सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 199

सूत्र-३१ 151
मार्गशीर्ष और पौष के मध्य में पड़ने वाली शिवा संज्ञक चतुर्दशी स्वर्गादि भोग
देने वाली है और पौष व माघ के मध्य पड़ने वाली शान्ता नामक चतुर्दशी
कल्याणकारिणी है।
माघफाल्गुनयोर्मध्ये सिद्धिदा सर्वसिद्धिदा।
ख्याता जया फाल्गुनान्ते विजयस्वर्गराज्यदा ॥ ३३॥
माघ व फाल्गुन के मध्य में आने वाली सिद्धिदा चतुर्दशी समस्त सिद्धियों को
देने वाली है और फाल्गुन के अन्त में आने वाली जय नाम से ख्यातिलब्ध चतुर्दशी
विजय व स्वर्ग का राज्य देने वाली है।
मनोरमा च चैत्रार्धे मनोरथप्रदायिनी।
वैशाखज्येष्ठयोर्मध्ये कान्ता च स्वर्गभुक्तिदा ॥ ३४॥
चैत्र मास के मध्य में आने वाली मनोरमा चतुर्दशी मनोरथों को पूर्ण करने
वाली और वैशाख व ज्येष्ठके मध्य में आने वाली कान्ता चतुर्दशी स्वर्ग और मुक्ति
देने वाली कही गई है।
ज्येष्ठाषाढयोर्मध्ये च आह्लादाऽऽह्लाददायिनी ।
आषाढार्धे तथा ख्याता सौम्या देवत्वदायिनी ॥ ३५॥
ज्येष्ठ व आषाढ़ के मध्य में आने वाली आह्लादा चतुर्दशी आह्लाद देने वाली है
जबकि आषाढ़ के आधे में आने वाली सौम्या चतुर्दशी देवत्व देने वाली के रूप में
प्रसिद्ध है।
श्रावणार्धे शुभा ख्याता तेजः सौभाग्यवर्द्धनी।
मणिप्रभा भाद्रपदे संसारे च मणिप्रदा ॥ ३६॥
श्रावण मास के आधे में पड़ने वाली शुभा चतुर्दशी तेज और सौभाग्यवर्द्धिनी
के रूप में विख्यात है और भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी मणिप्रभा के नाम
से संसार में मण्यादि रत्न प्रदान करने वाली है।
आश्विने च तथा मासे विश्वा त्रैलोक्यतोषदा ।
कार्तिके कृष्णपक्षे तु तथा विश्वकृदुद्भवा ॥ ३७॥
इसी प्रकार आश्विन मास में पड़ने वाली विश्वा चतुर्दशी तीनों ही लोकों में
सन्तुष्टि प्रदान करने वाली है जबकि कार्तिक मास के कृष्णपक्ष में पड़ने वाली
चतुर्दशी को विश्वकृदुद्भवा कहा गया है।
तास्तु समस्तदेशेषु दीपोत्सवसमुद्भवाः ।
कैलासे च पुरे रम्ये विख्याताश्च महीतले ॥ ३८॥