सिद्धिदा, (4.) जया, (5.) मनोरमा, (6.)
कान्ता, (7.) आह्लादा, (8.) सौम्या, (9.) शुभा, (10.) मणिप्रभा, (11.) विश्वा
और (12.) विश्वकृदुद्भवा— ये मार्गादि से आरम्भ होकर कार्तिक के अन्त तक,
कृष्ण पक्ष की चतुर्दशियों के नाम हैं।
अथ मासानुसार चतुर्दश्यां फलञ्च —
मार्गपौषयोर्मध्ये च शिवा स्वर्गादिभोगदा।
पौषमाघयोर्मध्ये च शान्ता कल्याणकारिणी ॥ ३२ ॥
सूत्र-३१ 151
मार्गशीर्ष और पौष के मध्य में पड़ने वाली शिवा संज्ञक चतुर्दशी स्वर्गादि भोग
देने वाली है और पौष व माघ के मध्य पड़ने वाली शान्ता नामक चतुर्दशी
कल्याणकारिणी है।
माघफाल्गुनयोर्मध्ये सिद्धिदा सर्वसिद्धिदा।
ख्याता जया फाल्गुनान्ते विजयस्वर्गराज्यदा ॥ ३३॥
माघ व फाल्गुन के मध्य में आने वाली सिद्धिदा चतुर्दशी समस्त सिद्धियों को
देने वाली है और फाल्गुन के अन्त में आने वाली जय नाम से ख्यातिलब्ध चतुर्दशी
विजय व स्वर्ग का राज्य देने वाली है।
मनोरमा च चैत्रार्धे मनोरथप्रदायिनी।
वैशाखज्येष्ठयोर्मध्ये कान्ता च स्वर्गभुक्तिदा ॥ ३४॥
चैत्र मास के मध्य में आने वाली मनोरमा चतुर्दशी मनोरथों को पूर्ण करने
वाली और वैशाख व ज्येष्ठके मध्य में आने वाली कान्ता चतुर्दशी स्वर्ग और मुक्ति
देने वाली कही गई है।
ज्येष्ठाषाढयोर्मध्ये च आह्लादाऽऽह्लाददायिनी ।
आषाढार्धे तथा ख्याता सौम्या देवत्वदायिनी ॥ ३५॥
ज्येष्ठ व आषाढ़ के मध्य में आने वाली आह्लादा चतुर्दशी आह्लाद देने वाली है
जबकि आषाढ़ के आधे में आने वाली सौम्या चतुर्दशी देवत्व देने वाली के रूप में
प्रसिद्ध है।
श्रावणार्धे शुभा ख्याता तेजः सौभाग्यवर्द्धनी।
मणिप्रभा भाद्रपदे संसारे च मणिप्रदा ॥ ३६॥
श्रावण मास के आधे में पड़ने वाली शुभा चतुर्दशी तेज और सौभाग्यवर्द्धिनी
के रूप में विख्यात है और भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी मणिप्रभा के नाम
से संसार में मण्यादि रत्न प्रदान करने वाली है।
आश्विने च तथा मासे विश्वा त्रैलोक्यतोषदा ।
कार्तिके कृष्णपक्षे तु तथा विश्वकृदुद्भवा ॥ ३७॥
इसी प्रकार आश्विन मास में पड़ने वाली विश्वा चतुर्दशी तीनों ही लोकों में
सन्तुष्टि प्रदान करने वाली है जबकि कार्तिक मास के कृष्णपक्ष में पड़ने वाली
चतुर्दशी को विश्वकृदुद्भवा कहा गया है।
तास्तु समस्तदेशेषु दीपोत्सवसमुद्भवाः ।
कैलासे च पुरे रम्ये विख्याताश्च महीतले ॥ ३८॥
152 अपराजितपृच्छा
इन सभी चतुर्दशियों में समस्त देशों में दीपोत्सव मनाए जाते हैं जो कैलाश में,
नगरों में और पृथ्वीतल पर सर्वत्र विख्यात हैं।
शिवरात्रिमाहात्म्यमाह —
शिवरात्रिसमं पुण्यं नास्ति यज्ञसहस्रकैः ।¹
मासे मासे कृष्णपक्षे या भवेच्चं चतुर्दशी ॥ 39 ॥
शिवरात्रिस्तु सा ज्ञेया व्रतानामुत्तमोत्तमा।
शिवरात्रि के समान कोई भी पुण्य हजारों यज्ञ करने पर भी नहीं मिल सकता
अतः प्रत्येक मास में जब-जब कृष्णपक्ष की चतुर्दशी हो, उसको शिवरात्रि के रूप
में जाने (और व्रत करें) जो व्रतों में उत्तम व्रत है।
अन्यदप्याह —
त्रिरूपा कृष्णवर्णा सा देवी कल्याणवर्द्धिनी ॥ 40 ॥
ललाटे मुकुटे लिङ्गे कर्णयोः स्कन्धयोस्तथा।
प्रकोष्ठे मणिबन्धे च कण्ठे ऊर्वोः स्तने तथा ॥ 41 ॥
मेखलायां कटिसूत्रं कटिमालादितस्तथा।
लिङ्गाधारमयाः सर्वे ऊर्ध्वाः करपुटैः कृताः ॥ 42 ॥
तंद्रूपा शिवसामर्थ्यात् शिवरात्रिः शिवशासना।
द्वादशोद्भवन्ति मर्त्ये नाम्नैवं शिवरात्रयः ॥ 43 ॥
वह देवी तीन रूपों वाली, कृष्णवर्ण की है और कल्याणवर्द्धिनी है। उसके
ललाट पर, सिर, कानों, स्कन्धों, प्रकोष्ठ, मणिबन्ध, कण्ठ, वक्ष, स्तनों पर मेखलाएँ
हैं। वह कटिसूत्र व कटिमालादि सहित शिवलिङ्गाधारमय होती है। इसके करपुट
ऊर्ध्वस्थ कल्पित किए जाएँगे। इस रूप में शिव के सामर्थ्यवशात् शिवरात्रि से
शिवशासन सिद्धि होगी। (इस प्रकार यहाँ) बारह शिवरात्रियों को नामानुसार कहा
गया जो कि मर्त्यलोक में होती है।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
विष्णुवाक्योद्भवसोमनाथोक्तद्वादशशिवरात्रिनिर्णयाधिकारो नामैकत्रिंश सूत्रम् ॥ 31 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में विष्णु के
वाक्यानुसार उद्भूत सोमनाथोक्त बारह शिवरात्रि निर्णय अधिकार नामक इकतीसवाँ सूत्र
पूर्ण हुआ ॥ 31 ॥
- यह श्लोक हेमाद्रि के निम्न श्लोक से तुलनीय है— शिवरात्रिसमं नास्ति कृत्वा यज्ञसहस्रकम् ॥ न ते
यमपुरस्थास्तेयैः कृतेयं शिवप्रदा। भुक्तिमुक्तिप्रदा देवि सत्यं सत्यं वरानने ॥ (चतुर्वर्गचिन्तामणि व्रतखण्ड
भाग 2, पृष्ठ 88)
सूत्र-३२ 153
विश्वकर्मावतारो नाम द्वात्रिंशं सूत्रम् ॥ 32 ॥
विश्वकर्मोवाच —
नमस्कृत्वा सोमनाथमज्ञानां ज्ञानदो भवान् ।
तव प्रसादाद् देवेश तथाऽस्माभिश्च दृश्यते ॥ 1 ॥
कथं चान्यब्रह्माण्डसृष्ट्युत्पत्तिप्रलयादिकम् ।
ब्रह्मा विष्णुः शशी सूर्य इन्द्राग्नी चान्यसम्भवः ॥ 2 ॥
कुर्वेतं देवदेवेश प्रसादं पार्वतीपते ।
ज्ञानोपदेशं सन्देहच्छेदनं च जगत्प्रभोः ॥ 3 ॥
विश्वकर्मा बोले — हे सोमनाथ ! आप अज्ञानियों को भी ज्ञान प्रदान करने वाले
हैं, मैं आपको नमस्कार करके प्रार्थना करता हूँ कि आप अपने ज्ञानरूपी प्रसाद से
हमें दिखाएँ कि किस प्रकार इन अन्य ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति और प्रलय होता है और
ब्रह्मा, विष्णु, शशि-सूर्य-इन्द्र-अग्नि और अन्य देवता कैसे उत्पन्न हुए ? हे
पार्वतीपति देव-देवेश ! कृपा करके हे जगत्प्रभो हमारे सन्देह का निवारण कीजिए।
ईश्वर उवाच —
पूर्वं ब्रह्मभवा सृष्टिर्जगत्स्थावरजङ्गमम् ।
समांशेन समुत्पन्नावुभौ ब्रह्मा तथा हरिः ॥ 4 ॥
ब्रह्मा तु सृष्टिकर्ता च पालकस्तु जनार्दनः ।
तस्मात्तथाऽपरे नैव ब्रह्माविष्णुसदाशिवाः ॥ 5 ॥
पूर्व ब्रह्म में होने वाली यह सृष्टि जगत में स्थावर, जङ्गमयुक्त हुई और समान
अंशों से दोनों ही ब्रह्मा और विष्णु उत्पन्न हुए। ब्रह्मा तो सृष्टिकर्ता हुए और इसके
पालनकर्ता जनार्दन विष्णु हुए। इनसे बाद में इसी प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव हुए।
गन्तव्यं ब्रह्मलोकेषु यत्र तौ परमेष्ठिनौ ।
तत्रोद्भूता च या सृष्टिस्त्वमवाग्रतो भवेत् ? ॥ 6 ॥
पुष्पकारूढः स्रष्टा च युक्तः पुत्रैश्च मानसैः ।
जयश्च विजयश्चैव सिद्धार्थश्चापराजितः ॥ 7 ॥
(उक्त तीनों ही) परमेष्ठिगण जब ब्रह्मलोक की ओर जाने को तत्पर हुए तब
आप ही इस सृष्टि के रचनार्थ उनके साथ अग्रसर हुए और पुष्पक विमान में आरूढ़
होकर स्रष्टा के पद से युक्त होकर अपने मानस पुत्रों— जय, विजय, सिद्धार्थ और
अपराजित को साथ ले गए।
154 अपराजितपृच्छा
पुष्पकस्य च स्रष्टा वै स्वयं त्वं सृष्टिसम्भवः ।
पुष्पविमानमारूढश् छत्रादिझल्लरीयुत् ॥ 7-1 ॥
कलशकनकदण्डै रत्नैर्नैकेर्विभूषितम् ।
घण्टारवकोपेतं वै नैकविद्याधराकुलम् ॥ 7-2 ॥
तरुणादित्यसङ्काशं तप्तकाञ्चनसप्रभम् ।
प्रभासक्षेत्रसम्भूतं द्वितीयमिव भास्करम् ॥ 8 ॥
पुष्पक विमान के स्रष्टा तो आप स्वयं हैं जिनसे समस्त सृष्टि रचना सम्भव
होती है। पुष्पक विमान में आरूढ़ होने योग्य छत्रादि और झल्लरीयुक्त कलश,
स्वर्णदण्ड, अनेकों रत्नों से विभूषित सजावट, घण्टाघोष आदि ध्वन्योपस्कर और
अनेक विद्याधरों के समूह तरुण सूर्य के समान प्रकाशमान, जगमगाते हुए तथा
तपाए गए सोने की चमक के समान, प्रभास क्षेत्र में उत्पन्न हुए। ऐसा लगता था कि
दूसरे भास्कर ही हों।
विष्णुः शक्रश्च सूर्यश्च स्वामी चैव गणाधिपः ।
रुद्रतेजः समुद्भूताः स्वयं वा सृष्टिकर्मणा ॥ 9 ॥
जटामुकुटशोभाढ्यः कुण्डलाभ्यालङ्कृतः ।
चतुर्भुजो महातेजा दिव्यहंसकवाहनः ॥ 10 ॥
अक्षसूत्रं करे याम्ये वामे चैव कमण्डलुः ।
पुस्तकं वामहस्तोर्ध्वे दक्षोर्ध्वे कम्बिका तथा ॥ 11 ॥
वे विष्णु, इन्द्र, सूर्य, कार्तिकस्वामी, गणाधिप और रुद्र के तेज से समुद्भूत
स्वयं सृष्टि कर्म करने वाले विश्वकर्मा जयमुकुट की शोभा से भरपूर और कानों में
सुन्दर कुण्डलों से अलङ्कृत चतुर्भुज स्वरूप, महातेजस्वी, दिव्य हंस पर सवारी
करने वाले, हाथों में अक्षमाला और सूत्र दाहिने हाथ में धारण किए हुए और बायें
हाथ में कमण्डलु धारण किए हुए तथा बायें ऊपरी हाथ में पुस्तक (शिल्पवेद)
तथा दायें ऊपर के हाथ में कम्बिका या हस्त-गज धारण किए हुए।
विश्वकर्मा सदागौरस्तेजः पुञ्जसमुद्भवः ।
बृहस्पतेर्भागिनेयस्तेजः कूट इवापरः ॥ 12 ॥
सम्प्राप्तो ब्रह्मलोके तु महौजा विश्वकर्मकः ।
ब्रह्मणो चासनं त्यक्त्वा करयुग्मं च योजितम् ॥ 13 ॥
भगवान् विश्वकर्मा सदा गौरवर्ण और तेजस्विता के पुञ्जरूप उत्पन्न होकर
बृहस्पति के भानजे तेजस्विता के शिखर के समान होकर यहाँ से आगे ब्रह्मलोक में
सूत्र-३२ 155
पधारे जिनको आदर देने हेतु स्वयं ब्रह्मा भी आसन त्याग करबद्ध होकर खड़े हो
गए।
तस्मै तदासनं दत्त्वा स्थितावासनयोरुभौ ।
चत्वारो मानसाः पुत्रा विश्वकृत्पार्श्वतः स्थिताः ॥ 14 ॥
एकैके च यथाशक्ति स्वयं वै सृष्टिकारकाः ।
जयो विजय आख्याताः सिद्धार्थश्चापराजितः ॥ 15 ॥
ब्रह्मा ने उन विश्वकर्मा को वह आसन दिया और दोनों ही एक साथ बैठे।
अपने पास में ही विश्वकर्मा के उन चारों मानसपुत्रों को भी खड़ा किया जो अपने
आपमें एक-एक भी स्वयं सृष्टिकर्ता के रूप में विख्यात हैं। वे जय, विजय,
सिद्धार्थ और अपराजित नाम से विख्यात् हैं।
ब्रह्मोवाच —
स्वयं रुद्रस्त्वमाख्यातो मया सृष्टो महेश्वरः ।
न्यूनाधिकां तथा सृष्टिं पूरयामि च साम्प्रतम् ॥ 16 ॥
स्वयं रुद्रो विष्णुः शिवो मम सृष्टिकृतोऽभिधाः ।
त्रैलोक्येऽमरपदं च सृष्टव्यं विश्वकर्मणा ॥ 17 ॥
(इसके बाद ब्रह्मा कहने लगे कि) स्वयं महेश्वर ने आपको कहा है कि उन्होंने
ही मेरी सृष्टि की है उसमें जो भी कमी-वेशी है, मैं उसे अब पूरी कर दूँगा। स्वयं
रुद्र (का मत है कि) विष्णु, शिव भी मेरी ही सृष्टि के नामधारी है। अब तीनों
लोकों में अमरपद देवताओं की सृष्टि विश्वकर्मा द्वारा होनी है।
त्रैलोक्ये चामरपदं सृष्टव्यं विश्वकर्मणा।
जानासि त्वं विश्वकर्मन् न किं ब्रह्मसमुद्भवम् ॥ 18 ॥
तीनों लोकों के अमरपद देवता स्वयं विश्वकर्मा के द्वारा की जाने वाली सृष्टि में
होते हैं। हे विश्वकर्मा ! आप यह सब जानते हैं। यह ब्रह्म किसी से उत्पन्न नहीं
हुआ। यह सब आप ही की सृष्टि है अर्थात् आपसे ही उत्पन्न हुई है।
भुवनसृष्ट्यादिदेवो भुवर्देवस्स उच्यते।
समीपगताथ तत्र पृथिवी तु भयातुरा ।
तत्पृष्ठतश्चागतो वै पृथुश्च पृथिवीपतिः ॥ 19 ॥
इस भुवनमय सृष्टि का आदिदेव भुवनदेव विश्वकर्मा को ही कहते हैं। एक बार
पृथ्वी भयातुरा होकर भगवान् विश्वकर्मा के समीप पहुँची और उसके पीछे के पीछे
पृथ्वीपति राजाधिराज पृथु भी पहुँच गया।
156 अपराजितपृच्छा
इत्युक्त विष्णुमाख्यातं विश्वकर्म प्रकथ्यते ।
पक्षिराजं समारुह्य शङ्खशाङ्गिदिधारिणम् ॥ २० ॥
सप्तकोटिगणैर्युक्तविमानैश्च सङ्कुलम्।
सिद्धचारणगन्धर्वैर्ऋषिभिः परिवेष्टितम् ॥ २१ ॥
सुरदुन्दुभिसंनादैर्नैकवादित्रसङ्कुलम्।
पुष्यकैश्छत्रमाच्छाद्यं पृथिव्यान्तक्षीरार्णवम् ॥ २२ ॥
अकस्मादागतो विष्णुर्ब्रह्मलोकेऽमृतार्णवात्।
गन्धमादनशैलेन्द्रे विश्वकर्मा जगत्पतिः ॥ २३ ॥
ऐसा विष्णु द्वारा कहा प्रसिद्ध है।¹ विश्वकर्मा इसको ही पुनः कहते हैं कि
विष्णु भगवान् शङ्ख-शार्ङ्गधनुषादि धारण करके पक्षीराज गरुड़ पर आरूढ़ होकर
सात करोड़ गणों को साथ लेकर, जो कि विमानों के समूहों में आए थे और जिनमें
सिद्ध, चारण, गन्धर्व ऋषिगण बैठे हुए थे और उन सबसे घिरे हुए स्वर्ग के दुन्दुभि
आदि के निनाद से और अनेकानेक वाद्यों के समूह पुष्पक विमान के छत्र के नीचे
आच्छादित होकर पृथिवी के अन्त में क्षीरसागर में अकस्मात् आ गए। इस प्रकार
विष्णु और ब्रह्मलोक के अमृतसागर से विश्वकर्मा जगत्पति के प्रभाव से पुष्पक
विमान द्वारा तत्काल पृथिवी के अन्तिम क्षेत्र में स्थित सागर में गन्धमादन पर्वत पर
आकर उतरे।
पुनः पृच्छति तं पुत्रः कनिष्ठस्त्वपराजितः ।
विश्वकर्मा पुनर्वाक्यं श्रुत्वोवाच मुनीन्द्रकः ॥ २४ ॥
तब उन्हें पुनः उनके कनिष्ठपुत्र अपराजित ने प्रश्न प्रारम्भ किए और विश्वकर्मा
ने उनको सुनकर हे मुनीन्द्रक ! पुनः उत्तर देने आरम्भ किए।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
विश्वकर्मावतारधिकारो नाम द्वात्रिंशत्तमं सूत्रम् ॥ ३२ ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में विश्वकर्मा
अवतार नामक बत्तीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ३२ ॥
- यहाँ सम्भवतः 'विष्णुपुराण' की ओर सङ्केत है। पराशरकृत इस पुराण में कहा गया है कि महाराज पृथु
अपरा आजगव नामक दिव्य धनुष और दिव्य बाण लेकर क्रुद्ध होते हुए पृथ्वी के पीछे दौड़े। तब भय
से व्याकुल होकर पृथ्वी गौ का रूप धारण कर भागी और ब्रह्मलोकादि में पहुँची— ततस्तु
नृपतिर्दिव्यमादायाजगवं धनुः । शरांश्च दिव्यान्कुपितः सोन्वधावद्वसुन्धराम् ॥ ततो ननाश त्वरिता गौर्भूत्वा च
वसुन्धरा । सा लोकान्ब्रह्मलोकादीनान् सन्त्रासादगमन्मही । यत्र यत्र ययौ देवी सा तदा भूतधारिणी । तत्र
तत्र तु सा वैन्यं ददृशेऽभ्युद्यतायुधम् ॥ (विष्णु. 1, 13, 69-71)
सूत्र- ३३ 157
पृथुपृथिवीसंवादे भूर्लोके विश्वकर्मागमनं
त्रयस्त्रिंशं सूत्रम् ॥ ३३ ॥
विश्वकर्मोवाच —
शृणु वत्स महाप्राज्ञं संवादं च पृथोः क्षितेः ।
जम्बूद्वीपे पृथो राज्यमेकच्छत्रं समस्तकम् ॥ १॥
तेनावलोकिता चैव समुद्रान्ता च मेदिनी ।
पर्वतैः स्थलजैः सर्वैः सूत्रारम्भे समीकृता ॥ २॥
रसवा सर्वबीजानि ह्यात्मन्येव धृतानि च।
प्रजाश्च क्लेशितास्तस्माद् गृहीतात्मेच्छया तु सा ॥ ३॥
तदुच्छेदे समारब्धे निःसृता सा भयातुरा ।
ततः पृथ्वी भयोद्विग्ना पृथोश्च पृथिवीपतेः ॥ ४॥
विश्वकर्मा बोले — हे महाप्रज्ञ बुद्धिमान वत्स! पृथुराज का संवाद सुनो।
समस्त जम्बूद्वीप पर पृथुराजा का एकछत्र सार्वभौमिक राज था। उनकी देखी गई
समस्त भूमि को समुद्रान्त तक पर्वतों-पहाड़ियों की उबड़-खाबड़ स्थिति को
सूत्रता, समतलता, समान सतह की बना दी गई थी (ताकि वहाँ कृषि-कार्य
सरलता से हो सके) ।¹ उस धरा पर सब प्रकार के बीजों को स्वयं अपने हाथ में
लेकर प्रजा के क्लेश निवारणार्थ उन्होंने पृथ्वी को अपनी इच्छा के वशीभूत कर
उसको इकसार करने को प्रवृत्त हुए तो वह पृथ्वी निःश्वास छोड़ते हुए भयातुर
होकर और भय से उद्विग्न होकर पृथुराजा के पास पहुँची।
पृथ्वी उवाच —
तथागताऽब्रवीत्तत्र यत्र तौ परमेश्वरौ ।
रक्ष रक्ष महाभूत त्वमेव शरणं प्रभो ॥ ५॥
पास आकर पृथ्वी बोली— आप मेरे परमेश्वर हो, मेरी रक्षा करो, रक्षा करो। हे
प्रभु ! आप ही मेरे लिए उपयुक्त शरण स्थल हो।
- विष्णुपुराण में कहा गया है कि पृथु ने अपने धनुष की कोटि से सैकड़ों-हजारों पर्वतों को उखाड़ा व उन्हें एक
ही स्थान पर इकट्ठा कर दिया। इससे पूर्व पृथ्वी के समतल न होने से पुर और ग्राम आदि का कोई नियमित
विभाग नहीं था। उस समय अन्न, गोरक्षा, कृषि और व्यापार का कोई क्रम नहीं था। यह सब वेनपुत्र पृथु के
समय से ही आरम्भ हुआ है— तत उत्सारयामास शैलान् शतसहस्रशः। धनुष्कोट्या तदा वैन्यस्तेन शैला
विवर्द्धिताः ॥ न हि पूर्वविसर्गे वै विषमे पृथिवीतले । प्रविभागः पुराणां वा ग्रामाणां वा पुराऽभवत् ॥ न सस्यानि न
गोरक्ष्यं न कृषिर्न वणिक्पथः। वैन्यात्प्रभृति मैत्रेय सर्वस्यैतस्य सम्भवः ॥ (विष्णु. 1, 13, 82-84)
158 अपराजितपृच्छा
पृष्ठतश्च ततः प्राप्तः पृथुर्बाणधनुर्धरः ।
ब्रह्मणश्चाग्रतः स्थित्वा धनुर्बाणौ निवेदितौ ॥ ६ ॥
भूराज्यं च समस्तं च ह्यर्पितं ते हितैषिणः ।
अस्माभिश्च परित्यक्ता सम्प्राप्ता चाऽत्र मेदिनी ॥ ७ ॥
धनुर्बाणौ स्वर्पयित्वा पृथुस्त्वं पृथिविपतिः ।
मा भीस्त्वं वत्स राजेन्द्र राज्यं च तव मेदिनी ॥ ८ ॥
राजा पृथ्वी के पीछे (आजगव नामक) धनुष-बाण लिए आ रहे थे परन्तु उन्होंने
ब्रह्माजी को आगे खड़ा हुए देखा तो अपने धनुर्बाण ब्रह्मा को समर्पित कर दिए तब
उन्होंने पृथुराजा से कहा कि तुम्हारे हितैषी होकर ही तो समस्त भू राज्य को हमने
परित्याग करके तुम्हें अर्पित कर दिया था। इसी कारण यह मेदिनी तुम्हें आज तुम्हें प्राप्त
हुई है। इसलिए हे पृथुराजा, तुम धनुष-बाण को समर्पित करके भयभीत मत होना
क्योंकि हे वत्स ! राजेन्द्र पृथु अभी भी तेरा यह राज्य और तेरी ये पृथ्वी तेरी ही है।
धरित्री कम्पिता तत्र ब्रह्मा प्रोवाच सान्त्वयन् ।
मा भीर्धरे च पुत्री त्वं ज्ञातं कष्टं निवेदितम् ॥ ९ ॥
पृथो शृणु त्वं राजेन्द्र स्वयं रुद्रस्तु विश्वकृत् ।
करिष्यति द्वयोर्योग्यं धात्री स्यादमरावती ॥ १० ॥
इस पर ब्रह्मा ने धरती को कम्पायमान देखकर उसे ढाढ़स बंधाते हुए कहा कि
हे पुत्री धरा ! डरो मत। तुम्हें जो भी कष्ट हो, वह पूरी तक मुझसे कहो। हे राजेन्द्र
पृथु ! तुम सुनो कि स्वयं रुद्रावतार विश्वकृत विश्वकर्माजी तुम्हारे और पृथ्वी के दोनों
के बीच का निस्तारण बड़ी चतुराई के साथ करवा देंगे जिससे तुम्हारी यह धरती
अमरावती (इन्द्रपुरी) के समान हो जाएगी।
त्वत्पार्श्वे पुत्रि बीजानि तिष्ठन्त्वाकल्पमेव च ।
विषया रक्षणीयाश्च विश्वेश्वर तथा त्वया ॥ ११ ॥
पालनीयावुभौ त्वेवं पृथू राजा च मेदिनी ।
विश्वज्ञ हस्तकर्तस्त्वं श्रियमाधत्स्व चेतयोः ॥ १२ ॥
इसके बाद, उन्होंने धरती को सम्बोधित करते हुए उसे आश्वस्त किया कि हे
पुत्री ! तेरे पास रखे गए समस्त बीज कल्पों तक विद्यमान रहेंगे।¹ इसलिए ये कृषि
- अराजकता की स्थिति में पृथ्वी ने समस्त ओषधियों, बीजों को अपने में लीन कर लिया था, ऐसे में प्रजा
क्षीणकाय हो गई— अराजके नृपश्रेष्ठ धरित्या सकलौषधीः । प्रस्तास्ततः क्षयं यान्ति प्रजाः सर्वाः प्रजेश्वर। त्वत्तो
वृत्तिप्रदो धात्रा प्रजापालो निरूपितः । देहि नः क्षुत्परीतानां प्रजानां जीवनौषधीः ॥ (विष्णु. 1, 13, 67-68)
सूत्र-३३ 159
के समस्त विषय विश्वेश्वर विश्वकर्मा तथा तुम्हारे द्वारा भी रक्षणीय है। पृथिवीपति
पृथुराजा और मेदिनी पृथ्वी तुम दोनों को यह मेरा आदेश पालनीय होना चाहिए
जिससे कि विश्वज्ञ विश्वकर्मा के हाथ से किए गए तुम दोनों के कल्याण कार्य को
चित्त लगाकर पूरा कर सको। इसलिए तुम दोनों ही मिलकर विश्वकर्मा जगतपति
को इस प्रकार स्थापित कर दो, यह कहते हुए ब्रह्माजी ने उन दोनों को हस्त मिलाप
करवाकर परस्पर प्रतिबद्ध कर दिया।¹
उभावेवं च स्थाप्येतां विश्वकर्मन् जगत्पते ।
ब्रह्मणे च तथोभाभ्यां करयुग्मे च योजिते ॥ 13 ॥
विश्वकर्मा समुत्थाय चतुर्भिर्मानसैः सुतैः ।
संस्थितः पुष्पविमाने पृथु धरे च मानसे ? ॥ 14 ॥
जयो विजय आख्याताः सिद्धार्थस्त्वपराजितः ।
ततो हिमवतः पृष्ठे भूर्लोके तु समागताः ॥ 15 ॥
इसके साथ ही विश्वकर्मा को भी अपने चारों मानस पुत्रों के साथ उठने का
कहकर पुष्पक विमान में राजा पृथु, धरा व मानस पुत्रों को उसमें बिठाया जिससे वे
- समराङ्गणसूत्रधार में आया है कि ब्रह्मा ने पृथ्वी को अभयदान देते हुए पृथु से कहा कि यह पृथ्वी
तुम्हारे द्वारा विधिपूर्वक पालन किए जाने पर ही उपायों के सहारे से धान्यादि से तुम्हारी भोग्या बनेगी
और जो अभीष्ट स्थानादि निवेश का कार्य है, उसको त्रिदशाचार्य, सर्वसिद्धि प्रवर्तक, प्रभासवसु के पुत्र,
बृहस्पति के भानजे, सम्पूर्ण विश्व में महाप्राज्ञ विश्वकर्मा महाराज सम्पादित करेंगे— अथैकदा
जगज्जन्महेतुमम्बुरुहासनम्। पृथ्वी पृथुभ्रान्ता चकिताक्षी समाययौ ॥ प्रणम्य
प्रणतिपह्वनिखिलत्रिदशेश्वरम्। सगद्गदमुवाचेति भूतधात्री पितामहम् ॥ भगवन्नहमेतेन पृथुना पृथुतेजसा। उप
(द्र? द्रु) ता त्वां शरणं प्राप्ता त्रायस्व मां ततः ॥ वदन्त्यामिति मेदिन्यामाविरासीदथो पृथुः।
संरम्भमुक्तहृदयो ब्रह्माणं प्रणनाम च ॥ जगादैनमथ स्निग्धध्वनिगम्भीरया गिरा। कुर्वंस्तद्वाहनंसानां
पयोदध्वनिशङ्कितम् ॥ त्वयास्मि जगतां नाथ जगतोऽधिपतिः कृतः । स्थापितानि च भूतानि सर्वाण्यपि वशे
मम ॥ तेष्वियं मम विश्वेश कदाचिद् वशवर्तिनी। समीकरोमि पाषाणजालादस्याः किलाधुना ॥ व्यस्तानि
धनुषा तावद् गौर्भूत्वेयं पलायिता। दोग्धुकामोऽहमप्येनां चिरमन्वगमं महीम् ॥ यत्रक्वापि प्रयात्येषा तत्र
मामेव पश्यति। अपश्यन्त्यन्यतस्त्राणमुग्धा त्वामुपस्थिता ॥ अस्यां वर्णाश्रमस्थानविभागश्च विधास्यते। इयं
च दुर्गमानेकक्षोणीधर कुलाकुला ॥ विधास्येऽस्यां कथं त्वेतदिति मे शङ्कितं मनः। पृथुनेत्यथ विज्ञप्तो
भगवानब्जसम्भवः ॥ उवाच बोधयन्नेनं कृत्वा भूमिं च निर्भयाम्। इयं मही महीपाल विधिवत् पालिता
सती ॥ सस्यैरुत्पाद्य निष्पन्नैस्तव भोग्या भविष्यति। यच्च ते स्यादभिप्रेतं स्थानादिविनिवेशनम् ॥ तदेष
त्रिदशाचार्यः सर्वसिद्धिप्रवर्तकः । सुतः प्रभासस्य विभोः स्वस्त्रीयश्च बृहस्पतेः ॥ विद्याभिशायिधीः सर्वं
विश्वकर्मा करिष्यति। राजन्रेष महेन्द्रस्य विदधादमरावतीम् ॥ अन्या अप्यमुना रम्याः पुर्यो लोकभृतां
कृताः। त्वया क्षेत्रीकृतां मूर्त्तिं दृष्ट्वा साद्रिद्रुमामसौ ॥ सन्निवेशान् पुरग्रामनगराणां विधास्यति। तद् गच्छ वत्स
लोकानामितस्त्वं हितकाम्या ॥ भयोर्ज्जिता त्वमप्युर्वि पृथोः प्रियकरी भव। काले स्मृतः स्मृतः पुण्यो राज्ञः
प्रियचिकीर्षया ॥ इत्युक्तत्वा गमनमुपेयुषि प्रदेशे स्वं स्थानं क्षितिभुजि चाश्रिते मुदोर्व्याम्।
प्रालेयावनिभृतमाजगाम खेलत्सिद्धस्त्रीपरिगतमाशु विश्वकर्मा ॥ (समराङ्गण. 1, 6-24)
160 अपराजितपृच्छा
जय, विजय, सिद्धार्थ और अपराजित नाम से आख्यात मानस पुत्र हिमालय के पार्श्व
में भूलोक में आ गए।
पृथिवी प्रेषिता स्थाने सम्बोध्य भूतधारिणि ।
विना कष्टं त्वया ग्राह्यं कारयिष्ये तु निश्चलाम् ॥ 16 ॥
इसके बाद, पृथ्वी को उस प्रेषित स्थान में सम्बोधित किया कि हे पृथ्वी ! तुम
प्राणिमात्र को धारण करने वाली हो, यह बात तुम्हें बिना किसी कष्ट के ग्राह्य होनी
चाहिए अर्थात् तुम्हें स्वीकार लेनी चाहिए इसका तुम निश्चलमना होकर पालन करोगी।
नृपश्च प्रेषितः स्थाने पृथुः सम्बोधितस्तथा ।
यथामरावती चैव त्वदर्थे मेदिनी कृता ॥ 17 ॥
पृथो चागम्य स्वस्थाने यावत्त्वं पालयेर्महीम् ।
निर्जलान् सजलान् देशांस्तावत्त्वमवलोकय ॥ 18 ॥
पुष्पकेऽस्माकमारुह्य मेरुमावृत्य दक्षिणम् ।
आलोकय भूतधात्रीमासमुद्रान्तमेदिनी ॥ 19 ॥
राजा पृथु को भी प्रेषित स्थान पर पहुँचने पर ब्रह्मा ने सम्बोधित करते हुए
कहा कि हे पृथुराजा ! तुम्हारे लिए ही आज हमने इस मेदिनी को अमरावती के
समान बना दिया है इसलिए हे पृथु अब तुम स्वस्थान को जाओ और जब तक तुम
इस पृथ्वी का पालन करते रहोगे, तब तक तुम पाओगे कि तुम्हारे जो स्थान निर्जल
थे, वे सजल हो गए हैं। अब तुम हम सब लोगों को पुष्पक विमान पर आरूढ़कर
मेरुपर्वत के चारों ओर घूमकर दक्षिण की ओर ले चलो और इस समस्त पृथ्वी को,
जो कि प्राणीमात्र की माता के रूप में आसमुद्रान्त विस्तृत है, देख सको।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
पृथुपृथिवीसंवादे विश्वकर्मभूलोकागमनाधिकारो नाम त्रयस्त्रिंशत्तमं सूत्रम् ॥ 33 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में पृथु-पृथ्वी
संवाद में विश्वकर्मा के भूलोकगमन अधिकार नामक तैंतीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 33 ॥
जयविजयसिद्धार्थपृच्छा नाम चतुस्त्रिंशं सूत्रम् ॥ 34 ॥
अपराजित उवाच -
जयपृच्छागमश्चैव कस्मिन् स्थाने जगत्यते ।
विजयपृच्छागमश्च कुत्रस्थाने बभूव च ॥ 1 ॥
सिद्धार्थपृच्छागमश्च किं स्थाने च तथाभवत् ।
सूत्र-३४ 161
एवमस्मत् प्रसादं तु कुरु शास्त्रार्थकौशल ॥ २॥
(शिल्पादि आगम शास्त्रों की उत्पत्ति के प्रसङ्ग में कहा गया है) अपराजित
बोले— हे जगत्पते ! जयपृच्छागम किस स्थान पर और विजयपृच्छागम किस स्थान
पर हुए। इसी प्रकार सिद्धार्थपृच्छागम भी किस स्थान पर हुआ। इस विषय में हे
शास्त्रार्थ कौशल गुरुदेव ! हमें आप कृपाकर बताइए।
विश्वकर्मोवाच —
ततो हिमवतः पृष्ठे ब्रह्मलोकात्समागतौ ।
शृङ्गाकुले घवनाकीर्णे हिमवन्तश्रीयोद्गवे ॥ ३॥
नैकगुहाश्रमरम्ये गन्धर्वगणसेविते ।
सिद्धामरकुलाकीर्णे क्रीडामणिगुहागृहे ॥ ४॥
जयः पृच्छति तत्रेदां वास्तुविद्योद्भवं तदा।
तदिदं कथनीयं च शृणु संवादमुत्तमम् ॥ ५॥
उस समय हिमालय पर्वत की पीठ पर, पार्श्वभाग पर ब्रह्मलोक से आए हुए
(देवादि से), मेघों के समूह से आच्छादित शिखरों के समूहों की शोभा से हिमालय
पर्वत की श्रीवृद्धि हो रही थी। वहाँ पर गन्धर्वगणों से सेवित अनेकों रम्य गुहाश्रयों
का समूह था जिनमें सिद्धगण, देवतागणों के कुलों के समूह उन मणिगुहागृहों में
क्रीड़ा कर रहे थे। ऐसे में वहाँ जय ने वास्तुविद्या के उद्भव के विषय में प्रश्न किया
जो यहाँ कहना प्रासङ्गिक है। इसलिए इस संवाद को सम्यक् प्रकार से सुनो।
जयपृच्छादीनां परिचयमाह—
चतुर्विंशति₂₄ साहस्त्रसङ्ख्यग्रन्थस्तथा कृतः ।
लिङ्गपीठाचार्चानिलयवेश्मराजवेश्मादिकम् ॥ ६॥
पुरप्राकारपरिखाप्रतोलीमार्गगोपुरम् ।
अन्योपस्करजातानि वास्तुवेदोद्भवानि च ॥ ७॥
जयपृच्छादिशास्त्रं च विश्वकर्मप्रभाषितम् ।
जयस्य कथितं चैतद् भक्तित्वात्सल्यतः पुरा ॥ ८॥
(उस ग्रन्थ के विषय में कहा गया है कि) उक्त वास्तुविषयक ग्रन्थ की ग्रन्थ
संख्या 24 हजार थी। उसमें लिङ्ग, पीठ, प्रतिमा या अर्च्चा, निलय, वेश्म,
राजवेश्मादि, पुर, प्राकार, परिखा, प्रतोली, मार्ग, गोपुर और भी अनेक उपकरण
सामग्री जो कि वास्तुवेद के उद्भव में आवश्यक होती है, वे सब जयपृच्छादि शास्त्र
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में भगवान् विश्वकर्मा द्वारा कही गई है।¹ यह विषय-वर्णन पूर्वकाल में जय के
भक्तिवात्सल्य के कारण कहा गया था।
हेमकृटे महाशैले शतयोजनमुच्छ्रिते ।
विरूपाख्याश्रमे रम्ये विचित्रशिखरोद्भवे ॥ ९ ॥
नानाद्रुमलताकीर्णो रत्नधातुपशोभिते।
सुरविद्याधरारम्ये गन्धर्वगणसेविते ॥ १० ॥
विजयेन ततः पृष्टो वत्साहं भक्तवत्सलः।
श्लोका विजयपृच्छायां सहस्राणि च द्वादश₁₂ ॥ ११ ॥
हेमकूट महापर्वत पर, जो कि सौ योजन की ऊँचाई वाला है, उस पर विचित्र
मनोहर शिखरों के बीच बना हुआ विरूपाख्य नामक आश्रम बड़ा ही सुन्दर है।
वहाँ नाना वृक्ष, लतादि की भरमार है और तरह-तरह के रत्नों, धातुओं से
शोभायमान है। वहाँ विजय ने भक्तवत्सल भगवान् विश्वकर्मा से प्रश्न किया कि हे
प्रभु! आपका वत्स हूँ। आप मुझे उपदेश करे। इस पर विश्वकर्मा ने जो उपदेश
किया, उससे विजयपृच्छा शास्त्र निर्मित हुआ इसमें बारह हजार श्लोक हैं।
ततघनमुरजादिवादित्रैर्विविधैस्तथा।
लास्यहास्यताण्डवाद्यैस्तालमूलसमुद्भवाः !' ౨ ॥
सप्तस्वरास्त्रयो ग्रामा मूर्च्छनास्त्वेकविंशतिः ।
ताना एकोनपञ्चाशदित्येतत्स्वरमण्डलम् ॥ १३ ॥
रागाः षट् समुत्पन्नाः षट्त्रिंशच्चैव तत्स्त्रियम्।
एतत्सर्वं विजयस्य कथितं भरताभिधम् ॥ 14 ॥
- इस ग्रन्थ का खण्डित पाठ वर्तमान में उपलब्ध है। हेमाद्रि कृत चतुर्वर्गचिन्तामणि में जयोपदिष्ट वास्तु,
मूर्ति विषयक श्लोक उपलब्ध होते हैं। जयपृच्छा ग्रन्थ का सम्पादन प्रभाशङ्कर ओघड़भाई सोमपुरा ने
किया है किन्तु वह पूर्ण नहीं है। लगभग समस्त श्लोक भ्रष्ट हैं। 'देवतामूर्तिप्रकरण' भी जय-विश्वकर्मा
संवाद के रूप में लिखा गया है जिसका सम्पादन डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू' ने किया है। इससे यह सङ्केत
मिलता है कि यह ग्रन्थ जयपृच्छा के ही मूर्ति विषयक अधिकार या रूपाधिकार का अङ्ग है। 16वीं
सदी में इसके पुनर्सम्पादन का श्रेय चित्तौड़गढ़-कुम्भलगढ़ के सूत्रधार मण्डन के पिता सूत्रधार खेता को
दिया जाता है क्योंकि इसमें मस्जिद (रहमानप्रासाद) निर्माण तक के निर्देश मिलते हैं। जयपृच्छा नाम
से ही एक अन्य पाठ भी मिलता है, इसका प्रचलन मालवा से हुआ माना जाता है। इसका खण्डित पाठ
मिलता है। धाराधिप भोजराज के सूत्रधार मल्लकृत 'प्रमाणमञ्जरी' में उक्त ग्रन्थ का सङ्केत आया है—
अथोच्यते सारतरस्य सारं काश्योदयालिन्दसमुद्भवं तम्। मानं समस्तं जयवीक्षदृष्टं सुशिल्पिकं
सर्वजनोपकृत्यम्॥ (प्रमाणमञ्जरी 2) चित्तौड़गढ़ के महाराणा कुम्भा (1433-68 ई.) ने कीर्तिस्तम्भ
की एक शिला पर स्तम्भराज को उत्कीर्ण करवाया था जिसमें जयकृत ग्रन्थ का उल्लेख है— स्तम्भस्य
लक्ष्मानुते नृपालः श्रीकुम्भकर्णो जयभाषितेन॥ (डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू' : प्रासादमण्डनम् की भूमिका)