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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 535 में से

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पृष्ठ 196

148 अपराजितपृच्छा
कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को उत्पत्ति हुई तब हे विश्वपति ! दीपोत्सव मनाया गया और
अन्य महोत्सव रूप में पाँच तृतीया भी अगली तिथि (के पूर्ण अथवा उदयव्यापिनी)
सहित मानी गई है। आप स्वयं साक्षात् रुद्रमूर्ति विश्वकृत और विश्वशेखर है।
विश्वकर्मोवाच —
दीपोत्सवः कथं देव किमर्थश्च तदुद्भवः।
सुरोरगासुरनराः कुर्वन्ति कथमुत्सवम्॥ 16 ॥
विश्वकर्मा बोले — हे प्रभु ! दीपोत्सव क्या है और इसका प्रचलन किसलिए
है? देवता, नाग, असुर और मानवगण यह उत्सव कैसे मनाते हैं, सो कहिये।
ईश्वर उवाच —
द्वादश₁₂ दीपोत्सवानां श्रेष्ठाः स्युः कार्त्तिकादितः।
शिवरात्रयो द्वादश व्रतानामुत्तमा मताः॥ 17 ॥
आद्या मार्गशिरे कृष्णचतुर्दश्यां तिथौ भवेत्।
त्रयोदश्यामेकभोजी ह्युपोष्या च चतुर्दशी॥ 18 ॥
स्नानं कृत्वा चोदकेन यस्तिष्ठेलिङ्गमाश्रितः।
दिनान्ते च निशाप्राप्तौ कुर्याद् वै दन्तधावनम्॥ 19 ॥
ईश्वर बोले — कार्त्तिकादित¹ या कार्तिक से आरम्भ होने वाले बारह (मासों
के) दीपोत्सव श्रेष्ठ है और बारह शिवरात्रियों को व्रतों के लिए उत्तम माना गया है।
होगी— अज, अतुल, अधिकर्मिक, अधिनायक, अधिष्ठाता, अधीश्वर, अभिधेय, अभिनन्द्य, अभिरक्षक,
अभ्युदयकारी, अमन्द, अर्चनीय, आढ्यङ्कुर, आदिकर, आदिकर, आनन्त्य, आनन्दन, आयःशूलिक,
आराधनीय, ईरेश, ईक्षक, ईश्वर, उच्छण्ड, उत्तमश्लोक, उत्पादक, उद्यमी, एकाक्षर, एकान्त, ऐकात्म्य,
ऐश्वर्यवन्त, ओजस्वी, औपमिक, क, कष्टक विशोधक, कल्याणक, कार्मुक, कालाध्यक्ष, कालक्ष,
कीर्तिकीय, कुशाग्रबुद्धि, कृतकार्य, कृताभरण, कृतायास, कृतधी, कृतप्रतिज्ञ, कृतलक्षण, कृतसङ्कल्प,
कृतहस्त, कृती, कृत्य, कृपालु, केवक, केलिमुख, कौतुकप्रिय, क्रतुप्रिय, क्रतुपति, क्रियापटु, क्वाचित्क,
क्षन्ता, क्षिप्रकारी, ख्यातिप्राप्त, गणितज्ञ, गण्डकघ्न, गमनीय, गुणी, चक्रवर्ती, चक्री, चक्षुर, चण्ड,
चण्डविक्रम, चारक, चित्रकार, चिन्मय, छत्वरक, जगतीश्वर, जगत्स्त्रष्टा, जनाश्रय, जागरूक, जिष्णु,
तक्षक, तितिक्षु, तक्षिणकर्मी, त्यागी, त्रिकालविद्, त्वष्टा (त्वष्ट्र), दक्ष, दाता, दिव्य, दिष्णु, दृस, देववर्धिक
, धृतात्मा, नन्दक, नमस्य, नित्य, निपुण, नियामक, निरज, पटु, पारङ्गत, पृथु, ब्रह्मवत्, विश्वात्मा,
विश्वकर्मा, सर्वेश्वर और सृष्टिकर्ता। (शिल्पशास्त्रम् : सम्पादक-अनुवादक : श्रीकृष्ण 'जुगनू', चौखम्बा
संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी, 2008 ई., भूमिका, पृष्ठ 15)

  1. यहाँ कार्त्तिकादि वर्षारम्भ का सङ्केत है जो कि मेवाड़ के बाद गुजरात आदि में अद्यावधि प्रचलन में है।
    अन्यत्र चैत्रादि या श्रावणादि वर्षारम्भ किया जाता है। ग्रन्थ के 19वें सूत्र (14-15) में भी इसी क्रम से
    गणना है। विष्णु आदि पुराणों से ज्ञात होता है कि पूर्व गुप्तकाल तक नक्षत्रों की गणना कृत्तिकादित थी,
    वराहमिहिर ने प्रथमतः अश्वन्यादित गणना की। यहाँ बारह शैवव्रतों का विधान किया गया है।